कहानी- एक सही फ़ैसला (Short Story...

कहानी- एक सही फ़ैसला (Short Story- Ek Sahi Faisla)

त्यागीजी भी सुबह वॉक पर निकलते, पर दो-तीन किलोमीटर टहलकर लौट आते. उनको सुबह की ताज़ी हवा से ज़्यादा लोगों के द्वारा उनको अभिवादन करने की दरकार थी. जब तक रोज़ दस-बीस लोग सलाम ना ठोके अफसर को खाना हजम नहीं होता. पर लोग अब आगे बढ़कर नमस्कार में भी कंजूसी करते प्रतीत हुए. कुर्सी को सलाम करनेवाले उनको अब पहचानने से भी परहेज़ करते दिख रहे थे.

त्यागीजी वरिष्ठ प्रशासनिक पद से भावभीनी सेवानिवृत्ति पाकर अपने आप को बेहद गौरवान्वित महसूस कर रहे थे. तैंतीस साल राजकीय सेवारत रहते हुए विभिन्न पदो पर अपनी धाक जमाई और इस दौरान उनके बनाए चेलों ने पूरे जोश-खरोश से घर तक पहुंचाया. धूम धड़ाका, गाजा बाजा, फूल गुलाल, साफो की भरमार से उनका वाहन लद गया. घर तक आनेवालों को बढ़िया नाश्ता कराया गया और अगले दिन सुरुचिपूर्ण भोज के लिए मशहूर नानक वाटिका में आने का आग्रह भी किया गया.
उसी मोहल्ले में मास्टर स्वामी भी उसी दिन रिटायर होकर लौटे. चालीस साल बच्चों का ज्ञान संवारते बीते और सेवाकाल पूरा होते ही शांति से अपने चार मित्रों संग एक माला और एक साफे में लौटे, तो पूरा परिवार पूजा थाल संग माला लिए स्वागत में खड़ा पाया.
अमूमन शर्मीले स्वभाव की उनकी धर्मपत्नी अपने दोनों बेटों-बहुओं और पोते-पोतियों के साथ मुस्कुराती माला पहनाने को आतुर दिखी. मित्र मण्डली चाय-नाश्ता कर लौट गई और अगले दो हफ़्ते मास्टरजी के कैसे बीते पता ही नहीं चले. उनसे मिलने, बधाई देनेवाले लोग आते रहते और कुछ देर रुककर लौट जाते. उनके पढ़ाए बच्चे, जो अब विभिन्न पदों पर सेवा दे रहे थे आते और सम्मान सहित अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करते.
उधर त्यागीजी भी लंबी छुट्टी के आनंद-सा अपने दिन गुज़ार रहे थे. अक्सर सोशल मीडिया और फोन पर लंबी बातचीत में दिन गुज़रता. अफसरी का ठसका बातचीत और व्यवहार में बरक़रार था. दिनभर उनकी ऊंची तान से घरवाले भी उबने व बड़बड़ाने लगे थे. अफसर की अफसरी ऑफिस तक तो अनुशासन स्थापित करने में सहयोग करती है, पर घर पर होने लगे, तो विद्रोह का कारण भी बनने लगती है. पत्नी तो उनकी आदतों के साथ बत्तीस वर्ष गुज़ार चुकी थीं, पर इकलौता बेटा, जो डेन्टिसट था और बहू, जो इकनॉमिक्स में पीएचडी कर रही थी, को उनके निर्बाध जीवन में खलल-सा दिखने लगा. दोनो घर से ज़्यादा समय दूर रहने के बहाने खोजने में लगे रहते.
उधर मास्टरजी ने हफ़्तेभर में ही अपने को नए रुटीन में ढाल कर स्वस्थ तन व स्वस्थ मन पाने की ओर प्रतिबद्ध करते नज़र आने लगे. प्रातः छह बजे उगते सूरज के साथ ही प्रातःकालीन भ्रमण पर निकल जाते. चार किलोमीटर चल कर विवेकानंद पार्क पंहुचते. वंहा पहले से ही मौजूद पंद्रह बीस लोगो के साथ योगा-प्रणायाम करते, कुछ अच्छे विषय पर चर्चा होती और फिर खुशी से भरी ऊर्जा के साथ मंथर गति से आसपास का अवलोकन करते लौट आते. अंकुरित अनाज का नाश्ता, अखरोट मिले दूध के साथ सेवन कर लेते. अख़बार की ख़बरो से रु-ब-रू होते. सुबह दस बजे तक की इस आनन्दमयी दिनचर्या उनको शेष दिन के लिए भी ऊर्जावान रखती और किसी को उनसे या उनको किसी से ऊंची आवाज़ में बतियाने, झल्लाने की ज़रूरत ना पड़ती. दिन में एक-दो घंटे कहानी, कविता, लेख, लिखने-पढ़ने का काम भी शुरू कर चुके थे, जो कई वर्षों से लगभग बंद हो चुका था. अल्प भोजन-अधिक कार्य के मंत्र को वो लगभग अपना चुके थे.
