कहानी- फाउल (Short Story- Foul)

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बाप रे! एक भी उत्तर इस तरह नहीं दे रही है कि कोई सुराग मिले. तो क्या व़क़्त आ गया है स्पष्ट पूछने का कि तुमने किसी से प्रेम किया है? किसी की हरे रंग की शालूवाली बनी हो? क्या तुम्हारे परिवार की मर्यादाएं भी प्रेम पर आकर भंग होती हैं? पर ऐसा कोई एपीसोड इसके जीवन में न हुआ, तो यह कितना बुरा मानेगी कि मुझे अपने जैसा धूर्त समझा है? अभिज्ञान यह पूछने का साहस न दिखा सका.

अभिज्ञान को लगता है वह अलग-अलग तरह से स़िर्फ सोचता आ रहा है. उसने जो काम सबसे अधिक किया है, वह है सोचने का. अब तक कुछ नहीं किया है सिवाय सोचने के. जब नई-नई जवानी के दिन थे तब सोचता था कि ‘गुलेरी’ की कहानी ‘उसने कहा था’ की हरे रंग की शालूवाली एक उसकी ज़िंदगी में भी आये, तो वह आई, जब वह इस विकासशील नगर के सुस्थापित अधिवक्ता अयोध्या प्रसाद के अण्डर में वकालत सीख रहा था. अयोध्या प्रसादजी के चैम्बर में उस व़क़्त पांच जूनियर थे. चार लड़के और पांचवीं वही… जो अंततः हरे रंग की शालूवाली निकली. चारों लड़के उस पर समान भाव से फिदा थे, पर वह अभिज्ञान पर फिदा हुई. अभिज्ञान इसे एक उपलब्धि की तरह देखता था.
पर शायद सभी हरे रंग की शालू वालियां एक-सी क़िस्मत लिखाकर लाती हैं. इस प्रकरण में इतनी भर विविधता हुई कि कुड़माई शालूवाली की नहीं, अभिज्ञान की हो गई. जैसा कि आरंभ में ही स्पष्ट किया गया है, अभिज्ञान अलग-अलग तरह से सोचता आ रहा है तो उसने सोचा कुड़माई का कड़ा विरोध करेगा, पर नहीं कर पाया. उसे लगता है वह तीन भाइयों और एक बहन में सबसे बड़ा है, पर उसकी हमेशा कम सुनी गई है. कारण बहुत साफ़ है, मझला भाई ध्वज एम.डी. कर रहा है, छोटा भाई धरम एम.बी.ए. कर अभी-अभी एक मल्टीनेशनल कंपनी में आकर्षक वेतन पर लगा था, जबकि अभिज्ञान कुछ ख़ास नहीं कर पाया था, जिसका परिणाम पूरा परिवार भुगत रहा था. दोनों छोटे भाइयों के लिये शानदार वैवाहिक प्रस्ताव निरंतर आ रहे थे, जबकि अभिज्ञान के लिये प्रस्ताव आ नहीं रहे थे और जो आ रहे थे, वे उस गौरव को कम कर देते थे जो इस परिवार को दोनों छोटे लड़कों के कारण प्राप्त हो रहा था. ऐसी संवेदनशील स्थिति में भाग्य से आये मनीषी के प्रस्ताव पर बाबूजी ने अभिव्यक्ति दे दी.
“अभिज्ञान, बेवकूफ़ी छोड़ो और हमें कुछ जीने दो… क्या यह शोभा देता है कि एक तुम्हारी वजह से मैं उन बड़े-बड़े लोगों को कोई उत्तर न दूं, जो ध्वज और धरम के लिये आ रहे हैं?”
“तो ध्वज और धरम की शादी कर दीजिए.”
“बड़ा बैठा रहे और छोटों की शादी हो जाये तो इस खानदान की प्रतिष्ठा बची रहेगी?”
“तो पहले मेरी कर दीजिए, सुहानी से.”
“यह नहीं होगा. निम्न वर्ग की लड़की विप्र कुल में नहीं आयेगी. और तुम इश्क़ में निकम्मे न बनो. बड़े इंतज़ार के बाद यह जो प्रस्ताव आया है, इसकी कद्र करो. मैं न जानता था अयोध्या प्रसाद के चैम्बर में वकालत नहीं इश्क़ सिखाया जाता है… तुम्हारा कैरेक्टर ख़राब हो गया.”
