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हिंदी कहानी- जीवन संध्या (Hindi Short Story- Jeevan Sandhya)

Hindi Short Story

“आप लोग आज की पीढ़ी के हैं. आपकी सभ्यता में प्रेम विवाह भी ख़ूूब हो रहे हैं. मेरे बेटे सुहास के कुछ दोस्त यहां आते हैं- अपने लिव इन पार्टनर्स के साथ. उनको तो कोई कुछ नहीं कहता, क्योंकि वे आपकी पीढ़ी हैं ना! लेकिन यहां सुधाजी और मैं जीवन संध्या के कगार पर खड़े हैं और आप लोगों के पास हमारे लिए आज कोई समय नहीं है. हमने अगर दोस्ती कर ली, तो आप क्यों परेशान हैं?”05

पार्क के एक कोने में बेंच पर विशालजी चुपचाप बैठे थे. चारों तरफ़ फूल खिले हुए थे, बच्चे खेलने में मग्न थे. शाम के साये लंबे होने लगे थे. एक ठंडी सांस खींचकर उन्होंने उठने की कोशिश की, पर फिर बैठ गए. विचारों के भंवर में एक बार फिर गोते लगाने लगे.

यह रिटायरमेंट उन पर भारी पड़ रहा था. पहले सुबह तैयार होकर ऑफिस चले जाते थे. सारा दिन कैसे कट जाता था, पता ही नहीं चलता था. टेलिफोन, मीटिंग, फाइलें, पार्टियां, क्लब- क्या नहीं था उनकी ज़िंदगी में. ठाठ ही ठाठ थे. समय कैसे भाग रहा था कुछ पता ही नहीं चलता था, लेकिन एक दिन अचानक जब पत्नी राधिका को दिल का दौरा पड़ा, तब यूं लगा मानो ज़िंदगी रुक-सी गई है. राधिका के जाने के बाद जीवन में खालीपन-सा आ गया. घर में बेटा सुहास व बहू लक्ष्मी, पोता रोहन और पोती रोहिणी सभी उनका बहुत ख़्याल रखते थे, परंतु रिटायरमेंट के बाद समय काटे नहीं कट रहा था.

बच्चे अपने स्कूल और सुहास व लक्ष्मी अपने-अपने ऑफिस चले जाते थे. उनके लिए तो बस ‘हाय पापा-बाय पापा’ से आगे बातों के लिए समय ही कहां था?

हां! उन्हें याद आया कि कॉलेज के दिनों में उनके प्रोफेसर रामदयाल अक्सर कहा करते थे, “बेटे, पढ़ाई तो ठीक है, बढ़िया नौकरी भी लग जाएगी, पर कुछ और भी सीखो, जैसे- संगीत, नाटक, पेंटिंग आदि, ताकि अपने खाली समय को भर सको.” ‘खाली समय’ विशालजी हंसते थे. खाली समय था किसके पास? वे तो चाहते थे कि दिन में कुछ और घंटे होते, तो एक आध काम और कर डालते.

फिर राधिका भी शायद ऐसा ही कुछ कहती थी, “आप परिवार में भी कुछ रुचि लिया करें. बच्चों के साथ रिश्ते बढ़ाएं. उनके साथ उठे-बैठें.” पर विशालजी को ये सब बातें खोखली लगती थीं. पर आज…

अब तक पेड़ों में पक्षियों की चहचहाहट बढ़ने लगी थी, शायद सभी रात के लिए ठिकाना ढूंढ़ रहे थे. उनके भी ख़्यालों की लड़ियां टूट गईं और वे भारी क़दमों से घर की ओर चल पड़े.

रोहन और रोहिणी पढ़ रहे थे. बीच-बीच में रोहिणी रोहन से कुछ पूछ भी लेती थी. रोहन कभी-कभी खीझ भी उठता था. विशालजी रोहिणी के पास गए और बोले, “मैं तुम्हारे होमवर्क में सहायता कर देता हूं.” वह हैरानी से उन्हें देखने लगी और फिर बोली, “नहीं दादाजी, मैं कर लूंगी या फिर भैया से पूछ लूंगी.”

