कहानी- ऐेसे ना करो रुसवा (Short Story- Aise Na Karo Ruswa)

Short Story- Aise Na Karo Ruswa

“आश्‍चर्य है?… तुम इतना अच्छा अभिनय कर लेते हो? वह भी तब जब तुम्हारे और संध्या के बारे में पूरे कॉलेज में चर्चा है.” अपने मुंह से निकले व्यंग्य को वह रोक न सकी.

“लोगों की मुझे परवाह नहीं, पर तुम तो मुझे ऐेसे रुसवा मत करो. मैंने संध्या का साथ दिया था, क्योंकि वह मुसीबत में थी. बाकी के सारे आरोप, जो लोग मुझ पर लगा रहे हैं, ग़लत हैं.”

शाम के छह बजनेवाले थे. तेज़ गति से भागती ट्रेन पल-पल अपने लक्ष्य की तरफ़ बढ़ रही थी. साथ ही पीछे छूटता जा रहा था अचला का वर्तमान और मन समाहित होता जा रहा था अतीत के गलियारों में. मन के किसी कोने में दबी स्मृतियों की यंत्रणा असहनीय हो उठी. वह घबराकर पत्रिका में मन लगाने की कोशिश करने लगी. लेकिन यादें थीं, जो मन को अवश किए हुए थीं. उसने उचटती नज़रों से डिब्बे का अवलोकन किया.

लगभग 17-18 वर्ष की तीन लड़कियां सामने की बर्थ पर बैठी बातों में मशगूल थीं. उनकी बेफ़िक़्री और छोटी-छोटी बातों पर भी खुलकर हंसने का अंदाज़ बता रहा था कि वे सभी स्टूडेंट्स हैं.

अचानक उसके हाथों से पत्रिका फिसलकर एक लड़की के पैरों के पास जा गिरी. बड़ी शालीनता से उस लड़की ने पत्रिका उठाकर अचला को पकड़ा दी. “क्या नाम है तुम्हारा?” अचला ने स्नेह से पूछा.

“मेरा नाम अर्चना है और ये मेरी सहेलियां सुप्रिया और सोनाली हैं. हम तीनों दिल्ली के एक कॉलेज में फ़र्स्ट ईयर की स्टूडेंट्स हैं. छुट्टियों में पटना अपने-अपने घर जा रही हैं. आप भी…?”

“हां, मैं भी पटना जा रही हूं, लेकिन उसके बाद मुज़फ्फरपुर तक जाना है.”

वह देर तक लड़कियों से गपशप करती रही. खाना खाते ही थकी-हारी लड़कियां सो गईं, पर अचला की आंखों में नींद का नामोनिशान न था. एक बार फिर वह अतीत के गलियारों में भटकने लगी. औरत चाहे कितनी ही पाषाण हृदय क्यों न हो, पर अपने पहले प्यार को भुला नहीं पाती. शायद यही कारण था कि न चाहते हुए भी अनमोल की यादें बार-बार उसे तड़पा रही थीं.

जिस शक के कारण वह आवेश में आकर अपने प्यार को ठोकर मार आई थी, आज पंद्रह साल गुज़र जाने के बाद भी क्या उसे अपने जीवन, अपनी सोच से ठोकर मारकर निकाल पाई थी? शायद नहीं.

उस पल को अचला कभी भूल न सकी, जब उसके द्वारा लगाए गए आरोपों को सुनकर अनमोल का चेहरा ज़र्द पड़ गया था,  पर उसके चेहरे पर किसी को छलने का भाव न था. बस, था तो स़िर्फ एक आश्‍चर्यमिश्रित क्रोध और अपमानित होने का भाव. शायद उसे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि उस पर भी ऐसे गंभीर आरोप लगाए जा सकते हैं, वह भी अचला द्वारा. उसने बहुत कोशिश की थी अचला को समझाने की, लेकिन अचला के सामने उसकी एक न चली.

पूरे पंद्रह वर्ष गुज़र गए. इन बरसों में अचला ने क्या कुछ नहीं पाया. अच्छी नौकरी के साथ-साथ सभी सुख-सुविधाएं. नहीं मिला तो जीवन की शांति और जीवन जीने का मक़सद. उसके शादी न करने के फैसले को बदलने के लिए मम्मी-पापा ने उसे बहुत समझाया. लेकिन अंततः दोनों  को ही उसकी ज़िद के आगे झुकना पड़ा. एक-एक कर तीनों भाइयों की शादियां हो गईं और जल्द ही वे सभी अपनी-अपनी दुनिया में रम गए.