अभिज्ञान क्या-क्या तो सोच रहा था. वह और सुहानी जल्दी ही अयोध्या प्रसाद से अलग होकर पार्टनरशिप में स्वतंत्र वकालत शुरू करेंगे, विवाह करेंगे और दुनिया को मुट्ठी में कर लेंगे और यहां पता नहीं क्या हुआ जा रहा था उसे.

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वह पता नहीं कितना कुछ सोचता रहा और एक रात जब पता नहीं कितना बजा था तब बहन ने उसे उसके कमरे में ठेल दिया इस उम्मीद के साथ कि घर में जबरन बस जानेवाली फाख़्ता से भी मोह हो जाता है, मनीषी तो कमनीय कन्या है. वह ठिठका रहा, क्या करे अब इस मनीषी नाम की परिणीता का? कैसे स्वीकारे? पर मनीषी ज़हीन निकली. वह सो चुकी थी. अभिज्ञान अपने ही कमरे में अपने ही बिस्तर की छोटी-सी जगह में इस तरह सिकुड़ कर बैठा रहा मानो अब वह बिस्तर उसका नहीं था. देर तक व्यर्थताबोध में बैठा रहा, फिर सोचने लगा मनीषी को जगाये और वकील से सधे अंदाज़ में प्रश्‍न पूछे, “यह विवाह तुमने क्यों किया? मर्ज़ी से किया या…? तुमने कभी प्रेम किया है? बनी हो किसी की हरे रंग की शालूवाली? नहीं? तो फिर मेरे प्रश्‍नों का सही उत्तर नहीं दे सकोगी. बहुत अंतर होता है प्रेम करनेवालों और न करने वालों के अनुमान और मानसिकता में.”
विचित्र था मनीषी का अंदाज़े-बयां. वह चुप रहती थी. अभिज्ञान उसकी इस चुप्पी पर हैरान था. अम्मा बात-बात में बड़बड़ाती हैं, बहन बात-बात में पैर पटकती है, सुनने में आया है ससुराल में भी उसकी आदत गई नहीं है. सुहानी बात-बात में हंसती है. मौन रहनेवाली लड़की शायद यह पहली ही है, जबकि मनीषी का मौन घरवालों को कृतज्ञ किये था. इस तरह के बहुत से प्रश्‍नों से बचे हुए थे. वे मनीषी के प्रति संवेदनशील होते जा रहे थे. बाबूजी ने एक बार फिर समझाया, “अभिज्ञान, अब तुम पर एक ज़िम्मेदारी है. स्वतंत्र रूप से वकालत क्यों नहीं शुरू करते?”
“सोच रहा हूं, सुहानी के साथ पार्टनरशिप में शुरू कर दूं.”
“एक स्त्री और एक पुरुष की पार्टनरशिप जैसा कुकाण्ड इस शहर में अब तक नहीं हुआ है. लोग तुम्हें केस तो क्या देंगे, मु़फ़्त तमाशा ज़रूर देखेंगे.”
“हम दोनों वकील हैं, पुरुष-स्त्री जैसी बात बीच में क्यों लाते हैं?”
वस्तुतः यह एक विचित्र स्थिति थी. मनीषी से विवाह कर अम्मा-बाबूजी की हसरत पूरी कर देने के साथ ही अभिज्ञान मानो दबाव से मुक्त हो गया था और अपनी मर्ज़ी चला कर अम्मा-बाबूजी दबाव में आ गये थे. दोनों पक्ष इतनी सावधानी व सतर्कता ज़रूर बरत रहे थे कि उनके आपसी अवरोध-प्रतिरोध मनीषी तक न पहुंचें और हालात एक दिन सुधर जाएंगे.
इधर मनीषी अम्मा-बाबूजी की जद्दोज़ेहद और अभिज्ञान के फितूर से ख़ुद को पूरी तरह अलग रखे हुए थी. यहां तक कि वह जब मायके जाने लगी तब भी उसने अभिज्ञान से बात न की. अभिज्ञान ने सोचा था, वह इतना तो ज़रूर पूछेगी और पूछना ही चाहिए कि आख़िर आप इस तरह छिटके हुए क्यों हैं? नहीं पूछा. यह नहीं, पर कुछ तो पूछती. तब अभिज्ञान ने पूछा, “मायके जा रही हो? पैसे हैं न?”
