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कहानी- पलाश के फूल (Short Story- Palash Ke Phool)

मैं पेड़ से टिककर अधलेटा था, तभी पलाश का एक फूल अपनी शाख से टूटकर मेरे पैरों पर आ गिरा. मैंने उसे उठा लिया था. मैंने अनु की तरफ़ देखा. वो भी मुझे ही देख रही थी. मैंने पलाश के फूल को हाथों से मसल दिया. उसका रंग मेरी उंगलियों पर फैल गया था. मैंने रंग भरी उंगलियां अनु के माथे की ओर बढ़ा दी थी. अनु ने कोई जवाब नहीं दिया बस अपनी आंखें बंद कर ली. मैंने पलाश के रंगों से उसकी मांग भर दी थी.


                                                                                                                                                                                                                                      रंग भला किसे नहीं भाते. लाल, पीले, हरे… हर तरह के रंग, लेकिन इन सब रंगों पर सबसे भारी होता है प्रेम का रंग. ये रंग कभी मेरे जीवन से भी होकर गुज़रा था. रीवा से शहडोल के रास्ते में एक जगह पड़ती है, गोहपारू. गोहपारू उतरकर आपको जैतपुर के लिए बस मिल जाएगी. गोहपारू से जैतपुर की दूरी यही कोई 40 किलोमीटर की होगी. रास्ता इतना ख़राब की 40 किलोमीटर में आपको 400 किलोमीटर की थकान हो जाए. मगर गर्मियों के दिनों में इस रास्ते की ख़ूबसूरती देखते बनती थी. रास्ते में दोनों तरफ़ पलाश के घने जंगल थे. गर्मियों में जब पलाश के फूल दहकते, तो ऐसा लगता मानो आसमान से आग बरस रही हो.
आज से क़रीबन 20 साल पहले मैं जैतपुर के एक शासकीय कार्यालय में पदस्थ था. मेरे सिवाय कार्यालय में एक चपरासी भी था. स्टाफ के नाम पर बस हम दोनों ही थे. यह बहुत पिछड़ा इलाका था. शाम होते ही गांव के लोग सो जाते. बिजली के दर्शन यदा-कदा ही होते थे. हर सामान के लिए शहडोल या गोहपारू जाना होता था.
मुझे जैतपुर में रहते दो साल से ज़्यादा बीत चुके थे. जून का महीना था. मैं सुबह ही किसी काम से गोहपारू गया हुआ था. दोपहर तक मेरा काम ख़त्म हो गया और अब मैं अपनी स्कूटर पर जैतपुर के लिए वापस निकल पड़ा था. गर्म हवाएं मेरे बदन को झुलसा रही थीं. पलाश के फूल झड़ कर नीचे ज़मीन पर एक चादर बना चुके थे. मैं क़रीबन आधा रास्ता तय कर चुका था, जब उस सूनी सड़क पर किसी ने मुझे आवाज़ दी थी. आवाज़ सुनते ही मैंने ब्रेक लगाया था और पलटकर देखा था. एक लड़की बड़ा-सा बैग कंधे पर टांगे मुझे ही आवाज़ दे रही थी.
“आप जैतपुर की तरफ़ जा रहे हैं क्या? अगर जा रहे हों, तो मुझे लिफ्ट दे देंगे?” उसने क़रीब आकर हांफते हुए कहा था.
उसे देखते ही एक पल को जैसे सब ख़ामोश सा हो गया था. उसका गुलाबी जिस्म तपती दोपहर में आंखों को ठंडक दे रहा था. उसने अपनी पेशानी पर उभर आई पसीने की नन्हीं बूंदों को हथेली के पिछले हिस्से से पोंछा और अपना सवाल दोहराया.
“आप जैतपुर की तरफ़ जा रहे हैं क्या?”
इस बार एक सूं की आवाज़ मेरे कानों के क़रीब से गुज़री थी और मैं एक झटके से स्वप्न से बाहर आया था.
“हां, उधर ही जा रहा हूं, चलिए, आपको छोड़ दूंगा.” मैंने जवाब दिया. मेरे जवाब देते ही वो स्कूटर की पिछली सीट पर बैठ गई थी.
