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कहानी- छलांग (Short Story- Chhalaang)

मैंने जब ये सारी बातें अपने शोध-निदेशक (दीप्ति के चाचाजी) के साथ साझा की, तो उन्होंने इस प्रस्तावित प्रवास में एक और अनुच्छेद जोड़ दिया, वह था मेरे और दीप्ति के लिए ग्रीन कार्ड की व्यवस्था. सच बताऊं तो उस समय तक मैं इसका अर्थ भी नहीं समझता था. कुछ ही महीने बाद कई राष्ट्रीयता का छलांग लगाते हुए मैं सात समंदर पार आकर ऐसे बसा कि यहीं का होकर रह गया.

मैं, सौरभ चक्रवर्ती, अपनी पत्नी दीप्ति की आख़िरी इच्छा पूरी करने कल रात ही शिकागो, संयुक्त राज्य अमेरिका से काशी पहुंचा. उसकी इच्छानुसार अस्थि-कलश का मणिकर्णिका घाट, काशी में विसर्जन करना था मुझे. दीप्ति का बचपन इसी शहर में बीता था. वाराणसी, जिसे बनारस और काशी के नाम से भी जानते हैं, उसका ननिहाल था, इस कारण यहां से उसका लगाव स्वाभाविक था. फिर पौराणिक मान्यताओं के अनुसार काशी के मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार हमारे लिए सीधा स्वर्ग का रास्ता खोलता है, यह प्रलोभन तो हमारे अचेतन मन में रहता ही है.
जब दीप्ति कोरोना की दूसरी लहर की चपेट में आ गई, तो उसका मनोबल इतना डगमगा गया कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं तथा क़ाबिल और समर्पित चिकित्सकों के प्रयास के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका. उसने मौत की आहट सुन ली थी, मृत्यु से ठीक एक घंटा पूर्व उसने मुझसे कहा, “सौरभ, मेरी आख़िरी इच्छा थी कि मेरा अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट, काशी में होता. वह तो अब संभव नहीं, पर इतना वादा करो कि तुम मेरी अस्थियां उसी घाट पर विसर्जित करोगे. ”
मैंने उसे बहुत दिलासा दिया, तुम ठीक हो जाओगी, पर उसका मन पहले ही हार चुका था. मैं बस उसका हाथ पकड़े उसकी हिम्मत बढ़ाने की कोशिश कर रहा था. मेरे दोनों बेटे, बहुओं सहित उसे दिलासा दे रहे थे, मगर जाने वाले को कौन रोक पाया है. उसे दिए वचन को पूरा करने मैं कल रात शिकागो से एयर इंडिया की सीधी उड़ान पकड़ दिल्ली होते हुए यहां पहुंचा और गंगा घाट के समीप ही एक होटल में ठहर गया.
प्रातः गंगा किनारे पहुंचते ही मुझे एक मित्र की कही बात याद आ गई, रांड, सांड, सीढ़ी, सन्यासी, इनसे बचे सो सेवे काशी. जिसने यह बात कही होगी उसने शायद आज के काशी की कल्पना भी नहीं की होगी. मुझे तो आज काशी और उसके घाट बेहद स्वच्छ और ख़ूबसूरत नज़र आ रहे थे.


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ख़ैर, जैसे मेरी नाव नदी की धारा के मध्य की ओर बढ़ी एक अद्भुत नज़ारा देखने को मिला. गंगा के घाट एक धनुष की आकृति में सजे दिखे. आप तो जानते ही होंगे कि गंगा अपने उद्गम से जब समुद्र से मिलने चलती है, तो वह मुख्यतः दक्षिण (और पूर्व) की ओर बढ़ती जाती है, कुछ ही ऐसे स्थल हैं जहां गंगा उत्तरायण होती है; वाराणसी उनमें एक है.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह काशी की गंगा को अतिरिक्त महत्व प्रदान करता है. पृथ्वी पर उसका स्वागत करने वाले शिव (बाबा विश्वनाथ) से एक बार पुनः मिलने का अवसर जो उसे मिलता है यहां.
इसी बात को मेरे नाविक ने कुछ अपने अंदाज़ में कहा, “साहब, जब गंगा मैया काशी पहुंची, तो उन्होंने अपनी आधी यात्रा पूरी कर ली थी, सोचा ज़रा अपनी यात्रा को तो देखूं. पीछे जो मुड़ी, तो उनका मुंह उत्तर की तरफ़ घूम गया." गंगा के उत्तरायण होने की इस व्याख्या ने चेहरे पर मुसकान ला दिया.
