कहानी- अपनी खोज में… (Short Story- Apni Khoj mein…)

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“कुछ बिरले ही ऐसे होते हैं, जो जीवन के मध्यान्तर में भी अपने पैरों में बेड़ियां डाले विकास के पथ पर चलते रहते हैं. मैं अपनी आत्मा को उतना दृढ़ नहीं पाती. ये हमारे मार्ग में बाधक ही बनेगी. सौ-सौ बार विचार किया है इन विषयों पर. लेकिन मुझे क्या पता था कि जीवन ऐसे दोराहे पर ला खड़ा करेगा, जहां एक को चुनना अपनी ही आत्मा को पराया कर देने जैसी पीड़ा देगा.”

 

सुदूर दक्षिण में बसा ये आश्रम, हिलोरें लेता सागर तट, फैले हुए हरे-हरे नारियल के दरख़्त… न जाने कौन-सा चुंबकीय आकर्षण है इस स्थान में, जिससे खिंची मैं बार-बार यहां आने को व्याकुल हो उठती हूं. चारों ओर बिखरी निःस्तब्ध शांति और शोर करता समुद्र. चुपचाप बैठी-बैठी मैं ढलते सूरज को देखती रही. कितना अलग है यह अस्त होता सूरज उस उदित होते सूरज से… शांत मगर निस्तेज बिल्कुल नहीं. अपनी संपूर्णता का ओज चारों ओर बिखेरता हुआ, निःशब्द, आहिस्ता-आहिस्ता सागर में विलीन होकर स्वयं अपने अस्तित्व का अर्घ्य दे देता है, बिना किसी अपेक्षा के.

अंधेरे ने पंख पसारने शुरू किए, तो उठकर चल पड़ी आश्रम की ओर. प्रार्थना का समय हो चुका था. प्रार्थना के बाद आश्रम के कार्यालय से होती हुई अपने कमरे में लौट आई. हाथ में दो लिफ़ा़फे थे. मन में अपार शांति थी. अंतर्द्वन्द्व के जिस कुहासे ने मन को सालभर से घेर रखा था, आज उससे मुक्ति मिली. मैंने तो अपना निर्णय ले लिया था, पर आदित्य और बेटू की पता नहीं क्या प्रतिक्रिया होगी मेरे इस निर्णय को सुनकर, यही सोच बेचैन किए जा रही थी. बेटू यानी सिद्धार्थ सिन्हा, हमारा होनहार इकलौता बेटा. मल्टीनेशनल कंपनी का उच्च पदस्थ अधिकारी. बेटू की उपस्थिति ने हमें सदा संपूर्णता का अनुभव दिया.

सुबह हुई. अपने कार्यक्रम के मुताबिक जल्द-से-जल्द मुझे स्टेशन पहुंचना था. बाहर निकली तो रक्ताभ सूर्य के दर्शन हुए. ऐसा स्वर्णिम सूर्योदय महानगरीय जीवन में देखने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. इस समय आदी बहुत याद आ रहे थे. काश वे भी होते इस पल मेरे साथ! सात बजे की ट्रेन का रिज़र्वेशन है, तैयार होकर मैं प्रार्थना कक्ष में पहुंच गई. विशाल हॉल के इस कोने से उस कोने तक धवल चादरें बिछी हुई हैं. सभी प्रार्थनारत हैं. एक कोने में जाकर मैं भी बैठ गई. मन ही मन अपने संकल्प को दोहराने लगी. अपने जीवन की इस सांध्यबेला में मुझे नहीं पता कि मेरा निर्णय सही है या ग़लत. तुम्हारे चरणों में शेष जीवन बिताने का जो संकल्प बरसों पूर्व लिया था, आज वो पूरा होता जान पड़ता है. हे भगवान, इस व़क़्त मुझे तुम्हारे संबल की आवश्यकता है. जाते-जाते सागर तट पर फैले इस अनछुए सूर्योदय को मैं अपने स्मृति पटल पर सदा के लिए अंकित कर लेना चाहती थी. तभी चौकीदार ऑटो लिए सामने आ खड़ा हुआ. ये सोचकर बैठ गई ऑटो में कि भगवान ने चाहा तो रोज़ इस सूर्योदय के दर्शन होंगे.