उसके शादी न करने का दर्द लिए पहले मम्मी गई, फिर पापा भी ज़्यादा दिनों तक जीवित न रह सके. अचला की ज़िंदगी पूरी तरह वीरान हो गई. परिवारविहीन एकाकी और निर्लिप्त जीवन से कभी-कभी उसका मन बुरी तरह घबरा जाता. दिमाग़ चाहे जो तर्क दे, पर उसका दिल कहता उसने अपने पैरों पर ख़ुद ही कुल्हाड़ी मारी थी.

अचला को आज भी याद है, जब उसकी पहली मुलाक़ात अपने से दो वर्ष सीनियर अनमोल से हुई थी. कॉलेज में होनेवाले डिबेट में वह उसका प्रतिद्वंद्वी था. लंबी क़द-काठी का अनमोल जितना देखने में सुदर्शन था, उतना ही मेधावी भी था. अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ, सौम्य, शांत और मिलनसार स्वभाव के कारण वह पूरे कॉलेज में काफ़ी लोकप्रिय था.

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डिबेट वाले दिन वह निश्‍चित समय पर बड़े ही आत्मविश्‍वास के साथ अनमोल के सामने जा खड़ी हुई थी. डिबेट शुरू होते ही दोनों अपना-अपना पक्ष एक-दूसरे के सामने रखने लगे थे. दोनों के ही तर्क-वितर्क बता रहे थे कि दिए गए विषय के वे सशक्त वक्ता हैं. फिर भी थोड़ी देर में ही अचला का पलड़ा भारी पड़ने लगा था. उसके एक-एक शब्द अपने पक्ष को कथानक की भांति जीवंतता से प्रस्तुत कर रहे थे, जो श्रोताओं को ही नहीं, उसके प्रतिद्वंद्वी को भी किंकर्त्तव्यविमूढ़ करता जा रहा था. उस दिन अचला की तो जीत हुई, पर अनमोल अपना दिल हार बैठा.

उस दिन के बाद से अचला सबकी नज़र में प्रशंसा का पात्र बन गई. धीरे-धीरे बढ़ती मुलाक़ातों के साथ अचला-अनमोल एक-दूसरे के बेहद क़रीब आ गए.

उन्हीं दिनों हॉस्टल में बी.ए. द्वितीय वर्ष की एक छात्रा संध्या अचला की रूम पार्टनर बनकर आई. शबनम में नहाई गुलाब की पंखुड़ियों की तरह ताज़गी भरा उसका सौंदर्य अद्वितीय था. संध्या जितनी सुंदर थी, उतनी ही सौम्य और सीधी-सादी भी थी. हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार. बिना भेदभाव के वह अचला के भी कई छोटे-मोटे काम संभालने लगी. कुछ ही दिनों में दोनों के बीच सगी बहनों-सा प्यार हो गया. अचला को लगता कि ईश्‍वर ने उसके जीवन में छोटी बहन की कमी पूरी कर दी है. जब भी अनमोल की चर्चा होती, वह अक्सर किलक पड़ती, “हाय राम! कितने हैंडसम हैं आपके अनमोलजी. काश! आपसे पहले मेरी नज़र पड़ गई होती, तो ज़रूर उड़ा ले जाती.”

अचला प्यार से उसे डांट देती.

“चुप कर पगली… यह क्या हाय-हाय लगा रखी है. देखना, एक दिन तुझे अनमोल से ज़्यादा हैंडसम पति मिलेगा.”

“मेरे ऐसे भाग्य कहां? अभी तक तो ज़िंदगी ने हर मोड़ पर मुझे छला ही है.” एक उसास उसके गले से निकल पड़ती.

देखते-देखते समय पंख लगाकर उड़ गया. परीक्षाएं नज़दीक आ गईं. अचला सारी मौज़-मस्ती भूल परीक्षा की तैयारियों में व्यस्त हो गई. अब उसका ध्यान संध्या की तरफ़ कम ही रहता.

समय पर परीक्षाएं शुरू हो गईं. एक दिन अचला परीक्षा देकर लौटी तो संध्या से बोली, “चल संध्या, कहीं मौज़-मस्ती करते हैं. कुछ खाते-पीते हैं, अभी अगला पेपर पूरे एक ह़फ़्ते बाद है.”

“नहीं दी… आज नहीं, मेरी तबियत थोड़ी ठीक नहीं है.”

उसकी फीकी हंसी, उदास चेहरा और धीमी आवाज़ ने अचला को चौंका दिया, “क्या बात है संध्या? तुम इतनी बीमार-सी क्यों लग रही हो?”

