कहानी- अपराधबोध (Short Story- Ap...

कहानी- अपराधबोध (Short Story- Apradhbodh)

गायत्री को लगता है की रिश्तों के बिखरने की एकमात्र वजह वही है. वो इस बेवजह के अपराधबोध में भीतर ही भीतर घुट रही है. पता नहीं कब गायत्री को इस अपराधबोध से मुक्ति मिलेगी.“ बता कर पापा ने गहरी सांस ली. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उनके हृदय से कितना बड़ा बोझ हल्का हुआ हो.
“कब गायत्री को इस अपराधबोध से मुक्ति मिलेगी…“ पापा के ये शब्द रह-रह कर मेरे मन-मस्तिष्क में घूम रहे थे.

आलमारी में मां की पुरानी मेडिकल रिपोर्ट्स ढूंढ़ने में मेरे हाथ अनवरत चल रहे थे. आंखें नम थीं और मन-मस्तिष्क को मिश्रित भावों ने घेर रखा था. मां को अकस्मात् हुए हृदयघात ने हमारी छोटी-सी शांत दुनिया में तूफ़ान ला दिया था.
ढूंढ़ते-ढूंढ़ते यकायक मेरी नज़र कोने में रखी एक ख़ूबसूरत-सी छोटी-सी संदूकची पर पड़ी. शायद मां ने इसे सबसे छुपा के रखा था. उत्सुकतावश मैंने संदूकची को उठा लिया. उस पर मां ने अत्यंत ख़ूबसूरती से रंग-बिरंगे रेशमी धागों से फूल-पत्ती काढ़ रखे थे. किनारे पर गोटे और मोतियों की झालर लगा रखी थी. संदूकची के सम्मोहन में मैं मां की रिपोर्ट्स भूलतो ही गई. मेरी उत्सुकता ने उसे खोलने पर विवश कर दिया.
उसके अंदर कुछ राखियां और कुछ ख़त थे. राखियां सभी बहुत ख़ूबसूरत थीं, जो मां ने ख़ुद अपने हाथों से बनाई थीं. उन ख़तों और राखियों को यूं छुपा देख मेरी अंदर की जिज्ञासा मुझे उन्हें पढ़ने पर विवश कर रही थीं. मेरे भीतर द्वंद युद्ध चलने लगा. हृदय मुझे उन ख़तों को पढ़ने के लिए विवश कर रहा था और मन किसी के भी निजी ख़तों को पढ़ने कीअनुमति नहीं दे रहा था. बहुत कशमकश के पश्चात अंतत: हृदय की विजय हुई और मैंने पढ़ने के लिए ख़त उठा लिया. मां ने ये ख़त राखियों के साथ मामा को लिखे थे, जो उन तक कभी पहुंचे ही नहीं.
जैसे-जैसे मैं ख़त पढ़ती गई, मेरी आंखों से अश्रुधारा बहती गई. उन ख़तों और राखियों में एक बहन का अपने भाई के प्रति अपार स्नेह, वात्सल्य और भावनाओं का निश्छल सागर बह रहा था. मां हर रक्षाबंधन पर मामा के लिए बड़े प्यार से राखी बनाती, उनके लिए अपनी भावनाएं और स्नेह ख़त में समेटती और अंत में उसे संदूकची में बंद कर देती. पिछले पंद्रह वर्षों का सागर सिमटा था उसमें.
ख़त पढ़कर नानी के घर की की यादें और मामा की कुछ धुंधली आकृतियां मेरे मानस पटल पर छाने लगी. उस वक़्त मेरी उम्र मात्र सात वर्ष की होगी जब मैं अंतिम बार मामा से मिली थी.
वट वृक्षों से घिरा नानी का घर और आंगन के बीच में डट के खड़ा वो आम का वृक्ष, मीठे रसीले दशहरी आम… कुछ-कुछ याद आने लगा था. बचपन की यादें मटमैले से चलचित्र की तरह आंखों के समक्ष घूमने लगी. मामा की लाड़ली थी मैं. वे मेरी सभी ख़्वाहिश पूरी करते. नानी तरह-तरह के पकवान बनाती और नाना ने मुझे ढेर सारी कहानियां सुनाते. मामा मां से उम्र में छोटे थे, इसलिए मां उन पर एक मां जैसा ही स्नेह लुटाती थीं. हर रक्षाबंधन पर मां मामा को राखी बांधने जातीं. यदि किसी कारणवश मां का राखी बांधने जाना सम्भव न हो पाता, तो मामा हमारे घर आकर मां से राखी बंधवाते और कहते, “दीदी चाहे कुछ भी हो जाए पर मेरी कलाई पर आपकी राखी ज़रूर बंधेगी.“ अपार प्रेम से बंधा था मां और मामा का रिश्ता… फिर ऐसा क्या हुआ होगा कि मां को मामा की राखियां उनकी कलाई के स्थान पर इस संदूकची में सजानी पड़ी. अवश्य ही कोई गंभीर बात होगी. मैं तो आज तक इन सभी बातों से अछूती थी और इसी भ्रम में थी मामा अमेरिका सेटल हो गए हैं, इसलिए नाना-नानी हमारे घर के नज़दीक रहने लगे थे. हम सभी उनका ख़्याल रखने में अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा के साथ निर्वाह कर रहे थे. उन ख़तों को पढ़कर मन में बहुत अनसुलझे प्रश्न घूम रहे थे. ऐसा क्या हुआ होगा, जिसने एक भाई-बहन के रिश्ते को विराम लगा और उसकी किर्चे मां के हृदय को इतने वर्षों चुभो रही थीं. अवश्य ही कोई बहुत गूढ़ कारण होगा, वरना मामा तो हर रक्षाबंधन पर कहीं से भी कैसे भी करके आते और मां से राखी बंधवाते.
मैं इन्ही विचारों में खोई थी कि मोबाइल की घंटी ने मेरी तंद्रा तोड़ी, “क्या हुआ स्नेहा, कहां रह गई? डॉक्टर कब से रिपोर्ट्स मांग रहे है… मां की रिपोर्ट्स मिली की नहीं मिली?“

