कहानी- स्माइली (Short Story- Smi...

कहानी- स्माइली (Short Story- Smiley)

“जी आदर के लिए लगाता हूं.” उसके अटपटे स्पष्टीकरण पर मेरी हंसी फूट पड़ी थी. मुझे हंसता देखकर वह भी हंसने लगा था, पर हमारी हंसी के कारण अलग थे. मैंं उसकी बातों पर ख़ुश होती थी और वह यह सोचकर कि वह मुझे ख़ुश करने में कामयाब रहा.

मैं हमेशा की तरह आज भी वक़्त पर रेस्तरां पहुंच गई थी और रजत हमेशा की तरह आज भी लेट था. मैं जानती थी उसे दो-दो केब बदलकर आना होता है, इसलिए कभी शिकायत नहीं करती थी. फिर स्माइली तो है ही मेरा मन बहलाने के लिए. मेरी नज़रें उसे इधर-उधर खोजने लगी और तभी अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ पानी का ग्लास लिए स्माइली हाज़िर था.
“मेरे आने की गंध मिल जाती है क्या तुम्हें?”
“सुगंध कहिए दीदीजी.” टेबल पर ग्लास रखते हुए वह बड़ी ही अदा से मेरे सम्मान में लगभग आधा झुक गया था. उसकी ऐसी ही अदाओं पर मैं अपनी हंसी नहीं रोक पाती. और मेरे चेहरे पर मुस्कान लाने की ख़ातिर ही वह ऐसी हरकतें दोहराता रहता है. जब मुझे मालूम हुआ था कि उसका नाम इस्माइल है, तो मैंने अगले ही पल उसका नामकरण ‘स्माइली’ कर दिया था. मैं उसके गोरे-चिट्टे तीखे नैन-नक्श से इतनी प्रभावित नहीं हुई थी, जितनी उसके चेहरे की मासूमियत और उस पर खिलती सदाबहार हंसी से.
“तुम स्कूल क्यों नहीं जाते?” मैंने उससे पूछा था.
“गांव में था, तब जाता था. मां-बाप मेहनत मजदूरी करते थे. फिर वे बीमार रहने लगे. मेरे कंधों पर बूढ़े बीमार मां-बाप और छोटी बहन की ज़िम्मेदारी है. इस रेस्तरां के मालिक हमारे ही गांव के हैं. कमाने उनके साथ शहर आ गया. यहां स्कूल जाने का वक़्त ही नहीं मिलता. रात को किताबों के थोड़े पन्ने पलट लेता हूं. इस तरह परिवार पाल रहा हूं.” गर्व से उसकी गर्दन थोड़ी और अकड़ गई थी, जिसे देखकर मुझे उस पर और भी प्यार उमड़ आया था.
“अच्छा एक बात और. तुम मुझे दीदीजी क्यों कहते हो?”
“दीदी तो इसलिए कि आप मुझे बहुत अपनी लगती हैं और जी…” वह कुछ सोचने लगा था.
“जी आदर के लिए लगाता हूं.” उसके अटपटे स्पष्टीकरण पर मेरी हंसी फूट पड़ी थी. मुझे हंसता देखकर वह भी हंसने लगा था, पर हमारी हंसी के कारण अलग थे. मैंं उसकी बातों पर ख़ुश होती थी और वह यह सोचकर कि वह मुझे ख़ुश करने में कामयाब रहा.
“मैं आपकी कॉफी लेकर आता हूं.” उसको तुरंत अपनी ड्यूटी याद आ जाती थी. रजत को लेकर तो वह अक्सर मुझे छेड़ता रहता था.
“आपको इस लड़के में ऐसा क्या दिखा, जो उसे इतना पसंद करने लगीं?”
“क्यूं, अच्छा भला तो है. दो आंखें हैं, दो कान हैं, एक नाक हे…” मैं भी मज़ाक के मूड में आ जाती थी.
हूं… वैसे तो ठीक है. बस, नाक थोड़ी टेढ़ी है और एक आंख थोड़ी भेंगी है.” वह भेंगा सा चेहरा बनाता, तो मैं हंस-हंसकर लोटपोट हो जाती थी. फिर ये ही सब बातें मैं हंसते-हंसते रजत के सामने दोहराती तो वह भी हंसने लगता.
“चलो, स्माइली के बहाने तुम्हें मेरा लेट आना तो नहीं खलता. मैं भी निश्चिंत रहता ह़ूं कि वह तुम्हारा मनोरंजन कर रहा होगा.”
उस रेस्तरां की एप्रोचेबल, लोकशन, अच्छा खाना या फिर स्माइली की मौजूदगी कारण चाहे जो भी रहा हो रेस्तरां मेरे और रजत के मिलने का स्थायी अड्डा बनता जा रहा था. हमारे जन्मदिन, रोज़ डे… हर त्योहार और ख़ुशी के सेलिब्रेशन के दो प्रत्यक्ष गवाह थे- एक तो यह रेस्तरां और दूसरा स्माइली. हमारी हर ख़ुशी में वह इतनी आत्मीयता से शरीक होता था मानो यह उसकी अपनी ज़िंदगी से जुड़ा कोई अवसर हो. और इसीलिए वह हम दोनों का ही प्रिय बनता चला गया था.

