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कहानी- ख़ुशियां और पैसे (Short Story- Khushiyan Aur Paise)

कपड़े उड़ते देखकर दीपा के चेहरे पर उपहास उड़ानेवाली मुस्कुराहट आ गई. उसने पानी का एक घूंट पीते ही बुरा सा मुंह बनाया, "हाय! मुझे तो याद ही नहीं रहा कि तेरे घर में फ्रिज नहीं है, रहने दे! मुझसे नहीं पीया जाएगा ये पानी, अब आदत नहीं रही ना."… दीपा की चुभती बातें सुनकर रेवा का सब्र धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा था.

रेवा की चचेरी बहन दीपा उसके एक कमरे के घर के बाहर खड़ी आवाज़ लगा रही थी, "किस कोने में घुसी है?इतना बड़ा तो तेरा घर भी नहीं है कि कहीं खो जाए, कब से आवाज़ लगा रही हूं."
रेवा अचानक अपने घर में उसे देखकर थोड़ी हैरान हो गई, "अरे दीदी, आप और यहां? सब ठीक तो है न?"
दीपा का उसके घर आना कोई मामूली बात तो थी नहीं, दोनों के रहन-सहन में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ जो था.
"हां, हां, सब ठीक है… मैं तो इस तरफ़ आई थी, तो सोचा कि तुझसे मिलती चलूं. तू तो कभी हमारे गरीब खाने में पैर रखती नहीं."
रेवा के साधारण से घर का मुआयना करती दीपा व्यंग्य से टेढ़ी मुस्कान के साथ बोली.
रेवा अपनी बहन की इस मुस्कान और उसकी चारों तरफ़ घूमती नज़रों का मतलब अच्छी तरह समझ रही थी.
दीपा खाते-पीते घर की इकलौती बहू थी. जहां पैसा पानी की तरह बहाया जाता था.
रेवा और दीपा दोनों का मायका निम्न मध्यमवर्गीय था, जहां पैसों की बहुत रेल-पेल तो नहीं, पर दो जून की रोटी का जुगाड़ आराम से होता था.
दीपा के साथ उसके पति का ये दूसरा ब्याह था. उनकी पहली पत्नी कैंसर की मरीज़ होकर शादी के तीन साल के अंदर ही भगवान को प्यारी हो गई थी. उसी दिन से उन्हें धन-संपत्ति से कुछ विरक्ति सी हो गई थी कि जो पैसा उनकी जान से प्यारी पत्नी को उनसे छिनने से न बचा सका, उसका होना न होना क्या मायने रखता है.
दीपा के सपने बचपन से ही बड़े थे, जो युवावस्था तक आते-आते ज़िद में बदल गए थे… उसे पता था कि उसके माता-पिता को उसके लिए बड़ा घर नहीं मिल सकता है, इसलिए जब दूर के किसी रिश्तेदार ने दीपा के लिए ये रिश्ता सुझाया, तो दीपा ने तुरंत अपने माता-पिता से इस रिश्ते के लिए हां कह दिया था.


