Close

कहानी- राजा की मां (Short Story- Raja Ki Maa)

देर रात तक मैं अपने हाथों पर उसकी नरम हथेली के स्नेहिल स्पर्श की अनुभूति से रोमांचित होती रही. उसकी आंखों में सम्मोहन तो था ही, साथ ही एक अजीब सी बेचैनी और मां के लिए बेइंतहा प्यार और वियोग से मिला-जुला भाव. उस नन्हें व्यक्तित्व की जो बात मुझे सबसे अधिक अपनी तरफ़ आकर्षित कर रही थी, वह था उसका मुझ पर अटूट विश्वास.

मेंटल हॉस्पिटल में एक डॉक्टर के रूप में अपना प्रथम दिन सफलतापूर्वक व्यतीत करने के बाद मैं अपनी सफलता पर गौरवान्वित होती हुई गेट से बाहर निकल ही रही थी कि दोनों हाथों को फैलाकर मेरा रास्ता रोकने का प्रयास करता एक सात वर्षीय बालक मेरे पास आकर खड़ा हो गया.

"आंटी, मेरी मां पागल नहीं है, उसे छोड़ दीजिए."

मैं अपलक उस मासूम की आंखों में ताकती रही, जिसके अनंत विश्वास भाव ने मुझमें भी यह विश्वास भर दिया कि हो न हो इसकी मां पागल नहीं है.

आसपास जमा भीड़ और अपनी क्रीमती साड़ी की परवाह किए बगैर मैं घुटने के बल नीचे बैठ गई. उसके नन्हे से कंधों को थामते हुए मेरे शरीर में एक सिहरन सी हुई. जाने कैसी पीड़ा से भरा होगा इस बालक का मन. जाने कितनों से फ़रियादें, मिन्नतें करने के बाद बेहद विश्वास से भरकर आज उसने मुझसे एक विनम्र आग्रह किया होगा. मैं द्रवित हो गई, जीवन में पहली बार नन्हीं सी बांहों ने इस तरह रास्ता रोककर मुझसे कुछ चाहा था.

"बेटा, आज इस अस्पताल में मेरा पहला दिन था. अभी तो मैं किसी को भी नहीं जानती. तुम्हारी मां को भी नहीं जानती, क्या नाम है उनका? मैं कल उनकी जांच करूंगी और यदि वो सचमुच रोगी नहीं हैं, तो उन्हें छोड़ दूंगी."

मेरे आश्वासन से उसमें एक निश्चिंतता आ गई, कंधे पर रखे मेरे हाथों पर उसने अपनी छोटी सी हथेली धर दी.

"मेरी मां सबसे अलग है आंटी, वो बहुत सुंदर है. गोरी है, उसके बाल लंबे हैं, आंखें नीली हैं, और मां की आंख के पास एक तिल भी है. उसका नाम है, रोली... रोली सहाय." अपनी मां के सौंदर्य का चित्रण करते हुए उसकी आंखें फैल गईं. मानो उसकी नज़र में सारे संसार में उसकी मां से ज़्यादा सुंदर कोई भी नहीं.

"कल मैं तुम्हारी मां की ज़रूर जांच करूंगी."

मैंने उसके गालों को थपथपाया और आगे बढ़ गई. सड़क से दूसरी ओर मुड़ने तक मैंने कई बार मुड़-मुड़ कर देखा. अपने दाएं हाथ के अंगूठे को चूसता वह बालक अपलक मुझे जाते हुए देख रहा था.

जीवन में पहली बार किसी ने इतनी सहजता से मुझे अपनी तरफ़ आकर्षित किया था. बार-बार लग रहा था कि क्वार्टर की तरफ़ बढ़ते अपने कदमों को मोड़ लूं और जाकर उस बच्चे की मां के बारे में विस्तार से बातें करूं.

देर रात तक मैं अपने हाथों पर उसकी नरम हथेली के स्नेहिल स्पर्श की अनुभूति से रोमांचित होती रही. उसकी आंखों में सम्मोहन तो था ही, साथ ही एक अजीब सी बेचैनी और मां के लिए बेइंतहा प्यार और वियोग से मिला-जुला भाव. उस नन्हें व्यक्तित्व की जो बात मुझे सबसे अधिक अपनी तरफ़ आकर्षित कर रही थी, वह था उसका मुझ पर अटूट विश्वास.

