अब तो आसपास के वातावरण में उसे यही अनुभव होता है कि यह तो पूरी की पूरी पीढ़ी ऐसी ही है, जो सिर्फ़ लेना जानती है. चाहती है कि उनकी ज़रूरतें तो कुछ ही क्षणों में पूरी हो जाएं, पर उन लोगों को कुछ न करना पड़े, न मेहनत करनी पड़े और न ही अपने आराम को छोड़ना पड़े.
"शैली, ज़रा एक ग्लास पानी तो पिलाना बेटी." नलिनी ने कन्धे से पर्स उतारकर बिटिया से कहा, "ओह, कितनी गर्मी है. बाहर तो जैसे सूर्य देवता नाराज़ होकर आग के गोले बरसा रहे हैं."
इतनी धूप में चलकर आने से उसका गला सूख रहा था और पूरा शरीर पसीने से सराबोर था.
नलिनी ने देखा, मां की बात तो शैली ने अनसुनी कर दी है और वह पूर्ववत् उपन्यास पढ़े जा रही थी.
"शैली पानी पिला दे ज़रा." नलिनी ने पुनः आवाज़ दी. तब कहीं जाकर शैली अनिच्छा से उठी और फ्रिज से निकालकर एक बोतल व एक ग्लास मां के सामने लाकर रख दिया और पुनः उपन्यास पढ़ने लगी.
नलिनी को बहुत थकान महसूस हो रही थी. पर क्या करे! भूख भी उतनी ही तेज लगी थी. यदि स्वयं अपनी ही बात होती, तो शायद वह ब्रेड खाकर ही काम चला लेती, पर उसे तो शैली को भी खिलाना था.
"शैली, तुमने खाना खा लिया?"
"नहीं मां! अभी खाना बना ही कहां है?" उपन्यास के पन्नों पर आंखें गड़ाए हुए ही उसने जवाब दिया.
मन-ही-मन झुंझलाती हुई नलिनी ने रसोई में प्रवेश किया. सब्ज़ी तो वह बनाकर सुबह रख ही देती है. फ्रिज में से आटा निकालकर अपने व शैली के लिए चपातियां बनाई और फिर दो प्लेटें लगाकर टेबल पर रखकर कहा, "आओ शैली, खाना खा लो."
शैली फुर्ती से उठी व टेबल पर बैठ गई.
"मां बड़े ज़ोर की भूख लग रही है." फिर खाना समाप्त करके पुनः बिस्तर पर जाकर लेट गई.
नलिनी ने पूरा कार्य निपटाया और फिर जाकर वह बिस्तर पर लेटी, तब तक शैली सो चुकी थी. नलिनी को नींद तो क्या आती बस एक घण्टे के लिए वह बिस्तर पर लेटी थी और फिर उसे उठकर बहुत सारे कार्य निबटाने थे.
नलिनी की विचारधारा पूर्ण रूप से शैली पर ही केन्द्रित थी. क्या मुझसे या उसके पापा से कहीं ग़लती हुई है शैली को पाल-पोसकर बड़ा करने में अथवा यह आधुनिक पीढ़ी का ही दोष है, जो वह अपने लिए तो सब कुछ चाहती है, पर प्रतिदान कुछ नहीं करना चाहती. आख़िर इन्हें स्वयं को भी तो सोचना चाहिए, इस इकलौती संतान के लिए हम दोनों ने ही अपना पूरा ध्यान व प्यार इस पर लुटाया है. न तो सुलभ, (उसके पति) न ही वह दूसरी संतान चाहते थे. अतः उन दोनों ने शैली के जन्म पर निश्चय कर लिया कि अब इसके पश्चात् और कोई बच्चा इस घर में नहीं आएगा. अतः दोनों का ध्यान पूरी तरह शैली पर केन्द्रित रहा. वह पढ़ने लिखने में जितनी अधिक मेधावी रही, उतना ही खेल-कूद, डिबेट व नाटक आदि में भी. पूरे समय स्कूल में शैली ही शैली छाई रहती, जब तक उसने स्कूल नहीं छोड़ा. अपनी क्लास की सर्वाधिक नम्बर प्राप्त करने वाली छात्रा रही और स्पोर्ट की चैम्पियनशिप की ट्रॉफी भी किसी दूसरी छात्रा के घर के ड्रॉइंगरूम की शोभा न बन पाई.
