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कविता- तुम्हें बुलाता भला? (Poetry- Tumhe Bulata Bhala?)

शब्द तुम, छंद तुम, गीत और राग तुम

बेसुध सा आलाप ले-ले मैं तुम्हें गाता रहा

कभी तो समझोगी मेरे निर्मल मनोभावों को

बस अपने मन को यही मैं समझाता रहा..

तुम मुखर हो बहुत कुछ कहती रहीं

मैं मौन हो सब कुछ बस सुनता रहा

शब्दों की गीली लकड़ियां सुलगती रहीं

आंच और धुएं को बस मैं सहता रहा..

देह की कामना न रही कभी मुझे

प्रेम का स्वीकरण ही बहुत था प्रिए

शेष न रहता तुम से कुछ चाहने को

फिर तो जी लेता अधरों को सीए हुए

जाने कैसी क्रीड़ा थी यह अद्भुत

न जीतीं तुम और न मैं हारा

मेघ बन गगन में तुम उड़ती रहीं

मैं धरा पर छाया तुम्हारी पकड़ता रहा..

प्रेम ‘मेरा’ पर मर्यादा तो ‘हमारी’ थी

पागलों सा बस मैं ही निभाता रहा

अपरिचित बन बढ़ गईं तुम आगे कहीं

किस संबोधन से तुम्हें बुलाता भला?

– डॉ. राम प्रमोद मिश्र

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Photo Courtesy: freepik

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