“अम्मा ने दे दिये हैं. वैसे वहां पैसे की क्या ज़रूरत होगी?” मनीषी ने आंखें झुकाए हुए कहा. तो अम्मा ने पैसे दिये. बीच में ध्वज आया था, तो इसके लिये साड़ी और चूड़ियां लाया था. तो हर कोई इस पर चाहतें लुटा रहा है कि फिर यह एक दिन प्रसन्न करेगी. ख़ैर, मैं प्रसन्न होने से रहा. यह मायके जा रही है फ़िलहाल यह प्रसन्नता ज़रूरी है. बड़े दिन हुए अपने ही कमरे में अजनबी की तरह सोते हुए. ख़ूब पसर कर सोऊंगा… पर रात तो आई, नींद नहीं आई. वही सोचने की बीमारी. क्या कोई लड़की इतनी शांत हो सकती है? लगभग अनुपस्थित, अदृश्य. मनीषी इतने दिनों यहां रही, क्या सोचती रही होगी? मौन रहकर क्या इस रिश्ते को अमान्य कर रही है? या एहतियात बरत रही है कि सब ठीक हो जायेगा? या चुनौती दे रही है कि ऐसे आदमी का तिरस्कार ही करना चाहिए? पर मनीषी से मुझे क्या प्रयोजन? मैं इतना क्यों सोच रहा हूं? यह सोचना थमता क्यों नहीं?

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घर में ये सब चल रहा था तो घर से बाहर भी वारदातें हो रही थीं. जैसे कि सुहानी ने बताया, “अभिज्ञान, मेरी शादी हो रही है. तुम पुरुष होकर ज़माने से न लड़ सके, फिर मैं कब तक लड़ती? वकालत में भी काम नहीं जम पा रहा है. वकालत ने काले कोट के अलावा कुछ न दिया, तुमने दी निराशा. ज़माने ने बनाया तमाशा… तो तुम्हीं कहो क्या करती?” अभिज्ञान के सामने मानो बिजली गिरी. इसी सुहानी ने तो कहा था, “अभि, तुम्हारा विवाह भले ही हो गया, हमारा इश्क़ ठंडा नहीं पड़ना चाहिए.” इसी दम पर तो मनीषी से मतलब न रखा. अभिज्ञान अपमान, अवमानना, अवमूल्यन जैसी अकबकाहट से भर गया. सचमुच जगत मिथ्या है. सिद्धांत या आदर्श जैसा तो कुछ रहा ही नहीं.
सुहानी के विवाह को अभिज्ञान के घर में चमत्कार के तौर पर देखा गया- अम्मा ने भगवान को बूंदी के लड्डुओं का भोग चढ़ाया.
मनीषी ने पूछा, “यह किस ख़ुशी में अम्मा?”
“उस मुसुटिया (चुहिया) के बियाह की ख़ुशी में.” अम्मा विहंस कर बोलीं.
मुसुटिया के बियाह की प्रतिक्रिया क्या रही, जानने के लिए अभिज्ञान ने हठात मनीषी को देखा. वहां ईर्ष्या या द्वेष जैसा कोई भाव नज़र नहीं आया. अभिज्ञान का सोचना तेज़ हो गया. तो मनीषी को इस प्रेम-प्रसंग की जानकारी है? क्या अम्मा ने संज्ञान दिया कि जैसे भी हो, तुम अभिज्ञान को मुसुटिया के जाल से निकालो? तो क्या मनीषी की दृष्टि में मेरी छवि ध्वस्त हो चुकी है? और यही है इसके मौन का कारण…?
उधर सुहानी फिर कचहरी में नज़र न आई. इधर मनीषी का तटस्थ भाव. अभिज्ञान की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? न घर में लगे दिल न बाहर. बाबूजी ने उसकी उलझन भांपी और बड़े दिनों बाद दुलार से उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “अभिज्ञान, तुम्हारी परेशानी यह है कि तुम सकारात्मक नहीं सोचते.”
सकारात्मक सोचने का क्रम कुछ यूं जमा. आख़िर मनीषी इतनी चुप क्यों रहती है? कुछ सोचती नहीं मेरे बारे में? अम्मा द्वारा ध्वस्त की गई मेरी छवि के बारे में? क्या कभी भी मुझमें रुचि नहीं लेगी? सोचा था रोने-धोने, मनावन-रिझावन, उठा-पटक, ध्वंस- जैसा कुछ होगा, पर यहां तो ऐसी शांति बहाल है कि अब अड़चन होने लगी है. रात में यह जल्दी सो जाती है. दिनभर काम में लगी रहती है. अब पूजा कर रही है… अब खाना बना रही है… अम्मा-बाबूजी को खिला रही है- कपड़े धो रही है- यह थकती-खीजती, ऊबती नहीं? इसकी कोई अपेक्षा, उम्मीद, साध नहीं? नहीं, सुहानी अभिज्ञान के जेहन से गई नहीं थी. वह मनीषी को लेकर धड़कन, संवेदन, स्पंदन भी अपने भीतर नहीं पा रहा था, पर पता नहीं क्यों चाहने लगा था कि मनीषी इस तरह तुच्छ बनकर न रहे, बल्कि कायदे से रहे, तो अम्मा से बोला, “अम्मा, ऐसे तो यह बीमार हो जायेगी. थोड़ा भी आराम नहीं करती.”