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“हां-हां, मिल गई पापा… बस दस मिनट में हॉस्पिटल पहुंच जाऊंगी. मां ठीक है ना?” मैंने अपने आप को संयमित करते हुए कहा.
“हां ठीक है. कुछ टेस्ट करने हैं, इसलिए पुरानी रिपोर्ट्स मंगवाई हैं. जल्दी आओ.“
“हां पापा.” कहकर मैं हॉस्पिटल के लिए रवाना हो गई.
सुबह अचानक ही मां के छाती में पीड़ा होने लगी थी, जिस कारण उन्हें हॉस्पिटल में दाख़िल किया था.
आईसीयू में लेटी मां का चेहरा कितना शांत, हंसमुख लग रहा था, पर उस हंसमुख चेहरे में रिश्तों का कितना दर्द छुपा है, ये मुझे आज पता चला. जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल तुम इतना जो मुस्कुरा रही हो, क्या ग़म है, जो छुपा रही हो… मां के व्यक्तित्व पर बिल्कुल सटीक बैठती थी. असीम संयम, संतोष और धैर्य की स्वामिनी है मां. हर रक्षाबंधन पर मां को अपने भाई से मिलने की कितनी तड़प होती होगी. जिस भाई को बेटे समान स्नेह किया, उसकी विरह की पीड़ा को कैसे सहा होगा. पर अब नहीं… मैंने तय कर लिया था चाहे कारण कुछ भी हो मैं मां और मामा का मिलन करवाऊंगी. इस रक्षाबंधन पर मां मामा की कलाई पर राखी ज़रूर बांधेंगी. कोई भी नाराज़गी कितनी भी गहरी क्यों ना हो, वो प्रेम की ताक़त के समक्ष फीकी हो जाती है. फिर अब तो इतने वर्ष हो गए…
“गायत्रीजी को माइल्ड हार्ट अटैक आया था, पर अब ख़तरे से बाहर हैं. दो-तीन दिन में आप उन्हें घर ले जा सकते हैं.“ डॉक्टर की बात सुनकर मैंने और पापा ने राहत की सांस ली.
“पापा… एक बात पूछूं…” मैंने मौक़ा देख पापा से पूछ लिया .
“हां, बोल ना.“
“पापा, मामा यहीं अपने देश में हैं ना! अमेरिका में नहीं…”
मेरे इस अप्रत्याशित प्रश्न से पापा आश्चर्य से मुझे देखने लगे. उनके माथे की लकीरें, मौन भाषा में कुछ प्रश्न भी करने लगी.
“हां पापा, आज आलमारी में रखें मैंने मां के वो ख़त पढ़ लिए जो वे हर रक्षाबंधन पर कुणाल मामा को लिखती थीं. मैं तो इसी भ्रम में जी रही थी की मामा अमेरिका हैं, पर वो तो अपने ही देश में है.”
“पापा, प्लीज़ मुझे इस बात के पीछे का कारण बताइए… मामा और मां के अटूट बंधन को कैसे ग्रहण लग गया? ऐसी क्या हुआ?”
