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कहानी- नीड़ का पंछी (Short Story- Nid Ka Panchhi)

"मोहिनी, अपनी कुंठा को अपने ऊपर हावी मत होने दो. ऐसे सोचो तो कमी सब में है. पुराने परिचित मुझे देख कर मुस्कुराते हैं तो क्या मैं समझ लूं कि वे मेरे अतीत पर व्यंग्य कर रहे हैं?.."

हरी मखमली घास के बीच-बीच से सिर उठाए, जंगली घास-फूस को खुरपी से खोद कर निकालते हुए माली ने जब काम करना बंद कर दिया तो मोहिनी जी चौंक सी गई. उनके एकरस चिन्तन में बाधा पड़ गई. माली खुरपी के साथ-साथ उखाड़े गए घास-फूस की डेरी को उठा कर उठ खड़ा हुआ. मोहिनी जी ने चारों ओर के वातावरण पर अपनी दृष्टि घुमाई. आकाश के गहरे स्लेटी रंग ने घास के हरे चमकीले रंग को आवृत कर लिया था. सूने गगन की दूरी को नापता कोई एक एकाकी पक्षी चीत्कार करता हुआ उनके सिर के ऊपर से निकल गया. बेत की आराम कुर्सी में धंसे अपने शरीर को मोहिनी जी ने सप्रयास निकाला और धीरे-धीरे कोठी की ओर बढ़ी. नौकर ने बाहर की मर्करी जला दी थी. दूधिया रोशनी से नहाई कोठी को आंख भर देख कर एक तृप्त मुस्कान उनके अधरों पर फैल गई.

भवेश के कमरे में पाश्चात्य संगीत का कैसेट पूरे वॉल्यूम पर चल रहा था. माली से काम करवाने में वे इतनी व्यस्त थीं कि बेटा कब कॉलेज से आया, इसका आभास ही नहीं हुआ. पता नहीं, कुछ खाया भी है? वे घर में न रहें तो किसी से कुछ मांगता भी नहीं. वे कहीं दूर तो नहीं थीं, लॉन में ही तो बैठी थीं. सामने न रहो तो माली दिनभर बैठे-बैठे खैनी बनाता खाता रहता है. माली ही क्यों, सभी नौकरों का वही हाल है, वह क्या-क्या और कहां-कहां देखे? भवेश के पिताजी माह में पन्द्रह दिन तो व्यवसाय के सिलसिले में बाहर ही रहते हैं और जब उस शहर में रहते हैं, तब भी रात के दस-ग्यारह से पहले घर नहीं आ पाते. इतना बड़ा कारोबार और संभालने वाले अकेले वे.

द्वार पर लटके भारी पर्दे को हटा कर उन्होंने कमरे में प्रवेश किया. भवेश और उसके मित्र संगीत की धुन पर नृत्य करने में मस्त थे. सभी चेहरे अपरिचित थे. भवेश ने अभी हाल ही में मैट्रिक पास करके कॉलेज में प्रवेश लिया है, नए-नए मित्र बने हैं. आज पहली बार उन लोगों को लेकर घर आया है. इन लोगों को अच्छी तरह से खिलाना-पिलाना है. ममता से भर कर उन्होंने सबको एक बार पुनः देखा और चलने का विचार किया, तब तक एक लड़के की दृष्टि उन पर पड़ गई. उसने दूसरे को इशारा किया. बारी-बारी से सभी उन्हें कुतूहल से देखने लगे. नृत्य थम गया था. नृत्य रुकने का कारण जानने के लिए मित्रों की दृष्टि का अनुसरण कर भवेश ने भी मां को देख लिया. उसका कोमल चेहरा तमतमा गया. मां के एकदम पास आकर वह झुंझला कर बोला, "आप यहां क्या करने आई हैं?" चकित होकर वह बेटे को देखती रह गई, जैसे वह क्या कह रहा है, यह उनकी समझ में नहीं आ रहा हो.

"तुम लोगों के लिए नाश्ता..." बिना कुछ सोचे-समझे उनके मुख से निकला.

