कहानी- रियल रिलेशनशिप (Hindi Short Story – Real Relationship)

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संजीव जायसवाल ‘संजय’

 

नितिन हर मामले में अच्छा था. रागिनी का पूरा ध्यान भी रखता, लेकिन हिसाब-किताब के मामले में कोई समझौता नहीं करता. उसका साफ़ कहना था कि समानता की पक्षधर लड़कियां जब लड़कों से बराबरी में खाना बनवा सकती हैं, तो आधा ख़र्च क्यूं नहीं उठा सकतीं?

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फ्लैट का दरवाज़ा खोल रागिनी भीतर आई और एसी चलाकर बिस्तर पर गिर पड़ी. मुंबई की उमस और लोकल की भीड़ कितनी जानलेवा होती है, यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है. अगर एसी न हो, तो यहां जीना ही मुश्किल हो जाए.
कुछ याद आते ही रागिनी ने अपने पर्स को खोलकर बिजली का बिल निकाला. 4500 रुपए का बिल और कल उसे जमा करने का आख़िरी दिन? एसी में भी रागिनी के माथे पर पसीने की बूंदें छलछला आईं. महीने की 20 तारीख़ है. आज सुबह तक कुछ रुपए थे उसके पास. सोचा था दोपहर में बिल जमा कर देगी, लेकिन ऑफिस में ही मां का फोन आ गया. पापा को आज फिर अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. बिल और पापा! दोनों में से पापा का ही पलड़ा भारी होना था और रागिनी ने दस हज़ार रुपए मां के अकाउन्ट में ट्रांसफर कर दिए थे. अब इतने पैसे भी नहीं बचे थे कि महीने के बाकी 10 दिन काटे जा सकें. ऐसे में बिल जमा करने की बात सोचना भी बेईमानी था.
नितिन अभी तक नहीं आया था. उसके कमरे का दरवाज़ा बंद था. क्या वह उससे बिजली का बिल जमा करने के लिए कहे? रागिनी ने सोचा, किंतु उसके साथ ही उसने नितिन का उत्तर भी सोच लिया. नितिन अपनी बात का पक्का था. जैसा तय हुआ था, उसने हर ख़र्चे का आधा बोझ उठाया था. न कम, न ज़्यादा. पिछले महीने बिजली का बिल उसने जमा किया था. इस महीने रागिनी की बारी थी. वह जानती थी कि नितिन इस महीने बिल जमा करने के लिए तैयार नहीं होगा.
उसने घड़ी की ओर देखा. 9 बज रहे थे. नितिन साढ़े नौ बजे से पहले कभी नहीं आता था.
कभी-कभी तो 11 भी बज जाते थे. उस दिन भी 9 बज रहे थे, जब वह मरीन ड्राइव के किनारे एक बेंच पर निराशा से सिर लटकाए बैठी थी.
“हे राग, तुम यहां कैसे?” अचानक एक स्वर सुन वह चौंक पड़ी.
सामने इंजीनियरिंग का उसका बैचमेट नितिन खड़ा मुस्कुरा रहा था. उत्तर देने की बजाय रागिनी ने प्रति प्रश्‍न किया, “तुम यहां कैसे?”
“अरे यार, मैं तो 2 साल से मुंबई में हूं. एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की पोस्ट पर भाड़ झोंक रहा हूं.” नितिन के स्वर में एक अजीब-सा दर्द उभर आया, फिर उसने रागिनी के चेहरे की ओर देखते हुए पूछा, “कहीं तुम भी तो किसी कंपनी में तीन-चार लाख के पैकेज पर भाड़ तो नहीं झोंक रही हो?”
“जी नहीं, मैं भाड़ नहीं झोंक रही, बल्कि साढ़े तीन लाख के पैकेज पर एक कंपनी में काम कर रही हूं.” अनायास ही उसके होंठ मुस्कुरा उठे और चेहरे पर छाई उदासी कम होने लगी.
