कहानी- गुनहगार (Short Stor...

कहानी- गुनहगार (Short Story- Gunahgaar)

मन के संशय को मिटाने की कोई सूरत खोज ही रहे थे कि आकाश ने खिड़की की ओर इशारा करते हुए धीरे-से पुकारा, “धरा, इधर देखो वह खिड़की बंद करना भूल गई है.” मैंने जल्दी से खिड़की के पास पहुंचकर अंदर नज़रें जमा दीं.
मगर उस जानलेवा दृश्य को देखने के बाद मेरी स्थिति ऐसी हो गई मानो शरीर का एक-एक बूंद ख़ून किसी ने निचोड़ लिया हो. अंदर शीशे के सामने खड़ी होकर चेहरे पर ढेर सारा पाउडर लगा मेघना ज़ोर-ज़ोर से हंस रही थी और बुदबुदाती जा रही थी, “मैं मम्मी से ज़्यादा गोरी… उनसे भी ज़्यादा सुंदर! अब मम्मी मुझे ज़रूर प्यार करेंगी.” मुझे ब्रह्माण्ड घूमता हुआ प्रतीत हो रहा था.

”मेघना की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है डॉक्टर. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि उसे क्या हो गया है?” शहर के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. निरुपमा के केबिन में मैं लगभग गिड़गिड़ा उठी.
“मेरी बेटी को अच्छा कर दो नीरू…” नीरू यानी कि निरुपमा, मेरी बचपन की सहेली, शहर की सफल सायकियाट्रिस्ट और मेरी हमदर्द.
मेरी ओर प्यार से देखते हुए निरुपमा ने कहा, “धैर्य रखो धरा, रोज़ इससे भी पेचीदा केस मेरे पास आते हैं. पहले तुम शांत हो जाओ. फिर विस्तार से सारी बात बताओ.” पानी का ग्लास मेरे हाथों में थमाते हुए उसकी आंखों में जो यक़ीन मैंने देखा, उससे ख़ुद को काफ़ी संभली हुई स्थिति में पाकर मैं थोड़ा सामान्य हुई.
“कुछ अजीब होती जा रही है हमारी मेघना. बात करो, तो काट खाने को दौड़ती है. कभी अपने पापा की ज़रूरी फ़ाइल फाड़ देती है, तो कभी मेरी क़ीमती साड़ियों पर जान-बूझकर इंक गिरा देती है. समझ में नहीं आता कि वह ऐसा क्यों करती है? मुझसे या आकाश से ऐसा व्यवहार करती है, जैसे हम लोग उसके दुश्मन हों.”
“हूं… क्या उम्र है अभी उसकी?” निरुपमा ने बीच में मुझे रोका.
“चौदह साल.” मैंने उत्तर दिया.
“मगर बहुत गंभीर और शांत रहती है. अपने हमउम्र साथियों के बीच वह ऐसी लगती है जैसे उनसे बहुत बड़ी हो. हम तरस गए हैं उसके बचपने को. न कभी कोई शरारत करती है, न कोई मांग, न प्यार जताती है, न नाराज़गी… बस हर व़क़्त ऐसी हरकतें करती है, जिससे मुझे और आकाश को परेशानी हो और इस परेशानी देने के प्रयोजन के पीछे ही मानो उसकी असली ख़ुशी हो. बहुत ख़ुश तो वो कभी होती ही नहीं. उसकी हर इच्छा ज़ाहिर करने से पहले ही आकाश उसकी हर ज़रूरत को पूरा करते रहते हैं, लेकिन उस पर तो जैसे कोई असर ही नहीं होता…” लगातार कहते हुए मैं हांफने लगी, तो नीरू ने फिर से मुझे पानी पीने का इशारा किया. पानी पीकर अब मैं थोड़ा शांत हो गई, क्योंकि मन का थोड़ा गुबार जो निकल गया था.
“इन सब बातों से परेशान होकर मैं अक्सर टूट जाती हूं. लेकिन हर बार आकाश मुझे ये भरोसा दिलाते रहते हैं कि जो बच्चे बचपन में अधिक परेशान करते हैं, वो बड़े होकर उतने ही समझदार बनते हैं. मगर कल रात की घटना ने तो उन्हें भी सकते में डाल दिया. हम लोगों ने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा, फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है नीरू? किस बात की सज़ा मिल रही है हमें.” और मैं बिलख पड़ी. काफ़ी देर तक मेरा रोना नहीं थमा, तो निरुपमा कुर्सी से उठकर मेरे क़रीब आकर बोली, “चुप हो जाओ धरा, हिम्मत हारने से तो समस्या सुलझने की बजाय और उलझती है. कल रात क्या हुआ था?” जवाब देते वक़्त बड़ी मुश्किल से मैंने अपनी रुलाई रोकी. भरी आंखों और बोझिल आवाज़ से मैंने बीती रात का वाकया सुना दिया.