"आप भीतर जाइए." भवेश उनके ठीक सामने इस प्रकार खड़ा हो गया, मानो उनकी आकृति को अपने आकार से ढंक देना चाहता हो. मोहिनी को जैसे चेत हुआ. अरे, इसकी आंखों में भी वही चिर-परिचित ग्लानि है, जिसे बचपन में वह अपनी मां की आंखों में देखा करती थीं.

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भवेश के कमरे से भीतर जाते समय उन्हें लग रहा था कि अपनी बौनी-कुबड़ी देह का बोझ अब उनसे ढोया नहीं जा रहा है. देह, जो उनकी आत्मा से एक अभिशाप की भांति चिपटी हुई है और भवेश, जो उनका बेटा है. क्या-क्या नहीं किया इसके लिए? अपने जीवन को ही दांव पर लगा दिया था. डॉक्टर बार-बार गर्भपात की सलाह दे रहे थे, परन्तु उन्होंने नहीं माना था, निःसंतान होकर जीने की क्या सार्थकता? सात माह में ऑपरेशन से जन्मे, चिड़िया के बच्चे जैसा लोमहीन नन्हा मांस पिण्ड, जिसके बचने की सम्भावना नहीं थी, आज लम्बा स्वस्थ किशोर बन कर उनकी अविकसित देह का पूर्ण प्रतिदान बन गया है. किन्तु आज उसी बेटे ने उनके स्वयं के बचपन के भावों की पपड़ी को जैसे उखाड़ दिया है. बरसों से अतीत में दबी-घुसी कुरूप धब्बों वाली स्मृतियां मन के उजले पर्दे पर उभर आई.

घर के बाहर-भीतर की दूरी को पैरों से नापते भाई-बहनों के बीच में वह स्वयं, चाहे कोई आए अथवा जाए, उन लोगों की गतिविधि में कोई अन्तर नहीं पड़ता था. बस केवल मोहिनी को ही उनकी आया किसी बाहरी आदमी के आने पर गोद में उठा कर पिछवाड़े ले जाती थी. वह चीख-चीख कर हाथ-पैर पटकतीं.

किन्तु अपने को छुड़ा नहीं पाती. एक बार उन्होंने आया की बांह में ज़ोर से काट लिया. आया ने दर्द से बिलबिला कर उन्हें छोड़ दिया, वह सीधी भागती हुई सबके बीच पहुंच गई. वार्तालाप के मध्य विरामचिह्न लग गया. आगन्तुक की आंखों में उपजे प्रश्न का उत्तर मां ने खिसिया कर दिया था, "बचपन में इसे पोलियो हो गया था."

अतिथि महिला ने तरस खाते हुए कहा था, "बहुत बुरा हुआ. लड़की की जात है, दिल्ली ले जाकर किसी बड़े डॉक्टर को दिखाइए."

"सब जगह दिखा चुके हैं, पानी की तरह पैसा बहाया है. इसके इलाज पर." मां ने खीझते हुए अपनी सफ़ाई दी थी.

उन लोगों के जाने पर मां ने आया के ऊपर क्रोध उतारा, "इतना समझाया है तुम्हें, क्यों आने दिया इसे?"

आया ने अपनी बांह आगे बढ़ा कर कहा था, "देखिए बहूजी, मोहिनी बिटिया ने कितने कस के काटा है."

मां का आक्रोश उनके विवेक पर हावी हो गया. दोनों हाथ से मोहिनी के सिर, पीठ और कुबड़ को जितना ही पीटती जाती थीं, उतना ही वाणी के बाणों से घायल करती जा रही थीं.

"अपने को कभी देखा है शीशे में? सबके सामने अपनी मनहूस देह लेकर चली जाती है."

उस दिन की एक-एक बात उनकी आत्मा में कील के समान ठुकी हुई है. पहली बार उन्हें लगा था कि वह सबसे पृथक है. उनमें बहुत बड़ी कमी है और तब से किसी के आने पर वह स्वयं ही अपने लिए एकान्त कोना तलाश लेती थीं.

