कहानी- सुनहरा अध्याय (Short Story- Sunhara Adhyay)

“पागल मत बनो काव्या. वह अध्याय कब का समाप्त हो चुका है. मुझे और नलिन को अलग रहते कितने बरस बीत चुके हैं. मैं अपने एकांतवास से ख़ुश हूं.”

“नहीं मम्मी, आपने ख़ुद स्वीकारा है कि गृहस्थी एक लड़की की ज़िंदगी में कितना मायने रखती है. जिस तरह आपको यह एहसास हो रहा है कि आप मेरी ज़िंदगी में पापा की कमी पूरी नहीं कर सकीं, मुझे भी यह एहसास हो रहा है कि मैं आपकी ज़िंदगी की यह कमी पूरी नहीं कर सकी.”

Kahaniya

काव्या को लेकर प्रमिलाजी की चिंता अब वाकई बहुत ज़्यादा बढ़ गई थी. आख़िर यह लड़की अपनी ज़िंदगी की क़िताब में यह सुनहरा अध्याय क्यों नहीं जोड़ना चाहती? जवानी की दहलीज़ को छूती लड़कियों के मां-बाप की रातों की नींद उड़ जाती है, यह सोचकर कि कहीं हमारी लड़की कोई अनुचित क़दम न उठा ले? कहीं वह कोई विजातीय या ऐसा-वैसा लड़का न पसंद कर ले? लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा है. प्रमिलाजी चाहती हैं कि काव्या के जीवन में कोई आए, जिसे लेकर उसके दिल में लड्डू फूटने लगें और वह अपनी बेटी की हंसी-ख़ुशी डोली सजाकर उसे विदा कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हों. लेकिन जीवन के पच्चीसवें बसंत में भी फूलों से लदी डालियां, हिलोरें लेता सागर, मदमाती हवा, लड़कों की सीटियां आदि बातें काव्या के लिए कोई मायने नहीं रखती थीं. हद तो तब हो गई जब उसने प्रमिलाजी द्वारा लाए रिश्तों को देखने-सुनने से भी इंकार कर दिया. प्रमिलाजी का पारा उस दिन फट ही पड़ा.

“तुम आख़िर चाहती क्या हो? अरे, लड़कियां इस दिन के लिए लालायित रहती हैं. क्यूं तुम अपनी ज़िंदगी का यह सुनहरा अध्याय आरंभ नहीं करना चाहती?”

“मम्मी, क्या सचमुच शादी एक लड़की की ज़िंदगी का सुनहरा अध्याय होता है?”

“हां, बिल्कुल. विवाह करके, मां बनकर ही एक स्त्री का जीवन पूर्ण होता है. एक पुरुष का संग उसके जीवन में ख़ुशियों के सतरंगी इंद्रधनुष खिला देता है. ज़िंदगी बेहद ख़ूबसूरत और अर्थपूर्ण नज़र आने लगती है. एक बार इस अध्याय के पृष्ठ उलटकर तो देखो!”

“आपने भी तो कभी इस अध्याय के पृष्ठ उल्टे थे मम्मी… क्या हुआ?” काव्या का दबा-सा स्वर उभरा तो प्रमिलाजी मानो आसमान से गिर पड़ीं.

‘मेरी बेटी ने मेरी ही ज़िंदगी को आधार बनाकर शादी के बारे में कितने पूर्वाग्रह पाल रखे हैं और मैं नासमझ-सी उससे सवाल-जवाब कर रही हूं.’ सोचकर प्रमिलाजी का सिर चकराने लगा. पर फिर तुरंत ही उन्होंने अपने आपको संभाला.

“मेरी ज़िंदगी का क़िस्सा अलग था बेटी. तुम उसे अपनी ज़िंदगी से क्यों जोड़ रही हो? जो मेरे साथ हुआ, ज़रूरी नहीं कि तुम्हारे साथ भी वही हो. सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते बेटी.” प्रमिलाजी ने बेटी को समझाने का प्रयास किया.

“तो फिर आपने हमेशा दूसरी शादी से इंकार क्यों किया? सारे पुरुष एक से तो नहीं होते?” काव्या भी आज पूरे तर्क-वितर्क पर उतर आई थी.