विशालजी ने कहा, “मैं कराता हूं ना…”

वह फिर बोली, “नहीं, मां डांटेंगी. वे कहती हैं कि आपको हम तंग न

करें और आपके घर आने के बाद हमें बिल्कुल चुपचाप रहना चाहिए,

नहीं तो आप नाराज़ हो जाएंगे.”

विशालजी सकपका गए और वापस सोफे पर आकर बैठ गए. वे सुबह का बासी अख़बार देखने लगे. मन नहीं लगा, तो उन्होंने टीवी चलाया, लेकिन कोई भी प्रोग्राम पसंद नहीं आया और उन्होंने टीवी बंद कर दी. बच्चे होमवर्क कर अपने कमरे में जाकर टीवी देख रहे थे. उनके हंसी-मज़ाक में वे भी शामिल होना चाहते थे, पर ऐसा हो न सका.

नौकर ने आकर खाना लगाने के लिए पूछा, तो उन्होंने पूछा, “बच्चे भी खाएंगे?” नौकर ने बताया कि वे तो खा चुके हैं. उन्होंने सुहास और लक्ष्मी के बारे में पूछा, तो पता चला कि वे दोनों बाहर से खाकर आएंगे. उन्होंने खाना लगाने के लिए कह तो दिया, पर चाहकर भी वे खा न सके और दो ही कौर खाकर उठ गए. उन्हें राधिका की बहुत कमी महसूस हो रही थी. वे अपने कमरे में चले गए और कपड़े बदलकर लेट गए. लेटने पर भी नींद आंखों से कोसों दूर थी, बिस्तर पर करवटें बदलते रहे और फिर जाने कब उन्हें नींद आ गई.

सुबह जागने पर भी उठने का मन नहीं किया. उनके सामने सारा दिन पहाड़-सा खड़ा था. नौकर चाय रख गया. नहाकर निकले, तो बच्चे स्कूल जा चुके थे. सुहास और लक्ष्मी अभी नाश्ते के लिए आए नहीं थे. वे जाकर टेबल पर बैठ गए. पहले सुहास आया, बोला, “हाय पापा कैसे हैं?” जवाब के लिए रुके बिना अख़बार देखते हुए दूसरे हाथ में चाय का कप उठा लिया और चाय पीते हुए बोला, “आज बहुत काम है और कुछ ज़्यादा ही बिज़ी रहूंगा.” चाय ख़त्म करके बोला, “अच्छा मैं चलूं, बाय पापा…” सुहास के जाने के कुछ देर बाद लक्ष्मी आई. पांव छूते हुए बोली, “कैसे हैं पापा?” साथ ही नौकर को आवाज़ देते हुए बोली, “रामू, बड़े साहब से पूछकर खाना बना लेना. शाम को बच्चों की पसंद का भी कुछ ज़रूर बनाना. मुझे शायद लौटने में देर हो जाएगी. अच्छा पापा, मैं चलूं.” और वह भी चली गई.

अकेले रह गए विशालजी. सोचने लगे कि अब क्या करें? किसी से मिलने या फोन करने का मन भी नहीं कर रहा था. थक-हारकर पार्क की ओर ही निकल गए. पार्क में अधिकांश बूढ़े लोग ही थे, जिन्हें उनकी तरह ही कुछ करने को न था. वे आपस में बैठे बतिया रहे थे या टहलते हुए घूम रहे थे. एक बेंच पर एक भद्र महिला अधलेटी-सी बैठी थीं. विशालजी को लगा उनकी तबीयत शायद ठीक नहीं है. वे उनके पास चले गए. उनके पुकारने पर महिला ने आंखें खोलीं. उनकी आंखें लाल थीं. विशालजी को लगा कि उन्हें तेज़ बुख़ार है. पूछने पर ज़रा-सा सिर हिलाकर उन्होंने हामी भरी. विशालजी ने उनका हाथ छूकर देखा, तो तेज़ बुख़ार लगा.