यह भी पढ़ें: स्पिरिचुअल पैरेंटिंग: आज के मॉडर्न पैरेंट्स ऐसे बना सकते हैं अपने बच्चों को उत्तम संतान (How Modern Parents Can Connect With The Concept Of Spiritual Parenting)

कहां रहता होगा वह? कैसे पता चला होगा उसे कि मैं इस मेंटल अस्पताल की नई डॉक्टर हूं?

रात में नींद आई भी, तो हर रोज़ गहरी निद्रा में सोने वाली मैं बार-बार चौंककर उठ जाती. ऐसा लग रहा था मानो वही बालक अस्पताल के गेट पर खड़ा मुझे पुकार रहा हो, विनती कर रहा हो कि मैं उसकी असहाय मां की रक्षा करूं, जो पागल नहीं है.

अपने जीवन के १५ वर्ष की नौकरी में मैं यह बात अच्छी तरह जानती थी कि पागलखाने में आने वाला हर व्यक्ति पागल नहीं होता. किसी मानसिक पीड़ा से थोड़ी देर के लिए अपने आप पर काबू न रख पाने वाले को भी कई बार घरवाले उपेक्षा से देखते हुए पागलखाने में भरती करवा देते हैं. कई बार तो उस बीमार शख़्स से मुक्ति पाने के लिए पागलखाने में प्रबंधकों को रिश्वत भी दी जाती है.

हो सकता है, इस बच्चे की मां के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ हो. मैंने मन ही मन निर्णय लिया कि मैं इस महिला के साथ यह अन्याय नहीं होने दूंगी.

बच्चे की नरम उंगलियों का ठंडा स्पर्श अभी भी मेरे हाथों पर था. मुझे उस बच्चे के प्रति अनायास उत्पन्न हुई ममता पर आश्चर्य हो रहा था.

सालों पहले जब निर्णय लिया था कि आजीवन विवाह नहीं करूंगी और अपना सारा जीवन उनके लिए समर्पित कर दूंगी, जो मानसिक रोगी हैं, तब मां ने बार-बार यही समझाया था कि पत्नी बनने के सुख से वंचित रहने का शायद जीवनभर कोई पछतावा न हो पर मां नहीं बनने की पीड़ा कभी न कभी अवश्य मेरी आत्मा को कचोटेगी और मुझे अपने निर्णय पर पछताना भी पड़ेगा. उनके समझाने का उ‌द्देश्य सिर्फ़ यही था कि पत्नी होने के लिए न सही, पर मां बनने के लिए तो मुझे अपना निर्णय बदल ही लेना चाहिए.

मुझे कोई पछतावा नहीं हुजा था. घर के आसपास घूमती रहती एक पागल निर्वस्त्र नारी की दयनीय स्थित से झकझोर उठी मेरी भावनाओं में अनायास ही सेवा भाव का जो सैलाब सालों पहले उठा था, उसमें अब तक रती भर भी अंतर नहीं आया था. मैं महसूस करती थी कि विवाह करके एक बंधन से बंधकर शायद मैं मानसिक रोगियों के प्रति उतनी समर्पित नहीं हो पाऊंगी, जितनी अविवाहित रहकर, पर पिछले कुछ घंटों से एक ख़्याल मुझे रह-रहकर विचलित कर रहा था कि मैं टूटकर प्यार करने या पाने की सुखद अनुभूति से वंचित रह गई हूं और यदि मेरा भी कोई ऐसा ही बेटा होता तो मेरे प्रति उसका अटूट स्नेह भाब भी शायद ऐसा ही होता.

मां बनने की चाहत बड़े चुपके से मेरे हृदय में प्रवेश कर गई और मुझे लगा कि शरीर के रोम-रोम से निकलकर एक एहसास ने मुझे मां बनने से वंचित रहने के निर्णय को बदलने के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया था. एक बालक से हुई छोटी सी मुलाक़ात मेरे दृढ़ संकल्प के लिए एक चुनौती साबित होती जा रही थी.