अचला की सहानुभूति पाकर संध्या की आंखें भर आईं, जिसे देखकर अचला का कलेजा एक अनजानी आशंका से धड़क उठा. तभी अपने आंसुओं को पोंछकर, हंसकर संध्या बोली, “ऐसी कोई गंभीर बात नहीं है, जिसके लिए मैं आपको परेशान करूं. जिस दिन आपकी परीक्षा समाप्त हो जाएगी, दिल में दो महीने से जमा बातों का पुलिंदा आपके सामने ही तो बांचूंगी.”

संध्या के आश्‍वासन से आश्‍वस्त वह फिर से अपनी परीक्षा की तैयारी में जुट गई. जिस दिन अचला अंतिम पेपर देकर लौटी, तो उसे पता चला कि संध्या के मम्मी-पापा आकर उसे ले गए. यूं अचानक उससे मिले बिना संध्या का चले जाना उसे व्यथित कर गया.

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दूसरे दिन सुबह तैयार होकर वह चाय बनाने जा ही रही थी कि उसके बगल के कमरे में रहनेवाली सुनंदा आ गई. चुपचाप बैठी सुनंदा के चेहरे पर आते-जाते रंग अचला की उत्सुकता बढ़ा रहे थे, “क्या बात है सुनंदा? क्या तुम मुझसे कुछ कहना चाहती हो?”

“हां, तुमने ठीक समझा है. मैं पिछले कई दिनों से तुम्हें संध्या के विषय में कुछ बताना चाह रही थी, लेकिन तुम्हारी परीक्षा चल रही थी, इसलिए चुप रही. वैसे भी तुम संध्या को इतना प्यार करती हो कि उसके विषय में कुछ बताना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था. जाने कैसे रिएक्ट करोगी?”

फिर थोड़ा रुककर बोली,  “शायद तुम्हें पता नहीं था कि संध्या मां बननेवाली थी. वह डॉक्टर के पास गई थी एबॉर्शन के लिए, वो भी अनमोल को साथ लेकर. डॉक्टर अनुराधा मेरी कज़िन है, जहां मैंने इन दोनों को देखा था. अनुराधा से ही मुझे सारी जानकारियां मिल गई थीं. इन दिनों अनमोल के साथ चिपकी जाने कहां-कहां घूमती रही थी. पूरे कॉलेज में लोग जाने कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं.”

सुनंदा की बातों से आश्‍चर्य, शर्म और गहरी आत्मवेदना से छटपटा उठी थी अचला. सुनंदा के जाते ही धम्म् से अपने बिस्तर पर आ गिरी थी. उसका सारा शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था. अब तक अनमोल पर रहा विश्‍वास तिनका-तिनका कर बिखरने लगा था. फिर भी हिम्मत जुटा अनमोल से मिलने चल दी थी. रास्ते में ही अनमोल उसे मिल गया था. मिलते ही बोला, “अच्छा हुआ जो तुम मुझे मिल गई, मैं तुमसे ही मिलने आ रहा था. मुझे तुमसे एक बहुत ही ज़रूरी बात करनी है, साथ ही संध्या का मैसेज भी देना है.”

“आश्‍चर्य है… तुम इतना अच्छा अभिनय कैसे कर लेते हो? वह भी तब जब तुम्हारे और संध्या के बारे में पूरे कॉलेज में चर्चा है.” अपने मुंह से निकले व्यंग्य को अचला रोक न सकी.

“लोगों की मुझे परवाह नहीं, पर तुम तो मुझे ऐसे रुसवा मत करो. मैंने संध्या का साथ दिया था, क्योंकि वह मुसीबत में थी. बाकी के सारे आरोप, जो लोग मुझ पर लगा रहे हैं, ग़लत हैं.”

ग़ुस्से से सुलगती अचला अनमोल पर बरस पड़ी, “मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम्हारे व्यक्तित्व का एक पहलू इतना गिरा हुआ है. संध्या मेरी छोटी बहन जैसी थी. कैसे किया तुमने इतना बड़ा छल हम दोनों के साथ?”

“अचला… तुम मुझे ग़लत समझ रही हो. पहले मेरी पूरी बात सुन लो, फिर तुम्हारे दिल में जो आए, फैसला करना.” पर अनमोल की बातें सुनने के लिए अचला रुकी ही कहां थी.

