कहानी- बाग़बान (Short Story- Bagh...

कहानी- बाग़बान (Short Story- Baghban)

ये क्या कह गया माली? ये अनपढ़ उनकी समस्या का कारण और निवारण एक साथ बता गया. तुरंत जाकर माथुर साहब को जगाया, विचार-विमर्श किया. बड़े दिनों बाद मुस्कुराईं, लगा जैसे कलेजे पर रखा पत्थर हट गया.

सुबह जल्दी उठकर कांताजी अपनी बगिया में आकर बैठ गईं, बस यहीं सुकून मिलता है. नहीं तो रात-दिन मन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि ग़लती किससे हुई? कहां हुई? माथुर साहब उच्च पद से सेवानिवृत्त हुए, बीच शहर में ये घर बनवाया. दो बेटे- बड़ा अनूप, छोटा दिलीप, दोनों इंजीनियर. समझदार बहुएं, प्यारे-प्यारे पोते-पोती, कुल मिलाकर सब कुछ १००% सही. हालांकि अब ये घर संभालना मुश्किल हो जाता है, लेकिन ये घर उनके संघर्षों का, उतार-चढ़ाव का गवाह है. माथुर साहब के लाख प्रयासों के बावजूद वो इसे बेचने के लिए तैयार नहीं हुईं.
लेकिन किसकी नज़र लगी मेरी गृहस्थी को? कांताजी की आंखें भर आईं. ना के बराबर बात होती है एक-दूसरे से. कोई हंसी-मज़ाक नहीं. चिढ़े-चिढ़े, खिंचे खिंचे सब रहते हैं… चश्मा उतारकर आंसू पोंछने लगीं कि आवाज़ आई, “राधे राधे माताजी.”
“आओ आओ रामदास… कहां गायब हो? दो-तीन बार फोन भी किया, मुनिया से बात हुई.”
“बताए तो रही मुनिया कि बंगलेवाली माताजी का फून आया, ध्यानै सै उतर गया.”
“… अच्छा ऐसा करो, गुड़ाई कर दो, खाद डाल दो और देखो ये पाम कैसे सूख रहे हैं, बढ़ भी नहीं रहे.”


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“दुइ-चार गमला मंगाओ माताजी, छोटा-छोटा कई ठो पउधा एक साथ लगे हैं, एही मारे बढ़ नहीं रहे. इन सबका अलग करे का पड़ी, तब बढ़िहैं भनाभन.”
ये क्या कह गया माली? ये अनपढ़ उनकी समस्या का कारण और निवारण एक साथ बता गया. तुरंत जाकर माथुर साहब को जगाया, विचार-विमर्श किया. बड़े दिनों बाद मुस्कुराईं, लगा जैसे कलेजे पर रखा पत्थर हट गया.
अगले दिन इतवार था. सबको अपने कमरे में बुलाया.
संयत स्वर में कहना शुरू किया, “मैंने और तुम्हारे पापा ने ये घर बेचने का फ़ैसला किया है. सामनेवाले भक्ति अपार्टमेंट में तीन फ्लैट बुक किए जाएंगे. २-२ बेडरूम वाले तुम दोनों के लिए और एक बेडरूम का फ्लैट हमारा!”


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सब अवाक थे! ये क्या हो गया अचानक?

अनूप आकर मां से लिपट गया. आंखें भर आईं, “मां, हमसे कोई ग़लती हो गई क्या?”
“नहीं रे”, कांताजी ने उसके आंसू पोंछे, “बस, मेरे पौधे बड़े हो गए हैं!”

Lucky Rajiv
लकी राजीव

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