“क़िस्मतवाली हो तुम, वरना मुझे तो भाड़ झोंकने के बाद भी इतने पैसे नहीं मिलते कि आज लोकल की हड़ताल होने पर टैक्सी से घर जा सकूं.” नितिन ने कंधे उचकाते हुए मुंह बनाया.
“तो क्या तुम भी इसीलिए रात काटने मरीन ड्राइव आ गए हो?” रागिनी ने अपनी बड़ी-ब़ड़ी आंखों को उठाकर नितिन की ओर देखा.
“तुम भी!” नितिन हल्का-सा बुदबुदाया, फिर अपनी तर्जनी रागिनी की ओर तानते हुए हंस पड़ा, “इसका मतलब तुम भी इसीलिए मरीन ड्राइव आई हो? वाह, ख़ूब कटेगी रात जब मिल जाएंगे दीवाने दो.” नितिन ने खुलकर ठहाका लगाया और हंसते-हंसते रागिनी के पास बेंच पर बैठ गया.
हंसते-हंसते ही नितिन की आंखें छलछला आईं और वह उन्हें पोंछ भर्राए स्वर में बोला, “कितनी उम्मीदों के साथ मां-पापा ने कर्ज़ लेकर हमें पढ़ाया था. सोचता था कि उनके हर सपने को पूरा करूंगा, लेकिन मालूम न था कि यह महानगर सपनों को पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि कुचलने के लिए बना है. वन बीएचके फ्लैट का किराया देने के बाद सपनों को पूरा करना तो दूर, ढंग से पेट की आग बुझाने लायक भी पैसे नहीं बचते हैं.”
रागिनी को लगा कि होंठ नितिन के हिल रहे हैं, लेकिन शब्द जैसे उसके हैं. हूबहू उसकी कहानी, उसी का दर्द दोहरा रहा था नितिन. पिछले साल एक दुर्घटना में दोनों पैर गंवा देने के बाद पापा की नौकरी छूट गई थी. उसकी नौकरी लग जाने से पापा निश्‍चिंत थे, लेकिन वह चाहकर भी घर ख़र्च चलाने लायक पैसे नहीं भेज पाती थी.
वह रात बात करते-करते ही कट गई थी. इसके बाद दोनों की अक्सर मुलाक़ातें होने लगीं. दर्द साझा हो, तो दोस्त बनते देर नहीं लगती. एक दिन नितिन ने प्रस्ताव रख दिया, “राग, क्यूं न हम लोग मिलकर एक फ्लैट किराए पर ले लें. इससे दोनों की काफ़ी बचत हो जाएगी.”
रागिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो नितिन ने टोका, “क्या सोच रही हो?”
“यह बहुत बड़ा ़फैसला है. इतनी आसानी से नहीं लिया जा सकता.” रागिनी ने कहा.
नितिन ने रागिनी के चेहरे को गौर से देखा, फिर बोला, “भरोसा रखो मुझ पर. तुम्हारी इजाज़त के बिना मैं कभी तुम्हें छूऊंगा भी नहीं.”
“और मैं यह इजाज़त कभी दूंगी भी नहीं.” रागिनी ने मुंह बनाया.
“और मैं यह इजाज़त कभी मांगूंगा भी नहीं.” नितिन ने भी रागिनी की तरह मुंह बनाया, फिर गंभीर स्वर में बोला, “वैसे अगर तुम चाहो तो हम शादी भी कर सकते हैं. तुम मुझे कॉलेज के ज़माने से पसंद हो.”
“न, शादी के बारे में तो मैं अभी सोच भी नहीं सकती. पहले मुझे अपना करियर बनाना है. मां-पापा के सपने पूरे करने हैं.” रागिनी ने साफ़ इंकार कर दिया.
किंतु महानगर की ज़रूरतें उनकी सीमित आमदनी से इतनी ज़्यादा थीं कि एक दिन रागिनी ने नितिन के साथ साझे के फ्लैट में रहने के लिए हामी भर ही दी. दो बीएचके फ्लैट में एक कमरा नितिन का और एक रागिनी का. दोनों की हर ख़र्च में आधा-आधा ख़र्च करने की सहमति बन गई थी. यहां तक कि एक दिन खाना बनाने की ज़िम्मेदारी रागिनी की, तो दूसरे दिन नितिन की.