“जैतपुर में कहां?” मैंने स्कूटर चलाते हुए पूछा.
“पंचायत ऑफिस, आज मेरा नौकरी का पहला दिन है. भोपाल से रीवा तक ट्रेन में आई थी. फिर शहडोल वाली बस से गोहपारू तक. वहां से कोई बस मिली नहीं, तो एक लड़के से लिफ्ट ले ली. वो आधे रास्ते आकर दूसरी ओर मुड़ गया, तो आपको आवाज़ दे दी. पता नहीं था इस रास्ते में गाड़ियां नहीं चलतीं, वरना कोई टैक्सी कर लेती.” लड़की ने मेरे सवाल के बदले कहा.

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जल्द ही हम ऑफिस के बाहर थे. कोई ख़ास कैंपस तो था नहीं, स़िर्फ कुछ कच्चे कमरे और तीन पक्के कमरे थे. उनमें से एक को मैंने ऑफिस और एक को अपना आशियाना बना रखा था, बाकी तीसरा कमरा बंद था. कच्चे कमरों में कार्यालय का पुराना सामान रखा हुआ था.
ऑफिस पहुंचते ही लड़की ने मुझे शुक्रिया कहा और अंदर की तरफ़ चली गई. लड़की के जाते ही मैं ताला खोल अपने कमरे में आ गया. मैंने एक नज़र दीवार पर लगे छोटे शीशे में डाली. मेरा चेहरा गर्मी से मुरझा गया था. मैंने कमरे के अंदर बने बाथरूम में मुंह-हाथ धोया और लगभग दस मिनट बाद ऑफिस की तरफ़ चल पड़ा.
मुझे देखते ही उसने अचरज से कहा था.
“आप यहां?”
“जी.” मैंने जवाब दिया और उसके सामने की कुर्सी पर जाकर बैठ गया, जिस पर लिखा था- गौतम कामथ, प्रभारी.
“गौतम कामथ… मैं ही हूं इस कार्यालय का प्रभारी.” इस बार मैंने उसके बिना कुछ पूछे ही कहा था.
मेरे इतना कहते ही वो खड़ी हो गई थी.
“सॉरी सर, मैंने आपको पहचाना नहीं.”
“कोई बात नहीं, वैसे आपने अपना नाम नहीं बताया?”
“सर, मेरा नाम अनु है, अनु सिंह.”
“ओके मिस अनु, वैसे मिस अनु ठीक रहेगा न?” मैंने कहा और उसने सहमति में मुस्कुराकर सिर हिला दिया था. उसके बाद हम उसके ज्वाइनिंग के पेपर तैयार करने में लग गए थे. मुझे कोई ख़ास काम तो था नहीं और फिर स्टाफ के नाम पर वहां स़िर्फ मैं ही था, तो हम दोनों साथ-साथ उसके काग़ज़ तैयार करने लगे. बिजली आज पूरे दिन से नहीं थी और शाम होते-होते तक हम दोनों पसीने से तरबतर हो चुके थे.
मैं थककर अपनी कुर्सी पर जा बैठा था. अनु भी गर्मी से परेशान सामने कुर्सी पर बैठी क़रीबन हांफने लगी थी.
“मिस अनु, पहली नौकरी की ढेर सारी शुभकामनाएं. वैसे आपका आज का काम ख़त्म हो चुका है, आप कल से ऑफिस आ सकती हैं.” मैंने चेहरा पोंछते हुए कहा था.
“शुक्रिया सर. सर वैसे मैं सोचकर आई थी की आज रात किसी होटल में कमरा ले लूंगी, और फिर एकाध दिन में कमरा तलाशकर यहीं रहना शुरू करूंगी, लेकिन लग रहा है यहां होटल मिलना मुश्किल है. सर कोई कमरा ही किराए से मिल जाता तो…” अनु ने सवाल किया था.
“अनुजी, कमरा पहली बात तो मिलेगा नहीं और अगर मिल भी गया, तो आप रह नहीं पाएंगी, लेकिन मेरे पास एक रास्ता है. ऑफिस के बगल में जो पक्के कमरे हैं, उनमें से एक में मैं रहता हूं और एक मैंने बंद कर रखा है. अगर आप उसमें रहना चाहें, तो मैं वो आपके लिए खुलवा सकता हूं.”
