कहानी- मैंने तो पहले ही कहा था… (Short Story- Main To Pahle Hi Kaha Tha…)

मंगला को समझ में नहीं आया कि ये अचानक शांता को क्या हो गया? मंगला ने रमेशजी से शांता के पत्र की चर्चा की. रमेशजी ने वही पुराना वाक्य दुहरा दिया, “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि इस झमेले में मत पड़ो. अब भुगतो अपनी भलाई का परिणाम.”

रमेशजी के पास समस्या का हल न पाकर मंगला भागी-भागी हर्ष के घर पहुंची. उसने हर्ष की मां से इस बारे में चर्चा की.

Short Story- Main To Pahle Hi Kaha Tha

“चलो, अंत भला तो सब भला! अब तो तुम्हारी जान में जान आई होगी.” रमेशजी ने मंगला से कहा.

‘हूं!’ मंगला के मुंह से इससे अधिक और कुछ नहीं निकला. उसे बस रुलाई फूट रही थी. उसे लगा कि आज ये कितने आराम से कह रहे हैं कि अब तो तुम्हारी जान में जान आई होगी, कल तक तो ये भी मुझे ही ताना दे रहे थे.

“अरे-अरे, तुम रोने क्यों लगी? अब तो सब कुछ ठीक हो गया. अब रोने का क्या कारण?” रमेशजी ने चकित होते हुए मंगला से पूछा.

“कल तक तो आप भी मुझे ही दोष दे रहे थे.” मंगला के मन का क्षोभ आख़िर शब्दों के रूप में सामने आ ही गया.

“ओह, तो ये बात है. ठीक है-ठीक है, कल तक मैं ग़लत था और तुम सही थीं. लो, मान ली मैंने अपनी ग़लती. चलो, अब आंसू पोंछो.” रमेशजी ने मुस्कुराते हुए कहा. फिर वे मंगला के पास बैठते हुए बोले, “सचमुच, तुमने बहुत समझदारी से सब कुछ संभाल लिया, वरना मैं तो समझता था कि इस मामले में अब कुछ नहीं हो सकता.”

ये प्रशंसा थी या सांत्वना, मंगला तय नहीं कर पाई, लेकिन उसने भी बात को आगे खींचना उचित नहीं समझा. दूसरों के कारण पिछले एक माह से घर में जो तनाव चल रहा था, आज उसके समाप्त हो जाने पर उसकी चर्चा दोहराने से क्या लाभ.

“आप बैठिए, मैं आपके लिए चाय बना कर लाती हूं.” मंगला रसोई की ओर जाने के लिए उठ खड़ी हुई.

“नहीं, तुम बैठो. चाय बनाकर मैं लाता हूं.” रमेशजी ने मंगला का हाथ पकड़ कर उसे वापस सो़फे पर बिठाते हुए कहा और वे स्वयं उठ खड़े हुए. मंगला ने प्रतिवाद नहीं किया. वह चुपचाप सो़फे पर बैठ गई.

रमेशजी के जाते ही मंगला के मानस पर विगत एक माह का घटनाक्रम चलचित्र की भांति घूमने लगा. उफ़! कितनी निर्लज्जता के साथ शांता ने दोषारोपण किया था मंगला पर.

“अपनी बेटियों को तो अच्छे-अच्छे घरों में ब्याह दिया और हमारी बेटी के लिए ऐसा नरक चुना. शरम नहीं आई तुम्हें ऐसा करते हुए.” फिर कोसने की मुद्रा में उंगलियां चटकाती हुई बोली थी, “तुम्हारी बेटियां भी सुख से नहीं रह सकेंगी, मंगला! ये मेरा श्राप है, श्राप!”

