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कहानी- नई सुबह (Short Story- Nai Subah)

"... यह मेरी अपनी ज़िंदगी नहीं, इस पर सबसे पहले मेरे मां-बाप का हक़ है. और आज जब मैं इस काबिल हुआ हूं कि उनका सहारा बन सकूं, तुम मुझे मार डालना चाहती हो. तुमने मुझे बहुत ग़लत समझा सुधा. मैं उन बेवकूफ़ों में से नहीं, जो अपनी दिलरुबा को ही सारी दुनिया समझ लेते हैं और अपने सारे फ़र्ज़ भूल जाते हैं..."

यूं तो कई लोग काम करते थे उस फर्म में, लेकिन अतुल उन सबसे अलग था. लम्बा कद, चौड़े कन्धे, उभरा हुआ सीना, भरी हुई मूछें, रोबीला अन्दाज़ और दिलकश आवाज़. कुल मिलाकर एक ख़ूबसूरत पर्सनैलिटी का मालिक था वह.

बदन के साथ-साथ वह दिल और दिमाग़ का भी उतना ही ख़ूबसूरत था, इसलिए सभी उसे बहुत पसंद करते थे. बॉस का तो वह मुंहलगा था, क्योंकि काम में भी वह काफ़ी तेज था. सेल्स ऑफिसर था वह इस फर्म में.

कल ही एक हफ़्ते का टूर करके लौटा था वह, इसलिए आज ऑफिस खुलते ही आ गया था और बॉस के केबिन में मौजूद था. अभी उन दोनों के बीच बातें चल ही रही थी कि फोन की घंटी बज उठी. बॉस ने फोन उठाया और "हेलो... जी हां है."

"आपका फोन." कहते हुए उन्होंने रिसीवर अतुल को दे दिया.

"मेरा फोन..." वह अपने आपमें बुदबुदाया और माउथपीस में बोला, "यस स्पीकिंग."

"लीजिए बात कीजिए..." अतुल चौंका, क्योंकि यह किसी लड़की की आवाज़ थी, उसने तो किसी को भी यह नंबर नहीं दिया था. फिर यह कौन है? वह सोच ही रहा था कि तभी, "कैसे हैं आप?" यह दूसरी लड़की की आवाज़ थी.

यह ख़ुद को संभालते हुए बोला, "ठीक हूं, लेकिन आप?"

"आपने मुझे देखा है, लेकिन जानते नहीं." उधर से जवाब आया.

"फिर फोन क्यों किया?" उसने दो टूक सवाल किया.

"दरअसल, आपसे एक काम था."

"कहिए, क्या कर सकता हूं मैं?"

"कल आप ६ बजे... रेस्टोरेंट में आ सकते हैं?"

"नहीं." उसने साफ़ मना कर दिया.

"देखिए, कोई आपसे मिलना चाहता है, इसलिए प्लीज़ इन्कार मत कीजिए... प्लीज़..."

"लेकिन जिसे मैं जानता तक नहीं, उसे पहचानूंगा कैसे?"

"यानी आप आएंगे..." उधर से आने वाली आवाज़ में ख़ुशी साफ़ झलक रही थी, "पहचान मैं लूंगी, आप इसकी फ़िक्र न करें."

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"लेकिन मैं वक़्त का बहुत पाबंद हूं."

"आपको इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा, लेकिन आप आएंगे न?"

"ठीक है."

और उधर से फोन रख दिया गया, जबकि इधर अतुल बॉस से नज़रें नहीं मिला पा रहा था, क्योंकि ऑफिस में किसी भी लड़की का फोन आने पर रोक थी. लेकिन बॉस ने उससे कुछ नहीं कहा और वापस टूर की बातों पर आ गए.

छह बजने में अभी दो मिनट बाकी थे और अतुल अपनी आदत के मुताबिक ठीक वक़्त पर आ गया था. गाड़ी पार्क करके अभी वह रेस्टोरेंट के गेट पर आकर खड़ा ही हुआ था और अपने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई ही थी कि, "आप ही मिस्टर अतुल हैं?"

