कहानी- स्मोक बॉम्ब (Short Story-...

कहानी- स्मोक बॉम्ब (Short Story- Smoke Bomb)

“यह क्या बॉम्ब-वॉम लगा रखा है. शरीर के साथ दिमाग़ भी बुढ़ा गया है क्या! बॉम्ब मंगा के हवेली में आग लगवाओगे क्या?” हक्के-बक्के नवाब को इस बिन मौसम बारिश की आशंका बिल्कुल नहीं थी. वैसे भी वो उम्र के उस पड़ाव पर थे, जहां बीवी से प्रेम, झगड़े की मात्रा से मापा जाता है. जितना ज़्यादा झगड़ा, उतना ज़्यादा दम्पति में प्यार! पहले से उलझन में घिरे अपने को संभालते किसी तरह बोले, “अरे बेगम यूं रश्क ना कीजिए, हम ज़रा ज़रूरी काम में मशरूफ़ है. उस पर ध्यान लगाने दीजिए.”

नवाब वजाहत अली की तीसरी पीढी के वारिस, अमजद अली भी अपने नाम के आगे नवाब लगाते हैं, पर उनको नवाब साहब बोलने वाले कम ही लोग हैं. पचास की उम्र में सभी उन्हें सम्मान से नवाब साहब पुकारे की भावना अब बहुत ज़ोर मार रही है. पुलिस अधिकारी, पत्रकार, जनप्रतिनिधि और सभी को, उनकी समझ अनुसार इस प्रयोजन हेतू लाभदायक शख़्स को, अपनी हवेली में दावत के लिए आग्रह कर चुके हैं. कुछ लोगों ने उनकी दावत क़बूल भी की, पर एहसान का भार नवाब साहब के कन्धों पर ही लाद कर चल दिए.
ऐतिहासिक हवेली की क्षीण हो चुकी भव्यता लोगों को प्रभावित करने में नाकाम सिद्ध हो रही थी. उनका एक ही प्रशंसक था, भोले उर्फ भोलाराम. भोले कृष्णा बैंड मे क्लेरनेट बजाने का काम करता है और शादी के सीजन के अलावा नवाब साहब की मिजाज़पुर्सी में ही अपना दिन व्यतीत करता है. अमजद अली भी अपने क़िस्सों की उल्टी भोले के कान मे शान से करते हुए नवाब होने का एहसास कुछ हद तक कर सुकून पा लेते हैं. प्रसिद्धी पाने की चाह की राह भी अपने इकलौते चेले भोले से कई मर्तबा चर्चा का विषय बनती, पर बिना किसी भरोसेमंद समाधान के सुबह से शाम हो जाती.
एक सुबह अपनी बगिया में अमजद अली अख़बार पढ़ते चाय की चुस्की ले रहे थे कि भोले किसी को लेकर उनके पास पहुंचा. भोले का खिला चेहरा बता रहा था कोई शुभ समाचार ही है.
“नवाब साहब, यह इम्तियाज खान हैं, मुंबई में डायरेक्टर विशाल भार्गव के यहां काम करते हैं. आप से बात करना चाहते है.”
“सलाम वालेकुम नवाब साहब.” पहली बार किसी अपरिचित के मुंह से यह सम्बोधन सुनकर अमजद अली की बांछे खिल गईं.
“वाले कुम अस्….. सला…..म मियां. बताए क्या खिदमत कर सकता हूं.”