“काव्या!” प्रमिलाजी का स्वर न चाहते हुए भी थोड़ा तीखा और कटु हो गया था. “यहां बात तुम्हारी शादी की चल रही है. मेरी शादी, मेरे अतीत को इसमें मत घसीटो.”

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“मम्मी, कैसी बातें कर रही हैं आप? भला मुझे, आपकी बेटी को आपकी ज़िंदगी से सरोकार नहीं होगा तो और किसे होगा? मां-बाप तो संतान के रोल मॉडल होते हैं. मैंने जब भी आपके वैवाहिक अतीत को टटोलना चाहा, आपने यह कहकर मेरा मुंह बंद कर दिया कि आम कामकाजी दंपतियों की भांति आपके अहम् टकराए और अलगाव हो गया. दोनों ने स्वेच्छा से अलग-अलग रहना मंज़ूर कर लिया. तलाक़ जैसी औपचारिक क़ानूनी प्रक्रिया में उलझना भी आपने आवश्यक नहीं समझा. कल को मेरी ज़िंदगी में भी यही मोड़ आए, इससे पूर्व ही मैं इस राह से किनारा कर लेना चाहती हूं.” एक दुखभरी सांस के साथ काव्या ने अपनी बात समाप्त की. उसे अफ़सोस था कि उसने गड़े मुर्दे उखाड़कर मम्मी के दिल को चोट पहुंचाई. लेकिन संतोष था कि आख़िर वह अपने दिल की समस्त उलझनें, समस्त शंकाएं मम्मी के सम्मुख रखने में क़ामयाब हो ही गई.

बरसों से मन में उमड़ते-घुमड़ते आशंका, संदेह, आक्रोश के बादल अंततः बरस ही गए और पीछे छोड़ गए एक नीर ख़ामोशी. प्रमिलाजी अपने कमरे में चली गईं. दो दिनों तक दोनों के बीच मौन पसरा रहा. सिवाय औपचारिक वार्तालाप के दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई. प्रमिलाजी गहरी सोच में थीं. इतना उन्हें स्पष्ट हो गया था कि काव्या जब तक विवाह संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होगी, गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करेगी. उसका घर कभी नहीं बस पाएगा. अकेलेपन की जिस त्रासदी को वे भोग रही हैं, काव्या भी… नहीं-नहीं! सोचकर ही प्रमिलाजी का कलेजा मुंह को आने लगा. तीसरे दिन ही उन्होंने बेटी से संवाद का सूत्र जोड़ दिया.

“काव्या, मैं समझती थी कि मैंने तुम्हारी ज़िंदगी में मां-बाप दोनों की कमी पूरी कर दी. लेकिन यह मेरी ख़ुशफ़हमी थी. एक टूटा हुआ परिवार संतान के लिए कभी भी ख़ुशी का सबब नहीं बन सकता. तुम्हारा घर बस सके, इसके लिए मुझे अपनी कमज़ोरियां स्वीकार करने में भी कोई गुरेज़ नहीं है. हां, आज मैं स्वीकार करती हूं कि यदि उस व़क़्त मैंने समझौते की दिशा में एक क़दम भी बढ़ाया होता, तो नलिन दो क़दम बढ़ाने में कोई कोताही नहीं करते और मैं तुम्हें यह भी बता देना चाहती हूं कि यदि नलिन ने एक क़दम बढ़ाया होता तो मुझे चार क़दम बढ़ाकर उस बढ़ती दूरी को पाटने में तनिक भी संकोच नहीं होता. लेकिन अहम् का मुद्दा तो यही एक क़दम बनकर रह गया. मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि आज भी अधिकांश टूटते परिवारों की एकमात्र वजह यही पहले क़दम का ईगो है. तुम यदि इस ईगो को दरकिनार कर सकी, तो तुम्हारी गृहस्थी कभी नहीं टूट पाएगी. अब देखो, अपने ईगो को दरकिनार रखते हुए मैंने अपने अतीत की भूल स्वीकार कर ली है. अब तो तुम शादी के लिए तैयार हो ना?” प्रमिलाजी की आशा भरी नज़रें काव्या की ओर उठीं और देर तक वहीं टिकी रहीं, क्योंकि काव्या गहरी सोच में डूब गई थी. काफ़ी देर सोच-विचार के बाद काव्या के होंठ हिले.