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पूछने पर पता लगा कि इस समय उनके घर पर कोई नहीं है, लेकिन बुख़ार के कारण उनका मन घबरा रहा था, इसलिए वे पार्क में आ गई थीं. किसी तरह सहारा देकर विशालजी उन्हें घर ले गए.

उनका नाम सुधा था. घर का ताला खोलकर वे अंदर गए. विशालजी ने सुधाजी को सोफे पर लेटा दिया. उन्होंने पूछा, “घर में कोई बुख़ार की दवा है?” सुधाजी ने कहा, “रसोई की आलमारी में है.” वे रसोई में गए. आलमारी से दवा निकाली. पानी का ग्लास भर रहे थे, तो सोचा कि चाय बना ली जाए, तो ज़्यादा अच्छा रहेगा.

चाय के लिए नापकर दो कप पानी पतीले में डाला, पर गैस उन्होंने आज तक नहीं जलाई थी. उन्हें याद आया कि राधिका अक्सर कहा करती थी कि कम से कम गुज़ारे लायक चाय, खिचड़ी इत्यादि ही बनाना सीख लो. कौन जाने कब काम आएगी, पर तब वे हंस देते थे.

हारकर पानी और दवा लेकर वे बैठक में आ गए. उन्होंने सहारा देकर सुधाजी को उठाया और दवा देते हुए बोले, “सॉरी, चाय नहीं बना पाया, कभी बनाई ही नहीं है. राधिका कहा करती थी… पर ख़ैर! छोड़ो. दवा खा लो.”

सुधाजी ने पानी के साथ दवा ले ली. थोड़ी देर बाद उन्हें जब कुछ राहत महसूस हुई, तो उन्हें ख़्याल आया कि मेहमान को चाय तो पिलानी चाहिए. विशालजी के लाख मना करने पर भी वे चाय बनाने के लिए उठ ही गईं. थोड़ी देर में वे दो कप चाय और कुछ मठरियां लेकर आ गईं. विशालजी को शर्मिंदगी महसूस तो हुई, पर उन्होंने चाय और मठरी ले ली.

चाय पीकर सुधाजी की तबीयत कुछ और संभली, तो दोनों बातें करने लगे. विशालजी ने उन्हें अपने परिवार के बारे में बताया. फिर सुधाजी ने बताया कि वह अपनी बेटी-दामाद और दो नातिनों के साथ रह रही हैं. उनके पति का बरसों पहले देहांत हो गया था. बेटी-दामाद काम पर जाते हैं और नातिन कॉलेज. सब अपनी ज़िंदगी में मस्त हैं. किसे ़फुर्सत है उनके लिए? वह घर चलाती हैं, गृहिणी की तरह या फिर नौकर की तरह, वे नहीं जानतीं? सब उन पर निभर्र्र रहते हैं. पहले तो उनको अच्छा लगता था, पर अब वे थक गई हैं. सब अधिकार से बोलते हैं. प्यार या इ़ज़्ज़त जैसी कोई भावना अब कहीं नज़र नहीं आती है. किसी के पास छुट्टी के दिन भी उनके लिए कोई समय नहीं होता है.

लेकिन अचानक सुधाजी को लगा कि एक अजनबी के साथ इस तरह बातें करना उचित नहीं है, वे रुक गईं और माफ़ी मांगने लगीं. इस पर विशालजी बोले, “सुधाजी, माफ़ी न मांगें. शायद मेरे भी दिल में कुछ ऐसे ही फफोले हैं. हम दोनों के हालात एक जैसे ही हैं, फिर शरमाना कैसा? चलो बात करके आपका मन कुछ तो हल्का हुआ.”

सुधाजी ने उन्हें खाने के लिए रोकना चाहा, पर वे रुके नहीं और लौट आए.

दूसरे दिन पार्क में विशाल बैठे थे, तो दूर से देखा कि सुधाजी आ रही थीं. वे सीधी उनके पास ही चली आईं और पिछले दिन के लिए धन्यवाद देने लगीं. फिर वे दोनों बैठकर बातें करने लगे.

