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कहानी- कॉकटेल बनाम मॉकटेल (Short Story- Cocktail Banam Mocktail)


"... उसकी अपनी इच्छा, अपना मौलिक स्वरूप तो कहीं खो-सा गया है. एक मॉकटेल बनकर रह गई है वो! हर कोई उसमें अपनी पसंद का स्वाद और सुगंध खोजता है और पाकर परितृप्त भी होता है. लेकिन पुरुष ख़ुद क्या है? महज़ एक कॉकटेल! हार्डड्रिंक! जो किसी के साथ मिक्स नहीं हो सकती... एक कड़वा घूंट, जिसे बस किसी तरह हलक से नीचे उतारना है."  

दीदी तीन-चार दिन में जीजाजी के संग चली जाएगी, सोच-सोचकर ही नंदिनी की आंखें भर आती थीं. तनु दीदी नंदिनी की इकलौती ननद है. पति सुजय से छोटी पर उसकी हमउम्र. नंदिनी ब्याहकर आई, तो दोनों में ननद-भाभी कम, बहनों-सा रिश्ता ज़्यादा बन गया था. पर दोनों को ज़्यादा दिन साथ रहने का मौक़ा नहीं मिल सका. क्योंकि शीघ्र ही तनु का ब्याह हो गया और वह अपने ससुराल चली गई. शादी को सालभर बीता था कि तनु के पति को विदेश में अच्छी नौकरी मिल गई. छुट्टी मिलते ही वह तनु को लेने आएगा, तब तक वह अपना पासपोर्ट, वीज़ा आदि बनवा ले, इस आश्वासन के साथ वह तुरंत विदेश रवाना हो गया. नंदिनी इन्हीं काग़ज़ी कार्यवाहियों का हवाला देकर तनु दीदी को अपने संग ले आई थी. वैसे भी मायके के नाम पर तनु के पास इकलौते भैया-भाभी का घर ही बचा था. पासपोर्ट, वीज़ा सब बन भी गया. अब तो बस मयंक के लौटने का इंतज़ार था. हर फोन कॉल के साथ वह जल्दी आने का आश्वासन देता और साथ ही तनु को पाश्चात्य रंग-ढंग के अनुरूप स्वयं को ढाल लेने की हिदायत भी. जिसे सुनकर तनु बेचारी उदास-सी हो जाती. सुंदर-सलोने नैननक्शवाली सांवली-सी तनु भारतीयता की प्रतिमूर्ति थी. स्कूल से लेकर कॉलेज स्तर तक अपने प्रिय विषय भारतीय सभ्यता और संस्कृति के पक्ष में बोलकर पुरस्कार जीतनेवाली लड़की को व्यावहारिक जीवन में अपनी उसी प्रिय संस्कृति और संस्कारों को तिलांजलि देनी पड़ रही थी. यह देखकर तनु के साथ-साथ नंदिनी का भी मन भर आता था, पर मजबूर थी. पत्नी से बेहद प्यार करनेवाले सुजय जीजाजी एक नंबर के हठधर्मी भी हैं, यह बात वह अच्छी तरह जानती थी. कहीं समझाइश का दांव उल्टा न पड़ जाए, इस भय से उसने चुप्पी साध ली थी. फिर पति मयंक को भी बहन की व्यक्तिगत ज़िंदगी में हस्तक्षेप कर उसकी गृहस्थी को दूभर बनाना पसंद नहीं था. 
तनु दीदी से उसे थोड़ी उम्मीद ज़रूर थी, पर उसने भी यह कहकर हाथ झाड़ लिए कि "भाभी, इतने समय बाद तो साथ रहने का सुअवसर आया है. अब छोटी-सी बात के लिए क्यों पंगा करूं? वहां जाकर इनके विचार बदलने का प्रयास करूंगी. अभी तो इन पर नई-नई खुमारी चढ़ी हुई है, क्या पता आप ही थोड़े समय बाद उतर जाए..."
तनु दीदी की बातें नंदिनी को आश्वस्त कर जाती और वह उसके साथ कभी पाश्चात्य पोशाकों की ख़रीद की मुहिम में, तो कभी पास्ता, बर्गर बनाने की मुहिम में जुट जाती. पढ़ी-लिखी तनु की इंग्लिश तो अच्छी थी ही पर पति के आग्रह पर अब वह उसमें अमेरिकन एक्सेंट डालने का प्रयास करने लगी. भाभी को समझा-बुझाकर शांत करनेवाली तनु का ख़ुद का आत्मबल कभी-कभी दम तोड़ देता. 