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थोड़ी देर के लिए माहौल एकदम शांत-सा हो गया. तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद की शांति व्याप्त हो गई थी. निरुपमा के माथे पर बल पड़ गए, फिर भी संयत और दृढ़ स्वर में उसने शांति भंग की, “कल तीन बजे मेघना को लेकर मेरे पास आना. और हां, उसे इस बात की बिल्कुल भनक भी मत लगने देना कि तुम उसे मेरे पास क्यों ला रही हो?”
इसके बाद निरुपमा ने मुझे दो-तीन बातें और समझाईं. चलते वक़्त मुझे हिम्मत बंधाते हुए बोली, “विश्‍वास रखो, सब ठीक हो जाएगा.” केबिन से निकलकर मैं कार में आकर बैठ गई. कार घर की ओर चल पड़ी और मेरा मन पीछे भागने लगा.
कल रात आकाश से बातें कर रही थी कि ‘खट्’ की आवाज़ ने हम पति-पत्नी दोनों को चौंका दिया. “अरे, मेघना ने अपने कमरे का दरवाज़ा क्यों बंद कर लिया. बंद कमरे में तो वो कभी सोती नहीं.” कहते हुए आकाश मेघना के कमरे की ओर बढ़े. मैं भी घबरा-सी गई. ‘क्या करूं? खटखटाने पर जाने कैसे रिएक्ट करेगी मेघना?’ मन के संशय को मिटाने की कोई सूरत खोज ही रहे थे कि आकाश ने खिड़की की ओर इशारा करते हुए धीरे-से पुकारा, “धरा, इधर देखो वह खिड़की बंद करना भूल गई है.” मैंने जल्दी से खिड़की के पास पहुंचकर अंदर नज़रें जमा दीं.
मगर उस जानलेवा दृश्य को देखने के बाद मेरी स्थिति ऐसी हो गई मानो शरीर का एक-एक बूंद ख़ून किसी ने निचोड़ लिया हो. अंदर शीशे के सामने खड़ी होकर चेहरे पर ढेर सारा पाउडर लगा मेघना ज़ोर-ज़ोर से हंस रही थी और बुदबुदाती जा रही थी, “मैं मम्मी से ज़्यादा गोरी… उनसे भी ज़्यादा सुंदर! अब मम्मी मुझे ज़रूर प्यार करेंगी.” मुझे ब्रह्माण्ड घूमता हुआ प्रतीत हो रहा था. मुझे एक ओर करके आकाश ने अंदर झांका, तो वह भी कांप उठे. मेघना बिल्कुल पागलों की तरह व्यवहार कर रही थी. मैं गश खाकर गिरने ही वाली थी कि आकाश ने मुझे सहारा दिया और कमरे में ले आए.
उस पल की अभिव्यक्ति कर पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन है. अचानक यूं लगा जैसे वह दीवार बुरी तरह हिल गई है, जिसके सहारे मैं खड़ी थी. थोड़ी देर के बाद मैं संयत हुई तो देखा आकाश निरुपमा का नंबर डायल कर रहे थे.
“आकाश, निरुपमा तो…”
“हां, शायद अब हमारी बच्ची को उसी की ज़रूरत है धरा. मेघना अपना मानसिक संतुलन खो रही है. हमें उसका सही इलाज करवाना पड़ेगा.” भरे गले से आकाश ने कहा, तो मेरी आंखें भर आईं. बात यहां तक पहुंच जाएगी, मेघना की उन छोटी-छोटी हरकतों की यह परिणति होगी, मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. कार झटके से रुकी, तो मेरी तंद्रा भंग हुई. सामने बालकनी में खड़ी मेघना ने मुझे देखकर बुरा-सा मुंह बनाया और अंदर चली गई. आश्‍चर्य ये कि कल की घटना का ज़िक्र हममें से किसी ने भी उसके सामने नहीं किया था और वह भी हमारे सामने सामान्य बने रहने का प्रयत्न कर रही थी.
