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कहानी- प्रायश्चित (Short Story- Prayshchit)

"कोशिश?.. कौन सी कोशिश बाकी रह गई मां?" रोते-रोते उसकी आंखें सूज गई थीं.
"मेरी मम्मी, दीदी बताती रहीं कि सज-संवर कर रहो, अच्छा खाना बनाओ… सब किया. फिर एक महीने बाद विनय के फोन की तलाशी लेने पर सच सामने आया कि मैं उनकी ज़िंदगी में हूं ही नहीं… मैं क्या करूं मां, आप बताइए…"
ईश्वर क्या करवाना चाहता है मुझसे? आरोपी भी मैं हूं, फ़ैसला भी मुझे सुनाना है.

"क्या हुआ मां? आपने अचानक ऑफिस फोन करके यहां बुला लिया?" नेहा हड़बड़ाई हुई थी.
"क्यों, मैं अपनी बहू के साथ इस शानदार रेस्तरां में कॉफी नहीं पी सकती हूं?" मैंने अपना स्वर सामान्य करने की बहुत कोशिश की, लेकिन हो नहीं पाया.
"नेहा!.. दरअसल घर पर इतने लोगों हैं कि हम लोग खुलकर बात नहीं कर पाते, इसीलिए यहां बुलाया. तुम दोनों में… मतलब विनय और तुम्हारे बीच सब सही चल रहा है ना?"
मेरे प्रश्न पूछने भर की देर थी कि उसके चेहरे पर वही सन्नाटा पसर गया, जो सुबह अम्माजी की बात…"देखो बहू! पता नहीं कब यमराज मुझे लेने आ जाएं… जल्दी से मुझे परदादी बना दो." सुनकर पसर गया था. ना लज्जा से गाल गुलाबी हुए थे, ना मुस्कान खिली थी, बस यंत्रवत अपना बैग उठाकर ऑफिस के लिए निकल गई थी.
"मां, विनय और कैथलीन… अभी भी साथ हैं… वो अलग नहीं हुए हैं!" वो शांत भाव से कॉफी पीते हुए बोली.
मेरे हाथ से कप छूटते-छूटते बचा. इसको सब पता है? एक बार जी में आया भोलेपन से पूछूं, "कौन कैथलीन?" फिर अपनी सतही सोच पर घिन आ गई… हिम्मत जुटा कर पूछा, "अभी भी साथ हैं… मतलब?"

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"मतलब आप सब लोगों ने मुझे बलि का बकरा बनाकर, सजाकर काटने के लिए विनय से शादी करवाई," नेहा रुलाई रोकते हुए फट पड़ी.
"आपको पता था ना कि विनय और कैथलीन का इतने सालों से अफेयर चल रहा था. वो अलग धर्म की है, इसीलिए आप लोग तैयार नहीं हुए, लेकिन मुझे क्यों बीच में घसीटा… वही बात हुई ना कि एक औरत होकर भी आप औरत की दुश्मन बन गईं?"
मुझे कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया गया था. ग़लत आरोप नहीं लगाए जा रहे थे… सब जानते हुए भी दबाव बनाकर विनय को शादी के लिए राज़ी किया था.
"नेहा, हम सबको लगा था कि शायद शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा, कोशिश करो बेटा."
"कोशिश?.. कौन सी कोशिश बाकी रह गई मां?" रोते-रोते उसकी आंखें सूज गई थीं.
"मेरी मम्मी, दीदी बताती रहीं कि सज-संवर कर रहो, अच्छा खाना बनाओ… सब किया. फिर एक महीने बाद विनय के फोन की तलाशी लेने पर सच सामने आया कि मैं उनकी ज़िंदगी में हूं ही नहीं… मैं क्या करूं मां, आप बताइए…"
ईश्वर क्या करवाना चाहता है मुझसे? आरोपी भी मैं हूं, फ़ैसला भी मुझे सुनाना है.
"तुम क्या चाहती हो?"
"विनय खुलकर कह चुके हैं कि वो कैथलीन से कभी अलग नहीं होंगे… ऐसे में मेरा अलग होना ठीक है, हालांकि मुझे मालूम है कि दोनों घरों में कोई इस बात के लिए तैयार नहीं होगा…" उसने दयनीय भाव से मेरी ओर देखा. कितना झेला इस लड़की ने, इतने महीनों से… मेरा मन भर आया.
"मैं विनय को समझाने की एक और कोशिश करूंगी, नहीं माना तो तुम फ़ैसला लेने के लिए स्वतंत्र हो, मैं तुम्हारे साथ हूं नेहा."

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वो डबडबाई आंखें लिए अविश्वास से मुझे अपलक निहारती रही, "सच मां? आपको ये चिंता नहीं कि सब लोग क्या कहेंगे?"
"मुझे पता है लोग क्या कहेंगे," मैंने उसका हाथ थपथपाते हुए गहरी सांस ली, "यही कहेंगे कि हर बार औरत की दुश्मन औरत नहीं होती है!"

Lucky Rajiv
लकी राजीव

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Photo Courtesy: Freepik

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