मेरी बात सुनकर अनु सोच में पड़ गई और फिर लगभग पांच मिनट की ख़ामोशी के बाद उसने कहा था कि वो उस कमरे में रहना चाहेगी.
उसकी हां होते ही मैंने प्यून को कमरा खोलने और साफ़ करने कह दिया था.
एक घंटे बाद अनु अपने कमरे में थी. शाम घिर चुकी थी. बिजली अब तक नहीं आई थी. मैंने खिड़की खोल मोमबत्ती जला दी. खिड़की खोलते ही ठंडी हवा का एक झोंका मेरे मन  को सहला गया था. अनु आज रात कहां सोएगी और क्या खाएगी, हम दोनों ही इस सोच में थे. आज उसकी नौकरी का पहला दिन था और वो इस तरी़के से उदास रहे, सोचकर मुझे अच्छा नहीं लग रहा था. रात नौ बजे के लगभग मैंने अनु के दरवाज़े पर दस्तक दी. दरवाज़ा कुछ देर से खुला था. अनु अब नए आसमानी रंग के कुर्ते में थी. उसके बाल अब सलीके से नहीं बने थे, बल्कि उन्हें हड़बड़ाहट में समेटा गया था. कमरे में अंधेरा था. एक छोटी टार्च कमरे को रौशन करने का भरसक प्रयास कर रही थी.
“क्या मैं अंदर आ सकता हूं?” मैंने दरवाज़ा खुलते ही कहा था.
“हां सर आइए न.” अनु ने जवाब देकर रास्ता छोड़ दिया.
हाथ में स्टील का डिब्बा थामे मैं अंदर चला गया था.
अनु ने एक चादर नीचे ज़मीन पर बिछाई हुई थी और बैग को तकिया बना लिया था. बैग के कोने में बिस्किट का एक अधखुला पैकेट मोड़ कर दबा हुआ दिखाई दे रहा था. शायद जब मैं यहां आया, तो अनु बिस्किट खा रही थी. ज़ाहिर सी बात है सुबह से उसने कुछ नहीं खाया था, भूख तो लगी ही होगी. मुझे उसकी इस हालत पर दया आ गई थी. अनु ने कुछ नहीं कहा. वो कहती भी तो क्या. कमरे में बैठने की भी कोई व्यवस्था नहीं थी. मैं स्वयं ही नीचे बिछी चादर के एक कोने में बैठ गया. अनु ने कुछ नहीं कहा और दूसरे कोने में बैठ गई.

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“अनुजी, आज आपकी नौकरी का पहला दिन है. नियमानुसार एक धमाकेदार पार्टी होनी चाहिए थी. पकवान बनने थे. आपको सबसे बेहतर बिस्तर पर सोना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्य से आज ऐसा कुछ भी नहीं है. पर मेरा यक़ीन मानिए ये आपके आने वाले सबसे बेहतर जीवन की एक मुश्किल शुरुआत है.” मेरी बात सुनकर अनु ने कोई जवाब नहीं दिया. मैंने आगे कहा.
“मेरे पास कोई पकवान तो नहीं है, लेकिन कुछ दिन पहले जब घर से आया, तो मां ने ज़बरदस्ती लड्डू पैक कर दिए थे और आलू के परांठे और टमाटर की चटनी मैंने हम दोनों के लिए बना लिए हैं. सॉरी, लेकिन इससे बेहतर मैं आज रात यहां कर नहीं सका.”
“सॉरी की बात नहीं है सर और आप खाना खा लीजिए, मुझे भूख नहीं है.”
“आपका तो नहीं पता, पर मुझे बहुत भूख लगी है, लेकिन अगर आप नहीं खाएंगी, तो फिर मुझे भी नहीं खाना. प्लीज़ खा लीजिए मुझे सच में भूख लगी है.” मैंने कहा.