त्यागीजी भी सुबह वॉक पर निकलते, पर दो-तीन किलोमीटर टहलकर लौट आते. उनको सुबह की ताज़ी हवा से ज़्यादा लोगों के द्वारा उनको अभिवादन करने की दरकार थी. जब तक रोज़ दस-बीस लोग सलाम ना ठोके अफसर को खाना हजम नहीं होता. पर लोग अब आगे बढ़कर नमस्कार में भी कंजूसी करते प्रतीत हुए. कुर्सी को सलाम करनेवाले उनको अब पहचानने से भी परहेज़ करते दिख रहे थे. एक महीने बाद ही जीवन मे खालीपन सा दिखने लगा. आख़िर पत्नी के साथ एक महीने विदेश घूमने का पैकेज टूर लिए विदेश निकल गए.
इधर मास्टर स्वामी ने अपने बातों और व्यवहार से मोहल्ले वासियों और सुबह के स्वास्थ्य जागरूक लोगों पर अपना सकरात्मक प्रभाव छोड़ चुके थे. शाम को उन्होंने देवी मंदिर में जाना शुरू कर दिया था. पूजा-आरती के बाद वह वहां के छोटे से लाॅन में बैठ जाते और आसपास की घटनाओं पर लोगों को चर्चा करने के लिए प्रेरित करते. अब रोज़ पंद्रह-बीस लोगों से सुबह विवेकानंद पार्क में और इतने ही लोगों से शाम को देवी मंदिर में समसामयिक विषयों पर चर्चा होना नियम बन गया. चर्चा से समाधान भी निकलते हैं और लोगों की निजी समस्याएं भी मास्टरजी के सुझाव से हल होने लगी. मात्र छह महीने में मास्टरजी ने अपनी यह दो क्लास रूम ऐसी बना दी कि अब उसमें छोटे-बड़े नए विद्यार्थी ख़ुद-ब-खुद जुड़ने लगे.
 • उधर त्यागीजी ने विदेश से लौटकर कुछ महीने तो खुमारी मे गुज़ार लिए, फिर मजबूरी में समय काटने को एक लाख रुपए जमा करा शहर का एक नामी क्लब जॉइन कर लिया. जहां ज़्यादातर लोग ताश खेलने, बिल्यर्ड खेलने और सुर सेवन के लिए आते थे. उसमें ज़्यादातर लोग तो बिज़नेसवाले थे, जो बातों बातों में अपनी बिज़नेस डील कर लेते थे. सुबह आनेवाले तो लोग स्वीमिंग, टेबल टेनिस और लॉन टेनिस खेलते, पर उसके बाद की पारी के लोग तो ज़्यादातर आमोद-प्रमोद की खोज में वहां का ठौर ढूंढ़ते. त्यागीजी समय तो यहां काट लेते, पर अपना रौब-दाब बनाने में नाकाम सिद्ध हो रहे थे. एक पुकार पर चार-छह लोग हाथ जोड़े इकट्ठा होनेवाले लोग क्यों उनकी बात भी काटने लगे, यह समझ में आने के बाद भी क़बूल नहीं हो रहा था.
एक वर्ष बीत गया. मास्टरजी के आह्वान पर मोहल्ले की साफ़-सफ़ाई का प्रोग्राम रखा गया था. सौ लोग मिलकर सुबह से जुट गए. जिसके पास जो साधन थे लेकर आए थे. कोई बबूल काट रहा था, कोई नाली से मोटा कचरा निकाल रहा था. सड़क में पडे छोटे मोटे गड्ढे भी मिट्टी डाल कर कूटे जा रहे थे. सड़क के आसपास पड़ा सारा प्लास्टिक बोरे में भरकर कबाड़ीवाले को दे दिया गया. चार घंटे में सड़क और गलियों की कायाकल्प हो गई. त्यागीजी ने भी अपने निर्देश देने की कोशिश की, पर उनकी बात को नज़रअंदाज़ ही किया गया. मास्टरजी पूरी तरह सर्वमान्य नेता बन चुके थे.
अब हर महीने कोई ना कोई सार्वजनिक गतिविधि होती, जिसका दूरगामी परिणाम महसूस किया जाता. पौधारोपण, साफ़-सफ़ाई, दीवार पेंटिंग, गरीबों को राशन और कपड़ा वितरण, सड़क मरम्मत आदि कार्य बिना अवरोध के सम्पन्न होने लगे। नगरनिगम के कार्यक्रम में भी मास्टरजी को उद्बोधन के लिए बुलाया जाने लगा. त्यागीजी ने भी अपना रुतबा उनके सामने त्याग दिया था और उनकी दिनचर्या को अंगीकार करने की कोशिश शुरू कर दी थी, जिसके नतीजे के तौर पर वो अपने घरवालों के बर्ताव और नज़रों में संतोष के भाव को देख पा रहे थे.
सेवानिवृत्त के दो साल बाद आज नगरनिगम के चुनाव में मास्टर स्वामी निर्दलिय पार्षद के रूप मे प्रत्याशी है और भारी अंतर से जीतने की पूरी संभावना है. त्यागीजी भी अपनी पत्नी के साथ मास्टरजी के चुनाव चिह्न बैट-बॉल पर बटन दबा कर अपने होने की सार्थकता सिद्ध कर आए है.

– संदीप पांडे

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