सुबह अपने अस्पताल के लिए मैं पैदल ही निकल पड़ी. मेरा क्वार्टर अस्पताल के काफ़ी नज़दीक था. मैंने देखा क्वार्टर के कुछ आगे बनी बिल्डिंग के गेट पर सलाखों को थामे वही बालक खड़ा था. शरीर पर कपड़े के नाम पर सिर्फ़ एक लाल चड्‌ढी थी. मुंह में ब्रश दबाए वो बालक अपलक मुझे ताक रहा था. सम्मोहित सी मैं उसके पास जाकर खड़ी हो गई.

"हेलो..." मैंने कहा तो वो मुस्कुरा दिया, मैंने पूछा, "यही रहते हो?"

"हां... आइए न?" उसने सादर अनुरोध किया.

"अभी नहीं बेटे, अभी तो काम पर जाना है न. लौटते हुए ज़रूर आऊंगी. तुम्हारी मां के बारे में तुम्हें बताना भी तो है.

यह भी पढ़ें: अनुपम खेर- मां के लिए उसके बेटे से बढ़कर कोई स्टार नहीं होता… (Anupam Kher- Maa Ke Liye Uske Bete Se Badkar Koi Star Nahi Hota…)

मां शब्द सुनते ही उसकी आंखों की कोर गीली हो उठीं. मैं स्नेहलिप्त हो उसे ताकती रही, ज़रूर इसकी मां ने इसे बहुत प्यार दिया होगा, तभी तो मां शब्द इसे रुला देता है. मैं तेजी से अस्पताल की ओर बढ़ गई, सिर्फ़ एक बार मुड़कर देखा तो वह पूर्ण विश्वास से भरकर मुझे बाय-बाय कर रहा था.

अस्पताल पहुंचकर मैं अधिक देर इंतज़ार नहीं कर सकी और तत्काल महिलाओं के वार्ड की तरफ़ मुड़ गई. चाहती तो रजिस्टर खोलकर बड़ी आसानी से रोली सहाय का नाम ढूंढ़ सकती थी, पर जाने क्यों मैं किसी को भी यह बताना नहीं चाहती थी कि रोली सहाय और उसका बेटा मेरे लिए बहुत अहमियत रखने लगे हैं.

महिलाओं के पूरे वार्ड मैंने तलाश किए. हर उस महिला की आंखों में ध्यान से झांका, जिसके बाल भी लंबे थे, ताकि आंख के तिल से रोली सहाय को पहचान सकूं. पर किसी भी महिला रोगी की आंख में तिल नज़र नहीं आया मुझे.

अंततः मुझे रजिस्टर खोलना ही पड़ा. क्लर्क मदद करना चाहता था, पर मैं उसके प्रस्ताव को अनसुना कर बड़ी तेजी से अपनी उंगली हर महिला रोगी के नाम पर रखती रही और 'रोली सहाय' के नाम पर मेरी उंगली रुक गई,

फाइल नं. ३० को निकालकर मैंने उस महिला की केस हिस्ट्री पढ़ी तो पता चला कि वह अविवाहित मां थी और प्रेमी की बेवफ़ाई से उसे ऐसा गहरा आघात लगा था कि वो पागल हो गई. पागलपन की अवस्था में जब उसे इस अस्पताल में भर्ती किया गया तब वह गर्भवती थी और इसी अस्पताल में उसने बच्चे को जन्म दिया था, जिसे नज़दीक के अनाथाश्रम के सुपुर्द कर दिया गया था.

मैं चकित थी कि आख़िर रोली सहाय गई कहां, उसका नाम तो रजिस्टर में था, पर वो नज़र नहीं आई. क्लर्क, जो मेरे बेरुखे व्यवहार को देखकर कार्यालय से बाहर चला गया था, अब नाली की सफ़ाई ढंग से न होने को लेकर सफ़ाई मजदूर पर बरस रहा था.

"मि. अजय..." मैंने ज़ोर से उसे पुकारा.

"जी मैडम..." वह एक ही आवाज़ में बड़ी फुर्ती से आकर मेरे पास खड़ा हो गया.

"मुझे एक महिला रोगी से मिलना है. नाम है रोली सहाय, उसे यहीं ले आओ."