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दिवाली के दिन मैं और रजत रेस्तरां में मिले, तो स्माइली को एक टेबल से दूसरे टेबल तक दौड़ लगाते देख हैरान रह गए. वह बहुत व्यस्त था. कारण पूछने पर पता चला अधिकांश वेटर्स परिवार के साथ दिवाली मनाने छुट्टी पर चले गए थे.
“तुम नहीं गए?”
“मैं ईद पर जाऊंगा.”
मेट्रो सिटी में कर्म पर आधारित वर्गभेद सर्वोपरि हो जाने से हमें जात-पात का तो ख़्याल ही नहीं रहता.
“ओह हां, चलो ईद पर चले जाना. अपने अम्मी-अब्बू और छोटी बहन… क्या नाम बताया था, हां लल्ली, सबसे मिलकर आना. उनके लिए तोहफ़े लेकर जाना.”
“ज़रूर दीदीजी.” वह दुगुने उत्साह से ऑर्डर लेने और सर्व करने लगा था. मैं और रजत उसके भोलेपन पर मुस्कुरा उठे थे. ईद से कुछ दिन पहले रजत के जन्मदिन पर रेस्तरां में मिलने का कार्यक्रम बना, तो मैंने रजत के लिए टी-शर्ट ख़रीदते वक़्त स्माइली के लिए भी एक कुर्ता ख़रीद लिया.
“ईद मुबारक!” कहते हुए जब हमने उसे कुर्ता भेंट किया, तो वह मुस्कुरा दिया था. पर उस मुस्कुराहट से हमेशा वाली शोखी नदारद थी.
“स्माइली, सबके तोहफ़े ख़रीद लिए है न? लल्ली के लिए क्या लिया?” वह अप्रत्याशित रूप से चुप रहा.
“क्या हुआ स्माइली? तबियत तो ठीक है न?” मैं उद्वेलित हो उठी थी.
“मैं घर नहीं जा रहा. छुट्टी नहीं मिली.”
उसके इतना कहते ही मेरा पारा चढ़ गया था. मैं दनदनाती हुई मालिक के केबिन में पहुंच गई थी.
“यह क्या तरीक़ा हुआ आपका? आपने स्माइली को न दीवाली पर छुट्टी दी और न अब उसके त्योहार पर जाने दे रहे हैं?”
“अभी सीज़न का बहुत रश चल रहा है मैडम! किसी को छुट्टी नहीं मिल सकती.”
“तो क्या हर वक़्त रेस्तरां संभालने का ठेका उसी का है? दूसरे वेटर्स क्या मक्खियां मारने के लिए हैं?”
“नहीं, काम तो सभी करते हैं, पर आप तो जानती ही हैं आप ही की तरह दूसरे ग्राहक भी स्माइली को ही ऑर्डर देना पसंद करते हैं. उसकी स्माइल मात्र से ही लोग खिंचे चले आते हैं.” स्माइली की तारीफ़ भी मुझे ख़ुश नहीं कर पाई.
“यह क्या बात हुई? कोई अच्छा है, तो आप उसका नाजायज़ फ़ायदा उठाएंगे? और यदि ऐसा ही करना है, तो फिर उसके घरवालों को यहां बुला लो. कितनी नाइंसाफी कर रहे हैं आप एक बच्चे के साथ. एक तो आपने उसकी पढ़ाई छुड़वा दी. ऊपर से दिन-रात काम में लगाए रखते हैं. आपके ख़िलाफ़ तो सीधे-सीधे चाइल्ड लेबर का केस बनता है.”
“मैडम, वह दिखने में ही बच्चा है. हक़ीक़त में बालिग हो चुका है.”
“आपके पास क्या उसका बर्थ सर्टिफिकेट है?”
“वो तो उसके बाप के पास भी नहीं है. बाप ने लाख मिन्नतें, ख़ुशामदें की, तभी तो मैंने इसे यहां लाकर काम पर लगाया. भलाई का तो ज़माना ही नहीं रहा.” मालिक भी अब अपने पर आ गया था.
रजत बीच-बचाव कर मुझे बाहर ले आए थे और समझाने लगे थे. मेरी वजह से रजत का जन्मदिन ख़राब हुआ… यह सोचकर मेरा मन अपराधबोध से भर उठा था. कुछ-कुछ ऐसे ही भाव स्माइली के चेहरे पर भी नज़र आ रहे थे. हालांकि वह कुछ बोल नहीं रहा था, पर पहली बार मैंने उसे इतना दुखी और परेशान देखा था. तब मुझे कहां आभास था कि उसका हंसता-मुस्कुराता चेहरा देखने के लिए मैं हमेशा के लिए तरस जाऊंगी.
कुछ दिनों बाद फिर मेरा और रजत का मिलने का कार्यक्रम बना. रेस्तरां के मालिक के उस दिन के व्यवहार की वजह से हमारा वहां जाने का मन तो नहीं था, पर स्माइली से मिलने की उत्कंठा हमें वहां खींच ले गई. पर स्माइली तो नदारद था. हमारी नज़रें उसे तलाशने लगीं, तो मालिक स्वयं हाथ जोड़े चला आया.
“मैंने इस्माइल को गांव भेज दिया है. थोड़े दिनों में वहां का सब माल असबाब समेटकर वे सभी यहीं रहने आ जाएंगे. अब तो आप ख़ुश हैं न?”
