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लघुकथा- शैतान का गधा (Short Story- Shaitan Ka Gadha)

बेटों ने जोश में आकर फ़ौरन मां के आदेश का पालन किया, पर घर लौटते हुए उन्हें पछतावा होने लगा. घर के भीतर से आती बच्चों की चिल्लाहटें तब उन्होंने क्रोध के आवेग में अनसुनी कर दी थीं. अब बार-बार वह कानों में बजने लगीं.
दोनों भाई सीधे शैतान के पास पहुंचे और पूछा, “तुमने हमसे ऐसा क्यों करवाया?"

एक पेड़ के नीचे गधा खड़ा-खड़ा ऊंघ रहा था. बंधा हुआ था, तो कहीं जा भी नहीं सकता था. शैतान ने उसे देखा, तो आ कर उसकी रस्सी खोल दी. पास ही एक किसान के खेत थे. छूटते ही गधा खेतों की तरफ़ भागा और खड़ी फसल को रौंद डाला. किसान की पत्नी उस समय बैठी दराती से साग काट रही थी. उसने गधे को खेत उजाड़ते देखा, तो वह दराती हाथ में लिए ही वहां पहुंची और फसल को बचाने के लिए गधे को फसल से दूर करने का प्रयास करने लगी. दराती गधे की गर्दन पर कुछ इस तरह लगी कि कुछ देर तड़पने के बाद वह मर गया.


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गधे का मालिक उसे ढूंढ़ते हुए वहां आन पहुंचा. उसने गधे की लाश के पास दराती पकड़े किसान की पत्नी को देखा, तो क्रोधित हो उठा. उसके हाथ में एक मोटा-सा डंडा था, जिसे वह जानवरों को खदेड़ने के काम में लाता था. ग़ुस्से में आकर उसने वही डंडा स्त्री के सिर पर दे मारा, जिससे स्त्री का सिर फट गया और उसकी वहीं मृत्यु हो गई.
किसान दिन का अपना काम पूरा करके घर पहुंचा, तो अपनी पत्नी को मृत पाया. किसान के हाथ में पिस्तौल थी, जो वह जंगली जानवरों को मारने के लिए अपने पास रखता था. उसने बिना कुछ पूछताछ किए गधे के मालिक को गोली मार दी.
गधे के मालिक की पत्नी के पास जब यह संदेश पहुंचा, तो उसने क्रोधित होकर अपने बेटों को तुरंत जाकर किसान का घर जला डालने का आदेश दिया, ताकि पूरा परिवार ही आग की चपेट में आकर जल मरे.
बेटों ने जोश में आकर फ़ौरन मां के आदेश का पालन किया, पर घर लौटते हुए उन्हें पछतावा होने लगा. घर के भीतर से आती बच्चों की चिल्लाहटें तब उन्होंने क्रोध के आवेग में अनसुनी कर दी थीं. अब बार-बार वह कानों में बजने लगीं.
दोनों भाई सीधे शैतान के पास पहुंचे और पूछा, “तुमने हमसे ऐसा क्यों करवाया?"
शैतान ने कंधे झटक कर शांत भाव से उत्तर दिया, “मैंने कुछ भी तो नहीं किया सिवाय गधे को खोलने के? बाक़ी लोगों ने ही रीएक्ट किया- बिना सोचे-समझे, ओवर रीएक्ट. तुम सब ने ही अपने भीतर के शैतान को बाहर आने दिया."
अगली बार क्रोध आने पर रुककर एक बार सोचना ज़रूर. प्रतिक्रिया करने से पहले देखना कि जो हम कर रहे हैं, वह करना उचित है? आवश्यक है?
किसी दूसरे ने ग़लती की है, तो क्या हमारी प्रतिक्रिया से वह सही हो जाएगी?

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मित्र मंडली में, व्हाट्सऐप पर, टेलिविज़न पर एक व्यक्ति बिना सोचे-समझे किसी अफ़वाह का गधा छोड़ देता है और लोग आपस में लड़ने लगते हैं, मरने-मारने पर उतर आते हैं.
याद रखिए तोड़ना आसान है, जोड़ना बहुत मुश्किल…

- उषा वधवा

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Photo Courtesy: Freepik


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