वह चौंक कर पीछे मुड़ा तो अपने सामने एक वेटर को खड़ा पाया, जिसने बड़े आदर से अपना सवाल दोहराया, "आप ही मि. अतुल है?"

"हां, मैं ही हूं."

इतना सुनते ही वेटर ने एक स्लिप उसकी तरफ़ बढ़ा दी और ख़ुद बिना कुछ कहे वहां से चल दिया. अतुल ने स्लिप खोल कर देखी, उसमें लिखा था, "अन्दर आइए, टेबल नं. नाइन." अतुल सीधा जाकर टेबल नं. नाइन पर कुछ झिझक के साथ बैठ गया. सामने बैठी लड़की को उसने देखा, तो देखता ही रह गया. बला की ख़ूबसूरत थी वह. पतली सी खड़ी नाक, बड़ी-बड़ी आंखें, उभरे हुए गाल, तराशे हुए नाज़ुक होंठ, जिन पर हल्की सी लिपस्टिक लगी हुई थी और वह क्रयामत का गोरा रंग, जिसमें सफ़ेदी कम और लाली ज़्यादा थी. उसके हुस्न में चार चांद लगा रहे थे. उसने पीला कुर्ता और हरा दुपट्टा पहन रखा था. सलवार को वह देख नहीं सका था, अपनी झिझक मिटाने के लिए उसने पूछा, "आपने ही मुझे फोन किया था?"

"जी हां."

अतुल पर एक और बिजली गिरी, इतनी प्यारी आवाज़, जैसे शहद था... जैसे कोयल की आवाज़ या... ऐसी, जिसे बताने के लिए शब्द ही न मिलें.

"लेकिन आपको तो मैं जानता तक नहीं, फिर आपको मेरा फोन नंबर कैसे पता चला?"

"देखिए, अभी आप मुझसे कुछ भी मत पूछिए." उसने सफ़ाई देते हुए कहा, "क्योंकि अभी मैं कुछ नहीं बता सकती. हां, इतना वादा करती हूं कि कभी ख़ुद ही अपने बारे में सब कुछ बता दूंगी, बस इतना जान लीजिए कि मेरा नाम सुधा है और मैं आपसे मिलना चाहती थी, इसके अलावा और कुछ मत पूछिए प्लीज़..."

उसके कहने का अन्दाज़ इतना प्यारा था कि अतुल चाहकर भी उससे कुछ न पूछ सका और दूसरी बातों में लग गया. बातों-बातों में सुधा ने अतुल से अगली बार मिलने का वादा भी ले लिया.

इसी तरह मिलने-मिलाने का सिलसिला चलता रहा. हालांकि अतुल ने सुधा से उसके बारे में कई बार जानना चाहा था, लेकिन सुधा हमेशा ही बड़ी सफ़ाई से टाल जाती थी. फिर अतुल ने भी पूछना बंद कर दिया, क्योंकि उसे प्यार चाहिए था और वह उसे मिल रहा था. हालांकि दोनों में से किसी ने भी खुल कर अपने प्यार का इज़हार नहीं किया था, लेकिन दोनों टूट कर एक-दूसरे को चाहने लगे थे. एक-दो दिन भी न मिलें, तो दोनों बेचैन हो उठते थे. अतुल यूं तो अपना काम पूरी मुस्तैदी से करता था, फिर भी कभी-कभी लापरवाह हो जाता था. एक दिन बॉस ने उससे पूछा भी था, "क्या बात है अतुल, आजकल कुछ खोए-खोए से रहते हो, कहीं किसी से इश्क़ तो नहीं हो गया?"

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"जी... नहीं तो... ऐसी कोई बात नहीं."

"अच्छा, उस दिन वह फोन किसका था?"

"जी... उस दिन के बाद तो उसका कोई फोन ही नहीं आया, न ही वह मुझसे मिली... पता नहीं कौन थी. अपना नाम भी नहीं बताया था उसने."