उत्तरायण होने के बावजूद उसके सभी घाट पूर्वार्भिमुख हैं. सूर्योदय की पहली किरण इन घाटों पर पड़ रही थी, जो इनकी सुंदरता में चार चांद लगा रही थी. इनकी ख़ूबसूरती को निहारता मैं कब मणिकर्णिका घाट जा पहुंचा, पता भी नहीं चला. जैसा मैंने पहले कहा, काशी की घाटों में मणिकर्णिका घाट का विशेष महत्व है; कहते हैं यहां चिता की अग्नि कभी शांत नहीं होती, क्योंकि मोक्ष प्राप्ति की आशा में अन्य स्थानों से भी बड़ी संख्या में आए परिजन अपने स्वजनों का अंतिम संस्कार यहीं करना चाहते हैं.
जैसे मेरी नाव घाट पर पहुंची मेरे पुत्र का एक मित्र अपने पुरोहित के साथ मेरे सामने उपस्थित हो गया; उससे पहले से ही संपर्क कर लिया गया था. पंडितजी ने अस्थि-प्रवाह की सारी प्रक्रिया लगभग एक घंटे में पूरी कर दी; मुझे संतोष हुआ कि मैं दीप्ति की आख़िरी इच्छा तो पूरी कर सका. अब मुझे बाबा विश्वनाथ का दर्शन करना था और फिर संध्या की फ्लाइट पकड़ कोलकाता निकल जाना था. इतनी दूर आने के बाद एक बार सुचित्रा, मेरे बुआ की बेटी, से मिलना तो बनता ही था, क्योंकि अब वही मेरी एकमात्र जीवित रिश्तेदार थी, जो दुनिया के इस कोने में रहती थी.
अब आपको बताऊं, मैं मूल रूप से पाकिस्तानी नागरिक था, मगर वर्ष 1971 में मेरे शांत मुल्क में एक ऐसा तूफ़ान आया, जिसने कितनों की ज़िंदगी तबाह कर दी; मैं बात कर रहा हूं दक्षिण-पूर्व एशिया में एक नए राष्ट्र बांग्लादेश के अभ्युदय की. इसके जन्म की प्रसव-पीड़ा धरती मां को नहीं, उस क्षेत्र के निवासियों को झेलना पड़ा. कितने निर्दोष मौत के घाट उतार दिए गए. यह इतिहासकारों के लिए आंकड़ों का खेल होगा, हमारे लिए तो यह ऐसी त्रासदी थी जिसे हम कभी भूल नहीं सकते. जनरल याहया खान की क़त्ल-ए-आम करती सेना से स्वयं को बचा कर मैं भारत पहुंचने में सफल तो हो गया, पर आगे क्या, सोच कर आंखों के सामने अंधेरा छा जाना स्वाभाविक था.
यह तो ईश्वर की असीम कृपा थी कि मेरे पास भारत के पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल के मुख्य नगर कलकत्ता में सिर छिपाने की जगह थी, मेरी बुआ का एक बड़ा सा मकान था और आर्थिक रूप से उनका परिवार काफ़ी सम्पन्न था. फिर भी अपनी जीविका का कोई उपाय तो करना ही था. मैं अपने मुल्क में एक डिग्री कॉलेज में अध्यापक के रूप में काम करता था, पर यहां तो वैसी नौकरी पाना असंभव ही था. मैं ठहरा एक अवैध शरणार्थी, फिर मुझे प्राध्यापक के रूप में कौन नौकरी देता. फिर भी मेरे पास गणित में एम.एस.सी. की डिग्री थी, पढ़ाने का अनुभव था और उस कार्य में निपुण भी था.
बंगाल में हम बांग्लादेशियों के प्रति जो सद्भाव था मुझे उससे आशा बंधी कि यदि प्रयास किया जाए, तो किसी निजी स्कूल में पढ़ाने की नौकरी तो मिल ही जाएगी. मेरी बुआ और मेरी बहन (बुआ की बेटी) ने मेरे विचार का समर्थन किया. नौकरी पाने के लिए मैंने एक रणनीति तय की जिसके तहत प्रत्येक दिन मैं किसी विशेष इलाके में जाता, वहां स्थित सभी विद्यालयों में पहुंच कर कोशिश करता कि प्राचार्य से मिलूं, कुछ बातें करूं, शायद मेरी योग्यता और अनुभव के कारण कोई नौकरी देने को तैयार हो जाए. यह कोई आसान काम नहीं था, उस पर मैं ठहरा एक अवैध प्रवासी, सद्भावना अपनी जगह थी, नियम की प्रतिबद्धता अपनी जगह.