शांता की बात सुन कर मंगला फूट-फूटकर रो पड़ी थी. उसके लिए कोई कुछ भी बुरा-भला कहे, वह हंसकर सुन सकती है, लेकिन बेटियों के लिए वह बुराई का एक भी शब्द सहन नहीं कर सकती. रो-रोकर उसके सीने में दर्द होने लगा था. मगर शांता को न चुप होना था और न वह चुप हुई. जी भर कर अनाप-शनाप बकती रही. शाम को जब रमेशजी द़फ़्तर से घर आए, तो वे भी शांता का रौद्र रूप देखकर सकते में आ गए. मंगला ने अलग ले जाकर उन्हें सारी बात बताई. मंगला की बात सुनते ही वे बोले, “और करो भलाई के काम. इसी को कहते हैं होम करते हाथ जलना. मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि तुम इस झमेले में मत पड़ो, लेकिन तुम्हें तो उस समय शांता की बेटी का घर बसाने की धुन थी. अब तुम्हीं सुनो उसकी सत्रह बातें.”

कहां तो मंगला को आशा थी कि रमेशजी उसकी मदद करेंगे. उसे कोई रास्ता सुझाएंगे, लेकिन रमेशजी ने तो पल्ला ही झाड़ दिया. ऊपर से उसी को दोषी ठहराया. जबकि देखा जाए तो मंगला का इसमें कोई दोष था ही नहीं. किसी का घर बसाना क्या कोई अपराध है?

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मंगला इस झमेले में पड़ती भी नहीं अगर शांता ने उसे रो-रोकर अपना दुखड़ा न सुनाया होता. शांता रिश्ते में मंगला की फुफेरी बहन लगती थी. यह रिश्ता बहुत निकट का तो नहीं था, लेकिन सहृदया मंगला की आदत है कि वह दूसरों के दुख से जल्दी द्रवित हो उठती है. शांता ने उसे बताया कि उसकी बेटी कुशा के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा है. वह एमए कर चुकी है. अपना स्वयं का ब्यूटीपार्लर चला रही है. फिर भी दहेज की लम्बी-चौड़ी मांगें कुशा के ब्याह के रास्ते में रोड़ा बनी हुई हैं.

“तुम अपने आसपास का कोई लड़का देखो ना. तुम लोगों का तो अच्छा रुतबा है, शायद यहां बात बन जाए. हम तो अपने शहर में क्या, अपने प्रदेश में भी लड़का ढूंढ़ चुके, लेकिन बात नहीं बन रही है. लड़की की बढ़ती उम्र देख-देख कर रात को नींद नहीं आती.” शांता ने चिरौरी करते हुए कहा था.

“ठीक है, मैं देखूंगी, मगर एक बात है….”

“क्या बात?” शांता ने चिंतित होकर पूछा था.

“कुशा बड़े शहर में पली-बढ़ी है और ये शहर कस्बाई है. यहां और वहां के रहन-सहन में बहुत अंतर है. कुशा को कहीं परेशानी न हो यहां रहने में.” मंगला ने कहा था.

“अरे नहीं, तुम इस बारे में ज़रा भी चिंता मत करो. हमारी कुशा बड़ी व्यवहारकुशल है. वह हर माहौल में तालमेल बिठा लेती है. तुम तो बस, उसकी नैय्या पार लगा दो.” शांता ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा था.

उस दिन के बाद से मंगला ने कुशा के विवाह कराने का मानो बीड़ा उठा लिया. रमेशजी ने उसे टोका भी था, “मेरे विचार से तो तुम इस झमेले में मत पड़ो. शांता का स्वभाव यूं भी तीखा है, अगर कल को कुछ ऊंच-नीच हो गई तो तुम्हें दोष देगी.”

रमेशजी ने मानो भविष्यवाणी कर दी थी, किन्तु उस समय मंगला को क्या पता था कि उसे क्या-क्या भुगतना पड़ेगा. मंगला ने रमेशजी के साढू के एक दूर के रिश्तेदार के लड़के को कुशा के लिए ढूंढ़ ही निकाला. लड़के का नाम था हर्ष. उसने व्यावसायिक शिक्षा में उपाधि ले रखी थी, किन्तु फ़िलहाल उसके पास कोई अच्छी नौकरी नहीं थी. वह एक निजी मिल में फिटर का काम करता था. हर्ष के भाई-बहनों का विवाह हो चुका था. उस पर अपने माता-पिता के अतिरिक्त और कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी. वे लोग लालची भी नहीं थे. उन्होंने दहेज लेने से साफ़ मना कर दिया था. मंगला को लगा कि हर्ष की पत्नी बनकर कुशा बहुत ख़ुश रहेगी. मंगला ने जब इस रिश्ते की बात रमेशजी को बताई, तो उन्होंने एक बार फिर मंगला को समझाया.