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"नहीं होगा मुझसे यह सब! जिस चीज़ के लिए अंदर से कोई उत्साह न हो, उसे जबरन बोझ की तरह कब तक ढोया जा सकता है?" तब नंदिनी उसे दिलासा देने लगती. सुजय के प्यार का वास्ता देती कि वह यह सब उसकी ख़ुशी के लिए कर रही है और प्यार में ऐसी छोटी-मोटी कुर्बानियां तो चलती हैं. सुजय आया. एयरपोर्ट पर ही तनु का बदला रंग-रूप देखकर वह खिल उठा. बड़ी गर्मजोशी से उसने अपने दोस्त से मिलवाया. उसे भी सुजय के साथ ही विदेश में नौकरी मिली थी और वह भी छुट्टी लेकर परिवार से मिलने आया था. अंतर था तो बस इतना कि वह अविवाहित था. तनु के चुस्त लिबास और एक्सेंट ने शायद उसके दिमाग़ में तनु की कुछ और ही छवि बना दी थी, क्योंकि वह बेहद अंतरंगता और उन्मुक्तता से उससे बातें करने लगा था. सुजय मयंक के साथ सामान और टैक्सीवाले में उलझा हुआ था. ऐसे में तनु बेचारी असहज होते हुए भी किसी तरह बर्दाश्त करती रही. नंदिनी तो देख-देखकर ही बेतरह खीज उठी थी. आख़िर वही तनु को खींच ले गई, "चलिए दीदी, हम टैक्सी में बैठते हैं."
नंदिनी की यह खीज रास्तेभर बरक़रार रही. क्योंकि घर पहुंचने तक सुजय जीजाजी का एक ही प्रलाप ज़ारी था, "उफ़, कितना पॉल्यूशन, गंदगी और अव्यवस्था है इंडिया में! पता नहीं, कैसे रहते हैं लोग यहां?"
'जैसे पैदा होने से लेकर अभी एक साल पहले तक आप रहते आए थे.' नंदिनी मन ही मन भुनभुनाती हर एक सवाल का मन ही मन जवाब भी दिए जा रही थी.
"शुक्र है, मैंने विदेश में ही बसने का निर्णय ले लिया..."
'अपना घर गंदा हो, तो लोग उसे साफ़ करते हैं, न कि पड़ोसी के घर जाकर रहने लग जाते हैं...' नंदिनी के जले-भुने मन में हर सवाल का जवाब तैयार था. घर पहुंचते ही नंदिनी और तनु चाय-नाश्ते की तैयारी में लग गईं. सुजय सोफे पर पसर से गए. "अब दो-तीन दिन तो जेटलेग के नशे में ही निकल जाएगें. वह उतरेगा, तो जाने का वक़्त हो जाएगा."
'जेट लेग का नशा, तो फिर भी दो-तीन दिन में उतर जाएगा जीजाजी! पर यह पश्चिम के अंधानुकरण का नशा कब उतरेगा? कहीं ऐसा न हो कि उसके उतरते तक तनु दीदी आपकी ज़िंदगी से निकल जाए...’ नंदिनी के मन की भुनभुनाहट अभी भी ज़ारी थी. तनु का उतरा हुआ उदास चेहरा इस भुनभुनाहट की आग में घी का काम कर रहा था.