ट्रेन में बर्थ ढूंढ़ने में द़िक़्क़त नहीं हुई. मेरा मन बार-बार बेटू, केतकी और आदी के इर्द-गिर्द भटक रहा था. घर जल्दी से पहुंच जाऊं बस… अपनी इस तड़प से मैं स्वयं बेचैन होने लगी. इस मोह से विमुक्त हो पाना क्या इतना आसान होगा? दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. इस यक्ष प्रश्‍न का मेरे पास कोई हल नहीं था.

आश्रम में मन कितना शांत था और अब कैसी बेचैनी है. ढलती उम्र में भावनात्मक उद्वेग का कुछ पता नहीं. पल में तोला, पल में माशा, कुछ भी हो सकता है.

आज पूरा एक ह़फ़्ता हुआ घर छोड़े. बहुत मुश्किल से राज़ी हुए थे आदी मुझे अकेले आश्रम भेजने के लिए. ट्रेन में बैठाते हुए बोले थे, “लौटने का रिज़र्वेशन करवा दिया है, आगे और एक्स्टेंड मत करवा लेना. पता चला मैडम जाकर वहीं जम गईं. जाते ही फ़ोन करना मत भूलना.” सारे निर्देश एक ही सांस में दे डाले और जब ट्रेन चल पड़ी तो दूर तक उसे ओझल होते देखते रहे- एकाकी, चिंतित, बेचैन.

विवाह की चालीसवीं वर्षगांठ पर इस निष्ठुर, स्वार्थी निर्णय का उपहार देने जा रही हूं अपने पति को. क्या होगी उनकी प्रतिक्रिया. बहुत सुखद तो निःसंदेह नहीं ही होगी. ग़ैर ज़िम्मेदार, स्वार्थी, भावुक, अहंकारी या फिर पागल कहेंगे मुझे. बेटू मन ही मन उदास तो बहुत होगा, पर कहेगा कुछ भी नहीं. शादी जब से हुई है अपनी भावनाएं हमारे साथ कम ही शेयर करता है. शायद मान भी जाए, क्योंकि वह मेरी मानसिकता से भली-भांति परिचित रहा है, लेकिन केतकी.. वो कहीं इस सोच को अन्यथा न ले. चाहे अब जो हो, इस कड़वे घूंट को तो मुझे पीना ही होगा. यदि मेरे निर्णय को सबने सहर्ष स्वीकारा तो इस विजय में भी पराजय मेरी ही है और हार तो हार है ही.

आदी वादे के मुताबिक स्टेशन पर मौजूद थे. चेहरा दमक रहा था उनका. देखकर बोले, “ये क्या हाल बना रखा है? तबीयत ठीक है न?” मेरे चेहरे ने चुगली कर दी शायद. “अच्छा घर चलो, अभी तबीयत ठीक होती है. इतनी अच्छी ख़बर है कि तुम उछल पड़ोगी.” गाड़ी देखकर मैंने पूछा, “बेटू ऑफ़िस नहीं गया आज? गाड़ी कैसे ले आए?” आदी ने अपने दमकते चेहरे का राज़ खोला, “मुबारक़ हो उर्मि, तुम्हारा लाडला अपनी कंपनी का सीईओ बन गया है.” उनका बस चलता तो वो मुझे गोद में उठा लेते. “कंपनी ने नई कार और ड्राइवर दिया है.” मेरे भावहीन सपाट चेहरे को देखते हुए बोले, “वॉट्स रांग विद यू, तबीयत तो ठीक है तुम्हारी?” “नहीं… ख़ुश तो हूं.” मैंने थकान का बहाना बनाया. “जानती हो कह रहा था, ये सब मां की प्रार्थनाओं का नतीज़ा है.” उस बेचारे को क्या पता कि मां प्रार्थना में क्या मांग आई है. मेरा सिर घूमने लगा. आदी से गाड़ी रुकवाकर उल्टी की. भावनाओं का समंदर बह निकला आंखों के रास्ते. आदी एकदम से घबरा गए. घर जाने की बजा सीधे डॉक्टर के पास ले गए. “थकान है, वीकनेस है, नींद पूरी नहीं हुई है, घर जाकर आराम कीजिए. बिल्कुल ठीक हो जाएंगी.” वगैरह-वगैरह कहकर डॉक्टर ने घर भेज दिया.