अनमोल उसे पुकारता रहा, फिर भी अचला ने उसकी तरफ़ पलटकर भी नहीं देखा. मन में अनमोल को त्याग देने का कठोर ़फैसला कर अचला दूसरे ही दिन मुज़फ्फरपुर आ गई. उसके बाद से ही उसने अनमोल से अपने सारे संपर्क तोड़ डाले. न उसका कोई फ़ोन कॉल रिसीव किया, न ही उसे कोई कॉल किया. वैसा ही उसने संध्या के साथ भी किया.

जल्द ही अचला अपनी नई ज़िंदगी शुरू करने दिल्ली आ गई. धीरे-धीरे वह अपनी सारी पीड़ा, वेदना और कृतियों को नई दिशा देने में जुट गई. कुछ दिनों की कड़ी मेहनत के बाद वह इनकम टैक्स ऑफ़िसर का पद प्राप्त करने में सफल हो गई, जिसके साथ ही उसके जीवन में आमूल परिवर्तन आ गया. काम की व्यस्तता ने अतीत में हुए धोखे को भुलाना आसान कर दिया.

अचला के बड़े भैया अमित आजकल मुज़फ्फरपुर के एक कॉलेज में कार्यरत थे. भैया-भाभी के बार-बार अनुरोध करने पर वह एक लंबे अरसे के बाद मुज़फ्फरपुर जा रही थी. दोनों को सरप्राइज़ देने के चक्कर में उसने अपने आने की सूचना भी नहीं दी थी.

तभी एक हिचकोले के साथ ट्रेन रुक गई. पता चला, आगे कोई ट्रेन पटरी से उतर गई है. धीरे-धीरे सरकती ट्रेन के रात नौ बजे से पहले पटना पहुंचने के आसार नज़र नहीं आ रहे थे.

जाने कैसे उसके मन की बात और घबराहट को पढ़ अर्चना बोली, “आंटी, आप चिंता न करें. आज रात पटना में आप मेरे घर रुक जाइएगा और सुबह मुज़फ्फरपुर के लिए बस पकड़ लीजिएगा.”

वह असमंजस की स्थिति में थी. स्टेशन पर अर्चना के पापा उसे लेने आए थे. अर्चना से अचला के विषय में जानकारी मिलते ही बड़े सम्मान के साथ उन्होंने अचला से अपने घर रुकने का आग्रह किया, तो वह टाल न सकी.

जब फ्रेश होकर वह खाने के टेबल पर पहुंची, तो घर के लोग उसका ही इंतज़ार कर रहे थे. उसके साथ ही इंतज़ार कर रहा था एक ऐसा सरप्राइज़, जिसे देखते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. आगे बढ़कर डायनिंग टेबल का कोना न थामा होता, तो शायद गिर ही जाती. सामने की कुर्सी पर अनमोल बैठा था. अपने को संभालकर बैठी, तो अर्चना घर के सभी सदस्यों से परिचय कराते हुए अनमोल की तरफ़ मुड़ी. “यह मेरे सबसे छोटे चाचाजी अनमोल हैं. यहां के एक कॉर्पोरेशन में एम.डी. हैं.”

दोनों की आंखों में एक आश्‍चर्यमिश्रित झलक देख अर्चना बोली, “क्या आप दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते हैं?”

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“ऑफ़कोर्स जानते हैं. यह मेरी क्लास मेट अचला है. मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं कि तुमने मुझे अचला से मिलवा दिया.”

अचला चुपचाप खाने की कोशिश करने लगी, पर एक भी निवाला उसके गले के नीचे उतर नहीं रहा था. किसी तरह कुछ खा-पीकर अर्चना के बताए कमरे में सोने आई, तो पीछे-पीछे अनमोल भी आ गया. पास ही रखी कुर्सी खींचकर बैठते हुए बोला, “इतने साल बीत जाने के बाद अब मैं न तुम्हें कोई सफ़ाई देना चाहता हूं, न ही इसकी कोई ज़रूरत रही. बस, तुम्हारे नाम संध्या का एक पत्र आज तक मेरे पास पड़ा है, जिसे मैं तुम्हें सौंपना चाहता था. लेकिन तुम्हारे मन में अपने लिए उमड़ती घृणा के कारण मैंने कभी कोशिश ही नहीं की तुमसे मिलने की. संयोग से आज तुम मिल ही गई हो, तो तुम्हें वह पत्र दे रहा हूं.”