कार से उतरकर मैं अपने कमरे में आकर लेट गई. सिर बहुत भारी हो रहा था. आंखें बंद की तो अतीत दस्तक देने लगा. आज से पंद्रह साल पहले कितनी ख़ुशहाल ज़िंदगी थी हमारी. आकाश से विवाह हुआ, तो लगा जैसे एक-दूसरे के लिए बने थे हम. सालभर बाद ही मेघना के गोद में आ जाने से जैसे झूम उठी थी ज़िंदगी. हम दोनों मेघना को पाकर बहुत ख़ुश थे, लेकिन एक कमी थी, जो कभी-कभी खटकती थी. मेरी दूध-सी उजली रंगत को देख कभी-कभी आकाश उदास होकर कह उठते, “काश, मेघना ने तुम्हारा रंग-रूप पाया होता.”
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दरअसल मेघना जन्म से ही सांवले रंग की थी और नैन-नक्श भी काफ़ी दबे हुए साधारण से थे. पर ज्यों-ज्यों वह बड़ी होती जा रही थी, उसका रंग अपेक्षाकृत अधिक काला होता जा रहा था और बाहर निकलने पर वह हम दोनों में से किसी की बेटी नहीं लगती थी. अक्सर रिश्तेदारों और पड़ोसियों से यह बात सुनने को मिलती, “धरा, कहां तुम्हारा दूधिया रंग और आकाश की स्मार्टनेस, फिर बिटिया में ये किसके गुण आ गए?”
उस दिन पड़ोस में मिसेज शर्मा के यहां लंच पर हम तीनों आमंत्रित थे, वहां भी वही रंग-रूप की चर्चा! मैंने महसूस किया था कि नन्हीं मेघना अब समझने लगी है कि उसकी मम्मी से उसकी तुलना होती है और इस पर उसके मम्मी-पापा उदास हो जाते हैं. एक-दो बार उसने दबे स्वर में कहा भी, “मैं सुंदर नहीं हूं ना मम्मी.” तो मैंने ज़ोर से खींचकर गले लगा लिया था उसे और कहती चली गई, “तुम बहुत सुंदर हो मेरी बच्ची… बहुत सुंदर…”
और बस, उस दिन से मैं दिन-रात घुलने लगी थी. मेरी बेटी उम्रभर इस दंश को झेलते हुए कैसे जी पाएगी. उसके समूचे आत्मविश्‍वास को ये हीनभावना निगल नहीं जाएगी कि उसका रंग-रूप साधारण है. मैं और आकाश उसे अब इतना प्यार देने लगे कि वह बाहर-भीतर मिलनेवाली उपेक्षाओं को हमारे प्यार के सहारे सहन करना सीख ले, परंतु धीरे-धीरे इसका उल्टा होने लगा. बाहर वह सामान्य रहती थी और घर में एकदम विद्रोह पर उतर आती. कारण, मेरी समझ से बाहर था. हम लोग उसकी ग़लती पर भी उसे नहीं डांटते थे. फिर भी..?
“अरे धरा, अंधेरे में क्यों लेटी हो?” आकाश ऑफिस से आ चुके थे.
“क्या कहा निरुपमा ने?” आकाश ने तुरंत पूछा.
“कल मेघना के साथ मुझे बुलाया है.” संक्षिप्त उत्तर देकर मैंने आंखें पुनः बंद कर लीं.
मेरे माथे पर स्नेह से हाथ रखते हुए आकाश बोल पड़े, “धरा, हमने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, इसलिए हमारे साथ भी बुरा नहीं हो सकता. मुझे ईश्‍वर पर पूरा भरोसा है. विश्‍वास रखो, हमारी मेघना जल्द अच्छी हो जाएगी.”
अगले दिन प्लान के मुताबिक दो बजे से ही मैं ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए सिरदर्द का अभिनय करने लगी और मेघना के सामने बार-बार बोल रही थी, “मुझे डॉक्टर के पास जाना है. अकेली जाऊंगी तो गिर जाऊंगी. चक्कर भी आ रहे हैं. हाय, मैं मरी…”
थोड़ी देर मेरा रोना-पीटना देखकर मेघना चिढ़ उठी. पैर पटकते हुए मुझसे कहने लगी, “चलो, मैं चलती हूं.”
मैं मन-ही-मन ख़ुश होते हुए कार में आकर बैठ गई थी. यह मेरी पहली जीत थी.
