कहानी- डेड एंड… (Short Story- De...

कहानी- डेड एंड… (Short Story- Dead End…)

इस फोटो को देखते ही अंजली ने कहा था, “अमर प्लीज़, अब आगे और नहीं.” फेस तो ब्लर था, पर शरीर तो उसका था.
“अमर, तुम जानते हो ऐसे फोटो देखकर मुझे क्या हो जाता है. मैं ख़ूबसूरत हूं मुझे पता है, लेकिन मेरी ख़ूबसूरती को तुम्हारी फोटोग्राफी ने इतना ग्लैमरस बना दिया है जिसकी कल्पना मैं ख़ुद नहीं कर सकती. मैं कोई हीरोइन नहीं हूं, एक शादीशुदा आम भारतीय नारी हूं…”

वह एसयूवी से उतरा और इधर-उधर देखने लगा. वाकई उसे कच्चे रास्ते के सिवा कुछ नज़र नही आया. उसने बैग से पानी की बोतल निकाली ठंडा पानी पीने के बाद वापस स्टीयरिंग पकड़ कर बैठ गया और सोचने लगा. सामने चार-पांच मकान थे, कुछ बच्चे नंग-धड़ंग खेल रहे थे. कुछ लुंगी पहने छोटे-मोटे काम कर रहे थे, कुछ कुल्ला-मंजन. ऐसे ही पांच-सात लोग जीवन की विभिन्न गतिविधियों में खोए थे. कुछ स्त्रियां भी थीं, जो उसे ही कौतूहल से देख रही थीं. अब ज़्यादा कुछ बचा नहीं था. फिर भी उसने इधर-उधर देखा, सचमुच कोई रास्ता नज़र नहीं आया. उसने गूगल मैप देखा श, वह अभी भी सीधे चलने का इंडिकेशन दे रहा था. इससे पहले कि वह आगे कुछ सोचता दो-तीन लोग आ गए.
“क्या हुआ बाबूजी रास्ता भटक गए?”
वह क्या जवाब देता गूगल तो सही बता रहा था, लेकिन अब यह नहीं दिखा रहा था कि इस डेड एंड के पीछे क्या है. वाकई अब इससे आगे गाड़ी नहीं जा सकती थी. उसने धीरे से पूछा, “आगे कोई रास्ता है क्या?“
वे बोले, “नहीं, इधर आगे कोई रास्ता नहीं है. बहुत लोग इधर भटक जाते हैं. न जाने क्यों गूगल ग़लत दिखाता है. आप इधर से ही वापस मोड़ लीजिए. थोड़ा बैक जा कर दाहिने मुड़ जाइएगा, वही से थोड़ी दूर चल कर मेन रोड आ जाएगी. वहां किसी से पूछ लीजिएगा. थोड़ी देर इसे बंद कर दीजिए.” वे गूगल मैप के लिए कह रहे थे और हां वहां नेटवर्क भी जा रहा था, सो मैप रूटीइंग करने में नाकाम हो रहा था.
उसने दोनों को शुक्रिया कहा स्टीयरिंग पकड़ी एक सिगरेट सुलगाई और गाड़ी मोड़ ली. धीरे-धीरे वह वापस उसी रास्ते पर चल रहे थे जिस रास्ते यहां तक पहुंचे थे.
उसने गाड़ी में चल रहे रॉक म्यूज़िक को बंद कर दिया. अच्छा नहीं लग रहा था. गाड़ी की दाहिनी विंडो खुली थी. स्टीयरिंग लेफ्ट हैंड से सम्हाले धीरे-धीरे लौट रहे थे. खाली रास्ता था. गाड़ी की स्पीड बेहद कम और सिगरेट के कश जिसकी राख वो लंबी होते ही बाहर झाड़ देता.
अमर एडवेंचरस ड्राइव पर निकला था, जो उसका शौक था. गाड़ी में सब कुछ मौजूद था, खाने-पीने से लेकर इमरजेंसी में काम आने वाली दवाइयों तक. सिगरेट के धुंए के साथ उसका दिल और दिमाग़ भी धुआं-धुआं हुआ जा रहा था. एडवेंचरस ड्राइव में इस तरह डेड एंड का आना और फिर गाड़ी को मोड़कर वापस लाना उसकी फ़ितरत के ख़िलाफ़ था.
मज़ा तो तब था, जो आगे कोई ख़ूबसूरत लैंड स्लाइड मिलती, कोई छोटा-सा पानी का झरना नज़र आता और कुछ नहीं तो घने पेड़ की छांव में कुछ पल बिताने का मौक़ा मिलता, जिसके नीचे वो अपनी चटाई डालकर बीयर पीता, थोड़े स्नैक्स खाता, कुछ देर प्रकृति की गोद में बिताता और ख़ुद के अस्तित्व को भूल जाता. वापस लौटता वहां से तो एक नई ऊर्जा लेकर कुछ फोटो शूट के साथ. इंटरनेशनल ट्रैवलर साइट के लिए अपने नए कवरेज के साथ कि जिस तरह उसके पिछले ब्लॉग ने इंटरनेट पर तहलका मचा दिया था, यह भी लाखों लोगों द्वारा पढ़ा और देखा जा रहा होता.
उसकी पिछली कवरेज डिस्कवरी चैनल में कोट हुई थी, जिसमें उसने अपने कैमरे से सोने के पहाड़ को शूट किया था, जो धीरे-धीरे कैलाश मानसरोवर में बदल गया था. बेहद ख़ूबसूरत दृश्य थे वे, जिन्हें देखकर लोग अचंभित रह गए थे और सबसे बढ़कर कैप्शन कि किस तरह हम भारतीय सूर्य और आदिदेव शंकर की आराधना करते हैं.. कैसे कैलाश मानसरोवर से सीढ़ियों की कल्पना स्वर्ग तक ले जाती है.. कैसे भगवान शिव कैलाश पर्वत पर मां पार्वती के साथ निवास करते हैं.. आस्था क्या है और हमारा जीवन आस्था से कैसे परिवर्तित होता है…
उसके कैमरे का कमाल था कि एक-एक चित्र बोल उठा था. वो विचारों में खोया था कि अचानक उंगलियों में गर्मी-सी महसूस हुई. ओह, सिगरेट ख़त्म हो चली थी. उसने उसे वहीं कच्ची सड़क पर फेंक दिया. अचानक अमर के विचारों ने टर्न लिया. देखते-देखते उसकी आंखों के सामने अंजली उतर आई. अंजली का साथ पाने के लिए उसे अंजली की ज़रूरत नहीं होती. उसके ख़्याल में डूबते ही वह उसकी स्टीयरिंग पर आकर बैठ जाती है. यह अलग बात है कि तब वह स्टीयरिंग गाड़ी की न होकर ज़िंदगी की होती है.