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सारा दिन मुख्य सड़क से जुड़ी गलियों की खाक छानता. शुरू में तो स्कूल में प्रवेश करने में भी झिझक होती, मगर दो-तीन दिन बाद उस हीनभावन पर मैंने विजय पा ली. थक जाता, तो किसी पार्क में थोड़ी देर के लिए बैठ जाता. पास में पैसे थे, अतः कुछ खा-पी लेता. इसके लिए घर जाना समय की बर्बादी लगती. इस मुहिम के पांचवें दिन एक +2 विद्यालय में कुछ बात बनती लगी. प्राचार्या ने मेरी बातों को गौर से सुना, योग्यता और अनुभव की प्रशंसा की और पूछा, "बांग्लादेश से आए हो?"
अब उनसे झूठ कैसे बोलता, स्वीकार में बस सिर हिलाया, लगा यह नौकरी भी मिलने से रही. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "जब बातें करो, तो बोलने के लहजे का ख़्याल रखो. देखो पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के लोगों के बात करने का लहजा अलग-अलग होता है. मैंने तुम्हारी बातों से ही समझ लिया कि तुम उस पार से आए हो. खैर, चिंता की कोई बात नहीं, मैं तुम्हें रख लूंगी. ऊंचे वर्ग (9 से 12 तक) में मुझे एक गणित का अच्छा शिक्षक चाहिए भी. पर एक बात अच्छी तरह से समझ लो, मैं तुम्हें स्कूल के नियमित शिक्षक के रूप में अपने रजिस्टर पर नहीं दिखलाऊंगी. तुम्हारा वेतन भी नगद दिया जाएगा. दी जाने वाली राशि तुम्हारी कार्य कुशलता और बच्चों की संतुष्टि पर निर्भर करेगा.
यदि तुम्हारा काम ठीक रहा, तो फिर देखेंगे तुम्हारे लिए आगे और क्या किया जा सकता है. ध्यान रहे बाहरी लोगों से अपनी नौकरी और स्कूल की जानकारी साझा नहीं करोगे. मेरे कहने का अर्थ समझ तो रहे हो न?"
मुझे क्या चाहिए था. अंधे को दो आंखें. मेरी आंखें भर आईं, मैंने उनका चरण स्पर्श किया. वैसे भी वे मां की उम्र की थीं. मैं चलने को उठ खड़ा हुआ. उन्होंने अपना आख़िरी आदेश सुनाया, "कल प्रातः साढ़े आठ पर स्कूल आ जाओगे, सारे वर्ग नौ बजे शुरू हो जाते हैं, तुम्हारा रूटीन भी तुम्हें कल ही मिल जाएगा."
इस तरह मुझे मेरा मनपसंद काम मिल गया और अगली सुबह से ही मैंने विद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया; मेरी बुआ की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. सीमा पर भी परिस्थितियां अब सामान्य होने लगी थी. मैंने मां-बाबा तक अपनी खैरियत और नौकरी की सूचना पहुंचा दी. एक सप्ताह बाद मेरे स्कूल की प्राचार्या ने कार्यालय में बुलाकर मेरे कार्य की प्रशंसा की और मेरे वेतन के बारे में भी बताया जो मेरी उम्मीद से ज़्यादा ही था. लगभग पंद्रह दिनों बाद मुझे पहला वेतन दिया गया और प्राचार्या ने शाम को अपने घर आने का आग्रह भी किया. उनके घर जब पहुंचा तो थोड़ी देर के लिए तो मेरी सांस रुक सी गई, उनके पति नगर के बहुत बड़े पुलिस अधिकारी जो थे. मगर वहां सबों ने मेरा मुस्कुरा कर स्वागत किया और मैडम ने बड़े प्यार से मुझे चाय पिलाया. कलकत्ता का प्रसिद्ध संदेश भी खिलाया. चलते वक़्त उन्होंने अपनी बेटी दीप्ति से मेरा परिचय कराया; मैं तो उसे जानता ही था, "मैडम, यह तो अपने स्कूल में बारहवीं की छात्रा हैं. मैं इन्हें गणित पढ़ाता हूं." मैडम ने हंसते हुए कहा, "सौरभ, इन्हें नहीं इसे; यह तुम्हारी विद्यार्थी है और मुझे तुम से इसके लिए कुछ सहायता चाहिए. यह गणित में थोड़ी कमज़ोर है. यदि शाम को तुम कुछ वक़्त इसे दे सको, तो मुझ पर बड़ा उपकार होगा. तुम जो कहोगे मैं उतनी फीस दे दूंगी."
