पहला अफेयर: ख़ामोशियां चीखती हैं… (Pahla Affair: Khamoshiyan Cheekhti Hain)

Pyar Ki Kahani
पहला अफेयर: ख़ामोशियां चीखती हैं… (Pahla Affair: Khamoshiyan Cheekhti Hain)

हमारी दोस्ती का आग़ाज़, शतरंज के मोहरों से हुआ था. जब शबीना अपने प्यादे से मेरे वज़ीर को शह देती, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता… और कहीं मेरा ऊंट उसके प्यादे को भगा-भगाकर बेहाल कर देता, तब उसके ग़ुस्सैल चेहरे की मायूसी देखती बनती.

आज उसकी वही बचकाना हरक़तें याद आती हैं, तो मन से एक हूक उठती है. एक साथ घूमना-फिरना, मौज-मस्ती के वो दिन… न जाने कहां गुम हैं? नहीं जानता वो दोस्ताना हाथ क्यों पीछे हट गया. उफ़़्फ्! व़क्त की गर्द ने मुझे अपनी आग़ोश में लपेट लिया है.
जब-जब मैंने गंभीर हो उसके भविष्य के बारे में कुछ कहा, तो उसने हर बात हंसकर हवा में उड़ा दी. जैसे कोई जासूसी किताब पढ़ रही हो. मैं नादान कहां पढ़ पाया उसके भीतरी निबंध!

न जाने कितने ख़त लिख-लिख पानी में बहाए हैं और कितने किताबों में ़कैद हैं. जो उसकी सहेली शमीम के हाथ भेजे, उनका भी कोई जवाब न आया. व़क्त मुट्ठी से रेत-सा कैसे फिसलता रहा… मैं कहां जान पाया! बस, उसकी चुप्पी अंदर-ही-अंदर सालती है.

शमीम की बातों ने मेरा पूरा वजूद हिला दिया. शमीम से जाना कि उसने किसी अमीर साहिबज़ादे से दोस्ती कर ली है. इस ख़बर ने तो जैसे मेरे जीवन में सूनामी-सा बवंडर ला खड़ा किया.

“जब भंवर में आ गई कश्ती मेरी, नाख़ुदा ने क्यों किनारा कर लिया…”

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हिम्मत जुटाकर एक दिन मैंने फोन घुमाया… उधर से मर्दाना आवाज़ थी, “हैलो, अरे तुम… राशिद! कहो कैसे फोन किया?”

मैं जल्द ही बोला, “अब्बाजान आदाब! ज़रा सबीना से बात कराएंगे?”

उनके अब्बा की आवाज़ अटकी, “उनसे मिलने कोई आया है. वे गुफ़्तगू में मशग़ूल हैं.”

“आप कहें राशिद का फोन था.” मेरी बात काट उन्होंने खट से फोन रख दिया. कुछ समय मुझ पर बेख़ुदी का आलम रहा, फिर एक दिन

मैंने रात को फोन घुमाया. उधर से सबीना की आवाज़ थी,“कौन?”

“हम हैं राशिद! अरे, इतनी जल्दी आवाज़ भी भूल गई.”

उसने तरकश से ज़हर बुझा तीर छोड़ा, “सुनो, मैंने अपनी ज़िंदगी का मक़सद पा लिया है. अच्छा होगा, तुम भी अपनी कश्ती का रुख मोड़ दो…” और खटाक से फोन कट गया.

उसका फेंका हुआ वह एक जुमला मेरा जिगर चाक-चाक कर गया. उफ़़्फ्! हुस्न पर इतना ग़ुरूर? जी चाहा सबीना को पकड़कर पूछूं कि ये सुनहरे सपनों का जाल क्यों बिछाया? इतने रंगीन नज़ारों की सैर क्यों कराई? यूं शतरंज के मोहरे-सा उठाकर पटकना कहां की वफ़ादारी है? वाह! क्या दोस्ती निभाई!

अब तो हर तरफ़ दमघोंटू माहौल है… उसकी बेवफ़ाई का कारण अब तक नहीं जान पाया और अगर उसने तय ही कर रखा था कि साथ नहीं निभाना, तो मन से, भावनाओं से क्यों ऐसा खेलकर चली गई. साफ़-साफ़ कह देती कि बस दोस्ती रखनी है, उसके बाद हमारे रास्ते अलग हैं… क्यों मुझे मुहब्बत की हसीन दुनिया दिखाई और क्यों मैं उसकी आंखों को ठीक से पढ़ नहीं पाया. अब तो बस, मैं हूं और मेरी तन्हाई! ये ख़ामोशियां अब चीखने लगी हैं. मेरे पहले प्यार का यह हश्र होगा… नहीं जानता था. अब तो ये ख़ामोशियां ही मुझसे बतियाती हैं… मेरा मन बहलाती हैं…!

कहीं दूर से एक आवाज़ आ रही है…

“धीरे-धीरे अंदर आना… बिल्कुल शोर न करना तुम…
तन्हाई को थपकी देकर… मैंने अभी सुलाया है…”

– मीरा हिंगोरानी

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