मेरी बात सुनकर अनु मुस्कुरा पड़ी थी. जल्द हम दोनों ज़मीन पर बैठ मोमबत्ती की रोशनी में खाना खा रहे थे. खाने के बाद जाते हुए मैंने अनु से कहा.
“अगर नींद न आए, तो दीवार पर ग्लास मारकर आवाज़ कर देना मैं समझ जाऊंगा.”
“जरूर.” अनु ने हंसकर जवाब दिया और मैं कमरे में लौट आया था.
मैं बिस्तर पर करवटें बदलता रहा था. नींद अनु को भी नहीं आई थी. उसने दीवार पर ग्लास मार इस बात का एहसास मुझे कराया था. रात के किस पहर में हम दोनों सोए थे, मुझे पता नहीं चला था.
अगली सुबह हम दोनों जल्द ही गोहपारू निकल गए थे अनु के लिए ज़रूरत का सामान लेने और शाम ढलने के पहले वापस लौट आए थे. मैं बहुत थक गया था, तो कमरे में जाकर आराम करने लगा था. शाम सात बजे के क़रीब अनु ने मेरे दरवाज़े पर दस्तक दी थी. आने का कारण उसने बताया कि उसने आज रात का खाना मेरे लिए भी बना लिया है. मैंने मना करने की कोई औपचारिकता भी नहीं की थी. हाथ-मुंह धोकर उसके कमरे में पहुंच गया था और बदले हुए कमरे की रूपरेखा देखकर मेरा मुंह खुला का खुला रह गया था.
कमरे के एक कोने में छोटा किचन निर्मित हो चुका था. खिड़की के नीचे चटाई बिछाकर एक नया गद्दा नए तकियों के साथ बिस्तर का रूप ले चुका था. कुर्सियां आ चुकी थीं. पानी का मटका, नए परदे, सब लगाए जा चुके थे. मेरा कमरा दो साल में इतना व्यवस्थित नहीं हुआ था, जितना अनु का एक घंटे में हो गया था. जल्द ही हम खाना खाने बैठ चुके थे.
सोते वक़्त आज मैंने दीवार पर ग्लास मारकर नींद न आना जताया था. अनु ने भी ठीक वैसे ही उत्तर दिया था. आज फिर हम दोनों रात के किसी पहर में सो गए थे.
वक़्त बीतता रहा. अनु नई जगह में ख़ुद को ढालती रही. मैं वक़्त के साथ उसके सबसे क़रीबियों में शामिल होता जा रहा था. अब हम स़िर्फ साथ काम करने वाले सहकर्मी नहीं रहे थे, उससे थोड़ा ज़्यादा हो गए थे. शाम ढलते ही सारा गांव सो जाता और हम निकल पड़ते गांव की गलियों में. अंधेरे में डूबी गांव की कच्ची-सूनी गलियां हमारे बीच पनपते प्यार की गवाह होती जा रही थीं. हम अंधेरे में एक-दूसरे का हाथ थामे रहते. किसी के आने की आहट होती, तो हाथ छोड़ दूर हो जाते और साए के गुज़रते ही फिर एक-दूसरे में समा जाते. कितनी ही रातें हम दोनों ने चांद को देखकर बिताई थीं. कितने ही बार मैंने उंगली से उसकी पीठ पर अपना नाम लिखा था. उसके जिस्म की ख़ुशबू मेरे हाथों से रात भर में रुख़सत भी न हो पाती और सुबह हम फिर साथ हो जाते.
साल बीत गया था. गर्मियां वापस आ गई थीं. मई के शुरुआती दिन थे. पलाश के फूल सुलगने लगे थे. आज हम दोनों ने नज़दीक शहर जाकर घूमने-फिरने का प्लान किया था. हम 11 बजे के क़रीब घर से निकल गए थे. आधा रास्ता पार होते तक अचानक स्कूटर ख़राब हो गई थी. अभी हमें कम से कम 15 किलोमीटर और आगे जाना था. मैंने स्कूटर को धक्का मार शहर तक ले जाने की कोशिश शुरू कर दी थी. अनु सिर को दुपट्टे से छिपाए साथ-साथ ही चल रही थी. मैं पसीने से लथपथ हो चुका था. मैंने स्कूटर रोड़ के किनारे खड़ी कर दी और नज़दीक एक पेड़ की छाया में आकर बैठ गया. अनु भी मेरे बगल में आकर बैठ गई थी. मेरी सांसें ज़ोर-ज़ोर से चल रही थीं. अनु ने मेरा हाथ थाम रखा था.