मैंने हाथ जोड़े और बस यही कह पाया, "मैडम प्लीज़, पैसे की बात नहीं. मैं कल से संध्या पांच बजे आ जाऊंगा; वैसे भी आपका निवास मेरे घर जाने के रास्ते में ही है." जिसका इतना बड़ा उपकार था मुझ पर उनसे पैसा लेना किसी पाप से कम होता क्या? चलते वक़्त मैडम ने मेरे हाथ में एक मोटा सा लिफ़ाफ़ा पकड़ाया, "इसमें कुछ महत्वपूर्ण काग़ज़ हैं. घर जाकर देखना."
घर पहुंच कर जब लिफ़ाफ़े को खोला, तो मेरी आंखों में आंसू आ गए. उसमें मेरा परिचय पत्र और भारत में स्थाई तौर पर रहने एवं कार्य करने की सरकारी अनुमति का पत्र था.
इस प्रकार मेरी ज़िंदगी लीक पर चल पड़ी. वक़्त के साथ मैडम को यह पता तो चल ही गया कि अपने मुल्क से भागने के पूर्व मैं राजशाही कॉलेज में व्याख्याता के पद पर कार्यरत था. एक दिन शाम दीप्ति को पढ़ा कर जब मैं ड्रॉइंगरूम में आया, तो मैडम ने मेरा परिचय वहां बैठे एक सज्जन से करवाया, "सौरभ, ये दीप्ति के चाचाजी हैं और भारतीय सांख्यिकी संस्थान, कलकत्ता में प्राध्यापक हैं. इन्हें एक होनहार शोध छात्र की आवश्यकता है, क्या तुम इनके साथ शोध छात्र के रूप में कार्य करना चाहोगे?" रूंधे गले से मैं बहुत मुश्किल से, "हां." कह पाया. समझ नहीं पा रहा था ईश्वर को (साथ में मैडम को भी) कैसे धन्यवाद दूं. मेरी ज़िंदगी पूरी तरह से बदलने वाली थी. लगा जैसे समंदर में थपेड़े खाती नाव को किसी की अज्ञात हाथों ने उठा कर किनारे पर रख दिया हो. मगर अभी तो कई आश्चर्य आने वाले थे.
एक दिन जब मैं संस्थान से देर शाम घर पहुंचा, तो मेरी बहन, सुचित्रा ने मुस्कुराते हुए कहा, "दादा, बऊदी (भाभी) को लाने की तैयारी हो रही है."
"पागल हो गई है क्या, कुछ भी बके जा रही है."
मगर जब अंदर गया तो देखा, मैडम, उनके पति और दीप्ति के चाचा सब बैठे हैं और मेरी बुआ पूरे परिवार के साथ उनकी खातिरदारी में जुटी है. मैंने सबों को नमस्ते किया और सीधा आंगन की तरफ़ भाग लिया.
"सुचित्रा, यह क्या हो रहा है?"
"कहा न तुम्हारी दीप्ति अब इस घर में मेरी बऊदी बन कर आ रही है."
मैं कुछ बोलता उसके पहले ही बुआ ने मुझे अंदर आने को कहा, "देख, ये लोग दीप्ति से तेरा लगन तय करने आए हैं और मैंने दादा (मेरे बाबा) की अनुमति से हां कह दिया है. तुझे कुछ कहना है?"
"मगर वह तो मेरी विद्यार्थी रही है, फिर उम्र का भी फ़र्क़..." मैं मुश्किल से बोल पाया. दीप्ति के चाचा जी, जो मेरे शोध-निदेशक भी थे, ने मुस्कुराते हुए कहा, "सौरभ, संबंध अचल नहीं होते, वे भी चलायमान होते हैं. उनकी भी गतिकी होती है. हमारे इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां पत्नी पूर्व छात्रा रही है. जहां तक उम्र का प्रश्न है, तो वह तुम से केवल 7 वर्ष कुछ महीने छोटी है, जो स्वीकार्य है. मैंने दीप्ति की भी स्वीकृति ले ली है. यह रिश्ता उस पर थोपा नहीं जा रहा है, बल्कि वह इस रिश्ते से बहुत ख़ुश है."

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अब मेरे पास कहने को कुछ नहीं था. इस तरह एक पूर्व छात्रा जीवन संगिनी बन कर मेरी ज़िंदगी में प्रवेश कर गई. शादी के सम्पन्न होने और पी.एच.डी. की डिग्री मिलने में बस एक महीने का अंतराल रहा.
