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कहानी: एकालाप- पतिदेव के लिए महादेव सा व्रत क्यों? (Short Story: Ekalap- Patidev Ke Liye Mahadev Sa Vrat Kyon?)

महादेव को पार्वती जी ने तपस्या करके पाया था. लेकिन हे मेरी पार्वती! तुम्हें तो मैं बिना तपस्या के ही मिल गया था.और अब तुम मेरे लिए इतना कठिन निर्जला व्रत कर रही हो कि मुझे अपने आप पर ही संदेह होने लगा है.

आज सुबह से घर में बड़ी शांति थी. कारण था- पत्नी जी का हरतालिका व्रत. निर्जला व्रत था. यानी अन्न तो दूर, जल की एक बूंद भी नहीं.

पत्नी जी सुबह से पार्वती माता बनने की तैयारी में थीं और हम सोच रहे थे कि जब घर में पार्वती माता अवतरित हो ही रही हैं तो हमें भी महादेव की भूमिका निभानी पड़ेगी.

लेकिन समस्या यह है कि महादेव बनना इतना आसान भी नहीं है.

महादेव के पास तो चमत्कारी शक्तियां थीं, हमारे पास तो बेचारे पति वाली सीमित शक्तियां हैं- वह भी शादी के बाद धीरे-धीरे समाप्त हो चुकी हैं.

महादेव ने क्रोध में बालक गणेश का सिर काट दिया तो बाद में हाथी का सिर लगाकर उन्हें पुनर्जीवित भी कर दिया.

हम पति लोग क्रोध में अगर पप्पू की पेंसिल भी तोड़ दें तो अगले दिन स्टेशनरी की दुकान से नई पेंसिल ख़रीदकर लानी पड़ती है.

पुरानी पेंसिल जोड़ने की शक्ति तो हमारे पास भी नहीं है और न ही घर में कोई ऐसी बात है जिसे तोड़कर आसानी से जोड़ सकें.

महादेव के पास त्रिनेत्र है.

हम आज के पति तीन आंखें तो क्या, दो आंखों से भी अपनी पार्वती जी की भृकुटि का उतार-चढ़ाव देखकर स्थिति भांपने में लगे रहते हैं.

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उनकी तीसरी आंख खुलते ही काम तमाम.

और हमारी दोनों आंखें पत्नी जी की टेढ़ी भृकुटि देखते ही अपने आप नीचे झुक जाती हैं.

महादेव तांडव करते हैं.

हम पति?

हम तो अपनी पार्वती की तान पर ही दिनभर नाचते रहते हैं.

महादेव कैलाश पर्वत पर रहते हैं और हम पति लोग भी अपने अपने घर के कैलाश पर ही रहते हैं.

बस अंतर इतना है कि महादेव के कैलाश पर बर्फ़ रहती है और हमारे घर में कभी कभी पत्नी जी की नाराज़गी के कारण माहौल ठंडा रहता है.

महादेव के गले में नाग है.

हमारे गले में ऑफिस की टाई, बच्चों की फीस, बिजली का बिल और ईएमआई का फंदा है.

महादेव भस्म रमाते हैं और हम पति लोग महीने की पगार आने से पहले ही ख़र्चों की भस्म हो जाते हैं.

महादेव का वाहन नंदी है और हमारा वाहन?

वही पुरानी मोटरसाइकिल, जो हर महीने पेट्रोल और सर्विस के नाम पर हमारी परीक्षा लेती रहती है.

महादेव को पार्वती जी ने तपस्या करके पाया था.

लेकिन हे मेरी पार्वती!

तुम्हें तो मैं बिना तपस्या के ही मिल गया था.

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और अब तुम मेरे लिए इतना कठिन निर्जला व्रत कर रही हो कि मुझे अपने आप पर ही संदेह होने लगा है.

आखिर मैं इतना भी महादेव जैसा नहीं हूं कि तुम्हारे इस तप का ऋण चुका सकूं.

मेरे पास न तीसरा नेत्र है, न जटाओं में गंगा, न कोई चमत्कारी शक्ति.

हां, एक शक्ति ज़रूर है-

तुम्हारे नाराज़ होने पर तुरंत “सॉरी” बोल देने की.

तो हे मेरे गणेश और कार्तिकेय की मां!

मैं सिर्फ तुम्हारा पति हूं और यह सौभाग्य मुझे बहुत पहले ही मिल चुका है.

अब तुम पार्वती सा कठिन व्रत मत करो.

उठो… थोड़ा जल ग्रहण करो.

कुछ जलपान करो.

और चलो, आज हम दोनों माता पार्वती और महादेव के मंदिर चलते हैं.

वहां उनसे कोई वरदान नहीं मांगेंगे कि पति महादेव जैसा हो जाए और पत्नी पार्वती जैसी.

बस हाथ जोड़कर इतना ही मांगेंगे कि-

हे महादेव! हमारी गृहस्थी की गाड़ी यूं ही चलती रहे.

न कोई किसी को पहाड़ से धकेले,

न कोई किसी का सिर काटे,

न कोई किसी को सत्तर टुकड़ों में काटकर ड्रम में भरे!

बस दोनों एक दूसरे की टेढ़ी भृकुटि को देखकर भी मुस्कुरा दें…

कभी पत्नी पति की ग़लती पर आंखें बंद कर ले और कभी पति पत्नी की ग़लती पर कान बंद कर ले.

और जीवन की इस लंबी यात्रा में…

न कोई महादेव बने, न कोई पार्वती बनने की ज़िद करे.

बस दोनों अच्छे पति-पत्नी बने रहें…

और हंसते-हंसते गृहस्थी की गाड़ी चलती रहे.

– प्रज्ञा पाण्डेय मनु

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Photo Courtesy: Freepik

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