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"मैं परांठे सेंकती हूं, तब तक दीदी आप इधर चिकन सॉसेजेस तैयार कर लीजिए." नाश्ते और खाने में तनु और नंदिनी ने इंडियन और कॉन्टिनेंटल दोनों तरह की रेसिपीज़ रखने का प्रयास किया था, ताकि सभी अपनी पसंद और सुविधानुसार ले सकें. पर सुजय और उनके दोस्त ने परांठों को छुआ तक नहीं. नंदिनी को आश्चर्य हो रहा था आलू के परांठों के नाम से ही लार टपकाने वाले सुजय जीजाजी ने ‘सो ऑयली’ कहते हुए परांठों की प्लेट एक ओर सरका दी थी. लेकिन तनु के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे. वह मूर्तिवत बैठी सॉसेजेस को कांटे से कोंचती रही. शायद उसे इसी सब की उम्मीद थी. नंदिनी मन ही मन सोचने को मजबूर हो गई...
‘तनु दीदी ने जीजाजी को बख़ूबी समझा है. तभी तो उन्हें कोई हैरत नहीं हो रही है. वे यह भी समझती हैं कि उनकी पसंद के अनुसार ख़ुद को ढाल लेने में ही समझदारी है, वरना व्यर्थ ही सबके सामने तमाशा खड़ा हो जाएगा. इतने समय तक भाई पर बोझ बनी रहीं (हालांकि हमने कभी ऐसा नहीं समझा) अब हंसी-ख़ुशी विदाई में ही सबका हित है. जो होगा, वहां पहुंचकर देखा जाएगा.’ दीदी की समझदारीभरी सोच की बात सोचकर ही नंदिनी का मन एक बार फिर विरह की वेदना से व्याकुल हो उठा. फिर उसकी नज़रें एक के बाद एक परांठे उड़ाते अपने पति मयंक पर ठहर गई. व्याकुलता का आवेग थमने लगा और कहीं जमा आक्रोश का लावा पिघलने लगा.
‘कैसे भाई हैं ये? अपनी छोटी बहन का दुख भी नहीं समझते? या समझकर भी अनजान बने रहते हैं? बस, बहन सकुशल पति के घर चली जाए, उसकी गृहस्थी बनी रहे... सिर्फ़ इतना सोचकर ये पुरुष कैसे संतुष्ट रह पाते हैं? जीजाजी भी ऐसे जता रहे हैं मानो विदेश में सुख-सुविधापूर्ण घर में रहने का प्रबंध कर दीदी पर कोई एहसान लाद रहे हैं? पेट भरने और लजीज़ खाना खाकर तृप्त होने में फ़र्क़ तो ये मर्द बख़ूबी समझते हैं. लेकिन ज़िंदगी काटने ओैर ज़िंदादिली से ज़िंदगी जीने में फ़र्क़ समझते हुए भी नहीं समझना चाहते.’ 
जीजाजी और उनके दोस्त जल्दी-जल्दी नाश्ता समाप्त करके उठे, तो नंदिनी की विचार श्रृंखला भंग हुई. दोस्त को घर जाने की जल्दी थी. जीजाजी ने उन्हें छोड़ने का जिम्मा लिया. पत्नी तनु को उदास कांटे से खेलते देख वे बोल उठे, "यह देखो मायका छूटने के ग़म में अभी से खाना-पीना छूट रहा है. यू नो मयंक, अपनी इसी भावुकता की वजह से इंडियन्स आगे नहीं बढ़ पाते. एनी वे... हम चलते हैं." मयंक उन्हें बाहर तक विदा करने चले गए. नंदिनी ने देखा तनु दीदी वाक़ई जाने किन विचारों में खोई अभी भी कांटे से खेल रही थीं. प्लेट का नाश्ता ज्यों का त्यों रखा था. उसने चुपके से वह प्लेट हटाकर उनके आगे दूसरी प्लेट में एक परांठा रख दिया.
"खाओ दीदी, परांठा ठंडा हो रहा है."
"हं..." तनु गहरी निद्रा से यकायक लौट आई.
"व... वो प्लेट..." वह अचकचा गई थी.
"उसे रहने दो." इतना मात्र कहकर नंदिनी अपना परांठा समाप्त करने में जुट गई. आगे कुछ कहने की किसी ने ज़रूरत नहीं समझी. तनु जान गई कि भाभी यह कहना चाहती हैं कि यहां हो, तब तक तो चार दिन मन का खा-पहन लो...

