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कहानी- अंतिम अध्याय (Short Story- Antim Adhyay)

यदि इश्क़ छुपाना कठिन है, तो उसका इज़हार कर पाना भी आसान नहीं होता. लेकिन प्यार मौन और अनकहा रहकर भी उतना ही सच्चा हो सकता है और शब्दों में बंधे बिना भी व्यक्त हो जाता है. अमृता तो मन की बात समझ लेने में यूं भी माहिर थी. बाद में जो कुछ हुआ, वह उसके बस में नहीं था. हमने अपने प्यार का इज़हार शब्दों में किया होता, तो भी क्या कर लेती वो? हमारे जीवन में प्रारब्ध का कितना हाथ है यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन हाथ की लकीरों में लिखा रहता हो या फिर माथे की, नियति अपना खेल दिखाती अवश्य है. Short Story बहुत अंतर था गांव और शहर के जीवन में. परंतु गांव का स्कूल दसवीं कक्षा तक ही था. उस वर्ष मामा जब मां से राखी बंधवाने आए, तब बोले, “बहुत मेधावी है तुम्हारा बेटा. इसे मेरे साथ शहर भेज दो. पढ़-लिखकर कुछ बन जाएगा, तो मुझे इस बात की संतुष्टि होगी कि मैं तुम्हारे लिए कुछ कर पाया.” यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे जितने अच्छे मामा मिले थे, उतनी ही अच्छी मामी भी थीं, जिन्होंने मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया और अपने ही बच्चों जैसा स्नेह भी दिया. मामा ने मेरा दाख़िला उसी स्कूल में करवा दिया, जिसमें उनके अपने बेटे उपेन्द्र ने उसी वर्ष बारहवीं पास की थी. कहां गांव का दो कमरोंवाला कच्चा स्कूल, जिसमें न तो अध्यापक नियमित रूप से आते थे और न ही बैठने की पूरी व्यवस्था ही थी और कहां शहर का यह नामी स्कूल, जिसमें यदि फीस ऊंची थी, तो सुविधाएं भी पूरी थीं. नियमित रूप से पढ़ाई, हवादार बड़े-बड़े कमरे और लंबा-चौड़ा खेल का मैदान. मेरे नंबर अच्छे होने के कारण मुझे दाख़िला तो मिल गया था, लेकिन मैं थोड़ा घबराया हुआ भी था. शुरू में उपेन्द्र ने मेरा खुले दिल से स्वागत किया. दो बहनों का अकेला भाई, मुझमें उसे अपना एक संगी मिल गया. उम्र में भी बस दो साल का अंतर था, अतः वह मेरे जीवन का सखा, गाइड सब कुछ बन गया. मैं उसे अपने मन की हर बात कहता और हर बात पर उससे सलाह लेता. पढ़ाई में उपेन्द्र की विशेष रुचि नहीं थी. शायद उसे अपने पिता का जमा-जमाया व्यापार नज़र आ रहा था, लेकिन मामा-मामी चाहते थे कि व्यापार में आने से पहले उपेन्द्र अच्छे से पढ़-लिख ले. उन्होंने अपनी दोनों बेटियों का विवाह भी उच्च शिक्षा दिलवाने के बाद ही किया था. लेकिन उपेन्द्र को प्रोत्साहित करने के लिए जब कभी वे मेरी लगन व मेहनत का उदाहरण रखते, तो उसके चेहरे पर ईर्ष्या की एक लहर दौड़ जाती. बारहवीं में नंबर कम आने के कारण किसी अच्छे कॉलेज में दाख़िला मिलने की संभावना नहीं थी, सो मामा ने एक प्राइवेट कॉलेज में उपेन्द्र का एम.बी.ए में दाख़िला करवा दिया. आज पीछे मुड़कर देखता हूं, तो यूं लगता है, जैसे यह जीवन भी एक लंबी कहानी ही तो है- हर व्यक्ति की अपनी अलग कहानी, अपने अलग-अलग सुख-दुख. ग्रामीण जीवन के अपने अध्याय को समाप्त कर शहरी जीवन में ढलने को मैं प्रयत्नरत था, पर यह सब इतना आसान भी न था. मामा मेरी इस कठिनाई को समझते थे कि अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद मैं इस नए माहौल में असहज महसूस कर रहा हूं और अकारण ही अपने दोस्तों की हंसी का पात्र भी बनता हूं. जब तक उपेन्द्र स्कूल में था, तब तक अन्य लड़कों को थोड़ा डर रहता था, पर उपेन्द्र व उसके साथी सब स्कूल पास कर चुके थे. यह भी पढ़ेनाम के पहले