फिर तो यह सिलसिला सुबह-शाम चलने लगा और धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे का इंतज़ार भी करने लगे. कभी-कभी पास के रेस्टॉरेंट में वे दोनों चाय भी पीने चले जाते थे. एक दिन सुधाजी ने उन्हें अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया. वे मान गए. सुधाजी ने उनकी पसंद के आलू के परांठे बनाए थे. खाते हुए उन्हें पत्नी राधिका की याद आ गई.

कुछ दिन विशालजी पार्क नहीं गए, क्योंकि उन्हें कुछ हरारत-सी महसूस हो रही थी. तब दो-तीन दिन बाद सुधाजी उनका हाल पूछने उनके घर चली आईं. विशालजी ने नौकर से कहकर चाय बनवाई और बाद में सुधाजी को खाने के लिए भी रोक लिया.

समय इसी तरह बीत रहा था. एक शाम जब वे पार्क में घूम रहे थे, तभी रोहन दादाजी को ढूंढ़ता हुआ वहां आया और बोला, “दादाजी, रोहिणी की नाक से ख़ून बह रहा है. जल्दी घर चलो.”

वे बदहवास-से घर की ओर चले, तो सुधाजी भी उनके साथ हो लीं. सुधाजी ने रोहिणी की नाक धुलाई, उसका सिर गीला किया और सिर पीछे करके उसे कुर्सी पर बैठा दिया. थोड़ी देर में ख़ून बहना बंद हो गया, तो विशालजी ने चैन की सांस ली. बच्चों ने सुधाजी के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, “ये सुधा आंटी हैं. मेरी मित्र हैं. यहीं पास में रहती हैं.” चाय पीकर और कुछ देर बच्चों से खेलकर सुधाजी चली गईं.

जब कुछ दिनों बाद बच्चे सुधाजी से दुबारा मिले, तो विशालजी ने बच्चों से कहा, “बेटा, आंटीजी को नमस्ते करो.” तो रोहन ने तो नमस्ते कर दिया, पर रोहिणी ने कहा, “नमस्ते दादी.”

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विशालजी को लगा कि सुधाजी को शायद बुरा लगा है, इसलिए उन्होंने रोहिणी से ऐसा कहने का कारण पूछा तो वह बोली, “मां ने कहा था कि ये सुधा आंटी नहीं, सुधा दादी हैं.” सुधाजी चुपचाप वहां से चली गईं.

शाम को लक्ष्मी के घर लौटने पर विशालजी ने उसे सारी बात बताई और इसका कारण पूछा. उसने यह भी बताया कि सुधाजी को बुरा लगा था, पर लक्ष्मी ने कुछ नहीं कहा. रात को विशालजी ने सुहास को बताया, तो वह भी चुपचाप ही रहा.

अगले दिन सुधाजी पार्क में नहीं आईं. उसके अगले दिन भी जब वे नहीं आईं, तो विशालजी उनके घर गए. वे उन्हें देखकर परेशान-सी हो गईं. बहुत पूछने पर वे रो ही पड़ीं और बोलीं, “मेरी नातिनें भी आपके बारे में ‘नानी का बूढ़ा बॉयफ्रेंड’ कहकर मज़ाक करती हैं. मुझे बुरा लगता है और मैं उन्हें डांट देती हूं. पर रोहिणी की बातों…”

विशालजी को भी ये बातें चुभ रही थीं. उन्होंने सुधाजी को विश्‍वास दिलाया कि वे इस समस्या का कुछ न कुछ समाधान निकालेंगे. उन्होंने कुछ दिन का समय मांगा. दो-तीन दिन सोचने के बाद वह सुधाजी के घर गए. उन्होंने सुधाजी को आनेवाले शनिवार को परिवारसहित शाम को पांच बजे चाय के लिए आमंत्रित किया. सुधाजी तो बिल्कुल मान नहीं रही थीं, पर फिर यह समझाने पर कि ‘वे दोनों कब तक घरवालों के ताने सुनते रहेंगे,’ वे मान गईं.