वर्ष पर वर्ष बीतते गए, सभी भाई, बहन, माता-पिता की लम्बाई को छूते हुए बढ़ रहे थे, सिर्फ़ उनका कद ही ज्यों का त्यों रह गया. बढ़ा था तो उनके पीठ का कूबड़. स्कूल जाना भी उन्होंने छोड़ दिया था, क्योंकि सब लड़कियां उन्हें 'मेंढकी' कह कर चिढ़ाती थीं. भाई-बहन भी इस मायने में पीछे नहीं थे, इसीलिए सब की निगाहों से दूर रसोईघर उनके लिए सबसे सुरम्य स्थल बन जाता था. भांति-भांति के पकवान व्यंजन बनाने में तथा घर के अन्य कामों में उनका जवाब नहीं था. बहनों के विवाह के बक्सों को अपनी सुघड़ कढ़ाई बुनाई से उन्होंने संवारा था. ‌कोई सपना नहीं था उनके पास. बस, एक-एक दिन बीतता तो लगता, चलो किसी प्रकार ज़िंदगी का एक दिन कम हुआ.

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माता-पिता ने उनके लिए भी वर अनुसन्धान करना आरम्भ किया. मोहिनी को यह सब कुछ निस्सार प्रतीत हो रहा था. भला कौन दो आंखों वाला उनसे विवाह करेगा? मां प्रत्येक परिचित के सम्मुख अपनी आवश्यकता की गठरी खोलती थी, "कोई भी, कैसा भी हो, बस इसका उत्तरदायित्व संभाल ले. हम लोग जीवनभर इसका साथ नहीं दे सकेंगे. कौन माता-पिता अपनी संतान का सहारा बन पाते हैं? रुपया? नहीं उसकी फ़िक्र न करें, जितना सब को दिया है, उससे अधिक ही देंगे."

मोहिनी यह सब सुनतीं तो उन्हें लगता कि धरती फट जाती और वे उसमें समा जातीं. इतनी पीड़ा, इतनी ग्लानि अपने खाते में क्यों लिखा कर लाई है? आत्महत्या करने की इच्छा होती थी, किन्तु उसके लिए भी साहस की आवश्यकता पड़ती है. वह उनमें कहां था?

अतिशय प्रयास करने पर सफलता देर-सबेर अवश्य मिलती है, मोहिनी के सम्बन्ध में यह बात सच उतरी. दीदी के ससुर के वर्कशॉप में दिनेश साधारण से मैकेनिक थे. विधवा मां, कुंवारी बहन तथा फूस के छप्पर वाली छोटी सी झोपड़ी, बस यही पूंजी थी उनके पास. मोहिनी के सम्बन्ध में कुछ जानकर भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी.

मोहिनी के पिता ने उन्हें अपने घर बुलाया था. दरवाज़े की झिरझिरी से दुबले-सांवले और झुके कन्धेवाले दिनेश को, मटमैले रंग के खादी के कुरते-पैजामे में देख कर, मोहिनी के बुझे हुए, मन को भी धक्का लगा. इससे अच्छे कपड़े तो उनके पिता के चपरासी पहनते हैं, परंतु उनके पिता की प्रसन्नता, अपने पद की गरिमा के पीछे से फूट पड़ रही थी. आखिर कोई तो मिला, जो उनके कन्धे पर रखे हल के जुए को अपने कन्धे पर रखने को तैयार था. मोहिनी के विवाह में टीमटाम पर कुछ भी व्यय नहीं हुआ, न बारात आई न रिश्तेदार जुटे, बस मन्दिर में जाकर फेरे डलवा दिए गए. मोहिनी के पिता ने बेटी के ससुराल जाने के पहले ही वहां का घर पक्का करवा दिया था. फिर भी मायके के घर की तुलना में कुछ भी नहीं था. वहीं सास-ननद की आंखों में तनिक भी प्रसन्नता और उत्साह नहीं था. थी बस अपनी विवशता की गहरी छाया, जो पूरे परिवेश की भी आच्छादित किए थी.