अक्षर से जानें कितना रोमांटिक है आपका पार्टनर? (First Letter Of Name Tells How Romantic Is Your Partner) मामा के एक परिचित की बेटी थी अमृता, जो उसी स्कूल में पढ़ती थी. वह मुझसे दो वर्ष जूनियर थी, उसी माहौल में ढली होने के कारण आत्मविश्‍वास था उसमें. मामा ने मेरी ज़िम्मेदारी उसी को सौंप दी. वह आधी छुट्टी के व़क्त और वैसे भी यदा-कदा मुझसे बात करने आ जाती. कह सकते हैं कि मुझे तिनके का सहारा मिल गया था और इससे मेरे दोस्तों द्वारा मेरा मज़ाक उड़ाना कम भी हो गया. मैं भी धीरे-धीरे अपने पांव जमाने लगा. स्कूल में तो अमृता से मुलाक़ात होती ही, पारिवारिक मैत्री होने के कारण अन्य अवसरों पर भी हो जाती. अन्य लड़कियों से बहुत अलग थी वो. कोमल और संवेदनशील. यूं वो कम ही बोलती थी, पर नारी सुलभ गुण के चलते वो मेरी परेशानी और मन की बात का सहज अनुमान लगा लेती. मैं उसकी मां से भी कई बार मिला था. वे स्नेहपूर्वक मेरा आवभगत करतीं. साल बीतते रहे और मैं स्कूल पार करके कॉलेज भी पहुंच गया. मुझे ज़िंदगी अब अच्छी लगने लगी थी, क्योंकि अमृता अच्छी लगने लगी थी. बिना किसी आहट, बिना मेरे जाने, न जाने कब वो मेरे दिल में समा गई थी. यह मेरे जीवन के मधुरतम दिन थे और अज्ञानवश मैं यह मान बैठा था कि जीवन का यह अध्याय सदैव यूं ही चलता रहेगा. प्यार हमारी कमज़ोरी भी बन सकती है और ताक़त भी. मैंने अपने प्यार को अपना प्रेरणास्रोत बना लिया. मैं जानता था कि उसे पाने के लिए मुझे अन्य लड़कों से कहीं अधिक कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. पढ़ाई में मेहनत कर मैं कितने भी अच्छे नंबर पा लूं, तब भी था तो मैं अनगढ़ ही. गांव से लाकर शहर में रोप दिया गया एक पौधा. मेरे बातचीत करने का सलीका, मेरा एटीकेट और सामान्य ज्ञान उन लोगों के मुक़ाबले नगण्य था, जो शहरी माहौल में पले-बढ़े थे, जिन्होंने अच्छे स्कूलों में शिक्षा पाई थी. यदि इश्क़ छुपाना कठिन है, तो उसका इज़हार कर पाना भी आसान नहीं होता. लेकिन प्यार मौन और अनकहा रहकर भी उतना ही सच्चा हो सकता है और शब्दों में बंधे बिना भी व्यक्त हो जाता है. अमृता तो मन की बात समझ लेने में यूं भी माहिर थी. बाद में जो कुछ हुआ, वह उसके बस में नहीं था. हमने अपने प्यार का इज़हार शब्दों में किया होता, तो भी क्या कर लेती वो? हमारे जीवन में प्रारब्ध का कितना हाथ है यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन हाथ की लकीरों में लिखा रहता हो या फिर माथे की, नियति अपना खेल दिखाती अवश्य है. ग्रेजुएशन के बाद मुझे देहरादून की मिलिट्री एकेडमी में प्रवेश मिला गया. छुट्टियों में मां से मिलने गांव तो जाता ही, परंतु साल के बीच एक-दो चक्कर मेरठ मामा के घर भी लगा आता और अमृता से भी मिल आता. अमृता की मां को हमारी दोस्ती की जानकारी भी थी और स्वीकार्य भी. ट्रेनिंग पूरी करके लेफ्टिनेंट बना ही था कि मामाजी का पत्र मिला, जिसमें उपेन्द्र के विवाह की सूचना थी. निमंत्रण-पत्र भी साथ था. उपेन्द्र का विवाह अमृता से हो रहा था. लंबा-चौड़ा आयोजन, जिसमें पांच दिन चलनेवाले कार्यक्रमों की फेहरिस्त थी. मैं हैरान रह गया. अभी ही तो मेरा करियर बना था और समय आया था कि मैं उसे प्रपोज़ कर सकूं. वैसे भी इससे पहले किस बूते पर उसके माता-पिता से बात करता? पर क्या अमृता भी यही चाहती थी? इसी प्रश्‍न का उत्तर पाने मैं मेरठ जा पहुंचा. पहली बार ऐसा हुआ था कि मैं मामा के घर न जाकर सीधे अमृता के घर गया था. घर में उसकी मां अकेली थीं और अमृता मामी के