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“नवाब साहब, विशाल सर एक पिक्चर बना रहे हैं, जिसमें नवाज भाई, तापसी और आलिया काम कर रहे हैं. पिक्चर का नाम है फुल इश्किया. शूटिंग के लिए पुरानी हवेली की ज़रूरत है. अगर आप इजाज़त दें, तो आपकी हवेली एक महीने के लिए हमें इस कार्य के लिए उपलब्ध कर दे.”
अमजद अली की आंखें भोले की उत्साहित आंखों से चार हुईं और अपने अंदर के उल्लास को संयमित करते हुए धीरे से पूछा, “कब ज़रूरत होगी?”
“जी दो महीने बाद शूटिंग का शैड्यूल संभावित है, पर उससे पहले हमें हवेली में रंग-रोगन कराना पडेगा और ज़रूरत के हिसाब से फ़र्नीचर की व्यवस्था करनी होगी. अगर आप को परेशानी ना हो, तो अगले हफ़्ते ही हम काम शुरू कर सकते है.”
“हां… हां… बेशक, पर एक बार हम अपनी दोनों बेगम साहिबा से भी इस बारे मे चर्चा कर लेते हैं. बच्चो को भी समझा कर पूछ लेते है. पर इसके लिए हमे क्…या…मिलेगा.” अटकते हुए अमजद अली ने पूछ ही लिया.
“एक लाख रुपए नगद और जो भी रंगाई-पुताई सामान का ख़र्चा होगा, वो हम वहन करेंगे.” दो क्षण की चुप्पी के बाद नवाब साहब बोले, “अ.. हमारा नाम भी फिल्म में आएगा.”
“यह तो डायरेक्टर साहब ही बताएंगे.” इम्तियाज़ ने अपनी असमर्थता बता दी. नवाब साहब को अचानक अपना चमकता नाम धूमिल होता नज़र आया.
“ठीक है कल तक आपको जवाब देता हूं. आपका फोन नम्बर बता दीजिए. कल हम इसे फाइनल कर लेंगे.” मन ही मन हवेली से प्रचार पाने का सपना साकार होता देखने की कल्पना लिए वो अपनी बड़ी बेगम के कमरे की ओर चल दिए.
छह महीने बीतने के बाद ‘फुल इश्किया’ फिल्म रिलीज़ हुई और ठीक ठाक चल भी गई. शहर में कई लोग उन्हें अब ‘इश्किया नवाब’ के नाम से जानने-पुकारने लगे थे. लोकल पत्रकार द्वारा उनकी हवेली पर लिखे लेख के कारण उनकी एक प्रतिष्ठित अख़बार के संवाददाता से भी मुलाक़ात हो चुकी है मुलाक़ात के दौरान संवाददाता से मिली राय कि अपनी हवेली का फोटोशूट करवा ले… जम गई. दो अच्छे फोटोग्राफर के नंबर भी उपलब्ध करा दिए.
बढ़िया फोटोशूट करा अपनी हवेली के फोटोज़ इंटरनेट पर डालूंगा और फिर गानो, सीरियल और फिल्म की शूटिंग हवेली मे करवा ख़ूब नाम कमाऊंगा… नवाब साहब सोचने लगे.
एक सप्ताह बाद ही राजधानी से दो फोटोग्राफर अपने साजो सामान सहित हवेली के दालान पर नवाब साहब के साथ भारी-भरकम नाश्ते के साथ चाय की चुस्की लेते हुए उनके पूर्वजों की गाथा सुनने-समझने की कोशिश कर रहे थे. दोनों में से एक बड़ी उम्र के फोटोग्राफर, जो चालीस पार लग रहे थे, ने दार्शनिक अंदाज़ में नवाब को राय पेश की.
“आपकी हवेली के पुरातन दृश्य को निखारने के लिए कुछ हेलोजन और रंगीन रोशनी की व्यव्स्था करनी पड़ेगी. कुछ फव्वारे, एलईडी लाइट की झालरे और पांच रंग के 10 स्मोक बॉम्ब मंगा लीजिए. कल सुबह से काम शुरू कर देंगे.”
अमजद अली को अचानक अपना गला सूखा प्रतीत हुआ. फोटोग्राफी का इतना झंझट. टेबल पर रखी पानी की बोतल गटागट पीकर बोले, “क्या यह सब ज़रूरी रहेगा.”
“काम साधारण चाहिए या उम्दा, आप तय कर लीजिए.” दाढी वाले दार्शनिक फोटोग्राफर ने सख्त-सी आवाज़ में जवाब दिया. आगे कुछ कहने या पूछने की इच्छा को नवाब अपने तक ही जब्त कर गए.