“ठीक है कि तुमने कुशा के लिए लड़का ढूंढ़ लिया है, लेकिन अंतिम निर्णय शांता को ही लेने दो. तुम तो बस, बिना कुछ छिपाए सब कुछ साफ़-साफ़ बता दो. आगे उनकी मर्ज़ी.”

“हां-हां, मैं सब कुछ बता दूंगी, भला मुझे किसी से कुछ छिपाकर क्या करना है? लेकिन देख लेना, शांता को यह रिश्ता पहली नज़र में ही पसंद आ जाएगा.” उत्साह से भरी हुई मंगला बोल उठी थी.

हुआ भी वही. शांता को रिश्ता पसंद आ गया. कुशा और हर्ष ने भी एक-दूसरे को पसंद कर लिया. शीघ्र ही मुहूर्त निकल आया और कुशा और हर्ष विवाह बंधन में बंध गए. रमेशजी ने भी अपने सारे संदेहों को किनारे करके विवाह के अवसर पर बढ़-चढ़ कर हाथ बंटाया.

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. पिछले माह मंगला को पता चला था कि कुशा के पांव भारी हैं और वह अपने मायके गई है. कुशा के सुखी जीवन के बारे में जान कर मंगला को अजीब-सा सुकून मिलता. उसे लगता कि उसने अपनी बेटियों की भांति एक और लड़की का जीवन संवारा है. किन्तु एक दिन शांता का पत्र पाकर मंगला अवाक रह गई. शांता ने मंगला पर आरोप लगाते हुए लिखा था कि उसने हर्ष के साथ ब्याह कराकर कुशा का जीवन बर्बाद कर दिया. वह अगर कुशा को सुखी नहीं देखना चाहती थी तो उसने कुशा को ज़हर क्यों नहीं दे दिया, ऐसे जीवनभर का नरक क्यों गले मढ़ दिया? इत्यादि-इत्यादि.

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मंगला को समझ में नहीं आया कि ये अचानक शांता को क्या हो गया? मंगला ने रमेशजी से शांता के पत्र की चर्चा की. रमेशजी ने वही पुराना वाक्य दुहरा दिया, “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि इस झमेले में मत पड़ो. अब भुगतो अपनी भलाई का परिणाम.”

रमेशजी के पास समस्या का हल न पाकर मंगला भागी-भागी हर्ष के घर पहुंची. उसने हर्ष की मां से इस बारे में चर्चा की.

“अब हम तुम्हें क्या दोष दें मंगला बहन! तुमने तो भले का ही विचार किया होगा, लेकिन इतना तो कहना ही पड़ेगा कि तुमने लड़की के बारे में हमें ठीक-ठीक नहीं बताया.” हर्ष की मां ने कोमल शब्दों में ही सही, लेकिन दोषी मंगला को ही ठहराया.

“लेकिन हुआ क्या?” मंगला ने चिंतित होते हुए पूछा.

“वह लड़की यहां तालमेल नहीं बिठा पा रही है. हम ठहरे मध्यमवर्गीय, उसके जैसी फारवर्ड लड़की को हम भी कहां तक सहन करें.” हर्ष की मां ने अपनी बेचारगी प्रकट करते हुए कहा.

“यह तो मैंने पहले ही बताया था कि कुशा बड़े शहर में पली-बढ़ी है. हो सकता है कि उसे यहां के तौर-तरी़के अपनाने में थोड़ा समय लगे.” मंगला ने याद दिलाया.

“हां, कहा तो था, लेकिन अब तो वह यहां आना ही नहीं चाहती है. हर्ष गया था उसे और अपनी बेटी को लेने, मगर उसने आने से मना कर दिया.” हर्ष की मां ने बताया.

“क्या? कुशा को बेटी हुई है! अरे वाह!” मंगला ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की.

“इसमें अच्छा क्या है? उसे तो अब यहां आना ही नहीं है.” हर्ष की मां ने ठंडे स्वर में कहा.

मंगला को हर्ष की मां का यह भाव रुचिकर नहीं लगा.