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कितना ख़्याल है भाभी को उसकी रूचि-अरूचि, पसंद-नापसंद का... और कितना आक्रोश है इनके मन में इस बात को लेकर कि इतनी शिक्षित होते हुए भी मैं पति की हर जायज़-नाजायज़ मांग मूक बनी रहकर पूरी करती रहती हूं. आपका यही स्नेह तो मेरा संबल है भाभी... उपयुक्त मौक़ा आने दीजिए, आपकी यह बहन जैसी ननद आपको निराश नहीं करेगी. सोचते हुए कृतज्ञता से तनु ने भाभी का हाथ दबा दिया.
नंदिनी यह सोचकर और भी उदास हो गई कि उसकी ननद कितनी भोली और नादान है, जो पसंद के एक परांठे से ही ख़ुद को कृतकृत्य समझने लगी है. यह किस मुंह से पति की ग़लत बात का प्रतिकार कर पाएगी और अपने दिल की बात उनसे कहने का साहस जुटा पाएगी? काश मैं आपकी कुछ मदद कर पाती दीदी! अपराधबोध के शिकंजे में जकड़ी नंदिनी घुटन महसूस करने लगी, तो प्लेटें समेटने के बहाने उठ खड़ी हुई. व्यक्त-अव्यक्त विचारों के द्वंद्व में दो दिन और गुज़र गए. जैसे-जैसे तनु दीदी, जीजाजी के जाने का दिन समीप आता जा रहा था नंदिनी के मन की घुटन एक जबरन लादे अपराधबोध के कारण बढ़ती जा रही थी.
उस संध्या वे किसी रिश्तेदार के यहां खाने पर आमंत्रित थे. विदेश जाने से पूर्व ऐसे आमंत्रणों का दौर चलता ही है.
"अब आप अपने कपड़े पैक ही रहने दीजिए तनु दीदी. आज आप मेरी साड़ी पहन लीजिए. यह पिंक फूलों वाली साड़ी, आपको बहुत पसंद भी है." नंदिनी के इसरार पर तनु उसकी दी साड़ी पहनकर उसे दिखाने आ गई. मैचिंग टॉप्स और छोटी-सी मेचिंग बिंदी में तनु का परंपरागत रूप निखर आया था.
"कितनी सुंदर लग रही है न दीदी!" नंदिनी ने मयंक का ध्यान आकृष्ट करना चाहा, पर वह अपनी टाई की नॉट बांधने में तल्लीन था. नंदिनी ने एक डिब्बा खोलकर ख़ूबसूरत जड़ाऊ पिंक चूड़ियों का सेट निकाला और प्यार से तनु दीदी को पहनाने लगी.
"यह चूड़ियों का सेट इस साड़ी पर बहुत फबेगा. यह साड़ी और यह सेट आप अपने साथ ले जाना दीदी. कभी अपने मन का भी तो पहन लेना."
तनु दीदी अपने कमरे में चली गईं, तो मयंक का ग़ुस्सा भड़क उठा, "तुम हर वक़्त तनु को अपने पति के ख़िलाफ़ जाने के लिए क्यों उकसाती रहती हो? क्यों उनकी सुखी गृहस्थी में आग लगाना चाहती हो?" नंदिनी इस अप्रत्याशित आरोप से एकबारगी तो हतप्रभ रह गई, पर फिर इतने दिनों का जमा आक्रोश, दबा हुआ अपराधबोध सब लावा बनकर फूट पड़ा, "क्या एकमात्र पति का संतुष्ट होना ही सुखी गृहस्थी होती है? वह जो भी है, जैसा भी है ठीक है. सारी ज़िंदगी स्त्री को ही अलग-अलग सांचों में ढलना है? कभी ख़ुद को पिता की इच्छा के अनुरूप ढालना है, कभी भाई की, तो कभी पति की. उसकी अपनी इच्छा, अपना मौलिक स्वरूप तो कहीं खो-सा गया है. एक मॉकटेल बनकर रह गई है वो! हर कोई उसमें अपनी पसंद का स्वाद और सुगंध खोजता है और पाकर परितृप्त भी होता है. लेकिन पुरुष ख़ुद क्या है? महज़ एक कॉकटेल! हार्डड्रिंक! जो किसी के साथ मिक्स नहीं हो सकती... एक कड़वा घूंट, जिसे बस किसी तरह हलक से नीचे उतारना है."
अपनी भड़ास निकल जाने के बाद नंदिनी काफ़ी हल्का महसूस कर रही थी. मयंक अवाक् था. लेकिन दोनों ही इस तथ्य से अनजान थे कि कान लगाकर उनकी बातें सुन रहा एक युगल स्वयं को मन ही मन बदलने का निर्णय ले चुका था. सुजय शर्मिंदगी के मारे अपनी पत्नी से नजरें चुराने को विवश हो रहा था, तो उधर तनु... मन में बढ़ते आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के वज़न ने उसके तन को फूल-सा हल्का कर दिया था.

संगीता माथुर  


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