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कहानी: एकालाप- शौक को मिली नई उड़ान… (Short Story: Ekalap- Shauk Ko Mili Nai Udan…)

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता.. एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो...

सच है अगर कुछ कर गुज़रने का जज़्बा हो तो उम्र भी मायने नहीं रखती. कामना भार्गव जी ने इसे चरितार्थ किया है. उनका अपने हुनर को निखारना, संवारना और एक अलग पहचान देना बहुत कुछ बयां कर देता है. ८० की उम्र के डगर पर भी अपनी ख़ूबसूरत पेंटिंग्स के ज़रिए एक नई उड़ान भरते सफ़र को उन्होंने बदस्तूर ज़ारी रखा है. एकालाप में उनकी प्रेरणादायी कहानी को जानते हैं उनकी ज़ुबानी.

जब मैं सोचती हूं तो लगता है,  ऐ ज़िंदगी तू मुझे कहां से कहां ले आई...

बचपन से चित्रकला का शौक था. बहुत शांत और धीरजवाली थी. अपने तीन भाई-बहन में सबसे बड़ी. याद ही नहीं कभी मां-पिता से पेंटिंग के सामान के अलावा कुछ मांगा हो.

19 साल की उम्र में शादी हो गई, जो बची-खुची पेंटिंग थी छूट गई. चार बच्चों और परिवार की देखभाल में समय ही नहीं मिलता था.

वर्षों बाद जब सब बच्चे उड़ गए और हम दोनों रह गए तो फ्रेंच आर्टिस्ट से स्टेन ग्लास पेंटिंग सीखी.

मुंबई, दिल्ली, जयपुर और अजमेर में कई एकल एग्जिबिशन लगे. आज भी दुनियाभर में कम से कम 10000 घरों में मेरी कलाकृतियां होंगी. फिर मन भर गया तो छोड़ दिया.

15 साल पहले पति के गुज़र जाने के बाद लगा कि चित्रकला फिर से शुरु की जाए. अजमेर के नामी चित्रकार श्री अशोक हाजरा, श्रीमती दीपिका और श्री विजयसिंह चौहान से सीखना शुरू की. ज़्यादा कुछ तो नहीं कंटेंपररी आर्ट ही करती थी.

एक बार अचानक धर्मशाला जाना हुआ. वहां पहली बार तन्खा पेंटिंग देखी और नाम सुना. बहुत अच्छी लगी. रात को सपना आया कि मैं पेंटिंग बना रही हूं. दूसरे दिन बाज़ार में जितने पिक्चर पोस्टकार्ड मिले ख़रीद लाई.

अजमेर वापस आकर इनको रख दिया और फिर अन्य कामों में लग गई. एक दिन मैं बोर हो रही थी, क्योंकि गुरुजी कई दिन से आ नहीं रहे थे. पोस्टकार्ड निकालें और बनाने बैठ गई. बहुत अलग काम था. बहुत समय लेने वाला और धैर्य से करने वाला. एक, दो, तीन... जब तीसरी बनाई तो लगा काफ़ी अच्छी बन गई है, लेकर गुरुजी के पास पहुंची. वे बोले, "करती रहो."

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पर मुझमें धैर्य बिल्कुल भी नहीं था. एक चीज़ से दूसरी चीज़ पर फुदकती रहती थी.

छह साल पहले जब बेटे के पास मुंबई रहने आई तो वो बोला, "दिनभर साड़ी-दुपट्टे पेंट करती रहती हो, कुछ ऐसा बनाओ कि हम लोग आपको याद रखें."

बात समझ में आ गई. फ़ौरन तन्खा की याद आई. दूसरे दिन से ही ज़ोर-शोर से काम शुरू.  पहले मैं सिल्क पर पोस्टर कलर से बनाती थी. पर यहां के मौसम में उसमें सिलवटें पड़ जाती थीं. फिर काग़ज़ पर एक्रेलिक कलर्स से बनाना शुरू किया, बाकी सब इतिहास है. जो है आपके सामने है. जब मैं मेज पर बैठती हूं तब पता नही मेरी अधीरता, जल्दबाज़ी, जल्दी बोर होना पता नहीं कहां चला जाता है. उस समय एक अलग ही कामना बैठी होती हैं. ऐसा लगता है जैसे कि सरस्वतीजी स्वयं हाथों पर बैठे जाती हैं.