मैं पेड़ से टिककर अधलेटा था, तभी पलाश का एक फूल अपनी शाख से टूटकर मेरे पैरों पर आ गिरा. मैंने उसे उठा लिया था. मैंने अनु की तरफ़ देखा. वो भी मुझे ही देख रही थी. मैंने पलाश के फूल को हाथों से मसल दिया. उसका रंग मेरी उंगलियों पर फैल गया था. मैंने रंग भरी उंगलियां अनु के माथे की ओर बढ़ा दी थीं. अनु ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आंखें बंद कर लीं. मैंने पलाश के रंगों से उसकी मांग भर दी थी. अनु ने अब भी कुछ न कहा. वो बस मेरे गले से लग गई थी. हम दोनों उसके बाद घंटों तक पेड़ की छांव में बैठे रहे. कुछ देर बाद हमारी सांसें लौट आई थीं और हम फिर शहर की तरफ़ चल पड़े थे. कुछ घंटों बाद हम शहर में थे. स्कूटर बन गई थी. हमने वापस घर जाने का निर्णय किया.
हवाएं अब ठंडी हो चली थीं. अनु मेरे कंधे पर हाथ रखे बैठी रही. उसके माथे का रंग सूख चुका था, मगर उसने उसे हटाया नहीं था. उस शाम ने हमें और भी क़रीब ला दिया था. आज महीनों बाद अनु ने दीवार पर आवाज़ करके नींद न आने का इशारा किया था. मैंने भी उसी अंदाज़ में उसे जवाब दिया. हम दोनों की आंखों से आज नींद गायब थी. अगली सुबह अनु बहुत ख़ूबसूरत लग रही थी. मैंने सोच लिया था कि जल्द ही मैं घर पर शादी की बात कर लूंगा.


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अगले कुछ महीने बहुत ख़ूबसूरत बीते. बारिश के दिन आने को थे. कुछ दिनों की छुट्टियां थीं, तो हम दोनों ही अपने-अपने घर गए हुए थे. मैंने पूरा एक हफ़्ता घर पर बिताया, पर अनु के बगैर मेरा मन नहीं लगा, तो वापस जैतपुर लौट आया. बारिश और अनु दोनों के जल्द आने की आस लगाए मैं अपने दिन गुज़ारता रहा. एक दोपहर मैं ऑफिस में बैठा था, जब डाकिया आकर मुझे एक लेटर देकर गया. मैंने लेटर देखा. वो अनु के ट्रांसफर का लेटर था. उसका तबादला जैतपुर से उज्जैन कर दिया गया था. स्कूटर लेकर मैं भाग पड़ा था गोहपारू के लिए. पीसीओ पहुंचते-पहुंचते जाने कितनी बार मरा था मैं. डायरी से उसका नंबर डायल करते जाने कितनी बार हाथ कांपे थे मेरे. मैंने हिम्मत करके उसे फोन किया. फोन रिसीव नहीं हुआ था. मैं लगातार उसे कॉल करता रहा. फोन बार-बार बज कर ख़ामोश हुए जा रहा था. आख़िरकार रात दस बजे अनु ने फोन उठाया था.
“अनु, एक बुरी ख़बर है.” मैंने दिल पर हाथ रख कर कहा. “तुम्हारा ट्रांसफर हो गया है उज्जैन के लिए.”
“क्या? मेरा ट्रांसफर हो गया? ये तो बहुत ख़ुशी की बात है.” अनु ने चहकते हुए कहा था.
उसकी बात सुनकर मुझे एक और शॉक लगा.
“तुमने कभी बताया नहीं कि तुमने ट्रांसफर के लिए अप्लाई किया है?” मैंने रुंधे गले से पूछा.
