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कहानी- सुबह का भुला (Short Story- Subah Ka Bhula)

उसने दरवाज़े को थोड़ा सा खोल कर बाहर झांका. सड़क पर लगे खम्बे के बल्ब की पीली रोशनी में इतने साल बाद भी उसने उसे पहचान लिया. “तुम!” दुलारी के मुंह से घुटी घुटी सी चीख निकली. 

खट खट… रात के सन्नाटे को तोड़ती हुई ये आवाज़ जैसे ही दुलारी के कानों में पड़ी वो चौंक कर नींदसे जाग गई.

गठिये से जकड़े अपने घुटनों को सीधा करते हुए एक आह निकल गई उसके मुंह से. पास में रखी लाठी को अपने हाथों में जकड़ कर वो सोच ही रही थी कि इस वक़्त कौन हो सकता है. उसके दोनों बेटे अपने बीवी-बच्चों के साथ शादी में गए थे, मगर दुलारी कहीं नही जाती थी. इतने में फिर दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई.

“कौन है?” कहती हुई दुलारी धीरे धीरे चलती हुई दरवाज़े तक गई.

उसने दरवाज़े को थोड़ा सा खोल कर बाहर झांका. सड़क पर लगे खम्बे के बल्ब की पीली रोशनी में इतने साल बाद भी उसने उसे पहचान लिया.

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“तुम!” दुलारी के मुंह से घुटी घुटी सी चीख निकली.

“अब क्यों आए हो यहां?”

“माफ़ कर दो दुलारी.  उसने मेरा सब कुछ छीन लिया. अब जब मैं बूढ़ाहो गया, बीमार रहने लगा और उसे देने के लिए कुछ नही बचा तो वो मुझे छोड़कर चली गई.” वो यानी सोहन सिर झुकाए खड़ा था.

विस्फारित सी उसे देखती दुलारी की आंखों में वोदृश्य कौंध गया, जब वो अपने बच्चों के साथ बिलखती हुई उसको रोक रही थी, मगर वो उसे शहर के स्टेटस में मिसफिट कह कर अपनी प्रेमिका के पास चला गया था.

तब से हर रात पास में लाठी ओर दिनभर की मेहनत ने ही उसके जीवन को सहारा दिया था,.

“बोलो दुलारी, माफ कर दोगी न मुझे? वैसे भी सुबह का भुला अगर शाम को घर आ जाए तो उसको भुला नही कहते हैं.” आशा से दुलारी को देखते सोहन ने कहा.

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“हां, सही कहते हैं, मगर अब शाम नहीं रात हो चुकी है.” कहती हुई दुलारी ने सोहन के मुंह पर दरवाज़ा बंद कर दिया.

– मेघा राठी

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Photo Courtesy: Freepik

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