तन्खा की बात करें तो यह बहुत पुरानी चित्रकला है. इसका इतिहास सातवीं सदी से भी पुराना है. इसे बौद्ध भिक्षु अपने देवी-देवताओं के चित्र बनाते हैं, क्योंकि बौद्ध लोग पहले हिंदू थे तो इनके देवी-देता अब भी वही‌ हैं. केवल‌ रुप बदल गए हैं. यह कला कपड़े पर नेचुरल कलर्स और सोने‌ से की जाती‌ है. मैं इसका‌ मॉर्डन वर्सन करती हूं. हर पेंटिंग बनाने में ३ से‌ १२ हफ़्ते तक‌ लगते‌ हैं.

अब तो ये पागलपन की हद तक हो गया है. रात को नींद नहीं आती है तो टेबल पर बैठ जाती हूं. फिर डर लगता है कि बच्चे डांटेंगे कि मम्मी अपनी उम्र का तो ख़्याल करो.

यहां पर मैंने दो कंप्टीशन में भाग‌ लिया. Hashtag art competition में इनाम जीता. फिर बॉम्बे आर्ट सोसाइटीं ने मेरी तन्खा पेंटिंग को जहांगीर आर्ट गैलेरी में अपनी एक्जीबिशन में‌ लगाया.

मेरी दिली इच्छा थी कि मैं तन्खा आर्ट को पॉपुलर करूं. उसका सबसे अच्छा तरीक़ा जहांगीर आर्ट गैलरी, मुंबई में प्रदर्शित करने के था. बच्चों ने यह इच्छा पूरी करने में पूरा साथ दिया और अब एक से लेकर सात‌ जून‌ तक वहां पर मेरी एकप्रदर्शिनी है. आप सबको आमंत्रित कर रही हूं ज़रूर आएं.

जब मैंने पहली तीन तन्खा बनाई, मेरी आर्टिस्ट फ्रेंड ने एक लिंक भेजा. तब मैं पिनटेरेस्ट वगैरह कुछ नहीं जानती थी.‌

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फिर तो मैं इतना मोहित हो गई‌ कि रोज़ रात को दो-तीन बार देख कर हो सोती थी. फोन का बिल जितना भी आए पर मन नहीं भरता था. फिर फोन बदला तो वो लिंक भी खो गया. आज भी उसको ढूंढ़ने की कोशिश ज़ारी है.

बेटे ने कहा, "मम्मी दुपट्टे छोड़ो‌ कुछ यादगार बनाओ."

मैंने कहा, "ठीक है तीन तो हैं एक तन्खा और बना देती हूं."

तीन दिन बाद बाहर से ठोकने की आवाज़ सुनकर आकर देखा कि बेटे जी ने तीनो पेंटिंग फ्रेम करवा ली‌ है और ड्रॉइंगरूम में लगा‌ रहे हैं. बोला, "ये‌ तीनों मेरी हैं. अब तुम जानो और तुम्हारी बेटियां." मैं इस शॉक से उबर भी नहीं पाई थी कि फोन दनादन बजने लगा. मेरे बच्चों का नेटवर्क इतना ज़बर्दस्त है कि किसी देश की खुफिया एजेंसी का‌ भी‌ क्या होगा. मैं ख़ुश हो ही रही थी कि सबको एक साथ मेरी याद आ गई. उधर से बंदूक छूटने की आवाज़ आई, "क्यों, क्या वह ही लाड़ला है. हम सौतेल हैं क्या? भाई को तीन तीन पेंटिंग दी हमें चार चार चाहिए."

किसी तरह एक का वायदा करके पीछा छुड़ाया ही था कि फिर फोन बजा. नाती-नातिन का फोन था. "और हम नानी हमारा भी घर होगा."

उनसे यह कह कर पीछा छुड़ाने की कोशिश कि जब घर होगा तब बात करना. परन्तु वे ज़्यादा होशियार थे. बोले, "तब तक ज़्यादा बूढ़ी हो जाओगी और बना भी नहीं पाओगी. अभी बनाओ." तो मैडम गाड़ी एक से चार और चार से सात पर आ गई. अभी एक दो ही बनाई थीं कि दामाद जी बोले, "मम्मी एक साइज़ की बनाइएगा, जिससे कोई दो एक साथ लगाना चाहे तो!.."

मैं हक्की-बक्की रह गई. सात से चौदह हो गए. उधर मेरे दुपट्टे पुकार रहे‌ थे... फिर‌ भी‌ काम शुरू किया. मुझमें धैर्य बहुत कम है, परंतु जब तन्खा बनाती हूं तो पता नहीं कहां से धैर्य आ जाता है और हफ़्तों एक ही पेंटिंग बनाती रहती हूं.

उसके बाद तो जो नशा चढ़ा कि चौबीसों घंटे तन्खा ही दिलो-दिमाग़ पर चढ़ी रहती है. अब बच्चों को मना करना पड़ता है कि "मम्मी बस करो!.."

कामना भार्गव

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