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उसकी आंखों में नशा छाने लगा. दीवानगी बढ़ने लगी. अंजली ही तो है, जो पिछले दस साल से उसकी ज़िंदगी की गाड़ी के स्टीयरिंग को थामे हुए है, उसे चला रही है. अंजली न होती, तो उसका यह शौक कब का ख़त्म हो चुका होता. वह अंजली ही थी जिसने कहा था, “तुम सचमुच बहुत अच्छी फोटोग्राफी करते हो, इसे मैगजीन में क्यों नहीं भेजेते.“ और वह हंसा था.
“क्या अंजली तुम भी मज़ाक करती हो. मुझे कौन जानता है और कौन लेगा मेरी ये फोटो.”
उसने कहा था, “तुम भेजकर तो देखो. नहीं लेगा तो तुमसे क्या छीन लेगा.“
उसने कहा था, “ठीक है तुम कहती हो तो भेज देता हूं.”
फिर हंसते हुए बोला, “लेकिन ये पिक तुम्हारी शैडो है, तो इसे अमर कलेक्शन न कहकर ‘ए एन’ कलेक्शन के कैप्शन से भेजता हूं.”
वह हंसी, “ए एन क्या है?”
“हा हा… ए मेरे नाम से और एन का अक्षर तुम्हारे नाम का, तुम्हें कोई एतराज तो नहीं है.” वह हंसी.
“मुझे भला क्या एतराज हो सकता है. यह तुम्हारी फीलिंग है, इसमें कुछ कहनेवाली मैं कौन होती हूं.”
एक मैगजीन के फोटो कॉन्टेस्ट में वह अंजली के शेडवाली फोटो टॉप टेन में आ गई थी. उसने गार्डन में अंजली के लहराते जुल्फ़ों के पीछे गुलाब के फूल शूट किए थे, जिसमें फिल्टर लगाकर उसने चेहरा बिल्कुल डिम कर दिया था और बस काली जुल्फ़ों के पीछे लाल गुलाब नज़र आ रहे थे. जैसे ही रिजल्ट आया था, वह मैगजीन लेकर अंजली के पास भागा था.
“अंजली… अंजली… ये देखो मेरे फोटोग्राफ सिलेक्ट हो गए.” अंजली की आंखों में ख़ुशी के आंसू तैर गए थे.
“अमर, तुम्हारी फोटोग्राफी के साथ मैं भी अमर हो गई. ये बाल तो मेरे हैं न.”
“अंजली, क्या कह रही हो. बाल क्या ये पूरी फोटो तुम्हारी है. ये प्राइज़ तुम्हारा है…“
“और यह अमर…” इतना कहकर वह रुक गया था.
अंजली उससे पंद्रह साल छोटी थी, शादीशुदा और वह, वह भी कौन-सा अकेला था. उसने धीरे से मैगजीन अंजली के हाथ में रख दी थी और हाथ को सहलाते हुए उठकर चला गया था.
अमर को कोई नहीं जानता था, लेकिन इन दस सालों में ‘ए एन’ फोटोग्राफी दुनिया में एक बहुत बड़ा सिग्नेचर बन गया था.
दुनिया जिन फोटोग्राफ्स की दीवानी थी, वह और कुछ नहीं अमर के ख़्वाब थे, जो वह अंजली के पोट्रेट्स में देखता. वह रात-दिन बस उसी में खोया रहता और उसे ही सोचकर न जाने कौन-कौन से एंगल से कैप्शन तैयार करता. यह शायद किसी आर्टिस्ट की ज़िंदगी का हिस्सा हो क्या पता…
उसने एक नदी को जब स्त्री के ऊपर से होकर नीचे तक बहते हुए दिखाया, तो तहलका मच गया था. क्या बोलती फोटोग्राफी थी. एक सुंदर महिला के अंग के ख़ास हिस्सों से बहते हुए उसके कमर पर लहराती हुई बेहद तराशे हुए पैरों को चीरती समंदर में उतर जाती है. देखनेवालों की सांसें थम गई थी. लेकिन यह तहलका उसकी ज़िंदगी में हलचल पैदा कर गया.
इस फोटो को देखते ही अंजली ने कहा था, “अमर प्लीज़, अब आगे और नहीं.” फेस तो ब्लर था, पर शरीर तो उसका था.
“अमर, तुम जानते हो ऐसे फोटो देखकर मुझे क्या हो जाता है. मैं ख़ूबसूरत हूं मुझे पता है, लेकिन मेरी ख़ूबसूरती को तुम्हारी फोटोग्राफी ने इतना ग्लैमरस बना दिया है जिसकी कल्पना मैं ख़ुद नहीं कर सकती. मैं कोई हीरोइन नहीं हूं, एक शादीशुदा आम भारतीय नारी हूं…”
“तुम्हारी फीलिंग्स मैं जानती हूं और इस मोड़ पर तुम मुझसे क्या चाहते हो यह भी मुझसे छुपा नहीं है. तुम्हारी हर तस्वीर जिस ख़ूबसूरती से मेरे जिस्म को उकेरती है वह एक सच्चे आशिक़ के सिवा किसी के बस की बात नहीं है. मैं उस दिन सरप्राइज़ हो गई थी जिस दिन तुमने कमर पर मेरे छोटे से तिल को हाईलाइट कर दिया था. मैं सोच में पड़ गई थी कि आख़िर कितनी गहरी निगाहों से तुम मुझे देखते हो.
तुम्हारी यह निगाह मेरे भीतर भी अनंत ऊंचाइयों और समंदर की गहराइयों तक मचलने की तमन्ना पैदा कर देती है और मेरे लिए ख़ुद को कंट्रोल करना मुश्किल होता है.