भारी बनारसी साड़ी में भी मोहिनी अपना कूबड़ छिपा नहीं पा रही थीं. उन्होंने घूंघट नहीं निकाला था. आम लड़कियों जैसे चोंचले करने के लायक तो उन्होंने अपने को कभी समझा भी नहीं था. निराशा की प्रतिमूर्ति बन कर वह द्वार को देखे जा रही थी. और जब दिनेश की दुबली आकृति दिखी तो उन्हें लगा कि जागते-जागते भी वह स्वप्न देख रहीं हैं. असम्भव जब सम्भव हो जाता है तो आंखों में फंसे आंसुओं में बाहर निकलने के लिए रेलमपेल मच जाती है. दिनेश पास आकर खड़े हो गए थे.

"तुम रो क्यों रही हो?"

वह कुछ बोल नहीं सकी थीं. दिनेश थोड़ी देर तक परेशान से खड़े रहे. मोहिनी के आंसू थे कि थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

अपने खुरदरे हाथों से उनके आंसू को पोंछने का प्रयत्न करते हुए दिनेश ने कहा था, "मैं जानता हूं, यह घर तुम्हारे लायक नहीं है. मैं भी तुम्हारे मायके वालों जैसा न पढ़ा-लिखा हूं, न अमीर किन्तु मैं पूरी कोशिश करूंगा कि तुम्हें कोई तकलीफ़ न हो".

मोहिनी रोना भूल गई. अरे, वह तो सोच रही थी कि दिनेश ने रुपयों के लोभ से विवाह तो कर लिया है, किन्तु उन्हें पत्नी रूप में कभी स्वीकार नहीं करेंगे, पर दिनेश तो अपनी कुंठाओं के संसार में इतनी गहराई तक फंसे हैं कि उनके लिए मोहिनी की कुरूपता अर्थहीन है. पहली बार मोहिनी का परिचय ऐसे व्यक्ति से हुआ था, जिसने बिना किसी तिरस्कार के मोहिनी को सहज मानवीय धरातल पर स्वीकार किया था.

अपने अभावों के प्रति यही सजगता दिनेश को अधिकाधिक श्रम करने के लिए प्रेरित करती गई. ससुर से प्राप्त पूंजी को उन्होंने दिन दूनी रात चौगुनी करने का जैसे संकल्प ले लिया था. अनवरत परिश्रम ने अपना रंग दिखा दिया था. सफलता की सीढ़ियां फलांगते हुए दिनेश पिछले कुछ वर्षों से नगर के चोटी के उद्योगपति हैं. धन की ताक़त का अन्दाज़ा मोहिनी को हो गया है. वे लोग, जो 'मेंढकी' कहकर उनका मज़ाक उड़ाते थे, आज 'मोहिनी', 'मोहिनी दीदी' कहते हुए उनके आगे-पीछे घूमते हैं. वैभव और सम्मान ने उनके मन की सारी कुंठाओं को समाप्त कर दिया था, किन्तु आज एक बार पुनः यह सच्चाई अपनी नग्नता के साथ उनके सम्मुख आ गई कि जो भी उनसे भावनात्मक स्तर पर जुड़ा है, वह उन्हें लेकर समाज के सम्मुख कहीं न कहीं लज्जित अवश्य है. हां, दिनेश ने ऐसा आभास उन्हे कभी नहीं होने दिया. तो क्या वह उनसे कहीं भी नहीं जुड़े हैं? क्या उनकी अतिशय व्यस्तता मोहिनी से दूर रहने का औचित्य प्रकट करने के लिए है? संशय का बिच्छू उनके मन में बार-बार डंक मारने लगा. इतने दिनों तक भ्रम का चश्मा लगा कर अपने आप को भरापूरा जो समझती आई है, उनकी यह समझ कितनी खोखली निकली. उन्हें लगा कि वह तो चिर एकाकिनी हैं. आसमान में पीछे छूट गए एकाकी पंक्षी का चीत्कार उनकी अन्तरात्मा के हाहाकार से घुल-मिलकर आंसुओं के रूप में फूट पड़ा.

