“पौधे हों या रिश्ते… जिसे घर में लाकरसींचना हो, उससे रोज़ फल और फूल की उम्मीद नहीं की जाती. कभी उसे धूप से बचाना पड़ता है, कभी उसकी मिट्टी ढीली करनी पड़ती है और कभी-कभी उसे यूं ही सोते हुए छोड़ देना पड़ता है.”
शर्मा जी चुपचाप चाय पीते रहे.
सुबह के सात बज चुके थे. शर्मा जी घर से निकले तो चेहरे पर ग़ुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था. सामने वाली बालकनी में सक्सेना जी हमेशा की तरह अपने पौधों को पानी दे रहे थे. शर्मा जी को देखते ही उन्होंने पूछा, “क्या हुआ शर्मा जी? सुबह-सुबह इतने ग़ुस्से में क्यों हैं?”
शर्मा जी ने झुंझलाते हुए कहा, “क्या बताऊं! मेरी बहू अभी तक सो रही है. सात बज गए हैं. न कोई शर्म-लिहाज, न घर-गृहस्थी की चिंता. हमारे ज़माने में तो बहुएं सूरज निकलने से पहले उठ जाती थीं. आजकल की बहुओं को तो बस सोना आता है.”
सक्सेना जी ने पौधे को पानी देते हुए सहज भाव से कहा, “अरे, इसमें इतना ग़ुस्सा करने वाली क्या बात है? जवान बच्चे हैं. रात में देर से सोए होंगे. कल शनिवार भी था. सोने दीजिए.”
“अरे, लेकिन सुबह की चाय का क्या?” शर्मा जी ने तुरंत कहा, “सात बज गए और अभी तक चाय बनाकर नहीं दी.”
सक्सेना जी मुस्कुराए. “बस इतनी सी बात! आइए, अंदर चलिए. साथ बैठकर चाय पीते हैं.”
दोनों ड्रॉइंगरूम में आकर बैठ गए. कुछ क्षण बाद सक्सेना जी उठे और किचन की ओर जाने लगे.
शर्मा जी ने पूछा, “अरे, कहां जा रहे हो?”
“चाय बनाने.”
यह भी पढ़ें: शादीशुदा ज़िंदगी में कैसा हो पैरेंट्स का रोल? (What Role Do Parents Play In Their Childrens Married Life?)
“अरे चाय तो बहू बना देगी.” शर्माजी ने कहा
सक्सेना जी हल्के से मुस्कुराए, “पर बहू तो मेरी भी सो रही है शर्मा जी.”
शर्मा जी चुप हो गए.
सक्सेना जी चाय बनाने चले गए.
कुछ देर बाद दोनों के हाथों में चाय के प्याले थे. शर्मा जी ने एक घूंट लिया और जाने क्यों उनकी निगाह बालकनी में रखे उन पौधों पर टिक गई, जिन्हें सक्सेना जी सुबह से बड़े मन से सींच रहे थे.
सक्सेना जी ने उनकी निगाह भांप ली.
“जानते हैं शर्मा जी.” उन्होंने पौधों की ओर देखतेहुए कहा, “पौधे हों या रिश्ते… जिसे घर में लाकर सींचना हो, उससे रोज़ फल और फूल की उम्मीद नहीं की जाती. कभी उसे धूप से बचाना पड़ता है, कभी उसकी मिट्टी ढीली करनी पड़ती है और कभी-कभी उसे यूं ही सोते हुए छोड़ देना पड़ता है.”
शर्मा जी चुपचाप चाय पीते रहे.
सक्सेना जी ने मुस्कुराकर कहा, “बहू है शर्मा जी… घर की सदस्य है, सुबह की चाय का अलार्म नहीं.”
शर्मा जी ने पहली बार प्याले को देखते हुए सोचा- जिस बहू से वे सुबह-सुबह सेवा की उम्मीद कर रहे थे, उसे उन्होंने कभी अपने घर में एक इंसान की तरह जगह दी भी थी या सिर्फ़ एक ज़िम्मेदारी की तरह?
यह भी पढ़ें: रिश्तों में मिठास बनाए रखने के 50 मंत्र (50 Secrets For Happier Family Life)
बालकनी में पौधे अब भी हवा में झूम रहे थे.
और शर्मा जी को लगा, पौधों को पानी देना तो सक्सेना जी रोज़ सीख रहे थे… शायद आज उन्होंने उन्हें रिश्ते सींचने का तरीक़ा भी सिखा दिया था.

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES
Photo Courtesy: freepik