फिर शैली का एडमिशन आर्किटेक्ट के लिए हो गया और हम दोनों ही बहुत प्रसन्न हुए. सुलभ के हर्ष का तो पारावार ही नहीं रहा. लेकिन सुलभ की वह ख़ुशी बहुत दिनों तक उसके भाग्य को गवारा नहीं थी और एक दुर्घटना में सुलभ के स्कूटर को किसी ट्रक ने टक्कर मार दी और सुलभ का उसी जगह देहान्त हो गया. यद्यपि नलिनी स्वयं पहले से ही स्कूल में टीचर थी, अतः उसे घर को संभालने में अधिक कठिनाई नहीं हुई. आर्थिक रूप से धन का स्रोत उनके पास था ही. पहले दो तनख्वाह आती थी घर में, अब नलिनी को सिर्फ़ अपनी तनख्वाह से ही घर चलाना पड़ता था. जैसे तैसे उसने शैली का आर्किटेक्ट का कोर्स पूरा करवा ही दिया, पर सुलभ की मृत्यु के पश्चात् नलिनी का कार्य दुगना हो गया था. स्कूल तो वह जाती ही थी, बाहर का पूरा कार्य व घर का पूरा कार्य सब निबटाते निबटाते वह निढाल सी हो जाती. थकान उस पर हावी रहती. सुलभ होते थे तो घर के कामों में भी उसकी सहायता कर देते थे, पर अब तो एक ग्लास पानी पिलाने के लिए भी उसके पास कोई नहीं था.
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अब तक तो शैली की आदतों पर उसका ध्यान नहीं गया था. कई बार सुलभ ने उसे टोका भी था, "नलिनी, तुम अपनी बेटी से घर का कोई कार्य नहीं करवाती हो. ऐसा न हो कि उसे काम न करने की आदत ही पड़ जाए तो बाद में कैसे करेगी?" वह हमेशा हंस कर टाल देती थी.
"नहीं सुलभ, बाद में सब कर लेगी. आख़िर बेचारी को कितनी मेहनत करनी पड़ती है, अपनी कक्षा में सब सेक्शनों में प्रथम आने के लिए और स्पोर्टस में चैम्पियनशिप के लिए थक जाती है." पर यही काम न करने की प्रवृत्ति कब शैली की आदत बन गई, उसे पता ही नहीं चला और वह यह सब बड़ी शिद्दत से अनुभव कर रही है कि आख़िर वह स्वयं इतनी मेहनत करती है. क्या इस लड़की को ज़रा भी मां से प्यार नहीं, जो यह मेरा थोड़ा सा हाथ ही बंटा दे.
"मां! मैं ज़रा प्रभा के यहां जा रही हूं." शैली ने उठकर तैयार होते हुए कहा.
"शैली, मैं अभी-अभी स्कूल से आई हूं, मेरे पास बैठो बेटा, तुमसे कुछ बातें करनी हैं." नलिनी ने कहा.
"अरे मां, तुमसे तो बातें मैं रात को कर लूंगी, अभी ज़रा धूम आऊं, यहां लेटे-लेटे बोर हो रही हूं." शैली दरवाज़ा बंद करते-करते एक ही सांस में बोलकर उड़न-छू हो गई थी.
कैसी है यह लड़की? क्या मां के लिए इसके मन में कोई प्यार नहीं, कोई अपनत्व नहीं? अपनी कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं समझती है. वह स्वयं स्कूल से आती हैं तो किसी से सुख-दुख की बातें करना चाहती हैं. अब शैली के अलावा उनका है ही कौन? यदि वह शैली का पूरा ध्यान रखती हैं, उसकी सब ज़रूरतें पूरी करना अपना धर्म व कर्तव्य समझती हैं तो शैली को भी मां के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी महसूस करनी चाहिए.
यदि एक कप चाय ही बिना कहे नलिनी को पिला दे या उसके स्कूल से लौटकर आने के बाद दो शब्द यही कह दे, "मां, अब तो तुम थक गई होगी, लाओ आज मैं तुम्हें खाना बनाकर खिला दूं या तुम्हारा सिर दबा दूं" तो उसे कितनी सांत्वना मिले.