“ कुछ बातें अगर ख़ामोश ही रहे, तो अच्छा है बेटा वरना…”
“वरना वो नासूर बन जाती हैं पापा. हर बात का एक वक़्त होता है पापा. ज़रूरी नहीं जो पहले नहीं सुधरी वो अब भी नहीं सुधरेंगी. हम प्रयास तो कर ही सकते हैं. वक़्त सबसे बड़ा मरहम होता है, वो गहरे से गहरा घाव भी भर देता है. ऐसी क्या बात हुई थी कि स्नेह के मोतियों से बना एक भाई-बहन का रिश्ता टूट के बिखर गया और…”
“ग़लतफ़हमी और स्वार्थ.“ पापा मुझे बीच में टोकते हुए बोले.
“पता है बेटा स्वार्थ और ग़लतफ़हमी ऐसा रोग है जिसे लग जाए, तो उसकी सोचने-समझने की शक्ति हर लेता है. बहुत कठिन होता है इसका उपचार. ये रोग सशक्त से सशक्त रिश्ते तो नष्ट करने का बल रखता है. ये रोग लोगों से ऐसे-ऐसे कार्य करवा देता है, जिसका बहुत दुर्दांत होता है. तुम्हारे मामा भी इन्हीं दो रोगों का शिकार हो गए थे.“
“मतलब?..”
“क़रीब पंद्रह वर्ष पहले कुणाल ने अपना व्यापार शुरू करने का विचार बनाया, जिसके लिए काफ़ी रुपयों की आवश्यकता थी. जमा पूंजी और गहने बेच कर भी वो पैसे पर्याप्त नहीं होते. फिर इतनी बड़ी रक़म तो सिर्फ़ घर को बेचकर ही इकट्ठी की जा सकती थी. अंतत: उसने घर को बेचने का निर्णय लिया. उसने ये सब पहले से ही सोच रखा था, इसलिए उसने अपने लिए दो कमरों का फ्लैट पहले से ही देख रखा था. ये बात तुम्हारे नाना-नानी को पता नहीं थी. वो तो बस अपने बेटे के हित के साथ खड़े थे. जब सब कुछ तय हो गया था कि तभी कुणाल ने दो कमरों वाले फ्लैट के विषय में सभी को बता कर चकित कर दिया. कुछ देर के लिए कमरे में मौन पसर गया. दो कमरों का फ्लैट यानी एक कमरा कुणाल और प्रिया का और दूसरा बच्चों का. तो मां-बाऊजी का कमरा… या तो घर का एक कोना या फिर वृद्धाश्रम. ये बात मौन रूप से सभी को समझ आ रही थी. वो कहते है ना बेटा… संतान चाहे कुछ भी कर ले, किंतु माता-पिता के हृदय से सदैव उसके लिए आशीर्वाद और दुआ ही निकलती है. वो ख़ुद चाहे किसी भी स्थिति और परिस्थिति में रहे, किंतु अपनी संतान का सदेव हित ही करते हैं. अपना अनिश्चित भविष्य जानते हुए भी तुम्हारे नाना घर के काग़ज़ात पर दस्तख़त करने ही जा रहे थे की…” कहते-कहते पापा चुप हो गए.
“फिर क्या हुआ पापा?”