“कितना वक़्त लगेगा उन सबको आने में?”
“अब यह तो बताना मुश्किल है. अम्मी-अब्बू को मनाएगा, सब सामान समेटेगा तो वक़्त तो लग ही जाएगा. आप तो इसी तरह आते रहिएगा. पता नहीं वह कब लौट आए?”
मैं बहुत ख़ुशनुमा मूड में रेस्तरां से निकली थी.
“देखा रजत, अन्याय के खिलाफ़ आवाज उठाने से ही न्याय मिलता है. जितना इंसान दबकर रहता है, दुनिया उसे उतना ही दबाती है.” पर मेरी यह खुषी क्षणिक ही रही. स्माइली के ही एक साथी वेटर ने हमें कोने में ले जाकर बताया कि स्माइली अब यहां कभी नहीं आएगा. मालिक ने उसे नौकरी से निकाल दिया हेै. आपके जाने के बाद मालिक उस पर बहुत बिगड़े थे. कहा, “तेरी वजह से मुझे जेल नहीं जाना है. एक तुझे पाल रहा था वो क्या कम था जो तेरे सारे घरवालों को भी बुलाकर पालूं?”
“तो, वह घर चला गया?”
“पता नहीं कहां गया? पर यहां नहीं लौटा.”
“ज्यादा जोश का नतीजा देख लिया न? बेचारे की लगी लगाई नौकरी भी गई और रहने-खाने का ठौर भी. इसलिए कहते हैं इंसान को जोश में भी होश नहीं खोने चाहिए.” रजत को मानो कुछ कहने का मौका मिल गया था. पर मुझे अपराधबोध से खिन्न देख वे तुरंत मुझे ढाढ़स बंधाने लगे थे, “तुम चिंता मत करो. हमारा स्माइली इतना स्वीट है कि जहां जाएगा अपने अच्छे स्वभाव से हर किसी के दिल में जगह बना लेगा.”
मैं कुछ आश्वस्त हुई थी. मगर एक अपराधबोध हमेशा के लिए दिल में घर कर गया था कि उसे पढ़ा-लिखाकर अपने पांवों पर खड़े करने का नेक काम मेैं भी तो कर सकती थी. मैं भी औरों की तरह ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ ही निकली.
दो साल की डेटिंग ने मुझे और रजत को एक-दूसरे के काफी समीप ला दिया था. हम एक दूसरे का मिजाज, खुषी, नाखुषी सब कुछ समझने और महसूस करने लगे थे. इसलिए घरवालों की रजामंदी लेकर एक शुभ मुहूर्त में हम विवाह बंधन में बंध गए. वक्त के साथ-साथ स्माइली की यादें, उससे बिछुड़ने का ग़म, सालता अपराधबोध सब कुछ कम होता-होता विलुप्तप्रायः हो चुका था.
रजत दो माह के प्रशिक्षण हेतु विदेश चले गए तो अकेलापन मुझे डसने लगा. रजत फोन से, मेल से बराबर संपर्क में बने रहने और मेरा मन बहलाने का प्रयास करते रहते. मैं गर्भवती थी, इसलिए मेरे खाने-पीने की उन्हें विशेष चिंता रहती थी. कभी फल, कभी मेवे तो कभी दूध के लिए उनकी हिदायतों का दौर चलता ही रहता. वे जानते थे अकेले के लिए बनाना और खाना मुझे कभी भी रूचिकर नहीं रहा. इसलिए अपना और गर्भस्थ शिशु का वास्ता देकर वे मुझे समुचित पोषण लेने के लिए प्रेरित करते रहते.
इस दौरान मेरा जन्मदिन आ गया. रजत चाहते थे इस शुभ अवसर पर मैं होटल में मित्रों के साथ पार्टी करूँ. पर पार्टी करना मुझे हमेषा से ही नापसंद रहा है और वह भी ऐसी अवस्था में. अंततः रजत मुझसे यह वादा लेने में कामयाब रहे कि उस शाम मैं घर पर अकेली नहीं रहूंगी. किसी भी रेस्तरां में जाकर अपना मनपसंद डिनर लूंगी. रजत का दिल रखने के लिए उस दिन मैं अनमने मन से घर से निकली और एक रेस्तरां पहुंच गई. मैंने अपने लिए एक कोने वाली टेबल चुनी. वेटर आया, तो मैंने उसे खाना ऑर्डर कर दिया. मैं जाने किन ख़्यालों में गुम थी कि वेटर आकर मेरे आगे एक बड़ा सा स्माइली के आकार का केक रख गया. वह पलटकर जाने लगा, तो मेरी तंद्रा भंग हुई. बड़ा सा स्माइली केक देखकर मैं हैरान रह गई थी.
“ए हेलो, यह मेरा ऑर्डर नहीं है.” मैंने उसे टोका.
“जी, साहब ने भिजवाया है.” वह एक ओर इशारा कर रवाना हो गया. मैंने इशारे की दिषा में देखा. रिसेप्षन पर बैठा सूट-बूट पहने आदमी उठकर मेरी ही ओर आ रहा था. तेज रोषनी में जब वह मेरे समीप आकर खड़ा हो गया तो हैरत से मेरी आंखें चौड़ी हो गई.
“स्माइली… म मतलब इस्माइल? तुम? यहां?”