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दूसरी ओर, रेवा के घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी… उसने भाई के साथ काम करनेवाले आयुष्मान के साथ प्रेम विवाह किया था, जिसमें उसके माता-पिता की रज़ामंदी भी शामिल थी.
वो जानते थे कि लड़का अच्छा और मेहनती है. छोटी सी नौकरी और ज़्यादा तनख़्वाह न होने के बावजूद रेवा के माता-पिता ने इस विवाह के लिए सहर्ष सहमति दे दी थी, क्योंकि उनका स्वयं का आर्थिक स्तर कोई बहुत ऊंचा नहीं था और वो समझते थे कि उनकी बेटी अपने भावी जीवन में भली प्रकार से सामंजस्य कर लेगी.
परिवार के नाम पर आयुष्मान और उसकी बड़ी बहन थे. बहन विवाहित थी और अपनी गृहस्थी में व्यस्त थी. जब तक आयुष्मान अकेला था, तब तक तो हफ़्ते-दस दिन में मायके आती थी, लेकिन उसके रेवा से ब्याह के बाद वो भी निश्चिंत हो गई कि अब भाई का घर भी बस गया. गाहे बगाहे आती भी तो बड़ी ननद का प्यार बरसाने के लिए ना कि नुक्ताचीनी करने के लिए. हालात ने दोनों भाई-बहनों को इतना परिपक्व तो कर ही दिया था कि उन्हें रिश्तों की कद्र थी. उनके जैसी रेवा जब उनके छोटे से परिवार में जुड़ गई, तो प्यार और अपनापन खुलकर बरसने लगा था.
घर बेशक छोटा सा था… एक कमरे के साथ रसोई… जहां एक समय में केवल एक व्यक्ति ही खड़ा हो सकता था, लेकिन फिर भी रेवा का चेहरा शादी के बाद चमक उठा था.
"पानी तो पिला रेवू बड़ी गरमी है." अपने आपको साड़ी के पल्ले से हवा करती दीपा बोली.
इस पर रेवा ने छत का पंखा तेज कर दिया… पंखे की तेज हवा से कपड़े के वो टुकड़े उड़ने लगे, जिनसे रेवा पायदान सिल रही थी.
पास की ही एक फैक्ट्री में रेवा पुराने कपड़ों से पायदान बना कर बेचती थी. कपड़े फैक्ट्री वाले मुहैया कराते थे और घर बैठे रेवा को कुछ आमदनी हो जाती थी.
कपड़े उड़ते देखकर दीपा के चेहरे पर उपहास उड़ानेवाली मुस्कुराहट आ गई. उसने पानी का एक घूंट पीते ही बुरा सा मुंह बनाया, "हाय! मुझे तो याद ही नहीं रहा कि तेरे घर में फ्रिज नहीं है, रहने दे! मुझसे नहीं पीया जाएगा ये पानी, अब आदत नहीं रही ना."… दीपा की चुभती बातें सुनकर रेवा का सब्र धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा था. मन किया कि कह दे, "बाइस साल तक घड़े का पानी पीने की आदत, तो एक दिन में ही छूट गई थी आपकी… अब तो फिर भी पांच साल हो चुके हैं… पर बहन का लिहाज़ कर चुप रही.
उसने औपचारिकतावश चाय के लिए पूछा, लेकिन जैसे कि उसे उम्मीद थी, दीपा ने मना कर दिया, "रहने दे. इतनी गर्मी में कौन चाय पीएगा… यहां एसी तो है नहीं… कैसे रहती है तू यहां?"