इसके विपरीत यदि वह शैली को कोई कार्य बताती हैं तो वह हमेशा यही कहती है, "मां अभी रुक जाओ, थोड़ी देर बाद कर दूंगी." कभी आज तक यह नहीं हुआ कि उसने वह कार्य उसी समय करके दिया हो. थोड़ी देर का मतलब घंटा-दो घंटा व कभी-कभी सुबह से शाम भी हो जाती है. और फिर नलिनी झुंझला कर वह काम स्वयं ही कर लेती है. वह ग़ुस्सा भी हो तो किससे, उसे लगता है हम दो ही तो हैं घर में.
वह शैली को डांटते हुए भी घबराती हैं. एक-दो बार उसने ज़रा नाराज़ होकर शैली को कुछ कह दिया तो वह दो दिन तक अपनी मां से नहीं बोली और पापा को याद करके पूरा दिन रोती रही. आख़िर में उसने ही अपने आप पर क़ाबू किया और शैली को मनाया.
कभी-कभी उसे लगता है कि यह सब उसी का क़सूर है, क्यों उसने तीन-चार बच्चे पैदा नहीं किए. शायद तब ऐसा हो सकता था कि वे एक-दूसरे के लिए कुछ करना सीखते. एक-दूसरे को प्यार करते, उनकी ज़रूरतें भी बंटतीं. अब तो आसपास के वातावरण में उसे यही अनुभव होता है कि यह तो पूरी की पूरी पीढ़ी ऐसी ही है, जो सिर्फ़ लेना जानती है. चाहती है कि उनकी ज़रूरतें तो कुछ ही क्षणों में पूरी हो जाएं, पर उन लोगों को कुछ न करना पड़े, न मेहनत करनी पड़े और न ही अपने आराम को छोड़ना पड़े.
अरे, मैं क्या सोचने लगी. अभी तो मुझे खाना भी बनाना है... और नलिनी बिस्तर छोड़कर किचन में घुस गई.
देखते ही देखते एक साल यूं ही व्यतीत हो गए. नलिनी अब शैली की शादी करना चाहती थी. वह सोच रही थी कि कोई अच्छा सा लड़का मिलने पर वह अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाए. पढ़ाई के एक साल बाद तक भी नलिनी शैली को कुछ सिखा नहीं पाई. यदि वह प्यार से शैली को काम करने के लिए कहती, तो शैली हमेशा हंस कर टाल देती.
"क्या मां, मैं पढ़ते-पढ़ते थक गई हूं. मुझे कुछ आराम तो करने दो न." यदि वह नाराज़ होकर शैली को डांटती तो शैली दो-दो दिन तक रूठ कर पड़ी रहती. न खाना खाती, और न ही बिस्तर से उठती. नलिनी बेचारी बाद में स्वयं ही उसे मना कर खाना खिलाती. आख़िर मां का दिल जो ठहरा, अगर बेटी भूखी है तो मां के गले से कौर कैसे नीचे जा सकता है? नलिनी को शैली अब प्रॉब्लम चाइल्ड नज़र आने लगी थी. अब उसे पछतावा होता था कि क्यों उसने सुलभ की बात नहीं मानी और बेटी को घर का कर्य करने की आदत नहीं डाली.
बहुत बार नलिनी सोचती क्या मेरी बिटिया ही ऐसी है या यह आधुनिक पीढी पूरी की पूरी ही ऐसी है. वह स्वयं भी पढ़ाई में काफ़ी तेज थी, ठीक वैसे ही, जैसे शैली रही है. उसी तरह पढ़ाई में भी और स्पोर्ट में भी उसने हमेशा प्राइज जीते हैं, शादी से पहले खाना उसने भी नहीं बनाया था, पर उसे शौक था खाना बनाने का. नई-नई डिशेज सीखने का, घर को साफ़ रखने का, पर शैली को तो बिस्तर पर लेटना व उपन्यास पढ़ने के अलावा कोई शौक नहीं था. बहुत बार उसकी इच्छा हुई कि शैली यदि घर की सफ़ाई ही कर दे तो वह रविवार को इतना व्यस्त नहीं रहे. सिर्फ़ कपड़ों की सफ़ाई का कार्य ही बाकी रहे. एक-दो बार उसने शैली को कहा भी, "बेटा ज़रा घर ही साफ़ कर दो, देखो कितना गंदा हो रहा है?"
