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बच्चों का कैसे बनाएं रिस्पॉन्सिबल? (How to Make Your Children Responsible?)

छोटी उम्र में बच्चों की परवरिश में थोड़ी-सी भी लापरवाही उन्हें लापरवाह बना सकती है. इसलिए ज़रूरी है उम्र के शुरुआती दौर में ही उन्हें तमाम अच्छी आदतें सिखाई जाएं, उन्हें ज़िम्मेदारी का पाठ पढ़ाया जाए, कैसे सिखाएं अपने बच्चों को ज़िम्मेदारी का पाठ? आइए जानते हैं.

नो लेक्चर प्लीज़

हर बात पर टोकना बच्चों को चिड़चिड़ा बना देता है. बच्चों की ज़रा सी ग़लती पर पैरेंट्स उन्हें नॉन-स्टॉप उपदेश देना शुरू कर देते हैं. आपकी इस आदत से बच्चा कुछ सीखने की बजाय उसे अनसुना करना शुरू कर देता है. उम्र के शुरुआती दौर से ही बच्चों को छोटी-छोटी बातों, जैसे- चॉकलेट खाकर उसका रैपर डस्टबिन में डालना, अपने खिलौनों को समेटना आदि सिखाएं. जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसे उसका छोटा-मोटा काम करना सिखाएं. इस तरह से बच्चा ख़ुद-ब-ख़ुद अपने काम करना सीख जाता है.

नज़रअंदाज़ ना करें

कानपुर की मिसेज़ शालिनी से जब मैंने उनके 10 साल के बेटे कार्तिक की लापरवाही के बारे में बताया, तो उनकी प्रतिक्रिया सुनकर मैं दंग रह गई. शालिनी ने कहा, “बच्चा है. इस उम्र में लापरवाही नहीं करेगा, तो कब करेगा? बड़ा होकर अपने आप सुधर जाएगा.” अगर आप भी शालिनी की ही तरह अपने बच्चे की छोटी-मोटी लापरवाही को नज़रअंदाज़ कर रही हैं, तो संभल जाइए. आगे चलकर यही लापरवाही आपको बहुत महंगी पड़ सकती है.

अचानक मना न करें

जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, ख़ुद को समझदार समझने लगता है. ऐसे में आपके बार-बार किसी बात पर मना करने पर उसे बुरा लगता है. उदाहरण के लिए अगर आपका लाड़ला/लाड़ली कंप्यूटर पर गेम खेल रहे हैं और आप उसे तुरंत बंद करने को कहते हैं, तो उन्हें बुरा लगता है और वो चिढ़ जाते है. इसलिए जब भी आप उन्हें किसी बात के लिए मना करें तो थोड़ा समय ज़रूर दें. जैसे- रोहन अब बस बेटा अगले 5 मिनट में आप कंप्यूटर बंद करके पढ़ने बैठ जाएंगे या फिर अगले दिन बच्चे को उसी बात के लिए प्यार से समझाएं.

ख़ुद में सुधार

कई बार बच्चे जिस तरह से आपको देखते हैं, वैसा ही व्यवहार करते हैं, जैसे- कई घरों में घर के सभी काम के अलावा पति का सारा काम भी पत्नी को करना पड़ता है. ऐसे में जब आप अपने बच्चे को उसका काम ख़ुद करना सिखाते हैं, तो वो ये कहते हुए इंकार कर देता है कि पापा भी तो अपनी चद्दर तह नहीं करते या फिर खाने की प्लेट किचन में नहीं रखते. इसलिए पति-पत्नी दोनों को बड़ी ही समझदारी से बच्चे के सामने पेश आना चाहिए और उसे कुछ सिखाने या कहने से पहले ख़ुद में सुधार करना चाहिए.

कुछ भी न थोपें

बच्चे को कुछ नया सिखाने के लिए बहुत ज़रूरी है कि आप संयम से काम लें. दूसरों के कहने पर या फिर अपनी मर्ज़ी चलाते हुए कुछ भी उन पर थोपने से बचें. पैरेंट्स होने के नाते आपको बड़ी ही समझदारी से काम लेना चाहिए. आपके एक ग़लत क़दम से आपका बच्चा बिगड़ सकता है. इसलिए जितना ज़रूरी हो, उतना ही उनको बोलें.

बाउंड्री लाइन सेट करें

बढ़ती उम्र के साथ बच्चा धीरे-धीरे पैरेंट्स की हर बात का जवाब देने लगता है. ऐसे में उससे हर बात पर बहस करने की बजाय शांत रहें. भागलपुर के 35 साल के आनंद का कहना है, “मेरी 12 साल की बेटी है. अब ज़माना इतना बदल चुका है कि कई बार चाहकर भी मैं उसे किसी चीज़ के लिए मना नहीं कर पाता. जैसे- जैसे वो बड़ी हो रही, मेरी ज़िम्मेदारी बढ़ती जा रही है. कई बार ऐसा होता है कि वो किसी बात को सुनने और मानने की बजाय मुझसे बहस करने लगती है. ऐसे में मैं ख़ुद ही शांत हो जाता हूं. इस तरह से एक प्वाइंट पर वो भी शांत हो जाती है और दोबारा उस बात पर कभी बहस नहीं करती. मेरा मानना है कि बच्चों से बहस करने की बजाय हमें अपने और उनके बीच एक बाउंड्री लाइन तय करनीचाहिए.”

क्या है कारण?

– कई बार पैरेंट्स का इग्नोरेंस ही बच्चों को केयरलेस बना देता है.

– बहुत ज़्यादा लाड़-प्यार मिलने पर भी बच्चा केयरलेस हो जाता है.

– कई बार बच्चा छोटी-छोटी बातों को ध्यान में नहीं रख पाता. वो चीज़ों को भूल जाता है और पैरेंट्स इसे उसकी लापरवाही मान लेते हैं. उदाहरण के लिए स्कूल से आने के तुरंत बाद बच्चे का होमवर्क न करना, आपके द्वारा किसी काम को समय से न कर पाना आदि.

– अपने दोस्तों से भी बच्चा बहुत कुछ सीखता है. ऐसे में कई बार उसकी लापरवाही का कारण उसके दोस्त भी होते हैं.

– लापरवाही की एक वजह बच्चों में तनाव का होना भी है. किसी बात से परेशान होने पर भी बच्चा कुछ करने में दिलचस्पी नहीं दिखाता.

लक्षण

– अगर आपका बच्चा आपकी हर बात को अनसुना कर रहा है या फिर हर बात का जवाब दे रहा है, तो समझ जाइए कि वो केयरलेस हो रहा है.

– किसी बात के पूछने पर चिढ़कर बोलना.

– आपकी हर बात का बुरा लगना.

– आपके बनाए हर नियम को तोड़ना.

– दोस्तों के सामने आपकी बातों को अनसुना करना.

– बात-बात पर ख़ुद को नुकसान पहुंचाने की बात करना.

– अपनी हर बात मनवाने की ज़िद्द और ख़ुद को ही सही समझना.

– घर देरी से आने पर जब आपके पूछने पर सही जवाब न देना.

– एक ही ग़लती बार-बार दोहराना.

– ‘अब मैं बड़ा हो गया हूं.’ बार-बार इस तरह की बातें करना.

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