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फोटोग्राफरों के विदा होते ही अमजद अली ने मुस्कान टेंट वाले को फोन लगाया और लाइट, फव्वारे और स्मोक बॉम्ब सुबह उपलब्ध कराने हेतू ऑर्डर दे दिया.
“नवाब साहब, बाकी सब तो मैं भिजवा दूंगा, पर यह स्मोक बॉम्ब मुझे जानकारी नहीं. यह कही और से मंगवा लें.”
“अमां अब मै कहां पता करूंगा आप ही पता कर मंगवा दो ना.” नवाब साहब की आवाज़ में गुज़ारिश का पुट अधिक था.
“अजी यह बॉम्ब के बारे मे थानेदारजी से पूछो. वो ही बता पाएंगे. कल सुबह ग्यारह बजे तक मै बाकी सामान पहुंचा दूंगा.” अमजद अली के फोन रखते ही पास ही खड़ी छोटी बेगम तमततमाती बोली, “यह क्या बॉम्ब-वॉम लगा रखा है. शरीर के साथ दिमाग़ भी बुढा गया है क्या! बॉम्ब मंगा के हवेली में आग लगवाओगे क्या?” हक्के-बक्के नवाब को इस बिन मौसम बारिश की आशंका बिल्कुल नहीं थी. वैसे भी वो उम्र के उस पड़ाव पर थे, जहां बीवी से प्रेम, झगड़े की मात्रा से मापा जाता है. जितना ज़्यादा झगड़ा, उतना ज़्यादा दम्पति में प्यार!पहले से उलझन में घिरे अपने को संभालते किसी तरह बोले, “अरे बेगम यूं रश्क ना कीजिए, हम ज़रा ज़रूरी काम में मशरूफ़ है. उस पर ध्यान लगाने दीजिए.”
“मैं कहे देती हूं, घर में कोई बम नहीं आएगा, वरना बच्चों को लेके अम्मी के पास आज ही चली जाऊंगी.”
“आप ज़रा मेरे लिए एक ग्लास पानी ले आइए.” किसी तरह पीछा छुड़ाने की नीयत से नवाब बोले.
बेगम के कमरे से रुखसत होते ही थानेदार को फोन मिला दिया. “और भई इश्किया नवाब, कैसे याद किया? दावत की दावत दे रहे है क्या?”
“अरे माई बाप वो स्मोक बॉम्ब चाहिए था. बता सकते है कैसे और कहां मिल सकता है.” नवाब ने धीमी ज़ुबान मेंं पूछा.
“यार यह सुना तो है, पर हमने कभी काम तो नही लिया. शायद डीएसपी साहब को पता होगा, एक-दो दिन में पता कर बताता हूं.” “एक-दो दिन नही, मालिक कल सुबह ही चाहिए. बस आप तो जहां से भी मिले मंगा दीजिए. पूरे दस चाहिए.” थानेदारजी से अच्छी तरह मिन्नते कर फोन रख दिया.
और किससे पता करें, समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हे दिव्य उजाला के संपादक का नाम ज़ेहन मेआया,शायद वो इस बारे मे कुछ बता सके. उनसे फोन पर बात करने की नाकाम कोशिश के बाद , वो अपनी अचकन पहन उनके आफिस की तरफ़ पैदल ही चल दिए. थोडी दूर ही पंहुचे कि सामने से भोले उनकी ओर ही आता नज़र आया.
भोले ने भांप लिया कि नवाब साहब किसी मानसिक द्वंद से गुज़र रहे है.
पहले तो अमजद अली टालने की कोशिश करते रहे. यह मानते कि इस बेचारे भोले को इस बारे मे क्या पता होगा, पर काफ़ी आग्रह के बाद चलते-चलते उसे स्मोक बॉम्ब की उलझन के बारे मे बता ही दिया.
“अरे, यह तो पटाखे की दुकान पर मिल जाएगा.” भोले के यह शब्द नवाब के कान में पड़ते ही तेज चलते कदम और अश्व गति से दौडते दिमाग ने जैसे सुकुन भरा विश्राम पा लिया.
“पटाखे… तुम जानते हो स्मोक बॉम्ब क्या है?”
“हां नवाब साहब, किसी शादी में अलग-अलग रंग के स्मोक बॉम्ब चलाते देखे हैं. उनमें से रंगीन धुंआ निकलता है. डांस के प्रोग्राम में अक्सर स्टेज पर चलाया जाता है. नवाब साहब के सिर से जैसे मनो भोज उतर गया. उनका संकटमोचक भोले फिर उनके लिए खुशी की बयार लेके आया था.
अगले दिन फोटोशूट पूरे दिन चला और महीने भर बाद ही नवाब साहब की हवेली और क़िस्मत दोनों चमकने लगी थी. सालो पहले हथेली बांचने और सितारे पढ़वाने की, जो भविष्यवाणी सुनी थी, अब साकार होती नज़र आ रही थी.

– संदीप पांडे

Photo Courtesy: Freepik

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