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“हैप्पी बर्थडे दीदीजी!”
थैंक्यू कहने की बजाय मैं आष्चर्य से उसे घूरे जा रही थी. उसका कद लंबा हो गया था और शरीर बहुत भर गया था. पर चेहरे पर छाई वही चिरपरिचित मुस्कान और मासूमियत से मुझे उसे पहचानने में एक क्षण की भी देर नहीे लगी थी.
“तुम्हें मेरा जन्मदिन याद था?” भावावेष में मेरी आंखें डबडबा गई थीं.
“सिर्फ जन्मदिन ही नहीं, मुझे सब कुछ अक्षरषः याद है. ईद के मौके पर आपका दिया कुर्ता मैंने आज तक संभालकर रखा हुआ है.” वह रजत के बारे में पूछने लगा और यह जानकर बहुत खुष हुआ कि हमने शादी कर ली है. फिर उसने मुझे केक कटवाया. बेहद प्यार से हमने एक दूसरे को खिलाया. स्माइली केक कट चुका था पर उसका स्माइली उड़कर हम दोनों के
चेहरों पर आकर फिट हो गया था. उस एक पल में ही मेरे चेहरे पर हंसी-मुस्कराहट सब कुछ लौट आई थी. स्माइली ने बताया कि मालिक द्वारा लताड़कर बाहर कर दिए जाने के बाद एकबारगी तो उसने गांव लौट जाने का मन बना लिया था. पर फिर लगा गांव क्या मुंह लेकर जाऊंगा? फिर गांव जाकर भी तो मेहनत मजदूरी ही करनी है तो यहीं कर ली जाए.
मैं काम की तलाष में भटकता इस रेस्तरां के मालिक के पास आ पहुंचा. ये बड़े दयालु सज्जन निकले. इन्होंने न केवल मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करने में सहयोग दिया, वरन रेस्तरां में काम देकर आत्मनिर्भर बने रहने का अवसर भी दिया. जब मैंने अच्छे नंबरों से ग्रेजुएशन उत्तीर्ण कर ली, तो उन्होंने मुझे इनाम स्वरूप यहां रिसेपशनिस्ट बना दिया. मैंने अपने परिवार को भी यहीं बुला लिया है. अब्बू अम्मी रेस्तरां की किचन संभालते हैं. लल्ली को अच्छे स्कूल में डलवा दिया है. वह जो फनी बनी रेबिट का मास्क पहने बच्चों का मनोरंजन कर रही है न, वही लल्ली है.”
तब तक स्माइली के अब्बू अम्मी भी आ गए थे.
“लल्ली कहती है मुझे भी भैया की तरह बचपन से ही अपने पैरों पर खड़े होना है. इसलिए वह दिन में स्कूल जाती है और षाम को बच्चों का मनोरंजन करती है. आपने मेरे बच्चे को कदम कदम पर रास्ता दिखाकर उसका बहुत साथ दिया है. वह आपकी बहुत तारीफ़ करता है.” अम्मी ने भावविभोर होकर मेरा माथा चूमा, तो मैंने भी फट से झुककर उनका आषीर्वाद ले लिया. स्माइली ने कैसे मेरे जन्मदिन को हमेशा के लिए यादगार बना दिया था, यह बताने के लिए मैं ख़ुशी-ख़ुशी रजत को फोन मिलाने लगी.

  • संगीता माथुर

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