नौकर खाने के लिए बुलाने आया तो अपने लिए उन्होंने मना कर दिया है. भवेश को खाना खिलाने के लिए कह दिया था.

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"क्या तबीयत तुम्हारी ठीक नहीं है? डॉक्टर साहब को बुला लूं?" दिनेश की आवाज़ ने उन्हें चौंका दिया, उन्होंने दीवार घड़ी पर दृष्टि डाली, रात के ग्यारह बज रहे थे. पांच घण्टों में जैसे एक युग की परिक्रमा पूरी करके पुनः वर्तमान में लौट आई हों. उन्होंने दिनेश की ओर आंखों के कोने से देखा, गत् बीस वर्षों की आर्थिक समृद्धि दिनेश के रूपरंग, वेशभूषा में आमल परिवर्तन कर दिया है. कितना भव्य और गरिमामय व्यक्तित्व हो गया है उनका और मोहिनी स्वयं मोटापे ने, लम्बाई-चौड़ाई बराबर कर दी है. उस पर से उठा हुआ कुबड़, मन के आईने में अपनी छवि को देखकर वह मुरझा गई.

दिनेश ने अपने हाथ से उनका माथा टटोला, "बुखार तो नहीं लगता, मैं डॉक्टर को फोन कर देता हूं. आकर चेकअप कर लेंगे."

आज मोहिनी को सब कुछ बनावटी लग रहा था, "मुझे कुछ नहीं हुआ है, डॉक्टर को बुलाने की आवश्यकता नहीं है."

"ठीक है, फिर चलो, चल कर खाना खा लो."

"मुझे भूख नहीं है. आप भोजन कर लीजिए."

"भवेश भी अभी तक भूखा है. बिना तुम्हारे सामने बैठे उसने आज तक कभी खाया है? उसे क्षमा कर दो, वह बहुत दुखी है."

तो भवेश ने दिनेश को बता दिया है. उन्हें इससे क्या? उदासीनता से मोहिनी ने कहा, "उसने किया क्या है? मेरे कारण सभी लजित रहते हैं. यदि वह भी है तो क्या हो गया." कुछ क्षणों तक चुप्पी छाई रही, फिर उसे बेधते हुए दिनेश के स्वर उनके कानों में बजने लगे, "मोहिनी, अपनी कुंठा को अपने ऊपर हावी मत होने दो. ऐसे सोचो तो कमी सब में है. पुराने परिचित मुझे देख कर मुस्कुराते हैं तो क्या मैं समझ लूं कि वे मेरे अतीत पर व्यंग्य कर रहे हैं?

यह तुम्हारा भ्रम है कि भवेश ने तुम्हारा अपमान किया है. इस उम्र में अधिकांश लड़के अपनी मित्र-मंडली में माता-पिता के अचानक पहुंचने पर क्षुब्ध हो जाते हैं, ऐसे में उनका व्यवहार अस्वाभाविक हो जाता है. इसका बुरा मत मानो. हम लोगों के रूप-रंग की उम्र तो बीत गई है. अब तो हमारे गुण, हमारी सफलता ही हमारे व्यक्तित्व की कसौटी है, जिसमें तुम पूरी तरह सफल हो." अब तक भवेश भी वहां आ गया था.

"मुझे क्षमा कर दो मां, खाने चलो, मुझे बहुत भूख लगी है."

हाथ टेक कर खड़ी होने लगीं तो वह लड़खड़ा गई, इतनी देर तक एक स्थिति में बैठे रहने से घुटने जैसे जुड़ गए थे. एक तरफ़ से पति ने और एक तरफ़ से पुत्र ने उन्हें सहारा दिया तो उन्हें लगा कि अकेलेपन का संत्रास धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है.

- इन्दिरा राय

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