घर पहुंची तो केतकी बाहर गई थी. प्रांशु बाहर खेलने गया था. सारी शाम आदी का लेक्चर सुनना पड़ा. “मना किया था, अकेली यात्रा मत करो. खाया होगा कुछ उल्टा-सीधा. ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है तुम्हारा. अब क्या वो उम्र रही जो इतना स्ट्रेन ले लेती हो? तुम्हारी ज़िद का नतीज़ा है ये सब. बेटू आएगा तो यही शक्ल लिए बधाई देना उसे.” मैंने धीरे से पूछा, “पूछेंगे नहीं, वहां क्या-क्या हुआ?” “ऐसा क्या अनोखा हुआ होगा जो पूछूं? हर बार की तरह वही ध्यान, योग-शिविर. मिल गई होंगी पुरानी सखियां. नया क्या हुआ होगा जो पूछूं?” बुरी तरह से खीझे हुए थे. नहीं आदी, बहुत कुछ घट गया है. इस बार आश्रम की आजीवन सदस्यता के काग़ज़ात पर स्वीकृति देकर हस्ताक्षर कर आई हूं. आपके नाम के लिए भी ‘हां’ कर आई हूं, वो भी आपसे पूछे बगैर.

रात बेटू काफ़ी देर से घर आया, “मां-मां क्या हुआ? कैसा रहा आपका ट्रिप.” कम ही आता है अब वो हमारे कमरे में, सो हड़बड़ाकर उठ बैठी. “बधाई हो बेटे, कितनी ख़ुश हूं मैं आज, तू ख़ुश तो है न बेटा?” जी कर रहा था अंक में समेट लूं उसे, शब्द गले में घुटकर रह गए, बहुत कुछ कहना चाहती थी. “आप आराम कीजिए. खाना खाया? दवाई ली कि नहीं?” कहकर बाहर निकल गया. मैं बैठी रह गई. कितना व्यस्त कर लिया है इसने अपने आपको.

“उठो उर्मि, उर्मि उठो, चाय पी लो…” सामने चाय लिए ये खड़े थे. नया कुर्ता-पजामा पहने एकदम फ्रेश. “ओफ़! मैं तो बिल्कुल ही भूल बैठी कि आज सालगिरह है हमारी शादी की.” “हर साल तुम लाती थीं फूल मेरे लिए, अब की मैं लेकर आया हूं. शादी की सालगिरह बहुत-बहुत मुबारक उर्मि. तोह़फे में क्या लोगी इस बार? नया चश्मा, नए शेड का हेयर डाई या फिर दांतों का नया सेट. वैसे ब्लड प्रेशर नापने की मशीन का आइडिया कैसा है?” मुझे हंसी आ गई. हैरान थी इनकी वाचालता देख.

“आज इतना कैसे बोल रहे हैं? आप वही हैं, जिनके बोल बिका करते थे.” बड़ी लाचारी से बोले, “क्या करें भई, जब से आई हो. कछुए की तरह अपने को सिकोड़े पड़ी हो. एक बार भी इस बूढ़े की ख़बर ली तुमने?”

नहा-धोकर अपने आपको भरसक संयत किया. कल तक आश्रम को जवाब देना है, इसलिए बात करने दोनों लिफ़ा़फे लेकर उनके पास पहुंची. मैंने दोनों लिफ़ा़फे उनकी ओर बढ़ा दिए. “क्या है इसमें?” कहते हुए वे दोनों काग़ज़ पढ़ गए, थोड़ी देर चुप रहे. उलट-पलट कर देखते रहे काग़ज़ों को. “ये सब क्या है… पांडीचेरी के आश्रम के स्कूल से तुम्हारा और कॉलेज से मेरे लिए कॉल लेटर. हमने कब अप्लाई किया था यहां? आजीवन सदस्यता की स्वीकृति… और ये कॉटेज… कैसा कॉटेज… कौन रहेगा इस कॉटेज में? मैं और तुम?” एक साथ कई सवाल पूछ डाले. मेरी ओर ताकते हुए काग़ज़ दिखाकर बोले, “तो ये है तुम्हारी बेचैनी का कारण… इसी ने बीमार कर रखा है तुम्हें. जीवन का इतना बड़ा निर्णय, एक पल में ले लिया…?” मैं निस्पंद बैठी थी. भीतर का चक्रवात बीत चुका था. इनके लिए ये एक अनपेक्षित प्रस्ताव था. आवाज़ में उत्तेजना थी. “आश्रम के समारोह में भाग लेने गई थी, जीवनपर्यंत संन्यास का संकल्प लिए लौटी हो. यदि मुझे पता होता….”