इसके बाद रागिनी की गाड़ी कुछ आराम से चलने लगी. वीकेंड में घूमने-फिरने के बाद भी इतने पैसे बच जाते थे कि पापा को भेज सके. वह अब काफ़ी ख़ुश थी.

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मनहूस-सा लगनेवाला महानगर भी अब उसे अच्छा लगने लगा था. ख़ुशियों के ही इन ख़ूबसूरत पलों में एक दिन उसने नितिन के आगे समर्पण कर दिया था. इसके बाद से तो दोनों की ख़ुशियों को जैसे पर लग गए थे.
पांच दिन जमकर मेहनत करते. वीकेंड में दिनभर घूमते-फिरते और रात में एक-दूसरे की बांहों में लिपटकर सो जाते. सब कुछ पूर्व निर्धारित था. हर ख़र्च आधा-आधा. यहां तक कि सेक्स भी केवल वीकेंड के लिए तय था.
उधर पापा की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी. अक्सर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता था. रागिनी हर तरह से बचत करने की कोशिश करती, लेकिन पूरा नहीं पड़ता था. बिजली का बिल हर माह लगभग चार हज़ार रुपए आता था. रागिनी और नितिन अन्य ख़र्चों की तरह उसे भी आधा-आधा भरते थे. एक महीने पापा के इलाज पर कुछ ज़्यादा ख़र्चा आ गया था. रागिनी को लग रहा था कि महीना पार करना मुश्किल होगा. अतः उसने कहा, “नितिन, मेरे पास पैसे नहीं बचे हैं, इसलिए इस महीने बिजली का पूरा बिल तुम भर दो. अगले महीने मैं दे दूंगी.”
“लेकिन तय तो यह हुआ था कि हर ख़र्च आधा-आधा रहेगा.” नितिन ने टोका.
रागिनी को ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. उसने नितिन के चेहरे की ओर देखा. उस पर ज़मानेभर की दुनियादारी समाई हुई थी. रागिनी की आंखें छलछला आईं. उसने भर्राए स्वर में पूछा, “क्या मेरे लिए तुम इतना भी नहीं कर सकते?”
“ओके बाबा, सुबह-सुबह रोओ मत. मैं इस महीने भर दूंगा बिल, अगले महीने तुम भर देना.”
नितिन हर मामले में अच्छा था. रागिनी का पूरा ध्यान भी रखता, लेकिन हिसाब-क़िताब के मामले में कोई समझौता नहीं करता. उसका साफ़ कहना था कि समानता की पक्षधर लड़कियां जब लड़कों से बराबरी में खाना बनवा सकती हैं, तो आधा ख़र्च क्यूं नहीं उठा सकतीं? रागिनी भी ईमानदारी से आधा ख़र्च उठाती थी, लेकिन इस बार मजबूरी आ गई थी. आज पापा को इलाज के दस हज़ार रुपए भेजने के बाद उसके पास पैसे ही नहीं बचे थे कि बिजली का बिल जमा कर सके.
साढ़े ग्यारह बज गए थे. नितिन अभी तक नहीं आया था. रागिनी का मन आशंकित होने लगा. उसने मोबाइल पर उसका नंबर मिलाया, “हैलो, नितिन, कहां हो तुम? इतनी देर कैसे हो गई?”
“आज तो कंपनीवालों ने खून चूस लिया है. बहुत थक गया हूं.” उधर से नितिन की आवाज़ आई.
“लेकिन तुम आओगे कब तक?”
“आ गया हूं. बिल्कुल दरवाज़े के बाहर खड़ा हूं.” नितिन ने कहा और इसी के साथ दरवाज़े पर दस्तक हुई.