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लेकिन ठहरो, तुम आर्टिस्ट हो तुम्हारा क्या, अपने भीतर न जाने कितनी ज़िंदगी जीने की ताक़त रखते हो. लेकिन मेरे पति को ज़रा-सा भी इसका आभास हो गया या मेरे कदम बहक गए, तो मेरी ज़िंदगी ख़त्म हो जाएगी. हमारा समाज इससे आगे बढ़ने की इजाज़त नहीं देता.” इतना कहकर अंजली तो चुप हो गई थी.
और इसके बाद से ही अमर बेचैन था. वह जानता था कि अंजली की कही हुई बात पत्थर के लकीर है. उसे ख़्वाब और ख़्याल में भी अब अंजली को सोचने की इजाज़त नहीं थी. बस इसी बेचैनी के साथ ही तो वह निकला था. आज इंटरनेशनल मैगजीन के लिए फोटो शूट करने और उसे डेड एंड के सिवाय कुछ न मिला था.
वह थोड़ी देर सोचता रहा और उसने वहीं उन झोपड़पट्टीनुमा घर कच्चे रास्ते और अधनंगे खेलते बच्चों की तस्वीर ले ली थी.
आज इस जर्नी में अमर अकेला था , ए एन नहीं. उसने अपनी गाड़ी, जो डेड एंड पर रुकी थी.
उस सेल्फी का कैप्शन लिखा- गूगल इस नॉट ऑलवेज राइट, इट गिव्स डेड एंड टू… और ट्रैवेल साइट पर पोस्ट कर दी.
“गूगल हमेशा सही रास्ता नहीं दिखाता और जहां आगे मैप में रास्ता दिखाई नहीं देता वह डेड एंड भी हो सकता है. जिसके आगे किसी भी क़ीमत पर गाड़ी आगे नहीं जा सकती और उसे मोड़ कर बैक करना होता है. उस डेड एंड से वापस लौटना होता है.”
अमर
फोटो ट्रैवेल साइट पर सिलेक्ट हो गई थी. अमर की आंखों में आंसू थे, जो ख़ुशी और दर्द के कम्बाइन इफेक्ट को एक साथ जी रहे थे.

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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Photo Courtesy: Freepik


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