अम्मा मोद मगन हो गई, “तुम्हें फ़िक़्र होने लगी?”
“फ़िक़्र की क्या बात…” कहकर अभिज्ञान ने लापरवाही दिखानी चाही, पर उसे सचमुच फ़िक्र होने लगी थी. यही कि कुछ गड़बड़ है. इसके मौन के कुछ मायने हैं. यह कि मैं ही दूर नहीं भाग रहा हूं, मनीषी भी मुझसे दूर भाग रही है. यह भी मुझे स्वीकार नहीं कर रही है. यह भी मुझे एक हस्तक्षेप की तरह देख रही है. और बिल्कुल करिश्माई ढंग से उसने यह भी सोचा कि यह भी किसी से प्रेम करती है जैसे कि मैं… उफ्, यह क्या करती है इससे मुझे क्या? मैं यह सब क्यों जानना चाहता हूं? क्योंकि मुझे जानना चाहिए. मैं इसके बारे में जानू यह मेरा नैतिक, मौलिक, संवैधानिक अधिकार है. और कुछ न बताकर यह मेरे अधिकारों का हनन कर रही है. तब अभिज्ञान ने पूछ ही लिया, “तुम्हें यहां अच्छा लगता है?”
“हां.”
“उस दिन अम्मा जो मुसुटियावाली बात कर रही थीं, ऐसा कुछ सुनकर भी?”
“उसमें आपका दोष नहीं है, क्योंकि बहुत से लोग प्रेम करते हैं.”
“तो तुम्हें आपत्ति नहीं है?”
“मेरी आपत्ति पर ध्यान कौन देता है?”
“क्या तुम्हें लगता है कि ये बातें तुम्हें न बताई जातीं तो बेहतर होता?”
“बातें छिपाना भी ठीक नहीं.”

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बाप रे! एक भी उत्तर इस तरह नहीं दे रही है कि कोई सुराग मिले. तो क्या व़क़्त आ गया है स्पष्ट पूछने का कि तुमने किसी से प्रेम किया है? किसी की हरे रंग की शालूवाली बनी हो? क्या तुम्हारे परिवार की मर्यादाएं भी प्रेम पर आकर भंग होती हैं? पर ऐसा कोई एपीसोड इसके जीवन में न हुआ, तो यह कितना बुरा मानेगी कि मुझे अपने जैसा धूर्त समझा है? अभिज्ञान यह पूछने का साहस न दिखा सका. इतना ज़रूर हुआ कि उसने मनीषी को बहुत गौर से देखा. मूर्त आकृति की तरह बैठी मनीषी के नैन-नक्श बहुत धारदार तो नहीं हैं, पर दूधिया स्निग्ध त्वचा चेहरे को स्वस्थ-सुंदर लुक देती है.
मनीषी का मौन अभिज्ञान को गैरक़ानूनी-सा लगने लगा. एक वह दिन था जब सोचा था इसकी सूरत नहीं देखेगा. एक यह दिन है जब लग रहा है यह कुछ बोले. अपने ग़ुस्से-चिढ़ का प्रदर्शन करे, प्रतिसाद करे, अभियोग ही लगाये. यह क्या है कि कमरे में मैं अवांछित-सा पड़ा हूं यह विरक्त-सी पड़ी है. वह बेचैन होकर कहने लगा,
“मनीषी, तुम अपनी दशा पर ख़ुश हो?” वह पत्नी को पहली बार नाम से
पुकार रहा था.
“हां.”
“यह जानने के बाद भी कि मैं ऐसा क्यों हूं?”
“आप कैसे हैं?”
“तुम्हें निराश किया.”
“नहीं तो.”
“तुम कुछ और चाहती थी?”
“मैं समझी नहीं.”