सप्ताह भर बाद शांता का एक और पत्र आ गया. उसमें भी उसने मंगला को उल्टा-सीधा लिखा था और कुशा का जीवन बर्बाद करने का दोषारोपण किया था. इस प्रकार दोनों पक्षों की ओर से बार-बार दोषारोपण किए जाने से मंगला का हृदय आहत होने लगा. उसने तो ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कुशा अथवा हर्ष को अपने जीवन में कोई दुख झेलना पड़े.

अभी तीन दिन पहले शांता और कुशा अपनी नन्हीं बेटी सहित आ धमकी थी.

“तुमने ही ये आग लगाई है, अब तुम्हीं इसे बुझाओ. मेरी कुशा एक पल के लिए भी उस घर में नहीं रहेगी. ये हैं तलाक़ के काग़ज़ात, इन पर तुम हर्ष के हस्ताक्षर करा कर लाओ.” शांता ने मंगला पर मानसिक दबाव डालते हुए कहा.

शांता की बात सुनकर मंगला घबरा गई. उसने एक बार फिर रमेशजी से इस बारे में चर्चा की.

“मामला तो सचमुच गंभीर हो चला है. ठीक है, देखता हूं मैं.” रमेशजी ने मंगला को धीरज बंधाते हुए कहा. किन्तु उसी दिन उन्हें दौरे पर तीन दिन के लिए बाहर जाना पड़ गया.

“जैसे भी हो, ये तीन दिन टाल-मटोल करती रहना. फिर मैं लौटकर देखूंगा कि क्या हो सकता है… वैसे मैंने तो पहले ही कहा था…” रमेशजी ने जाते-जाते मंगला को समझाया भी था और उलाहना भी दे डाला था.

रमेशजी के उलाहने सुनकर मंगला को ताव आ गया कि अब चाहे जो भी हो, इस मामले को वह ख़ुद ही हल करेगी. यह निश्चय करने के बाद उसने पूरे मामले पर एक बार फिर दृष्टिपात किया. उसे लगा कि उसने अभी तक कुशा की मां और हर्ष की मां की बातें सुनी हैं, उसने कुशा या हर्ष से तो बात ही नहीं की. आख़िर वे लोग क्या चाहते हैं?

मंगला ने शाम के समय शांता, उसके पति और कुशा से बात करने का निश्चय किया. उसी समय उसने हर्ष और उसके माता-पिता को भी बुला लिया. सभी लोगों के इकट्ठा होने पर पहले तो विवाद की स्थिति निर्मित होने लगी, लेकिन तब मंगला ने कठोरता से काम लिया.

“आप लोग बहुत बोल चुके हैं, कृपया, अब आप लोग बीच में न बोलें.” मंगला ने कठोर स्वर में शांता और हर्ष की मां को डांटते हुए कहा.

“कुशा, क्या तुम अपनी ससुराल में दुखी हो?” मंगला ने कुशा से पूछा.

“नहीं तो.” कुशा ने उत्तर दिया.

“लेकिन तुम्हारी मां का तो कहना है कि तुम ससुराल में ख़ुश नहीं हो.” मंगला ने फिर कहा.

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं है….बात दरअसल ये है कि मां मुझसे पूछती रहती हैं कि हर्ष मुझे घुमाने ले जाते हैं कि नहीं या हर्ष कितने बजे घर लौटते हैं… मैंने मां को बताया कि इनकी ड्यूटी का समय बदलता रहता है, इसलिए रोज़ घूमने नहीं जा पाते हैं. कई बार ये देर से घर लौटते हैं और तब हम साथ में खाना खाते हैं. शायद इसी से मां को लगा होगा कि मैं ख़ुश नहीं हूं.” कुशा ने कहा.

“तो फिर तुम तलाक़ क्यों लेना चाहती हो?” मंगला ने पूछा.

“मैं कहां लेना चाहती हूं…ये तो हर्ष चाहते हैं, मुझसे अलग होना.” कुशा के स्वर में पीड़ा का भाव उभर आया.

“क्या बात है हर्ष? क्या तुम्हें कुशा अच्छी नहीं लगती? या तुम्हें इसके व्यवहार से कष्ट पहुंचता है?” मंगला ने अब हर्ष से पूछा.

“नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है. मुझे कुशा से कोई शिकायत नहीं है.” हर्ष ने दृढ़तापूर्वक कहा. वह आगे बोला, “मैंने तो कुशा से तलाक़ लेने के बारे में कभी सोचा भी नहीं, बल्कि मैं तो ये सोचकर चकित था कि कुशा मेरे साथ क्यों नहीं रहना चाहती? लेकिन अब तो मुझे कुछ और ही मामला समझ में आ रहा है.”

“हां, मुझे भी. तो कुशा और हर्ष तुम दोनों तलाक़ लेना चाहते हो या साथ-साथ रहना चाहते हो?” मंगला ने पूछा.

“हम साथ-साथ रहना चाहते हैं.” दोनों एक स्वर में बोल उठे.

कुशा के मुंह से यह स्वीकारोक्ति सुनकर शांता का चेहरा उतर गया. उधर हर्ष की मां भी नज़रें चुराने लगी.

“देखा, कभी-कभी घर के बड़ों के अहम् के कारण किस तरह बच्चों का जीवन बर्बाद होने लगता है.” मंगला ने कहा. फिर उसने शांता से पूछा, “तुमने ऐसा क्यों किया शांता?”

“मैंने सोचा कि कुशा ख़ुश नहीं है, लेकिन अगर कुशा ख़ुश है तो… तो मैं अपने व्यवहार के लिए माफ़ी मांगती हूं.”

“हां, मैं भी! मैंने भी नाहक तुम्हें दोष दिया, मंगला बहन!” हर्ष की मां बोल उठी.

“चलो इसी बात पर दोनों समधिनें एक-दूसरे को गले लगा लो!” मंगला ने कहा. फिर उसने आगे कहा, “कई बार हम समझ लेते हैं कि हमारे बच्चे नई परिस्थिति में तालमेल नहीं बैठा पाएंगे और इसी भ्रम में पड़कर हम ग़लत निर्णय कर डालते हैं. और नई बहू के साथ-साथ सास को भी तो तालमेल बैठाना चाहिए. क्यों हर्ष की मां, मैंने ग़लत कहा क्या?”

“नहीं मंगला बहन, तुम ठीक कहती हो.” हर्ष की मां ने झेंपते हुए कहा.

इस प्रकार पटाक्षेप हुआ मंगला के जीवन के इस अप्रिय प्रसंग का. रमेशजी जब दौरे से वापस आए तो मंगला ने उन्हें पूरी घटना कह सुनाई.

“चलो अच्छा हुआ कि सब कुछ ठीक हो गया और एक घर उजड़ने से बच गया.” रमेशजी बोल उठे. आज सुबह शांता अपने पति के साथ वापस घर चली गई. हर्ष, कुशा और अपनी बेटी को अपने साथ ले गया.

“चाय तैयार है, मैडम!… और साथ में गरमा-गरम पकौड़े भी.” रमेशजी ने प्रफुल्लित होते हुए कहा.

“अरे, पकौड़े मैं बना देती आपने क्यों कष्ट किया?” मंगला हड़बड़ाकर बोली. वह अब बीते घटनाक्रम से बाहर निकल आई थी.

“तो क्या हुआ जो मैंने बना लिए. मैंने तो पहले ही कहा था…”

“क्या…?” मंगला ने चौंककर पूछा.

“यही कि मैं पकौड़े बहुत अच्छे बनाता हूं!” कहते हुए रमेशजी ठहाका मारकर हंस दिए, मंगला भी अपनी हंसी रोक नहीं पाई. आख़िर महीना भर बाद वह खुलकर हंसी थी.

– डॉ. सुश्री शरद सिंह

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कहानी- मैंने तो पहले ही कहा था... (Short Story- Main To Pahle Hi Kaha Tha...)
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मंगला को समझ में नहीं आया कि ये अचानक शांता को क्या हो गया? मंगला ने रमेशजी से शांता के पत्र की चर्चा की. रमेशजी ने वही पुराना वाक्य दुहरा दिया, “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि इस झमेले में मत पड़ो. अब भुगतो अपनी भलाई का परिणाम.”
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