थोड़ी देर बाद हम दोनों डॉ. निरुपमा के केबिन में थे. मेरा मुआयना करके नीरू अचानक मेघना की ओर मुखातिब हो गई,
“हाउ स्वीट, ये तुम्हारी बेटी है? काश, दो बेटों की बजाय ईश्‍वर ने मुझे भी ऐसी एक बेटी दी होती.” अविवाहित नीरू की इस बात पर मैंने मुश्किल से अपनी हंसी रोकते हुए कहा, “तो क्या हुआ, ये भी तुम्हारी बेटी जैसी है, क्यों मेघना?” मगर मेघना का चेहरा तना हुआ ही रहा. एकाध दवाइयां लिखकर मुझे पकड़ाते हुए नीरू ने फिर से कहा, “देखो ना, आज मेरा बाहर घूमने जाने का प्रोग्राम है, लेकिन अकेली बोर हो जाऊंगी… मेघना बेटे, तुम चलो ना मेरे साथ, लेकिन सिर्फ तुम, तुम्हारी मम्मी को साथ नहीं ले जाएंगे. मुझे बड़ों से ज़्यादा बच्चों का साथ फ्रेश कर देता है.”
“ऐसा करते हैं, मैं फटाफट तैयार होकर आती हूं.” कहती हुई निरुपमा उठकर खड़ी हो गई और मुझसे बोली, “मैंने जो दवाई दी है, उसे खाकर तुम घर जाकर आराम करो. मैं एक-दो घंटे बाद मेघना को ख़ुद घर पर छोड़ जाऊंगी.”
मेघना के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना निरुपमा झटके से तैयार होने चली गई.
क़रीब चार घंटे बाद मेघना निरुपमा के साथ लौटी. उसकी ख़ुशी और आंखों की चमक देखकर मुझे बहुत सुकून मिला. मुझे एक कोने में ले जाते हुए धीरे-से नीरू ने कहा, “अभी दो-तीन दिनों तक मैं मेघना को बाहर घुमाने ले जाऊंगी. उसके मन की परतें खुलने के लिए ये ज़रूरी है और इस बीच मैं तुमसे उपेक्षित व्यवहार करूंगी. हम लोग जो भी बातें करेंगे सिर्फ फोन पर, ठीक है?”

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अगले दिन फिर नीरू उसे लेने आ गई. आश्‍चर्य, नीरू के आने से पहले ही मेघना तैयार होकर इंतज़ार कर रही थी. अगले दो-तीन दिनों तक कभी पार्क, किसी दिन डिज़नीलैंड और कभी पिक्चर हॉल में नीरू मेघना को ले जाती रही. वह अपने तरी़के से उसका इलाज करती रही. एक सप्ताह बाद नीरू ने मुझे फ़ोन किया, “धरा, मेघना स्कूल चली गई है क्या?” मेरे ‘हां’ कहने पर वह बोली, “मैं तुमसे मिलने आ रही हूं.” थोड़ी देर बाद उसने घर में प्रवेश किया. मेरे चेहरे पर प्रसन्नता देखकर उसने कहा, “कैसी है मेघना?”
“नीरू, वह ठीक है. इन चार-पांच दिनों में उसने इतनी बातें की हैं. जितनी पहले कभी नहीं की थीं. उसका व्यवहार भी सामान्य है, मैं समझ नहीं पा रही हूं कैसे! पर हां, मुझसे अब भी खिंची-खिंची-सी रहती है.”
मेरी बात पर उसने कहा, “हां तुमसे खिंची-खिंची रहने का कारण उसकी नाराज़गी है. दरअसल धरा, ये पूरी तरह मनोवैज्ञानिक समस्या है. उसका इलाज मैं कर चुकी हूं. अब तुम्हारा इलाज बाकी है.”
मैं कुछ समझ नहीं पाई. तभी उसने कहना शुरू किया, “बचपन से तुम्हारे साथ उसकी तुलना सुनते-सुनते वह तुमसे चिढ़ गई थी. तुम्हें अपना प्रतिद्वंद्वी मान बैठी, लेकिन जैसे-जैसे बड़ी होती गई, उसका दृष्टिकोण बदलने लगा. वह अपने रंग-रूप को लेकर सहज होने लगी थी, लेकिन तुम्हारे और आकाश के व्यवहार ने उसे असहज बना दिया.”