रागिनी ने दरवाज़ा खोला, तो सामने नितिन खड़ा था. बिल्कुल थका और परेशान. उसने एक उदास नज़र रागिनी के चेहरे की ओर डाली और फिर अपने कमरे में बिस्तर पर पसर गया. उसकी हालत देख रागिनी को दया आ गई. उसने क़रीब जा उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहा, “बहुत थक गए हो?”
“हां, आज बिल्कुल निचोड़ लिया है. पूरा शरीर दर्द कर रहा है.” नितिन के स्वर में निराशा उभर आई.
“अभी तुम्हारा दर्द दूर कर देती हूं.” कहने के साथ रागिनी ने नितिन के माथे पर चुंबन अंकित कर दिया.
“ओह राग, तुम बहुत अच्छी हो.” नितिन ने रागिनी का हाथ पकड़ उसे अपनी ओर खींच लिया. रागिनी नितिन की बांहों में सिमट गई. भावनाओं का ज्वार जब ख़त्म हुआ, तब नितिन के चेहरे पर शांति छाई हुई थी. उसने रागिनी के बालों पर हाथ फेर स्नेह भरे स्वर में कहा, “आज मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत महसूस हो रही थी. चूंकि हमारे दिन निर्धारित हैं, इसलिए कुछ कह नहीं पा रहा था, किंतु तुमने मेरे दिल की बात जान ली.”
“नितिन, एक अनुरोध है. क्या तुम मान लोगे? मेरे पास पैसे कम पड़ रहे हैं. इस महीने के बिजली का बिल भी तुम ही भर दो. मैं अगले दो महीने लगातार भर दूंगी.” रागिनी ने कहा.
“यह कैसे हो सकता है? पिछले महीने का बिल भी मैंने ही भरा था.” नितिन का स्वर उखड़-सा गया.
“मैं तुम्हें इतना प्यार करती हूं. क्या तुम मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते?”
“प्यार?” नितिन हल्का-सा बुदबुदाया, फिर तेज़ स्वर में बोला, “इस महानगरी में कोई किसी से प्यार नहीं करता. सभी स़िर्फ ख़ुद से प्यार करते हैं.”
“नितिन, हमने जो अभी किया है, क्या वह हमारा प्यार नहीं था?” रागिनी की आंखें छलछला आईं.
“ओह, तो तुम उसकी क़ीमत वसूलना चाहती हो?” नितिन के होंठ व्यंग्य से टेढ़े हो गए.
“नितिन!” रागिनी चीख पड़ी.
अपमान से उसका चेहरा लाल हो गया और वह तड़पते हुए बोली, “अगर क़ीमत ही वसूलना चाहूं, तो एक रात में इतना वसूल सकती हूं, जितना तुम पूरे महीने में नहीं कमा पाते होंगे.”
“अगर तुम्हें अपने देह की क़ीमत मालूम है, तो फिर यहां क्या कर रही हो?” नितिन का स्वर भी तेज़ हो गया.
“नितिन.” अविश्‍वास से रागिनी की आंखें फैल गईं और फिर वह दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढंककर फफक पड़ी. उसे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि नितिन उसे इस तरह से ज़लील कर सकता है.
“राग, मैंने आज दोपहर में ही बिजली का बिल जमा कर दिया था. यह देखो उसकी रसीद.” चंद पलों बाद नितिन का गंभीर स्वर सुनाई पड़ा. रागिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया. वह उसी तरह सिसकती रही.
“मेरी कंपनी ने तुम्हारी कंपनी के लिए एक प्रोजेक्ट किया था. आज उसे ही देने मैं तुम्हारे ऑफिस गया था. मैं तुम्हें भी सरप्राइज़ देना चाहता था, इसलिए पहले से कुछ नहीं बताया था. वहीं मैंने तुम्हारी और आंटी की फोन पर होनेवालीे बातें सुन ली थीं और चुपचाप बिल जमा करा दिया था. मेरे पास दस हज़ार रुपए इमरजेंसी के लिए पड़े थे. उन्हें भी आंटी के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया है. इस समय अंकल का इलाज ज़्यादा महत्वपूर्ण है.” नितिन ने बताया.
