
कॉलेज के कैंपस से जो विशाल, वीर पहाड़िया की सुहानी, आफिया सयैद की एक-दूसरे से तकरार होती है वो समय-समय पर उलझती-सुलझती है और बाद में दोनों अच्छे दोस्त बन जाते हैं. लेकिन विशाल तो दोस्ती को प्यार समझ बैठता है, जबकि सुहानी के चेकलिस्ट में वह है ही नहीं. यानी एकतरफ़ा प्यार का दर्द.. इस प्रेम के कीटाणु ने विशाल को अपने प्रेम जाल में फंसा ही रखा है, उस पर रंजीत, अपारशक्ति खुराना का सुहानी को लेकर प्रेम तीसरा त्रिकोण बन जाता है. विशाल और रंजीत के बीच में सुहानी को पाने की जो रस्साकशी चलती है, वो मनोरंजन से भरपूर है. लेकिन इन सब के बीच शुरू से अंत तक जो एक शख़्स विशाल के साथ हमेशा रहा वो है उसका रूम मेट और दोस्त निखिल विजय. कॉलेज और हॉस्टल लाइफ का पागलपन, दीवानगी देखते ही बनती है.
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हल्की-फुल्की मूवी, जो हंसाती, गुदगुदाती और लुभाती भी है. कॉलेज में होनेवाले रैगिंग से लेकर प्रेमिका को पाने के लिए दांव-पेंच, पैरेंट्स को पटाने से लेकर, रोमांटिक गाने तक फिल्म में हर फ्लेवर का मज़ेदार तरी़के से इस्तेमाल किया गया है.

निर्देशक अपूर्व सिंह कार्की की यह फिल्म कहीं पर भी बोरियत महसूस होने नहीं देती. उस पर कलाकारों का नौसिखिया सा रफ-टफ अंदाज़ हंसी के जाने कितने पल बटोरता है.
वीर और आफिया की जोड़ी अच्छी लगती है. पहली ही फिल्म में दोनों की केमेस्ट्री दर्शकों को पसंद आ रही है. हीरो के दोस्त के रूप में निखिल विजय ने बढ़िया काम किया है. अपारशक्ति खुराना और राकेश बेदी भी प्रभावित करते हैं. सिनेमेटोग्राफी में अजुर्न कुकरेती ने बनारस, दिल्ली, एनसीआर यानी उत्तर प्रदेश व गुड़गांव आदि जगहों का छायाकांन ख़ूबसूरती से किया है.

तुझसे बिछड़ के, कहो तो, इश्क़ का ग़ुलाम, तू मेरा रैय्यो, अंडी बंडी… सभी गाने सुनने और देखने में अच्छे लगते हैं. ज़ी म्यूज़िक के बैनर तले राहुल मिश्रा का संगीत और मीर के गीत दिल को छूते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि निर्माता गौरव वर्मा, अवानिका फिल्म्स, फार्स फिल्म और भावना स्टूडियोज के बैनर तले ‘प्रेम कीटाणु’ ने अपने लव जर्म्स को धीरे-धीरे हर तरफ़ फैला दिया है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इससे कितने प्रभावित हो पाते हैं. शेष फिर…
– ऊषा गुप्ता