"अरे मां, यह दो कमरों का मकान, यह तो गंदा रहेगा ही, इसे मैं क्या साफ़ करूं? मकान अगर बड़ा सा हो तो सफ़ाई करने व उसे सजाने में आनन्द भी आए." यह शैली का उत्तर था. इसके आगे नलिनी क्या कहे.
स्कूल में जब उसकी सहयोगी टीचर्स उसे कहती, "अब तो तुम्हारा काम कम हो गया होगा. शैली काम में हाथ बंटा देती होगी." तो नलिनी क्या जवाब देती. बस मुस्कुरा कर रह जाती. यह तो उसका दिल ही जानता था कि वह दिन-ब-दिन कितनी थकान अनुभव करती है. आख़िर उसकी भी उम्र बढ़ रही थी और अब दो-दो काम स्कूल व घर तथा बाहर का कार्य करने में उसे मुश्किल होती थी.
खैर, देर सबेर ही सही, उसे शैली के लिए उपयुक्त वर मिल ही गया. उसकी सहयोगिनी टीचर अंजू के मामा जी का लड़का मधुप उसके यहां काफ़ी आता-जाता था. नलिनी के घर की सफ़ाई, उसकी सुघड़ता देखकर बहुत प्रभावित हुआ और शैली भी उसके मन भा गई. आख़िर कमी भी क्या थी? शैली देखने में सुन्दर, पढ़ाई में तेज, आर्किटेक्ट की डिग्री, कमी जो थी, वह तो सिर्फ़ नलिनी को ही पता थी और वह भी सोच रही थी कि लड़की के सिर पर जब ज़िम्मेदारी का बोझ पड़ेगा, सब ठीक हो जाएगा.
शैली की शादी मधुप से बड़ी सादगी से हो गई. तड़क-भड़क न तो लड़के वाले ही चाहते थे और न वह स्वयं ही इसके पक्ष में थी. अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो कुछ उसने अपनी इकलौती पुत्री को दहेज के रूप में दिया, वह उसकी परिष्कृत रुचि को दर्शा रहा था और लड़के वाले सुन्दर, नाजुक बहू व अच्छे स्टैन्डर्ड का सामान पाकर प्रसन्न थे.
शैली की शादी की तैयारी करते हुए वह बार-बार सोच रही थी कि बहुत सी माताएं अपनी बेटी का दिया हुआ सुख याद कर कर जब-तब रोती है. बेटी बड़े पैमाने पर मां का सहारा होती है, उसके काम में हाथ बंटाती है, पर वह क्या सुख याद करेगी. शैली ने उसे क्या सुख दिया? क्या वह एक दिन भी आराम दे पाई नलिनी को. फिर बार-बार वह अपने विचारों को दूर भगाने का प्रयास करती. क्यों सोच रही है वह यह सब? जो उसकी स्वयं की ज़िम्मेदारी थी, वह उसने पूरी कर दी. अब वह उस ज़िम्मेदारी से मुक्त हो गई है. अपनी नींद सोना, अपनी नींद जागना.
शैली विदा हो गई, पांच-छह दिन तक तो नलिनी को घर खाने के लिए दौड़ता. घर में रहने की इच्छा न होती, पर फिर उसने सोचा- अपनी ज़िन्दगी तो जीनी ही है. अतः कुछ दिनों बाद उसे अकेले रहने की आदत हो गई. हां, वह खाने के लिए एक ही समय भोजन बनाने लगी. पहले शैली थी तो खाना सुबह व शाम दोनों समय बनता था. स्कूल में टीचर्स पूछती, "नलिनी, तुम्हें तो बड़ा बुरा लगता होगा, पहले शैली संभाल लेती थी. अब तो एकदम अकेली हो गई हो. कोई बात करने को भी नहीं है. हमारे यहां ही आ जाया करी." तब नलिनी की फीकी मुस्कुराहट ही उसका प्रत्युत्तर होती. वह कहां कह पाई अपना दर्द, अपनी घनिष्ठ सखियों से भी कि वह तो सुलभ की मृत्यु के पश्चात् अकेली ही है. उसका दुख बांटने वाला कोई नहीं है. कभी उसकी पुत्री ने न तो उसे मानसिक संतोष ही दिया. अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् और न ही कभी किसी काम में उसका हाथ बंटाया, जो उसे शारीरिक सुख व आराम मिलता.