“की अचानक गायत्री ने सम्पत्ति में से अपना हिस्सा मांग लिया… क़ानूनन पिता की संपत्ति पर बेटे और बेटी का समान अधिकार होता है.“

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“अनबीलीवेबल… मां ने हिस्सा मांगा..?”
“तुम्हारी तरह, गायत्री के अचानक इस मांग से सभी आश्चर्यचकित और निशब्द थे. किसी को गायत्री से ये उम्मीद नहीं थी. ये जानते हुए भी की घर क्यों बिक रहा है, कुणाल को रुपयों की आवश्यकता है… उस पर गायत्री की ये मांग.
मां-बाऊजी तो चुप थे, किंतु कुणाल और प्रिया ने गायत्री को एक स्वार्थी, लालची आदि के दोषों के साथ कटघरे में खड़ा कर दिया. उस दो कमरों के फ्लैट के सच ने कुणाल और प्रिया के हृदय में छुपा स्वार्थ और लालच को भी उजागर कर दिया था. जीवन में ऐसे क्षण और कुणाल के इस व्यवहार की कल्पना तो किसी ने भी नहीं की थी.
गायत्री अच्छी तरह जानती थी कि धीरे-धीरे करके कुणाल और प्रिया, मां-बाऊजी की स्वेच्छा बताकर उनको वृद्धाश्रम में रहने के लिए विवश कर देंगे. काफ़ी लड़ाई-झगड़े, रूठा-रूठी, तरह-तरह के दोषारोपण के पश्चात गायत्री को उसका हिस्सा मिल गया. किंतु उसके लिए उसे बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी. कुणाल ने सदा के लिए उसके साथ अपने सभी रिश्ते ख़त्म कर दिए.”
“आप कुछ नहीं बोले मां को पापा…”
“बेटा मैं तो एक मूक दर्शक था. हां, पर मुझे गायत्री पर पूरा विश्वास था. उसके हृदय में क्या चल रहा है… इतने बड़े निर्णय के पीछे क्या उद्देश्य था… ये तो मैं नहीं जानता था, पर इतना अवश्य विश्वास था की वो जो कर रही है उसके पीछे अवश्य ही कोई गूढ़ बात है. लालच और स्वार्थ तो गायत्री के स्वभाव से अछूता था. अपने एकमात्र भाई के विरह की पीड़ा गायत्री को दिन-रात सताती थी. मैं अक्सर उसे छुप-छुप कर रोता देखता था. इस घटना के बाद जब रक्षाबंधन पर गायत्री ने उसे रखी भेजी, तो उसने उसे अस्वीकार कर उसी रूप में उसे वापस भेज दिया. फिर तो हर रक्षाबंधन पर वो कुणाल के लिए राखी बनाती अवश्य थी, पर उसे सहेजकर उस संदूकची में रख देती थी.”
“फिर उन रुपयों का मां ने क्या किया..?”
“समय अपनी गति से चल रहा था. फिर अंतत: वही हुआ जिसका गायत्री को भय था.”
“क्या..?” मेरी उत्सुकता चरम सीमा पर थी.
“कुणाल का नया व्यापार कुछ ख़ास नहीं चला. घर का ख़र्च चलाना तक मुश्किल हो रहा था. कुछ समय पश्चात गायत्री को अपने मां-बाऊजी के विषय में कुछ पता चला. वो तुरंत मा-बाऊजी को लेने चली गई और उन्हें उनके अपने घर… उनका अपना घर ले आई. वो घर, जो उसने अपने उस हिस्से में से ख़रीदा था. उसकी दूरदर्शिता सोच ने ऐसे क्षण की अनुभूति पहले से ही कर ली थी. उसने तभी उन रुपयों से एक घर ख़रीद लिया था, जो उसने अपने मां-बाऊजी के नाम किया था और उनके पश्चात वो घर क़ानूनन कुणाल के नाम कर दिया था. गायत्री को तो कभी पैसे का लालच था ही नहीं.