“क्या? हमारे व्यवहार ने?” मेरे आश्‍चर्य पर वह बोली, “हां, तुम लोगों ने उसकी कमी को ढंकने के लिए उसे इस तरह प्यार करना शुरू कर दिया, जो अस्वाभाविक होने के साथ अटपटा भी है. जानती हो, मेघना की आंखों में बार-बार आंसू आ जाते हैं ये कहते हुए कि उसके मम्मी-पापा उससे प्यार नहीं करते. मैंने जब उसे कहा कि तुम्हें ऐसा क्यों लगता है. मैंने देखा है, वो तो तुम्हारी हर बात मानते हैं, तुम्हारी ग़लतियों पर भी तुम्हें नहीं डांटते. ये उनका प्यार नहीं तो और क्या है?”
“नहीं आंटी, ये प्यार नहीं है, वो तो मेरे साथ परायों जैसा व्यवहार करते हैं. मैं कुछ भी करूं सब माफ़!” वो आक्रोश से भर उठती है.
“मैं पापा की ज़रूरी फाइलें बरबाद कर देती हूं. मम्मी की क़ीमती चीज़ें नष्ट कर देती हूं. पापा ने कितने प्यार से मम्मी को सिल्क की साड़ी गिफ्ट की थी. मैंने उसे कैंची से काट दिया, इस उम्मीद से कि अब तो वे ज़रूर डांटेंगे, लेकिन नहीं. पापा ने कहा, ‘कोई बात नहीं, दूसरी ला देंगे.’
और आप ही बताइए आंटी, क्या मम्मी-पापा ऐसे करते हैं? आशीष व अर्पिता ज़रा-सी ग़लती करते हैं, तो आंटी उन्हें थप्पड़ लगा देती हैं. फिर थोड़ी देर बाद गले से लगाकर प्यार भी करने लगती हैं. मुझे ये सब बहुत अच्छा लगता है. मुझे थप्पड़ मारना तो दूर कभी ज़ोर से भी कुछ नहीं कहती हैं मम्मी. क्या हुआ जो मैं सुंदर नहीं हूं, क्या ये ज़रूरी है कि दुनिया में सब सुंदर ही हों. मम्मी तो मुझ पर ऐसे दया दिखाती हैं, जैसे मुझे कोई भयानक बीमारी हो. इन सबसे मैं तंग आ गई हूं आंटी. मैं मम्मी का प्यार चाहती हूं. बस और कुछ नहीं.”
“बस करो नीरू, मैं समझ गई हूं मेरी बेटी को मानसिक यातना बाहरवालों से नहीं मिली है, बल्कि घर में ही…”
“हां धरा, ये सच है, बच्चों को बाहरवालों से उतनी समस्या नहीं होती, जितना कि वह अपने माता-पिता के व्यवहार से आहत होते हैं. उसे हीनभावना से उबारने के लिए तुमने जो रास्ता चुना, उसने उसे और भी गहरे कुंए में धकेल दिया. सच पूछो तो वह बहुत मज़बूत लड़की है. अपने रंग-रूप को लेकर वह उतनी दुखी नहीं है जितनी तुम हो. उसके असामान्य व्यवहार की वजह तुम दोनों हो. अपनी बेटी से पराए जैसा व्यवहार करके तुम लोग उसके गुनहगार बन गए हो. अब हो सके तो उसे दुनिया की नहीं, बल्कि अपनी नज़रों से देखो और उसे प्यार करो सिर्फ प्यार.
उसे सहानुभूति की नहीं, अपनेपन और प्यार की ज़रूरत है धरा! जानती हो, उसने मुझसे कहा, मम्मी से अच्छी तो आप हैं. आपने इतने दिनों में मुझे प्यार भी किया और डांटा भी. मुझे सिखाया और समझाया भी. मम्मी की तरह मेरी झूठी तारी़फें नहीं की.”
“तभी उस दिन आईने के सामने बुदबुदाती हुई मेघना कह रही थी कि अब मम्मी मुझे ज़रूर प्यार करेंगी.” सारे अंधेरे छंट चुके थे.
मैंने दृढ़ स्वर में कहा, “नीरू, तुमने मेरी बेटी मुझे लौटा दी, अब मैं उसे किसी क़ीमत पर खोने नहीं दूंगी. मैं सब समझ गई हूं.”
“मैं भी धरा.” तभी आकाश पीछे से आकर मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, जो न जाने कब से खड़े होकर हमारी बातें सुन रहे थे.

– वर्षा सोनी

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