“मैं संन्यास नहीं ले रही आदी. प्लीज़ मुझे ग़लत मत समझिए.” मैंने कांपती आवाज़ में कहना प्रारंभ किया, “सांसारिकता मेरे लिए बोझ नहीं. बरसों पहले जब हम गए थे एक साथ. आप ही की इच्छा थी कि रिटायरमेंट के बाद ऐसे ही किसी स्थान पर हम रहें, साथ-साथ. क्या सोचकर आपने कहा था ये आप जानें, पर मैंने उसी वर्ष आजीवन सदस्यता के लिए आवेदन कर दिया था. ये सोचकर कि हमें कौन-सा मौक़ा मिलने वाला है. अबकी जब मैं गई, सच कहूं भूल चुकी थी इस बात को और मुझे कोई अंदाज़ा भी नहीं था. उन्होंने मुझे कार्यालय में बुलाकर स्वीकृति पत्र थमा दिया. कल तक मुझे जवाब भी देना है. मेरा ये निर्णय सही है या ग़लत मुझे नहीं पता, पर इस व़क़्त मुझे आपके सहारे और साथ की सख़्त ज़रूरत है.” कहते-कहते मैं सुबक पड़ी. स्त्री लाख चाहे, कठोर होने का गुमान कर ले, अपनों के स्नेह की उष्मा उसके भावनात्मक हिमखंड को पिघला ही देती है. “तुम्हारी भावनाओं को समझता हूं उर्मि, तुम्हारी ख़ुशी के लिए तुम जहां कहोगी, चलने के लिए तैयार हूं. मैं तुम्हें बांधूंगा नहीं. मेरा जीवन तो तुम्हीं से जुड़ा है. परंतु ज़रा सोचो- ऐसा करके क्या हम अपने बेटू के संग अन्याय नहीं करेंगे?”

“जानती हूं, बहुत पीड़ा होगी उसे. पर मैं झूठ नहीं कहूंगी आपसे. उस पल मुझे किसी का भी ख़याल नहीं आया था… बेटू का भी नहीं. बस, एक ही सोच हृदय को मथ रही थी कि अब हमारा यहां इस महानगर में क्या काम? रिटायरमेंट के बाद पिछला पूरा वर्ष लगभग लक्ष्यहीन बीता. देख ही रहे हैं. बेटू और केतकी अपने प्रांशु के साथ अपनी गृहस्थी में कितने ख़ुश हैं. इनके गतिशील जीवन में हमारा स्थान कितना है? मानव सेवा में शेष जीवन अर्पित करने की पुरानी साध इन दिनों बलवती होने लगी थी. हम उम्र लोगों का सहचर्य हो और जीवन किसी सार्थक लक्ष्य से जुड़ जाए, तो उस असीम के निकट पहुंचने का मार्ग आसान हो जाता है. सांसारिकता का ऋण और गृहस्थ धर्म पूरी निष्ठा से निभा लिया. कुछ बिरले ही ऐसे होते हैं, जो जीवन के मध्यान्तर में भी अपने पैरों में बेड़ियां डाले विकास के पथ पर चलते रहते हैं. मैं अपनी आत्मा को उतना दृढ़ नहीं पाती. ये हमारे मार्ग में बाधक ही बनेगी. सौ-सौ बार विचार किया है इन विषयों पर. लेकिन मुझे क्या पता था कि जीवन ऐसे दोराहे पर ला खड़ा करेगा जहां एक को चुनना अपनी ही आत्मा को पराया कर देने जैसी पीड़ा देगा.”

इस बीच केतकी प्रांशु को लेकर पार्टी में कब गई, पता नहीं. जाते हुए खाना रख गई थी, पर भूख किसे थी? इस लम्बी जिरह के बाद आदी खिंचे से रहे. शादी की सालगिरह का ऐसा उत्सव पहले कभी नहीं मनाया था. दोनों दो ध्रुवों की भांति अलग-अलग. सोचा, चलो जो हुआ सो हुआ, अब ये चर्चा किसी के आगे नहीं करनी. संध्या पूजा कर रही थी, तभी केतकी कमरे में आ गई, “बड़ी जल्दी आए, पार्टी कैसी रही?” “आप लोगों को बाहर लेकर जाना था न इसलिए.”

“बेटू भी आ गया?”

“हां, फ़ोन पर हैं, कोई मिस्टर स्वामी हैं, पांडीचेरी से… लाइन कट रही है बार-बार.”