अतुल ने यह बात बॉस से नज़र चुराकर कही थी, क्योंकि वह झूठ बोला था. हक़ीक़त तो यह थी कि दोनों कभी किसी होटल में, तो कभी सिनेमा हाल में, तो कभी नदी किनारे अक्सर मिला करते थे. पिछली बार जब दोनों मिले थे, तो नदी पर मिलने का वादा हुआ था. और आज दोनों नदी के किनारे एक सुनसान जगह पर बैठे एक-दूसरे पर अपना प्यार लुटा रहे थे.

सुधा बैठी हुई थी और अतुल औंधे मुंह उसकी गोद में लेटा हुआ था. सुधा उसके बालों से खेल रही थी, पर उसका दिमाग़ कहीं उलझा हुआ था. शाम धीरे-धीरे घिर रही थी. आकाश में पक्षी चहचहाते हुए अपने घोंसलों में लौट रहे थे. सूरज भी पश्चिम में नीचे उतर आया था और उसके आसपास आकाश में लाली बढ़ती जा रही थी. दोनों काफ़ी देर से ख़ामोश थे. इस ख़ामोशी को धीरे से सुधा ने तोड़ा, "पेड... सो गए क्या?"

"नहीं..."

"एक बात पूछे?"

"पूछो." अतुल ने छोटा सा जवाब देते हुए कहा.

"तुम मुझे कितना प्यार करते हो?"

"हूं..!" चौंककर सीधा हो गया था अतुल, "यह क्या पूछ रही हो आज, मुझे पर भरोसा नहीं रहा क्या?"

"नहीं, बस यूं ही बताओ न, कितना प्यार करते हो मुझे?"

"लगता है तुम सीरियस हो." अतुल उठकर बैठते हुए बोला.

"बहुत ज़्यादा."

"अगर ऐसा है तो सुनो मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं, यह बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं."

"लेकिन मुझे शब्दों में ढला हुआ जवाब चाहिए." सुधा ने सपाट लहजे में कहा.

"सॉरी." अतुल ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं नहीं बता सकता, क्योंकि प्यार बताने की नहीं, बल्कि महसूस करने की चीज़ है."

"तुम मुझे बातों में उलझाने की कोशिश कर रहे हो, ठीक है, मैं ही पूछती हूं."

"ओ.के. मैडम, पूछिए क्या पूछ रही हैं आप? लेकिन एक बात है यार, तुम अच्छे-खासे रोमान्टिक मूड को चौपट कर रही हो." अतुल ने बात बदलने की कोशिश की.

"तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?" सुधा ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया.

"मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?" अतुल ने वाक्य दोहराया, "इसे छोड़ो और यह बताओ कि तुम मुझसे क्या करवाना चाहती हो?" अतुल भी सीरियस हो गया था.

"सामने नदी देख रहे हो?" सुधा ने इशारा करते हुए पूछा.

अतुल ने गर्दन मोड़कर नदी की तरफ़ देखते हुए कहा, "हां देख रहा हूं."

"इसमें छलांग लगा सकते हो?"

"मुझे तैरना नहीं आता डूब जाऊंगा."

"तो भी मैं चाहूंगी कि तुम छलांग लगाओ."

"क्यों?"

"मैं देखना चाहती हूं कि तुम मुझे कितना प्यार करते हो." सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा,

"अगर में छलांग न लगाऊं तो?" अतुल ने भी मुस्कुराते हुए कहा.

"तो मैं समझूंगी कि तुम मुझे प्यार नहीं करते."

चटाक... अतुल का भरपूर चांटा सुधा के गाल पर पड़ा और उस सुनसान जगह पर गूंज कर रह गया.

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सुधा ग़ुस्से में बिफरती हुई अतुल की तरफ़ मुड़ी. "तुमने मुझे चांटा मारा?"

"हां, मैंने तुम्हें चांटा मारा, अब यही सवाल मैं तुमसे पूछता हूं कि तुम मुझे कितना प्यार करती हो?" अतुल एक-एक शब्द को चबाता हुआ कह रहा था.