साथ विवाह की ख़रीददारी करने बाज़ार गई हुई थी. मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी. चाय का प्याला पकड़ाते ही उन्होंने स्वयं ही बात छेड़ी. दरअसल, मेरे मामा और अमृता के पापा एक ही क्लब के मेंबर थे. वहीं पर मामाजी ने अमृता के पापा से कहा कि उपेन्द्र उनकी बेटी से विवाह करने को इच्छुक है. अमृता के पापा को प्रस्ताव पसंद आ गया. जाना-पहचाना, पढ़ा-लिखा परिवार, अच्छा व्यवसाय और भला क्या चाहिए था उन्हें? उन्होंने फ़ौरन हामी भर दी. अमृता की मां ने समझाने की बहुत कोशिश की कि एक बार अमृता से ज़रूर बात कर लेनी चाहिए, लेकिन अमृता के पिता उनमें से थे, जो स्वयं को ही सबसे समझदार व्यक्ति समझते हैं. ऐसे लोग सलाह-मशविरा नहीं करते, केवल फैसला सुनाते हैं, जिसे मानना अनिवार्य होता है. और उनके अपने विचार से अमृता के लिए इससे बेहतर रिश्ता और क्या हो सकता था. यह जानकर कि विवाह का प्रस्ताव स्वयं उपेन्द्र की तरफ़ से आया है मुझे बहुत अचंभा हुआ, चोट भी लगी. मामा-मामी न सही, उपेन्द्र तो भली-भांति मेरे इस प्यार से परिचित था. जैसे मैं अपनी हर परेशानी उससे बांटता था, वैसे ही अमृता के बारे में भी हर बात मैंने उसे बताई थी. कभी वह मज़ाक में कहता कि तुमने तो आते ही सबसे अच्छी लड़की पटा ली और कभी अनजाने में व्यंग्य भी करता कि तुम जैसे मिट्टी के माधो को अमृता जैसी समझदार लड़की कैसे पसंद करती है, यह मेरी समझ के बाहर है. यह भी पढ़े5 तरह के होते हैं पुरुषः जानें उनकी पर्सनैलिटी की रोचक बातें (5 Types Of Men And Interesting Facts About Their Personality) विवाह पर जाना तो लाज़िमी था, सो गया, पर केवल बारात में. और फिर छुट्टी न होने का बहाना बनाकर लौट आया. बहुत ख़ुश थे मामा-मामी और उनसे कोई गिला भी न था मुझे. इसमें कोई शक़ नहीं था कि वहां पर अमृता ख़ुश रहेगी. मामा-मामी बहुत अच्छे थे, संपन्न घर था और उपेन्द्र भी ज़रूर मन ही मन उसे चाहता रहा होगा, तभी तो विवाह का प्रस्ताव रखा और क्या चाहिए ख़ुशियों के लिए. तहेदिल से अमृता की ख़ुशियों की कामना कर मैं लौट आया और मान लिया कि मेरी कहानी की इति हो चुकी है. लेकिन उपन्यासों के उपसंहार भी तो हुआ करते हैं न. लगता है मेरी कथा का उपसंहार लिखना अभी शेष था. शायद लड़कियों में जीवन से समझौता करने की शक्ति हम पुरुषों से अधिक होती है. ख़ैर, मुझमें नहीं थी और फलस्वरूप मैं मामा के घर जाने से कतराता रहा. उपेन्द्र का बेटा हुआ और वह चार साल का भी हो गया, पर मैं उस घर में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. मां से पता चला कि उपेन्द्र का बेटा शिवम बहुत बीमार है और डॉक्टरों ने उसे रक्त का कैंसर बतलाया है. मेरी आंखों के सामने अमृता का उदास चेहरा दिनभर घूमता रहता. एक मां के लिए अपने बच्चे के दुख से बढ़कर कोई दुख नहीं हो सकता. अमृता की खोई ख़ुशी लौटाने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था, पर मैं वहां जाकर उसे ढाड़स बंधाने का साहस भी नहीं जुटा पा रहा था. बस, प्रार्थना भर कर सकता था और वही कर रहा था. सबकी मिली-जुली दुआओं का ही असर था कि आगे टेस्ट कराने पर उसे रक्त कैंसर की वह क़िस्म एएलएल निकली, जो गंभीर होते हुए भी लाइलाज नहीं थी. अब उसका इलाज संभव हो चुका है. यद्यपि वह लंबा और कष्टप्रद है, क़रीब साढ़े तीन साल तक चलनेवाला. कैंसर सेल ख़त्म करने के लिए दवाइयां इतनी स्ट्रॉन्ग दी जाती हैं कि मरीज़ का स्वस्थ ख़ून भी प्रभावित होता है. फलस्वरूप मरीज़ को अनेक बार बाहरी ब्लड