हे प्रभु, सब कुछ आज ही हो जाना है, कल के लिए कुछ नहीं छोड़ोगे? मैं सिहर उठी. दूसरे फ़ोन तक पहुंची तभी घंटी फिर बजी, “जी हां, मैं सिद्धार्थ सिन्हा… उर्मिला सिन्हा मेरी मां हैं.” मेरे कान बेटू की आवाज़ से चिपक गए थे. “अपॉइन्टमेन्ट… किसलिए? कहीं आपने ग़लत नम्बर… मिसेज सिन्हा ने… कब?… कॉटेज… किसलिए… डॉ. सिन्हा के नाम से…?” फ़ोन कट गया.

बेटू सामने खड़ा था, ठगा-सा… हैरान… फ़ोन फिर बजा, मैं एक सांस में कह गई कि इस विषय में कल मैं स्वयं उनसे बात करूंगी, मेरे पैर कांप रहे थे. दरवाज़े को कसकर पकड़ लिया. आदी भी जाने कहां रह गए इतनी देर, वे होते तो बात को संभाल लेते. “आप सारी बातें तय करके आई हैं. इस बार इसलिए गईं…? पापा को पता था ये सब…?”

“ऐसा कुछ नहीं है बेटू… मेरी बात सुनो.”

“आपने इतनी दूर हमसे अलग रहने की सोच ली… और मुझे पता तक नहीं? आपको यहां अच्छा नहीं लगता, है ना? कहीं केतकी ने तो कुछ…” और वो केतकी को पुकारता, इससे पहले ही मैंने उसका हाथ पकड़ लिया. जितना हो सकता था, भरसक समझाने की कोशिश की. वही शब्द जिन्हें इतने दिनों से मन ही मन रटती आ रही थी, दोहराए, पर सब व्यर्थ. बालक की तरह गला रुंध आया था उसका. शादी के बाद से जो आवरण मेरे समक्ष ओढ़े रखता था, हट गया. पद, प्रतिष्ठा और पुरुषत्व पर उसका बालमन भारी पड़ रहा था. मेरे हाथों को अपने हाथों में ले थका-हारा वहीं सोफे पर बैठ गया.

“ऐसी क्या बात हो गई अचानक, जो इतना कठोर क़दम उठा बैठीं? मैं आप लोगों को समय नहीं दे पाता हूं न… जानता हूं, आप हर्ट होती होंगी. समय तो पापा भी नहीं देते थे, पर आपने उन्हें तो छोड़ने की बात कभी भी नहीं की और मुझे.. एक पल में पराया कर दिया?” मैंने उसका ध्यान बंटाने के लिए कहा, “अच्छा छोड़… इस विषय पर बाद में बात करते हैं, पहले ये बता आज की पार्टी में क्या-क्या हुआ?”

“आज? जानती हैं आज क्या हुआ? सच कहूं? मेरे साथी मुझसे ड्रिंक लेने की ज़िद करने लगे. लेकिन मना कर दिया मैंने. मुझे मेरे मां-पापा से आशीर्वाद लेना है, उनकी एनीवर्सरी है आज. नशा करके आपके सामने आता मैं? …पर अब सोचता हूं, काश… मैंने कर लिया होता नशा… ठेस इतनी गहरी तो नहीं लगती. अब, जब आप चली ही जाएंगी, तो रोकनेवाला कौन होगा? जो जी चाहेगा वही करूंगा.” “बेटू, चल उठ बेटे.”

लेकिन वह वैसे ही बैठा रहा, अवसाद से घिरा, एकदम चुप. केतकी दो बार आई. स्थिति की भयावहता को देख कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर रही थी. “अच्छा है, आप चली जाएंगी, मेरे इस मशीनी जीवन से दूर. वहां आश्रम में कितनी शान्ति है न…अभी तक आपका जीवन एक यज्ञ था, जिसमें स्वार्थ के लिए बहुत कम स्थान रहा. मैं आपके जीवन लक्ष्य को अपने स्वार्थ के लिए नीचे नहीं लाना चाहता. वहां आप जैसों की ही ज़रूरत है, जो अपना सर्वस्व दे सकें. मुझ अकेले के मोह में आप यहां बेमन से पड़ी रहें, इस पाप का भागीदार मैं नहीं बनना चाहता.”