अगर उस समय वो अपने मां-बाऊजी के-लिए लड़ती, तो वो मुनासिब नहीं होता. बात और बिगड़ जाती, इसलिए हिस्सा मांगा. अपार स्नेह रखती है वो कुणाल पर. उसने सबकी नज़रों में बुरा बनना मंज़ूर किया, किंतु फ़र्ज़ से पीछे हटना नहीं. माता-पिता की सेवा और देखभाल का जितना हक़ बेटे का है, समान रूप से उतना हक़ बेटी का भी है. नाना-नानी को जब गायत्री के सत्य का ज्ञात हुआ, तो उन्हें अपनी परवरिश और संस्कारों पर गर्व हुआ. उन्हें ये भी पूरा विश्वास था कि कुणाल के विवेक पर लगा ग्रहण शीघ्र हट जाएगा और परिवार फिर से ख़ुशहाल हो जाएगा. हमने कुणाल को सत्य से अवगत करवाने और उस घर के काग़ज़ात देने का दो-चार बार प्रयास किया था, किंतु वो कुछ भी सुनने और समझने को तैयार ही नहीं था. वो तो अभी तक यही समझता है कि मां-बाऊजी वृद्धाश्रम में ही है. ग़लतफ़हमी, क्रोध और स्वार्थ ने उसकी बुद्धि और विवेक पर ग्रहण जो लगा रखा था. अब तो समय की प्रतीक्षा है… जब ग्रहण समाप्त होगा और सब कुछ कुशल मंगल हो जाएगा. गायत्री को लगता है की रिश्तों के बिखरने की एकमात्र वजह वही है. वो इस बेवजह के अपराधबोध में भीतर ही भीतर घुट रही है. पता नहीं कब गायत्री को इस अपराधबोध से मुक्ति मिलेगी.“ बता कर पापा ने गहरी सांस ली. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उनके हृदय से कितना बड़ा बोझ हल्का हुआ हो.
“कब गायत्री को इस अपराधबोध से मुक्ति मिलेगी…“ पापा के ये शब्द रह-रह कर मेरे मन-मस्तिष्क में घूम रहे थे.
मां के स्वास्थ्य में धीरे-धीरे सुधार आ रहा था.
हम सभी का जीवन अब अपने नित्य चर्या पर आ गया था. उस दिन रक्षाबंधन का त्योहार था. हम सभी हर्षोल्लास के साथ तैयारियां कर रहे थे. तभी दरवाज़े पर घंटी बजी. दरवाज़ा खोलते ही मां जड़वत हो गई. सामने कुणाल मामा और मामी खड़े थे. चेहरे पर ख़ुशी और विस्मय के भाव, आंखों में अश्रुधारा और होंठों पर मुस्कान उनकी ख़ुशी बयां कर रही थीं.
“अपने इस नालायक भाई को राखी नही बांधोगी दीदी… मुझे क्षमा कर दो दीदी. मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया, जो तुम्हें समझ नहीं पाया.“ कह कर मामा उनके गले लग गए. मां निशब्द थीं.
वर्षों पश्चात यह सुखद मिलन हो रहा था. सभी गिले-शिकवे, ग़लतफ़हमियां आंसुओं की धारा में बह रहे थे. घर के बाहर और भीतर दोनों स्थानों पर सावन बरस रहा था. मां की सभी राखियां मामा की कलाई पर सज रही थीं.
“कुणाल ये लो तुम्हारी अमानत. इसे स्वीकार कर मुझे अपराधबोध से मुक्ति दो.“
“इसे अपना अपराधबोध मत कहिए दीदी. आपने तो अपने बेटी और बहन होने का कर्तव्य पूरी निष्ठा के साथ निभाया था. भटक तो मैं गया था. अपराध तो मुझसे हुआ था. मैंने ही आपको ग़लत समझा. स्वार्थ और ग़लतफ़हमी मेरे विवेक पर हावी हो गई थी. अपराधी आप नही मैं हूं. आप मुझे क्षमा करके मुझे इस अपराधबोध से मुक्ति दीजिए.“

“अरे भाई तुम दोनों को अपराधबोध से मुक्ति मिल गई हो, तो ज़रा हमें भी इस भूख से मुक्ति दे दो.“ पापा की इस बात से सारा माहौल हल्का हो गया.

नाना-नानी, पापा के चेहरे पर असीम ख़ुशी और संतुष्टि थी. इस काया पलट के पीछे का रहस्य वो समझ चुके थे. वे मुझे आंखों की मौन भाषा से धन्यवाद दे रहे थे.

कीर्ति जैन
कीर्ति जैन

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