स्वाभाविक था मेरी ज़िंदगी का नया अध्याय शुरू हो गया. ज़िम्मेदारी तो बढ़ गई थी, पर अब सहयोगी और मार्गदर्शक भी बहुत थे. फ़िलहाल मुझे दो-दो कार्य एक साथ करने पड़ रहे थे, एक तरफ़ कॉलेज/विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य की तलाश और दूसरा अपनी संस्थान में शोध-सहायक की नौकरी. इसे संयोग ही कहेंगे कि तीन महीने बाद मेरे संस्थान में अनुप्रयुक्त गणित पर एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन पहले से होना तय था. आयोजन समिति ने इसके वैज्ञानिक सत्र में मौखिक प्रस्तुतीकरण हेतु मेरा भी एक शोध पत्र चयनित किया था. इसी के साथ विदेश से आए आमंत्रित वैज्ञानिकों में मुझे संयुक्त राज्य अमेरिका की टुकड़ी की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. ऐसे में उनके साथ अपने विषय पर वार्तालाप और विचार-विमर्श का पर्याप्त अवसर मिलना स्वाभाविक था. उनमें से एक सज्जन को मेरे शोध-पत्र ने इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उस पर आधारित एक रिसर्च प्रोजेक्ट तैयार किया और उसके वित्तपोषण की स्थिति में मुझे अपने विश्वविद्यालय में आने का निमंत्रण दिया. यह भी वादा किया कि वे विश्वविद्यालयों में मेरे लिए उपयुक्त स्थान तलाशने में मदद करेंगे.
मैंने जब ये सारी बातें अपने शोध-निदेशक (दीप्ति के चाचाजी) के साथ साझा की, तो उन्होंने इस प्रस्तावित प्रवास में एक और अनुच्छेद जोड़ दिया, वह था मेरे और दीप्ति के लिए ग्रीन कार्ड की व्यवस्था. सच बताऊं तो उस समय तक मैं इसका अर्थ भी नहीं समझता था. कुछ ही महीने बाद कई राष्ट्रीयता का छलांग लगाते हुए मैं सात समंदर पार आकर ऐसे बसा कि यहीं का होकर रह गया.
कभी-कभी अपनी इस यात्रा: भारतीय (गर्भ में)-पाकिस्तानी-बांग्लादेशी-पुनः भारतीय-अमेरिकी, पर विचार करता हूं, तो ख़ुद नहीं समझ पाता कि यह सब हुआ कैसे. यहां आकर एक बार मैंने पुनः फ़र्श से अर्श तक की यात्रा दीप्ति के साथ पूरी करने के लिए कमर कस ली, और इसमें सफल भी हुआ. हां, इतना अवश्य था कि मेरी इस सफलता में यदि मेरी लगन और कठिन परिश्रम का महत्वपूर्ण योगदान रहा, तो मेरे मेंटर वरीय अमेरिकी प्राध्यापक के संग मेरे सौभाग्य ने भी ख़ूब साथ दिया.
अकादमी सीढ़ियां चढ़ते एक रिकॉर्ड समय में मैं सुप्रसिद्ध शिकागो विश्वविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी प्राप्त करने में सफल हुआ. ख़ैर, उस संघर्ष की कहानी फिर कभी. आज की तिथि में मेरी बहन सुचित्रा के सिवा वे सारे क़िरदार, जिन्होंने मेरी ज़िंदगी में अहम रोल अदा किए, जा चुके हैं. अब यहां तक आ कर उससे न मिलूं यह उसके और अपने प्रति अन्याय होगा. इसी कारण मैंने शिकागो से चलने के पूर्व ही बनारस से कलकत्ता तक का टिकट ले लिया था, अब कल प्रातः ही सुचित्रा से मिलने के लिए निकल पड़ूंगा. मुझे यूं अचानक आया देख वह तो बच्चों की तरह उछल पड़ेगी. हां, मुश्किल यह है कि उसे उसकी बऊदी के छोड़ कर चले जाने की बात भी बतानी होगी, जिसे मैंने अब तक छिपाए रखा था.
एक बार ख़्याल यह भी आया था कि इसी के साथ राजशाही की यात्रा भी कर लूं. वहां‌ से रात के अंधेरे में पलायन करने के पश्चात फिर कभी जाने का मौक़ा ही नहीं मिला. मगर‌ मध्य-सत्र में समयाभाव था; अतः वहां की यात्रा को फिर कभी के लिए स्थगित कर दिया, जानता हूं वह.. फिर कभी.. शायद ही आए.

प्रो. अनिल कुमार




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Photo Courtesy: Freepik


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