कभी-कभी फोन द्वारा शैली उसे अपनी कुशल क्षेम से परिचित करा देती थी. जब से घर-घर में टेलिफोन लगे हैं और बाहर से टेलिफोन की सुविधा हो गई है, चिट्ठियां पत्रियां तो जैसे अतीत की बात हो गई है.
अब तो शैली की शादी को एक साल पूरा हो गया था वह एक नन्हें-मुन्ने की मां भी बन गई है. इस पूरे साल में शैली मुश्किल से दो या तीन बार मां से मिलने आई, पर वह वैसी ही रही, जैसी शादी से पहले थी. मां के लिए उसने कोई काम अब भी नही किया. दोनों तीनों बार उसके इंजीनियर पति भी उसके साथ आए. शैली का आना न आना मां के लिए बराबर ही था, क्योंकि मां को तो रात को सोते समय या भोजन के वक़्त बस उसका चेहरा देखने को मिलता और बाकी समय तो वह बन-संवर कर तैयार होने में और कभी इस सखी से मिलना है, तो कभी उस सखी से मिलना है' में व्यतीत करती थी. हां, उसका पति समझदार था. वह चाहे जब आकर उसका हाथ बंटाने लगता और शैली को समझाता, "मां से मिलने आई हो, तो मां के पास रहो."
कई बार वह शैली के साथ बाहर जाने को मना कर देता था तो शैली अकेली ही निकल जाती घर से. तब नलिनी के दामाद कहते, "लाइए मम्मी, मैं आपको अपने हाथ का बनाया हुआ खाना खिलाता हूं."
और नलिनी के ना-ना करते हुए भी मधुप अपने पसन्द की कुछ विशेष डिशेज नलिनी के लिए बनाता. खाने के समय तक शैली लौट आती और कहती, "क्या तुम भी घर में रहते हुए बोर नहीं हुए. मेरे साथ चलते तो मज़ा आता."
तब मधुप कहता, "मां से बातें करने में जो आनन्द आता है, वह तुम्हारी सखियों से मिलने या घूमने में नहीं आता."
ऐसे में नलिनी सोचती, 'देखो, एक तो यह पराया लड़का है जो मेरे लिए कितना सोचता है, और मेरी ओर ध्यान देता है और एक अपनी लड़की है जिसे मां की कोई चिन्ता नहीं है.' मधुप कहता "मां इसे कब अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास होगा." नलिनी कहती "समझ जाएगी धीरे-धीरे."
मुन्ना छह महीने का हो चुका था. ऐसे में एक दिन शैली का टेलिफोन आया, "मैं आ रही हूं मां आपके पास रहने."
नलिनी ने सोचा, शायद उसे इस बार एक हफ़्ते से अधिक रहना होगा, इसलिए ऐसा कह रही है.
पर वास्तविकता का पता तब लगा जब शैली अगले ही दिन एक बड़ा सा सूटकेस व मुन्ने को लकेर अकेली ही आ गई.
"मधुप नहीं आए?" नलिनी ने पूछा तो शैली ज़ोर-ज़ोर से रोकर मां के गले लिपट गई.
"उन्होंने मुझे छोड़कर जाने के लिए कहा है. अब मैं उस घर में नहीं जाऊंगी, आपके पास ही रहूंगी." शैली एक ही सांस में कह गई.
"अरे, मधुप तो ऐसा लड़का नहीं है. आने दे मैं उसे समझाऊंगी." नलिनी ने बेटी को सांत्वना दी.
"नहीं, मां नहीं, मैं अब उस घर में नहीं जाऊंगी. उन्होंने मुझे समझ क्या रखा है?" शैली कहने लगी.
नलिनी मन ही मन परेशान हो गई. अब उसे मुन्ने व शैली का भार भी उठाना पड़ेगा. आजकल तो वैसे ही थकान उस पर हावी रहती है और शैली से तो वह सहारे की सोच भी नहीं सकती. मधुप तो बड़ा धैर्यवान व सहनशील लड़का है, यह क्या हो गया, यदि वह मिले तो पूछें उससे.