“कोशिश कई बार की गौतम, लेकिन कभी कह नहीं पाई. तुम्हें याद है वो दिन जब तुमने कहा था कि हम शादी करेंगे. इस गांव में एक घर बसाएंगे और न जाने क्या-क्या सोचते रहे थे तुम. लेकिन मैंने कभी कोई जवाब नहीं दिया था. उस दिन मैं ये कहना चाहती थी कि मुझे नहीं पसंद तुम्हारा यह सपना. अभी मेरी उम्र ही कितनी हुई है. मुझे आगे और तरक़्क़ी करनी है, नाम कमाना है, दुनिया देखनी है. मुझे इस छोटी जगह में जीवन नहीं बिताना. हमारे बच्चों को यहां नहीं रखना, लेकिन कभी कह नहीं पाई. तुम इस नौकरी में, इस गांव में, इस सपने में इतने मशगूल थे कि तुमने ये कभी जानना ही नहीं चाहा कि मैं क्या सोचती हूं. तुम सपने बुनते रहे, लेकिन उस सपने में मुझे ़कैद करने की सोचते रहे. मैं तुम्हारा साथ चाहती हूं गौतम, लेकिन इसके लिए तुम्हें मेरे साथ आना होगा. मेरे साथ उज्जैन चलो. हम शादी करेंगे, घर बनाएंगे, बोलो आ सकोगे मेरे साथ?” उसने कहा और मेरे जवाब का इंतज़ार करती रही.
मेरी कुछ देर की ख़ामोशी के बाद उसने कहा, “गौतम, मैं तुम पर कोई दबाव नहीं बना रही. तुम अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जी सकते हो, लेकिन तुम्हारे सपनों के लिए मैं अपने सपने नहीं मार सकती. आई एम सॉरी गौतम.” उसने कहा और फोन रख दिया.
उसके कहे शब्द घंटों तक मेरे ज़ेहन में कौंधते रहे. अचानक बादल घिर आए थे. हवाएं चलने लगी थीं. रात भर बादल और मेरी आंखें जैतपुर को भिगो देने की नाकाम कोशिश करते रहे.
अगले दिन मैंने अनु को कॉल नहीं किया. उसकी अगली दोपहर मैं ऑफिस में था जब अनु आई. उसके साथ एक लड़का भी था. उसने बताया कि उसके किसी रिश्तेदार का लड़का है. मैंने अब तक उसकी किसी भी बात का कोई भी जवाब नहीं दिया था. उसने मुझसे जो भी पेपर मांगे, मैंने चुपचाप दे दिए. जहां दस्तख़त करने कहा, मैंने कर दिए. वो जाकर अपने कमरे में सामान बांधने लगी थी. मैं चुपचाप उसके दरवाज़े के बाहर हाथ बांधे खड़ा उसे ये सब करते देखता रहा. जल्द ही उसका सामान बंध चुका था. उसका मुंहबोला भाई एक-एक करके सब सामान गाड़ी में रखता जा रहा था. जल्द ही कमरा खाली हो चुका था. उसने दरवाज़ा बंद कर दिया.
साथ आए लड़के ने कहा.
“देख लो, कुछ रह तो नहीं गया है.”
“देख लिया, कुछ नहीं रह गया है.” अनु ने जवाब दिया.
जब उसका यहां कुछ रह ही नहीं गया था, तो भला मैं क्या कहता. मैं अपनी जगह पर बुत बना रहा. अनु मेरे क़रीब आई. उसने कुछ कहना चाहा. उसके होंठ हिले, मगर फिर उसने कुछ नहीं कहा और जाकर गाड़ी में बैठ गई.
गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ गई थी. धुंध का एक गुब्बार पीछे रह गया था.


मैं अब भी अपनी जगह पर खड़ा था. जाने कहां से पलाश का एक फूल उड़ता हुआ मेरे कदमों में आ गिरा. ऐसे जैसे वो मुझसे माफ़ी मांग रहा हो. ये पलाश के फूलों का मौसम नहीं था. मैंने झुककर उसे उठा लिया. उसमें अब वो चमक नहीं थी. पलाश के फूलों ने अब दमकना बंद कर दिया था.

डॉ. गौरव यादव

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