"मैडम.. वो सीरियस पेशेंट है, इसलिए उसे कमरे से बाहर निकालते ही नहीं हैं. यही बेहतर होगा कि आप वॉर्ड में चले."

मैं चुपचाप उठकर उसके पीछे हो ली. यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि बालक ने मुझे जैसा बताया था, बिल्कुल उसके विपरीत थी उसकी मां. काला रंग, ठिगना कद, छोटी-छोटी आंखें, जिसमें तिल भी नहीं था. पता नहीं, उस लड़के ने मां के सौंदर्य का ऐसा वर्णन कैसे किया.

"मैडम, क्या राजा आपसे भी मिलने आया था." डरते-डरते क्लर्क ने पूछा.

"राजा... वो कौन है?"

"इस महिला का बेटा. सड़क की दूसरी ओर जो अनाथाश्रम है, वहीं रहता है. जाने कैसे उसे पता चल गया कि उसकी मां पागल है. पिछले छह-सात महीने से कई बार वो इस पागलखाने में घुस आया है और डॉक्टरों से लड़ भी पड़ता है कि उसकी मां को छोड़ दिया जाए, क्योंकि वो पागल नहीं है. मुझे लगा शायद वो आपसे भी..."

"हां... ठीक कह रहे हो तुम." में आश्चर्य से उस महिला की तरफ़ देखते हुए बोली.

"मैडम, कई बार राजा अपनी मां से मिलने के लिए ज़िद भी करता है, पर इतने सीरियस पेशेंट के पास बच्चे को लाना सख्त मना है, इसलिए बार-बार उसे समझा-बुझाकर वापस भेजना पड़ता है. कई बार तो वह अस्पताल की दीवार फांदकर भी अंदर आ जाता है."

सच्चाई जानने के बाद में और भी व्याकुल हो उठी. पूरे दिन तनावग्रस्त रही. मैंने राजा को वचन दिया था कि वापस लौटते हुए उसे उसकी मां की स्थिति से अवगत कराऊंगी और उस नन्हें से बच्चे को निराश करने के विचार मात्र से ही मेरे हृदय में अजीब सा दर्द उठने लगा था.

राजा एक ग़लतफ़हमी पाले हुए था कि उसकी मां पागल नहीं है और मैं उसके अबोध मन से इस ग़लफ़हमी को निकाल देना चाहती थी, क्योंकि अधिक दिनों तक इस ग़लतफ़ह‌मी को पाले रखने का अर्थ था- राजा का स्वयं मानसिक रोगी बन जाना.

शाम होते ही मैं उसी बिल्डिंग की ओर चल पड़ी. बिल्डिंग के बाहर ही 'आदर्श अनाथाश्रम' का बोर्ड लगा था. सवेरे जब मेरा ध्यान सिर्फ़ राजा की तरफ़ था, मेरी नज़र इस बोर्ड पर नहीं पड़ी थी.

गेट खोलकर मैं तेजी से अंदर की ओर चल पड़ी. पर तभी ठिठककर रुक जाना पड़ा. आश्रम के आंगन में झाडू लगाती एक महिला की पीठ पर एक छोटा सा बच्चा बंधा हुआ था. मैंने देखा, उस महिला की शक्ल हू-ब-हू वैसी ही थी, जैसी राजा ने मुझसे कही थी.

"राजा यहीं रहता है न?" मैने पूछा तो उसने अपनी नीली-नीली आंखों को मेरी तरफ़ उठा दिया, जिसमें से एक काला तिल झांक रहा था.

मैं चकित होकर उस स्त्री को देखती रह गई, वो कुछ कह भी रही थी पर मैंने कुछ भी नहीं सुना. हृदय अनायास ही तेजी से धड़कने लगा था. इस सच्चाई ने मुझे द्रवित कर दिया कि राजा इस महिला में अपनी मां को देखता है या फिर शायद उसने किसी और मां को इतने क़रीब से पहले कभी नहीं देखा होगा, इसीलिए उसने इस महिला के रूप को ही अपनी कल्पना में मां का रूप दे दिया था.

"तुम यहीं रहती हो?"