पंद्रह-बीस दिन तो ऐसे ही निकल गए. शैली ने वही अपना पुराना ढर्रा अपना लिया था. पूरा दिन लेट कर व्यतीत करती. हां, मुन्ने ने उसके पैरों में जंजीर अवश्य डाल दी थी, जिससे जब चाहे वह घूमने नहीं निकल पाती थी. नलिनी सोच रही थी, शायद यह अब अपना तौर-तरीक़ा बदल दे. पर जब उसने बेटी में कोई परिवर्तन नहीं देखा, तो उसे एक दिन कहना ही पड़ा, "शैली, अब मेरी उम्र बढ़ती जा रही है. मैं पहले जितना काम नहीं कर सकती, अब थकने लगी हूं. तुम्हें यहां रहना है, तो घर का काम भी देखो और अपने लिए नौकरी भी ढूंढ़ो बेटी. मैं अब और तुम्हारी ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकती."
शैली अवाक होकर मां का मुंह देखती रह गई. मां ने स्पष्ट शब्दों में उसे कह दिया था और अब यहां अगर सहारा नहीं तो फिर और दूसरी जगह उसके लिए कहां है. मां के घर से अलग होकर दुनिया में इधर-उधर भटकने की कुछ क्षणों की कल्पना ने ही उसे एकदम बड़ा व ज़िम्मेदार बना दिया था. शैली की समझ में आ गया कि उसे यह काम न करने की अपनी आदत छोड़नी पड़ेगी. घर की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी, क्योंकि उसके ऐसा न करने पर हो सकता है मां भी उसे न रखे. तब वह अपने छोटे से मुन्ने को लेकर कहां जाएगी.
बस, अगले दिन से ही शैली में आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया, वह सुबह जल्दी उठती. मां के लिए चाय बनाती और फिर उनके कपडे निकालकर देती. उन्हें कुछ भी कार्य करने से रोकती और जब नलिनी घर पहुंचती, तो उसे खाना तैयार मिलता. यद्यपि शैली को खाना बनाना आता ही कहां था. पर नलिनी को यह तो ख़ुशी थी कि वह बनाती रहेगी और इसी तरह काम करना सीख लेगी.
इन पांच-छह महीनों में शैली अब पूरी तरह से बदल गई थी. सौभाग्य से उसे दो महीने पहले नौकरी भी मिल गई थी पार्ट टाइम. वह चार घंटों के लिए जाती थी और उसे ढाई हजार मिल जाते थे. नलिनी सोचती लड़की ने जो आराम उसे शादी से पहले नहीं दिया, अब दे रही है. दुख के धरातल पर दोनों एक साथ खड़ी हुई थीं. जो काम अब तक स्नेह, प्यार व सुख नहीं कर पाए, वह दुख ने कर दिखाया.

एक दिन स्कूल से लौटते हुए नलिनी को मधुप मिल गया. नलिनी के पास आकर उसने अपना स्कूटर रोका और कहा, "मां, किधर जा रही हैं. मैं आपको छोड़ देता हूं."
नलिनी ने कहा, "नहीं बेटा, में चली जाऊंगी, तुम घर चलो, मैं आती हूं."
मधुप ने जवाब दिया, "नहीं मां. अभी मैं घर नहीं जाऊंगा."
"क्यों शैली से नाराज़ हो, मुझसे तो नहीं." नलिनी ने कहा, वह मधुप से शैली के बारे में बातें करना चाहती थी.
"मैं तो तुमसे मिलने की सोच रही थी. यह अच्छा हुआ तुम आ गए."
"मां चलिए, किसी रेस्टोरेन्ट में बैठते हैं. कॉफी पीते हुए बातें होंगी."
मधुप व नलिनी पास के ही एक रेस्टोरेन्ट में गए और मधुप ने नलिनी से पूछकर कॉफी का ऑर्डर दे दिया. पहले उसने कहा, "मां, खाना ही खा लेते हैं, नहीं तो आपको घर जाकर बनाना पड़ेगा."