“तो फिर तुम मुझे इस तरह ज़लील क्यूं कर रहे थे?” रागिनी ने अपने चेहरे को ऊपर उठाया. वह अब भी नितिन की बातों पर विश्‍वास नहीं कर पा रही थी.
“रागिनी, मैं बहुत स्वार्थी हूं.” नितिन ने पहली बार रागिनी को उसके पूरे नाम से पुकारा… फिर बोला, “मैं केवल इस घर में होनेवाले ख़र्चों में तुम्हारा आधा हिस्सा नहीं चाहता हूं, बल्कि तुम्हें अपने जीवन का आधा हिस्सा भी बनाना चाहता हूं. इसीलिए तुम्हें एहसास दिलाना चाहता था कि हम दोनों अपूर्ण हैं. हमें एक-दूसरे के सहारे की आवश्यकता है. आओ, अपनी-अपनी अपूर्णता को एक-दूसरे को अर्पित कर उसे पूर्णता का नाम दे दें.” इतना कह कर वह पलभर के लिए रुका, फिर रागिनी की आंखों में आंखें डालता हुआ बोला, “राग, मैं अपने जीवन के राग को तुम्हारी रागिनी में डुबो देना चाहता हूं. बोलो अर्द्धांगनी बनोगी मेरी?”
“नितिन, मैं पहले भी कह चुकी हूं कि मैं शादी नहीं कर सकती. मुझे अभी अपना करियर बनाना है.” रागिनी ने अपने आंसू पोंछते हुए धीमे स्वर में कहा.
“कैसा करियर और किसके लिए करियर?” नितिन का स्वर एक बार फिर तेज़ हो गया और वह तड़पते हुए बोला, “करियर एक ऐसी यात्रा है, जो न कभी पूर्ण होती है और न कभी कोई इसके अंतिम शिखर तक पहुंच पाता है. यह एक ऐसी अंधी दौड़ है, जिस पर इंसान ज़िंदगीभर दौड़ता रहता है, लेकिन अंत समय तक विश्‍वास नहीं कर पाता है कि वह इस दौड़ में विजयी हो पाया है. यह एक ऐसी अधूरी प्यास है, जो हमेशा बनी रहती है.”
इतना कहकर नितिन रागिनी के क़रीब आया और उसके कंधों पर हाथ रखते हुए बोला, “हम और तुम कभी न कभी, किसी न किसी से तो शादी करेंगे ही, लेकिन क्या हम दोनों एक-दूसरे को कभी भूल पाएंगे? अपने प्रथम समर्पण में हमने एक-दूसरे को अपनी पवित्रता का जो अनमोल उपहार दिया था, क्या वह कभी किसी दूसरे को दे पाएंगे? अगर नहीं, तो क्या वह उस दूसरे इंसान के साथ धोखा नहीं होगा?”
“नितिन!” रागिनी के होंठ कांप कर रह गए. उसके पास नितिन की बातों का कोई जवाब नहीं था.
“राग, मैं तुम्हारे साथ लिव इन रिलेशनशिप में नहीं, बल्कि रियल रिलेशनशिप में रहना चाहता हूं. जहां मेरा और तुम्हारा नहीं, बल्कि सब कुछ हमारा होगा. हम आधा-आधा नहीं, बल्कि इस जीवन को पूरा-पूरा एक साथ जीएंगे. जहां…” कहते-कहते नितिन का स्वर भी कांप उठा और आगे के स्वर खो गए.
रागिनी ने नितिन के चेहरे की ओर देखा और फिर बिना कुछ कहे एक बार फिर उसके सीने से लिपट गई, किंतु उसका मौन नितिन के सारे प्रश्‍नों के उत्तर दे रहा था. नितिन ने भी उसे अपनी बांहों में भर लिया. दोनों एक-दूसरे का साथ निभाने एक नई यात्रा की तैयारी कर रहे थे.

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