लक्ष्मी और सुहास को भी विशालजी ने शनिवार शाम को घर पर ही रहने को कहा और बताया कि कुछ ख़ास मेहमान चाय पर आ रहे हैं.

शनिवार की शाम को दरवाज़े की घंटी बजी और सुधाजी का परिवार अंदर आया, तो लक्ष्मी की व्यंग्यपूर्ण मुस्कान विशालजी से छिपी न रह सकी. परिवार के लोगों का आपस में परिचय करवाकर जब बैठाया गया, तब वातावरण बहुत बोझिल-सा था. ख़ैर, चाय-नाश्ता आ जाने पर माहौल कुछ हल्का-फुल्का नज़र आने लगा.

चाय समाप्त होने पर विशालजी ने रोहिणी वाला क़िस्सा सुनाया. फिर से कमरे में चुप्पी छा गई. उसके बाद सुधाजी ने अपनी नातिनों का कहा दोहराया, तो उनके परिवार में बहुत अकुलाहट-सी दिखने लगी. वातावरण फिर से बोझिल हो गया.

तब विशालजी ने कहा, “आप लोग आज की पीढ़ी के हैं. आपकी सभ्यता में प्रेम विवाह भी ख़ूूब हो रहे हैं. मेरे बेटे सुहास के कुछ दोस्त यहां आते हैं- अपने लिव इन पार्टनर्स के साथ. उनको तो कोई कुछ नहीं कहता, क्योंकि वे आपकी पीढ़ी हैं ना! लेकिन यहां सुधाजी और मैं जीवन संध्या के कगार पर खड़े हैं और आप लोगों के पास हमारे लिए आज कोई समय नहीं है. हमने अगर दोस्ती कर ली, तो आप क्यों परेशान हैं? हम दो-चार बातें करके आपस में हंस-बोल लेते हैं, तो आपको ऐतराज़ होता है. आप हमारे रिश्ते को शायद अश्‍लील समझते हैं और आप हमसे इस रिश्ते का नाम जानना चाहते हैं, तो आज मैं आप सभी को बताता हूं कि हम दोस्त हैं. लेकिन आपकी नज़र में हम गुनाह कर रहे हैं, क्योंकि मैं एक पुरुष हूं और सुधाजी एक स्त्री हैं. मैं जानता हूं कि आपके मित्रों और सहयोगियों में स्त्री और पुरुष दोनों ही हैं. आप उनके साथ हंसते और बोलते भी हैं, तो मैं आपसे पूछता हूं कि आपका रिश्ता उनसे क्या केवल दोस्ताना ही है या उससे कुछ ज़्यादा?”

कमरे में फिर एक अजीब-सा तनाव छा गया. सभी के सिर झुके हुए थे. अपने चारों ओर निगाहें घुमाकर देखने के बाद विशालजी ने फिर कहना शुरू किया, “सच तो यह है कि हम इस घुटी-बंधी ज़िंदगी से तंग आ गए हैं. आपको ऐतराज़ हमारी दोस्ती से है, तो आज और अभी मैं इस घर को, जिसे मैंने बनाया था, छोड़कर जाने के लिए तैयार हूं. सुधाजी अगर चाहेंगी, तो वे भी मेरे साथ आ सकती हैं, क्योंकि हम भी जीना चाहते हैं. हमें भी जीने का हक़ है.”

कुछ रुककर वे आगे बोले, “मैं आप पर फैसला छोड़ रहा हूं, पर यह फैसला मैं आज और अभी सुनना चाहता हूं.”

कमरे की चुप्पी को तोड़ती हुई कई आवाज़ें एक साथ आईं “पापा…” “मां…” “नानी…” फिर कमरा गूंज उठा, “हमें माफ़ कर दीजिए. हमने आप दोनों को बहुत दुख दिया है, पर आप हमें छोड़कर जाने की बात न करें.”

– राजेश्‍वरी सिंह

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