"रही बात मेरे प्यार करने की, तो एक बार मेरी हो जाओ, फिर देखो, मैं ज़िंदगी की हर ख़ुशी तुम पर लुटा दूंगा. लेकिन तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारे कहने पर जान दे दूंगा. यह मेरी अपनी ज़िंदगी नहीं, इस पर सबसे पहले मेरे मां-बाप का हक़ है. और आज जब मैं इस काबिल हुआ हूं कि उनका सहारा बन सकूं, तुम मुझे मार डालना चाहती हो. तुमने मुझे बहुत ग़लत समझा सुधा. मैं उन बेवकूफ़ों में से नहीं, जो अपनी दिलरुबा को ही सारी दुनिया समझ लेते हैं और अपने सारे फ़र्ज़ भूल जाते हैं. भूल जाते हैं कि दुनिया उनसे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत लड़कियों से भरी पड़ी है, जो उनके किसी क़ाबिल होने पर ख़ुद ही उनके सामने लाइन लगाएंगी, चली जाओ यहां से, और अपनी सूरत आइन्दा मुझे कभी मत दिखाना."

"जा रही हूं, लेकिन याद रखना, मैं तुम्हें नौकरी से निकलवा दूंगी." सुधा उठते हुए बोली.

"क्या मतलब?" चौंक पड़ा था अतुल.

"मतलब यह कि जिस फर्म में तुम सेल्स ऑफिसर हो, वह मेरे भाई की है." सुधा के लहज़े में व्यंग्य था.

"आई... सी... तुम मुझे क्या नौकरी से निकालोगी. मैं ख़ुद ही कल रिज़ाइन कर दूंगा. अब आप जा सकती हैं."

और सुधा पैर पटकती हुई चल दी. अतुल उसे जाते हुए दूर तक देखता रहा. उसका दिल कह रहा था, 'सुधा, तुमने यह क्या कर दिया, बॉस मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मुझे कितना नीच समझेंगे. खैर, अब तो रिज़ाइन करना और भी ज़रूरी हो गया है.' वह न जाने कब तक यूं ही बड़बड़ाता रहा.

दूसरे दिन ऑफिस पहुंचते ही अतुल को बताया गया कि उसके लिए फोन आया था, थोडी देर में फिर आएगा. अभी अतुल मुड़ा ही था कि फोन की घंटी बज उठी, रिसेप्शनिस्ट ने फोन उठाया और, "हेलो, जी हां, मेरे सामने खड़े हैं. सर, आपका." कहते हुए उसने रिसीवर अतुल की तरफ़ बढ़ा दिया.

"हेलो," अतुल फोन पर बोला, "अतुल स्पीकिंग."

"प्लीज़ फोन मत रखिएगा." यह सुधा की आवाज़ थी.

"जो भी कहना है जल्दी कहिए." अतुल सपाट लहज़े में बोला.

"कल जो कुछ भी हुआ, उसके लिए मैं बहुत शर्मिन्दा हूं और आपसे माफ़ी मांगती हूं." सुधा की आवाज़ कांप रही थी, मानो उसे डर हो कि कहीं अतुल फोन रख न दे.

"कल की बात सिर्फ़ आप जानते हैं और मैं, तीसरा कोई नहीं. मैं वह बात यहीं ख़त्म करना चाहती हूं. कल रात मैं सो नहीं सकी. रातभर आपके ही बारे में सोचती रही और मैंने पाया कि आप सही थे. साथ ही यह भी कि बहुत चाहते हैं आप मुझे. इसलिए ज़िन्दगी के सफ़र में आपके साथ चलने का फ़ैसला किया है. आप बस रिजाइन मत दीजिएगा, बाकी सब मैं संभाल लूंगी. प्रॉमिस कीजिए, आप रिजाइन नहीं करेंगे, प्लीज़, मेरी ख़ातिर." सुधा के लहज़े में प्रार्थना थी.

"प्रॉमिस!" अतुल ने कहा और फोन रख दिया.

- परवेज अहमद 'परवाज़'

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