"नहीं.. यहां काम करती हूं, आश्रम की सफ़ाई और खाना पकाने में महाराज की मदद करती हूं."

"तुम राजा को जानती हो."

"हां, वह बहुत अच्छा लड़का है और मेरे बच्चे का भी बहुत ख़्याल रखता है."

मैं प्रबंधक के कमरे की ओर चल पड़ी. अंदर जाते हुए मैंने पल भर में ही एक बड़ा निर्णय ले लिया. सालों तक कई मानसिक रोगियों के संपर्क में रही थी. उनके रिश्तेदारों से उन्हें मिलने वाली उपेक्षाओं को क़रीब से महसूस किया था. उनके लिए तड़पने वाले अपनों को भी मैंने सांत्वना दी थी, पर ऐसा कोई आज तक नहीं मिला था, जिसकी पीड़ा में मैं इस कदर शरीक हो जाऊं कि उसका दर्द मेरा नितांत अपना दर्द बन जाए.

"मैं राजा को गोद लेना चाहती हूं." मैने प्रबंधक को देखते ही कहा, तो उनके चेहरे पर ख़ुशी की लहर नाच उठी.

"जी ज़रूर... यदि आप की तरह और भी लोग आगे आएं तो इन बच्चों का तो जीवन ही सुधर जाए, और राजा तो मां के लिए तड़पता रहता है. उसकी मां पागल है और डॉक्टर का कहना है कि वो कभी ठीक नहीं होगी."

जो भी औपचारिकताएं पूरी करनी थीं, उन सब की विस्तार से जानकारी लेते हुए मुझे लगा कि मेरे हृदय का बोझ उतर गया है. बस, अब राजा को समझाना भर बाकी था. उसके हृदय में मां की जो छवि थी, उसे बदलने का साहस भर करना बाकी था.

"सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद आप राजा को ले जा सकती हैं."

"जी... पर जाने से पहले में एक बार उससे मिलना चाहूंगी."

प्रबंधक ने चपरासी को भेजकर राजा को बुलवा लिया, राजा दौड़ता हुआ मेरे पास आ खड़ा हुआ.

"आप मेरी मां की ख़बर लाई हैं? मेरी मां पागल नहीं है न?" उसके चेहरे पर उल्लास था. ऐसा लग रहा था मानो वो इस विश्वास से दौड़ता चला आया है कि मैं उसकी मां को साथ लेकर आई हूं."

यह भी पढ़ें: लघु कथा- मां की सीख (Short Story- Maa Ki Seekh)

"हां, बेटे... मैं तुम्हारी मां की ख़बर लाई हूं, पर अभी वो बीमार हैं, उन्हें कुछ दिन और अस्पताल में रखना होगा. पर बेटे, जैसा तुमने कहा था तुम्हारी मां वैसी बिल्कुल नहीं है."

"अच्छा..." उसकी आंखें आश्चर्य से फैल गई. "फिर कैसी हैं वो."

"उसका रंग सांवला है- मेरी तरह, उसका कद ऊंचा है- मेरी तरह, उसके बाल भी छोटे हैं बिल्कुल मेरी तरह, उसकी आंख में तिल नहीं है और उसकी आंखें नीली भी नहीं है, बल्कि उसकी आंखें बड़ी और काली है बिल्कुल मेरी तरह... सच बेटे तुम्हारी मां बिल्कुल मेरी तरह है. इसीलिए मैं यह चाहती हूं कि जब तक तुम्हारी मां ठीक नहीं हो जाती, तुम मेरे साथ रहो मेरे बेटे बनकर, अपनी मां के ठीक होने तक मुझे मां कहकर बुलाया करो, ठीक है न."

वो अपलक मुझे देखता रहा. स्नेहलिप्त आंखों ने मुझमें वात्सल्य तलाशा और शायद उसने मेरी आंखों में ममता देख ली थी, इसीलिए तो वह "मां" कहता हुआ मेरे गले से लग गया.

देर तक राजा के कोमल शरीर को आलिंगनबद्ध किए हुए में रोमांचित होती रही. मैं तृप्त हो गई थी. मैंने राजा को उसकी मां से मिला जो दिया था.

- निर्मला सुरेन्द्रन

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES

Share this article