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इस बार रेवा का सब्र जवाब दे गया और उसके मुंह से निकल ही गया, "वैसे ही जैसे पहले आप भी रहती थीं "
"तब की बात और थी रेवा… अब तो मैं एक मिनट भी नहीं रह सकती एसी के बिना."
"फिर तो आपने यहां आकर ग़लती कर दी दीदी, क्योंकि एसी तो छोड़िए मेरे घर में तो कूलर भी नहीं है."
"अरे, तू तो नाराज़ हो गई. रेवू मैं तो तुझसे मिलने आई हूं… तू कहे तो चली जाती हूं."
अपनी बड़ी बहन की बात सुनकर, रेवा चुप लगा गई, पर अब वो मन ही मन सोच रही थी कि दीपा जल्दी यहां से चली जाए, वरना कहीं आयुष्मान के सामने कुछ कहेगी तो वो बर्दाश्त नहीं कर पाएगी, वैसे भी उसकी ट्यूशन क्लास का टाइम होनेवाला था.
आयुष्मान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलनेवाली रेवा अपने खाली समय का भरपूर सदुपयोग करती थी. सिलाई के काम के अलावा मोहल्ले के कुछ बच्चे उससे ट्यूशन भी पढ़ते थे, जिनसे उसकी अच्छी आमदनी हो जाती थी.
दीपा वहां आधे घंटे तक बैठी रही और साथ ही किसी न किसी तरह रेवा को नीचा दिखाने की कोशिश करती रही.
अब तक दीपा की बातों से तंग आ चुकी रेवा ने उकता कर पूछा, "दीदी! आपके ड्राइवर को तो कुछ पानी-वानी पिला दो, बेचारा गर्मी में आपका इंतज़ार कर रहा है."
यह सुनते ही रेवा के पड़ोसी का लड़का जो उसी समय  चायपत्ती मांगने आया था, बोल पड़ा, "आंटी तो ऑटो में आई है." सुनकर रेवा ने आश्चर्य से बहन की तरफ़ देखा.
दीपा के चेहरे का फीका पड़ चुका रंग कई बातों की चुगली कर गया, लेकिन वो ख़ुद को संभाल कर बोली, "नहीं.. ड्राइवर को मैंने यह कहकर भेज दिया था कि पता नहीं मुझे कितना समय लगेगा."
"लेकिन आंटी! मैंने तो आपको ऑटो से उतरते देखा था." लड़के ने फिर कहा.
अपनी बहन की शर्मिंदगी को भांपते हुए, रेवा ने लड़के को डांटा और अपना मुंह बंद रखने के लिए कहा, लेकिन वो समझ चुकी थी कि उसने अब तक जो कुछ भी सुना था, वो सब सच था कि उसकी बहन के ससुराल में पैसा बहुत है, पर उसका कोई सम्मान नहीं है… वरना दीपा को झूठ बोलने की क्या आवश्यकता थी?
यह ज़रूरी तो नहीं है कि जिनके पास कारें हैं, वे ऑटो में सफ़र नहीं कर सकते. लेकिन वास्तव में ईर्ष्या की मारी दीपा, अपने मन की जलन को कम करने के लिए और रेवा को नीचा दिखाने के लिए आई थी. क्योंकि उसके अमीर ससुराल की सच्चाई तो उसके सामने शादी के चंद दिनों के बाद ही आ गई थी. अब तो उसे उन सुख-सुविधाओं का भी लालच नहीं रह गया था, जिनका नाम लेकर वो रेवा का मज़ाक बनाने का प्रयास कर रही थी… वैसे भी उसे कहीं भी आने-जाने के लिए गाड़ी लेकर जाने की इजाज़त नहीं थी, क्योंकि अपने पति की नज़रों में वो ऐसी औरत थी, जो सिर्फ़ पैसे की लालसा में उससे शादी करने को राज़ी हो गई थी. दीपा इसे नकार भी नहीं सकती थी, क्योंकि सच भी तो यही था.
वो केवल अपने सास-ससुर की सेवा करने के लिए लाई गई बाई थी… पति के प्यार के लिए तो वो आज भी तरस रही थी.
दीपा को यह भी पता था कि रेवा का पति उसके पैरों तले फूल बिछाता था और वो यही देखने के लिए आई थी कि कोई बिना पैसे के इतना ख़ुश कैसे रह सकता है.
शर्मसार होकर दीपा घर जाने के लिए उठी ही थी कि रेवा का पति आयुष्मान घर आ पहुंचा.
घर में घुसते ही उसने रेवा को पुकारा, "देखो क्या बनवाया है तुम्हारे लिए… मशीन चलाते समय कंधा दुखने लगा था न? मशीन के पैर लाया हूं और साथ में मोटर भी. अब तुम्हें सिलाई करने में आसानी होगी…" बात झं हुए आयुष्मान ने दीपा को देखा तो झेंप गया,"माफ कीजिएगा दीदी, आप को देखा नहीं मैंने…" वो बोल रहा था, लेकिन दीपा का सारा ध्यान उस मोटर और मशीन के पैरों पर था.
दीपा के घर के भारी भरकम सजावटी सामान की तुलना में ये दोनों चीज़ें बहुत मामूली, पर फिर भी अनमोल थीं.  क्योंकि इसमें रेवा के पति का प्यार छिपा हुआ था.
नम आंखें लिए दीपा बिना एक शब्द बोले रेवा के घर से निकल गई.
बहन के दर्द को महसूस करती रेवा दयनीय दृष्टि से दीपा को जाते हुए देख रही थीं… कोई कुछ नहीं बोला था, पर फिर भी हर कोई यह समझ गया था कि ख़ुशी को पैसे से नहीं ख़रीदा जा सकता है, ये तो पति-पत्नी का आपसी प्यार और सम्मान है,‌ जो दिलों में ख़ुशी की रोशनी फैलाता है.

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कई बार हम दूसरों के घर की सुख-सुविधाओं को देखकर अपने आपको कमतर आंकने लगते हैं, ख़ासतौर पर तब जब हम वो सुविधाएं जुटाने में असमर्थ होते हैं. लेकिन सच तो यह है कि घर में मौजूद महंगे से महंगा सामान प्यार की तुलना में बहुत सस्ता होता है.
आपस में प्रेम और विश्वास हो, तो व्यक्ति तंगी में भी गुज़ारा कर लेता है, लेकिन सोने-चांदी के सिक्के भी हों, पर परिवार में प्रेम नहीं, परवाह नहीं.. तो जीना मुश्किल हो जाता है.
मैं ये नहीं कहती कि पैसों की… सुख-सुविधाओं की आवश्यकता नहीं होती.. ज़रूर होती है… पर पहली आवश्यकता प्यार और सम्मान की होती है, सुख-सुविधाएं, तो इंसान अपनी हिम्मत के बल पर जुटा ही सकता है.
- शरनजीत कौर

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