मैं निरुत्तर बेबस-सी बैठी उसका सिर सहला रही थी. उसकी आंखों से झरझर आंसू बहने लगे. भर्राई आवाज़ में बोला, “आप दोनों ने अपने त्रिकोण में से मुझे बाहर कब निकाल दिया मां?… मैं कहां जाऊंगा… कोई भाई-बहन भी तो नहीं मेरा?” कहकर मेरी गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगा. “मेरा बच्चा… अपने दिल पर इतना बोझ मत डाल. हम सब हैं तो तेरे साथ… देख तो, ऐसे रोते हुए तू कितना बुरा लग रहा है. किसी ने देख लिया तो? चल उठ…” पर वह लेटा रहा, यूं ही मेरी गोद में सिर डाले.

गोद में सिर रखे-रखे सोफे पर वहीं सो गया. कैसा अनर्थ हो गया मुझसे? आज पता चला कि समय और उम्र ने इसके शरीर को खींचकर बड़ा ज़रूर कर दिया है, पर मन है जो उसी बालपन में लौट जाना चाहता है. मुझे क्या पता था कि इतना जुड़ा हुआ है तू हमसे अभी भी. जिस बेटू से बात करते हुए घबराती थी पहले, वही आज मेरे सामने सो रहा है, नन्हें शिशु की भांति, बेसुध… धीरे से उसे वहीं लिटा अपने कमरे में आ गई. चुप करके पड़ी रही. आदी बड़ी देर बाद आए मैं सो रही हूं, ये सोच बिना आवाज़ किए वे भी सो गए. नींद आंखों से कोसों दूर थी. बेटू का आंसुओं से भीगा चेहरा ज़ेहन में घूम रहा था. जन्म से लेकर आज तक वही तो धुरी था मेरे जीवन का…. और मेरी परिक्रमा पूरी हो गई, ये मैंने सोच भी कैसे लिया? अपने ही हाथों अपने बच्चे की नाल काटकर विलग होने का आदेश दे दिया? मन किया चीखकर रोऊं, अभी जाकर बेटू को अंक में समेटकर उससे क्षमा मांग लूं. मैंने पाप किया है यह सोचकर कि हम तुम पर बोझ हैं. कितनी स्त्रियां हैं इस धरती पर, जो अपने घर, परिवार, पत्नी और मां के दायरे से अलग, स्वतंत्र, अपने उत्थान हेतु कुछ सोच पाती होंगी? फिर मैं कौन-सी अनोखी हूं.

मेरा सारा अहंकार तिरोहित होने लगा इस सत्य के आगे कि मैं मां हूं पहले, फिर कुछ और… रात का धुंधलका था, जो छंटने का नाम नहीं ले रहा था. ये मेरे जीवन की सबसे लम्बी रात थी. अपने को धिक्कारती-फटकारती बैठी-बैठी सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगी. उजाला फैलने से पूर्व ही पूजा करने बैठ गई. आंखें अनवरत बह रही थीं. ‘मैंने तुमसे शक्ति मांगी थी, अपने आपको सारे बंधनों से विमुक्त करने की, तो ये पीड़ा क्यों दे रहे हो? स्त्री का घर ही उसका तीर्थ है और संतान पहला धर्म. एक मां इन्हें दुत्कार कर क्या कहीं और विश्रान्ति पा सकेगी? तुमने ही तो अर्जुन को समर से न भागने की धर्मसंगत शिक्षा दी है. फिर नारी नारी धर्म से च्युत हो तुम्हारी सेवा में प्रस्तुत हो जाए, तो ये उसकी कायरता न होगी? हम भले ही छोटी-छोटी गृहस्थी का पिंजरा बना, अपनी आत्मा को इसी तक सीमित कर लेती हैं. परन्तु इससे हमारी मानवता का क्षेत्र सिकुड़ तो नहीं जाता! पुण्य के लोभ में स्त्री अपने धर्म से डिगे तो विमाता ही कहलाएगी न?’

आख़िरकार अंतर्द्वन्द्व का अंत मां की ममता की जीत के साथ हुआ. स्वयं की खोज में मां ही की तो जीत होनी थी, सो वो भला कैसे हारती.

अगली सुबह मैं नाश्ते के समय सभी को संबोधित करते हुए बोली, “मैंने पांडीचेरी जाने का निर्णय स्थगित कर दिया है. बेटू मैं तुम्हारे, बहू और पोते के बगैर नहीं रह सकती. अब मैं, तुम लोगों के साथ ही रहूंगी.” “सच मां!” हर्षातिरेक में बेटू की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे.

 

– पूनम मिश्रा
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