अपनी बातें समाप्त कर अनमोल ने जेब से एक पत्र निकालकर अचला को पकड़ा दिया. संध्या का पत्र देखकर अचला का सर्वांग सिहर उठा. हिम्मत करके कांपते हाथों से उसने पत्र खोला-

दीदी नमस्कार,

मैं नहीं जानती कि मैंने कौन-सा ऐसा पुण्य किया था, जो आप जैसी प्यार करनेवाली बहन मुझे मिली. उसी के साथ जाने कौन-सा ऐसा पाप भी कर आई थी, जो राघव जैसे लड़के से प्यार कर बैठी. जब मैं मां बननेवाली थी, उसी समय उसे अमेरिका जाने का मौक़ा मिला. मैं उसके सामने बहुत रोई, गिड़गिड़ाई कि वह मुझसे शादी करने के बाद अमेरिका चला जाए, लेकिन वह नहीं माना और चला गया.

मैं घोर संकट में थी. आपकी परीक्षा चल रही थी. दूसरा कोई मदद करनेवाला था नहीं, इसलिए मैंने सारा दर्द अनमोलजी के साथ बांटा. वे जी-जान से मेरी मदद में जुट गए. हम दोनों ने कई डॉक्टरों के चक्कर लगाए. एबॉर्शन करवाती, उसके पहले ही जाने कैसे वॉर्डन ने मेरी तबियत ख़राब होने की सूचना मेरे घर भिजवा दी. ज़बर्दस्ती मेरे मम्मी-पापा आकर मुझे घर ले जा रहे हैं. जब आपकी परीक्षा समाप्त हो जाएगी, अनमोलजी यह पत्र आपको दे देंगे. आप कैसे भी करके यहां आकर मुझे ले जाइएगा, वरना मेरी सौतेली मां मेरी क्या दुर्दशा करेगी, यह मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम. प्लीज़ दीदी, इस संकट से मुझे उबार लीजिए. आपके इंतज़ार में…

आपकी छोटी बहन,

संध्या

पत्र पढ़कर स्तब्ध अचला स़िर्फ इतना ही बोल पाई, “अब कहां है संध्या?”

“तुम्हारे हॉस्टल छोड़ने के पंद्रह दिन बाद उसने आत्महत्या कर ली. इसके साथ ही तुमसे और तुम्हारे प्यार से मेरा मोहभंग हो गया. संध्या मेरी छोटी बहन जैसी थी, उसे बचाने के लिए मैंने काफ़ी बदनामियां भी झेलीं, फिर भी उसे बचा नहीं पाया. काश! तुमने मुझ पर थोड़ा-सा भी भरोसा किया होता. संध्या के जाने के बाद मुझे तुमसे इतनी नफ़रत हो गई कि मैंने सारी ज़िंदगी शादी न करने का फैसला कर लिया.”

अनमोल की बातें समाप्त होते-होते, अचला का मन हाहाकार कर उठा.  बरसों से मन में दबी पीड़ा आंसुओं का सैलाब बन आंखों से उमड़ पड़ी. वह फूट-फूटकर रोती रही. थोड़ी संभली तो बोली, “कितनी तड़पी होगी संध्या मेरे इंतज़ार में. कितनी मजबूरी और निराशा में उसने इस दुनिया का मोह छोड़, मौत को गले लगाया होगा. मैं मरकर भी उसके प्यार का कर्ज़ नहीं चुका सकती. हे भगवान! मैं क्या करूं? मेरी ग़लती माफ़ी के लायक ही नहीं है.”

पश्‍चाताप की आग में झुलसती अचला का बुरा हाल देख अनमोल से चुप नहीं रहा गया.

“ख़ुद को संभालो अचला. मैं शायद तुम्हें कभी माफ़ न करता, लेकिन अपनी ग़लती के पश्‍चाताप में तुम्हें टूटकर बिखरते देख मुझे लगने लगा है कि यदि आज मैंने तुम्हें माफ़ नहीं किया, तो शायद इतिहास ख़ुद को दोहरा देगा.”

अचला के सब्र का बांध भी टूट चुका था. वह अचानक उठकर अनमोल की बांहों में समा गई. अनमोल भी अपने आंसुओं को रोक न सका.

Rita kumari

       रीता कुमारी

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“आश्‍चर्य है?... तुम इतना अच्छा अभिनय कर लेते हो? वह भी तब जब तुम्हारे और संध्या के बारे में पूरे कॉलेज में चर्चा है.” अपने मुंह से निकले व्यंग्य को वह रोक न सकी. “लोगों की मुझे परवाह नहीं, पर तुम तो मुझे ऐेसे रुसवा मत करो. मैंने संध्या का साथ दिया था, क्योंकि वह मुसीबत में थी. बाकी के सारे आरोप, जो लोग मुझ पर लगा रहे हैं, ग़लत हैं.”
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