प्रेम-प्रसंग की सीधे जासूसी न कर उसने सभ्यता से काम लिया, “तुम स्टेट लेवल की बैडमिन्टन प्लेयर रही हो न… तो मेरा मतलब शादी के बाद करियर में रुकावट तो नहीं पाती हो? तुम अपने जिले की बेस्ट महिला खिलाड़ी मानी जाती थी न?”
“हां.”
“तो ग्राफ़ में जीत अधिक दर्ज है कि हार?”
“सिंगल्स, डबल्स में कुछ बार हारी हूं, पर मिक्स्ड में हमेशा जीती हूं.”
मिक्स्ड डबल्स… कौन था, इसका साथी? खेलने के अलावा और क्या काम करता होगा? क्या उम्र होगी? दोनों के बीच अनुराग जैसे तत्व…
“जब मायके जाती हो तब खेलती हो?”
“नहीं. खेल किसी के लिये नहीं रुका रहता. वहां दूसरे खिलाड़ी आ जाते हैं.”
“मिक्स्ड डबल्स में…” मनीषी ने उत्तर देने में तत्परता दिखाई, “मेरी जगह मिहार आ गई है. अच्छा तालमेल बना लिया है.”
“मिहार को अपनी जगह देखकर तुम्हें बुरा लगा?”
मनीषी ने इतना भर कहा, “खेल और ज़िंदगी के नियम अक्सर एक से होते हैं. जगहें भर जाती हैं.”
मनीषी का मौन और अभिज्ञान की बढ़ती मुश्किलें. दरअसल सब कुछ उल्टा हो गया था. सोचा था, वह भाग रहा होगा और यह रिझा रही होगी. लेकिन हुआ यह कि वह भाग रहा था, यह सिमट रही थी. उसका भागना थम गया, इसका सिमटना जारी रहा. अभिज्ञान प्रेम में वहशी होकर कपड़े फाड़कर न तो सड़क पर घूम रहा था, न वैरागी बन भगवा धारण कर सका था. तो अब आवश्यकता और उपयोगिता के मद्देनज़र वह समन्वय पर आना चाहता था.
सकारात्मक सोचना चाहता था. तो सकारात्मक सोचते हुए उसने पाया कि वैसे तो उसने मनीषी पर ज़ुल्म नहीं किया है, पर फिर भी किया है. वह ख़ुद को गुनहगार पाने लगा, लज्जित हो गया, फिर क्षमाप्रार्थी की तरह मनीषी के सामने प्रस्तुत हुआ,
“मनीषी, तुम्हें मेरे बुरे व्यवहार से दुख तो ज़रूर पहुंचा होगा.”
“नहीं.”
“मैं क्या करता? मेरी मनःस्थिति तब क्या रही होगी. वह समय मैंने कैसे बिताया, तुम अनुमान नहीं लगा सकती.”
“लगा सकती हूं.”
“जो हुआ, मुझे उसका अफ़सोस है.”
“अफ़सोस न करें. आपके व्यवहार से मुझे सुविधा हो गई. मुझे ख़ुद को संभालने का समय मिल गया.” मनीषी ने अब भी आंखें झुका रखी थीं और आंखों पर ये जो पलकें तनी हुई थीं, वे भापने न देती थीं, आंखों में क्या ठहरा हुआ है? कोई कसक, कोई चुभन, अफ़सोस, पीछे छूट गई कोई स्मृति… अभिज्ञान को अनायास मिक्स्ड डबल्सवाले का ख़याल आ गया. तो घटा है कुछ मनीषी के साथ भी? नहीं कर पाई होगी मां-बाप का विरोध, रहे हैं कुछ अनिश्‍चय? भूलने में लगा होगा व़क़्त… और अब संभल रही है… ठीक मेरी तरह…
अभिज्ञान ने मानो बेसुध में पूछा, “तो क्या तुमने भी कुछ फाउल किये हैं?”
“हां, खेल की तरह ज़िंदगी में भी फाउल होते हैं, पर सच यह भी है कि फाउल के बाद हम सम्भलते भी हैं.”
और यह पहली बार हुआ जब मनीषी ने आंखें उठाकर अभिज्ञान को भरपूर देखा.
अभिज्ञान के चेहरे पर ज़बर्दस्त बदलाव का दौर था. पहले बिजली गिरी, फिर अकबकाहट हुई, फिर सकारात्मक भाव उदित हुआ. यही कि घर में जबरन बस जानेवाली फाख़्ता से भी मोह हो जाता है, यह तो कमनीय कन्या है.

 

   सुषमा मुनीन्द्र

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