"अरे नहीं, शैली ने खाना तैयार कर रखा होगा." नलिनी ने जवाब दिया.
"क्या? शैली ने खाना तैयार किया होगा? यह मैं क्या सुन रहा हूं?" मधुप के भाव बता रहे थे जैसे वह कोई बहुत अनहोनी बात सुन रहा हो.
नलिनी हंसी और बोली, "विश्वास नहीं होता न, घर चलकर देख लेना. मधुप, अब वह बहुत अच्छा खाना बनाने लगी है और घर की पूरी ज़िम्मेदारी और मुन्ने की भी, उसी ने संभाली हुई है. वह तो पार्ट टाइम सर्विस भी कर रही है. पर मधुप..." नलिनी की बात पूरी होने से पहले ही मधुप ने बात काट दी.
"सॉरी मां, बात काटने के लिए, मैं सोच रहा हूं कि मेरा ड्रामा कामयाब रहा. आप कहना चाहती हैं न कि मैंने शैली से लड़ाई क्यों की. उसे यहां क्यों भेजा?" मधुप ने कहा.
"हां." नलिनी बोली, "मैं यही तो पूछना चाहती थी कि तुमसे." ड्रामा शब्द सुनकर नलिनी का कौतूहल जाग उठा था कि यह क्या कह रहा है.
"मां! मैंने यह ड्रामा जान-बूझकर किया था. शैली को आपने प्यार में इतना अधिक बिगाड़ रखा कि वह बाद में अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास ही भूल गई. आपने सोचा था कि शादी के बाद लड़की अपनी घर-गृहस्थी संभालना सीख जाएगी, पर शैली ने तो अपने घर जाकर भी कभी किसी ज़िम्मेदारी का अनुभव ही नहीं किया. सारा दिन लेट कर या फिल्म देखकर अथवा घूम कर ही वह अपना समय व्यतीत करती थी.
घर में क्या हो रहा है, घर गंदा है या साफ़, मेहमान आने पर उन्हें खिलाने ्पि-लाने की ज़िम्मेदारी सब नौकर पर छोड़ रखा था. शादी से पहले मैं आपकी सुघड़ता, घर चलाने का तरीक़ा, पापा के मरने के पश्चात् पूरी ज़िम्मेदारी से जो शैली को आपने पढ़ाया-लिखाया था, यह सब देखा था. इन सबसे ही तो प्रभावित होकर मैंने शैली से शादी की थी कि ऐसी सुघड़ व सुगृहिणी मां की बेटी में भी ये सब गुण विद्यमान होंगे. पर जब शादी के पश्चात् मैंने शैली का यह रवैया देखा, तो मुझे बड़ी निराशा हुई. यहां तक तो मैं सब सहन करता गया, पर मुन्ने के जन्म के पश्चात् भी जब शैली ने अपने आपको नहीं बदला, तब मैंने सोचा कि अब तो यह कार्य मुझे ही करना पड़ेगा. इसीलिए मुझे यह लड़ाई-झगड़े का नाटक कर शैली को आपके पास भेजना पड़ा. बस, मुझे एक ही डर था कि यदि आपने फिर इसका पूरा कार्य ख़ुद करना शुरू कर दिया या इसे छूट दे दी तो यह कभी आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगी. पर यह अच्छा हुआ कि आपने उसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली और मेरे द्वारा किया हुआ यह नाटक सफल हो गया." मधुप ने एक ही सांस में कह गया.
नलिनी मन ही मन अपने दामाद की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा कर रही थी, पर उसकी वाणी प्रत्यक्ष रूप से उसका साथ नहीं दे पा रही थी, क्योंकि गला अवरुद्ध हो गया था और आंखें अश्रुओं से परिपूर्ण. उसे कुछ कहने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी, क्योंकि उन कृतज्ञतापूर्ण आंखों से छलकते हुए अश्रु नलिनी के मन की बात स्वतः ही प्रकट कर रहे थे.
मधुप ने जब कहा, "चलो मां, अब घर चलें." तो वह कॉफी का अधूरा प्याला छोड़ कर उठ खड़ी हुई. घर पर शैली व उसका सुखद भविष्य जो उनका इंतज़ार कर रहा था.
- डॉ. अनुसूया त्यागी
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