चढ़ाने की ज़रूरत पड़ती है. एक कठिनाई यह भी थी कि शिवम का ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव था, जो बहुत कम लोगों का होता है और डॉक्टरों की राय में ख़ून ब्लड बैंक से न लेकर किसी स्वस्थ एवं युवा व्यक्ति का ही दिया जाना चाहिए. उपेन्द्र का अपना ब्लड ग्रुप वही था, लेकिन ब्लड इतने कम अंतराल से दिया जाना था कि एक ही व्यक्ति से बार-बार ब्लड नहीं लिया जा सकता था. मुझे पता चलते ही मैंने अपना ब्लड देने की ठानी, क्योंकि मेरा भी वही ब्लड ग्रुप था. मैंने फ़ौरन फोन पर ही उपेन्द्र से बात की और उसे आश्‍वस्त किया कि जितनी बार भी आवश्यक होगा मैं अपना ब्लड दूंगा. यूं हम बारी-बारी शिवम को ब्लड देने लगे. उपेन्द्र मुझे निश्‍चित तारीख़ बता देता और मैं उसी दिन सीधे अस्पताल पहुंच जाता. इस बीमारी में मरीज़ की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है और उसे इंफेक्शन बहुत जल्दी पकड़ सकता है, अतः उसे सबसे अलग रखा जाता है. केवल एक ही व्यक्ति नहा-धोकर और साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखते हुए उसके पास बैठ सकता है. अमृता भीतर कमरे में बेटे के संग रहती और मेरी मुलाक़ात बाहर स़िर्फ उपेन्द्र से ही होती. उसके बाद मैं घर जाकर मामा-मामी से मिलकर लौट आता. तीसरी बार जब मैं ब्लड देने गया, तो शिवम की सेहत में काफ़ी सुधार था. हालांकि दवाइयां अभी लंबे समय तक चलनी थीं. डॉक्टर आश्‍वस्त थे कि ख़तरा टल गया है और फ़िलहाल और ब्लड देने की ज़रूरत नहीं. सदैव की भांति अमृता भीतर कमरे में शिवम के पास थी. लौटते समय मैंने उपेन्द्र को आश्‍वस्त किया कि कोई भी आवश्यकता पड़ने पर मुझे बता दे, मैं तुरंत आ जाऊंगा. उपेन्द्र ने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर कहा, “मैं तुम्हारा यह एहसान ज़िंदगीभर नहीं भूलूंगा. तुमने हमारे बुझते चिराग़ को फिर से रौशन करने में मदद की है.” मैं कैसे कहता उससे कि ये सब मैंने तुम्हारे लिए नहीं अमृता के लिए किया है. मेरे लिए आज भी अमृता की ख़ुशी सर्वोपरि है. अब तो मेरी कहानी का उपसंहार भी लिखा जा चुका है और मैंने क़िताब बंद कर दी है, निश्‍चय के साथ कि अपने अतीत में अब कभी नहीं झांकूंगा और न ही भविष्य की सोचूंगा. बस, केवल वर्तमान में ही जीऊंगा. मैंने अमृता के संग ज़िंदगी गुज़ारने का सपना देखा था, जो पूरा नहीं हुआ. सौभाग्यशाली होते हैं वे, जिनका प्यार परवान चढ़ता है, लेकिन जिनका नाक़ामयाब रह जाता है, दास्तान तो उनकी भी होती है न! और सबसे बड़ी बात यह कि प्यार में क़ामयाब न हो पाने का मतलब यह क़तई नहीं है कि उनकी निष्ठा में कोई कमी रह गई थी. एक बात और, कहा जाता है कि कच्ची उम्र का प्यार महज़ एक दैहिक आकर्षण होता है, विपरीत लिंगी में जगी नई उत्सुकता मात्र. मुझे तो याद नहीं आता कि मैंने हाथ बढ़ाकर कभी अमृता को छूने का प्रयत्न भी किया हो. सच तो यह है कि किशोरवय और यौवन की दहलीज़ पर खड़ा वह समय, जब दुनिया और उसके स्वार्थ से अभी वास्ता नहीं प़ड़ा होता, बस उसी समय का प्यार ही वास्तविक प्यार होता है, निश्छल और निर्मल. और ऐसा जीवन में स़िर्फ एक ही बार हो सकता है. सूखी धरती पर वर्षा की पहली फुहार महसूस की है कभी? किस तरह महक उठती है कुंआरी धरती इस पहले मिलन से. बाद में कितना भी बरस ले, जलमय हो जाए पृथ्वी पर वो सोंधी महक फिर नहीं उठती कभी. ठीक वैसा ही होता है अपरिपक्व उम्र का वो पहला प्यार! Usha Drava         उषा वधवा

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