“मम्मी, क्या यही स्वीकारोक्ति तुम पापा के सम्मुख भी दोहरा सकती हो?” काव्या का स्वर शांत और संयत था. फिर भी प्रमिलाजी चिल्ला उठीं.

“काव्या!”

“हां मम्मी, क्या तुम पापा के सामने अपनी ग़लती मान सकती हो?”

“मैंने कोई ग़लती नहीं की.” प्रमिलाजी की गर्दन एकदम तन गई थी और वाणी में कठोरता का पुट आ गया था. “मैं तुम्हें स़िर्फ टूटते परिवारों की मिसाल दे रही थी और यह बता रही थी कि यदि दोनों में से एक भी पक्ष अपने ईगो को कुछ देर के लिए नज़रअंदाज़ कर समझौते की दिशा में एक क़दम भी उठाए तो दूसरा पक्ष चार क़दम बढ़ाकर उसका स्वागत करेगा, क्योंकि अधिकांश मामलों में ही दोनों पक्ष अलग नहीं होना चाहते.”

“मैं भी यही कह रही हूं मम्मी. आप और पापा भी अलग होना नहीं चाहते थे. बस, किसी एक के झुकने का इंतज़ार कर रहे थे और शायद आज भी कर रहे हैं.”

“पागल मत बनो काव्या. वह अध्याय कब का समाप्त हो चुका है. मुझे और नलिन को अलग रहते कितने बरस बीत चुके हैं. मैं अपने एकांतवास से ख़ुश हूं.”

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“नहीं मम्मी, आपने ख़ुद स्वीकारा है कि गृहस्थी एक लड़की की ज़िंदगी में कितना मायने रखती है. जिस तरह आपको यह एहसास हो रहा है कि आप मेरी ज़िंदगी में पापा की कमी पूरी नहीं कर सकीं, मुझे भी यह एहसास हो रहा है कि मैं आपकी ज़िंदगी की यह कमी पूरी नहीं कर सकी.” काव्या भावुक होने लगी तो प्रमिलाजी ने मोर्चा संभाल लिया.

“हम मुद्दे से भटक रहे हैं काव्या. हम तुम्हारी शादी की बात कर रहे थे और मैंने तुम्हें विश्‍वास दिला दिया है कि यह ज़िंदगी का बेहद ख़ूबसूरत मोड़ है, जहां संयम और धैर्य बनाए रखने की ज़रूरत है. केवल समझौतावादी प्रवृत्ति से इस मोड़ के ख़ूबसूरत नज़ारों का आनंद लिया जा सकता है.”

“और समझौते का यह प्रयास कभी भी, कहीं भी किया जा सकता है, है ना मम्मी?”

“तुम ज़िद पर उतर आई हो काव्या… मुझे नलिन से मिले बरसों बीत गए हैं. मेरे पास उनका कोई अता-पता नहीं है.”

“पापा कोलकाता में हैं.” प्रमिलाजी को लगा उनके आसपास मानो सैकड़ों बम फट गए हैं.

“तुम्हें अपने पापा का पता मालूम है? मतलब… मतलब तुम उनसे मिलती रही हो? इतना बड़ा धोखा, इतना बड़ा झूठ! मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी, अपना सब कुछ मानकर संतोष करती रही. तुम्हारा घर बसाने के लिए अपने बरसों से पाले अहम् के टुकड़े-टुकड़े कर डाले और तुम…?”

“नहीं मम्मी! आप ग़लत समझ रही हैं. मैं कभी पापा से नहीं मिली. बस इधर-उधर पूछताछ और पत्र-व्यवहार, फ़ोन आदि के बाद बड़ी मुश्किल से उनका पता जुटा पाई हूं. सेवानिवृत्ति के बाद अब नितांत एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं पापा. दरअसल, शादी को लेकर मैं इतने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थी कि एक बार उनसे मिलना चाहती थी. अब पता भी मिला है तो इतनी दूर का, जहां अकेले आपको बताए बगैर मैं नहीं जा सकती. मम्मी हम साथ कोलकाता चलेंगे. मैं देखना चाहती हूं कि कैसे एक क़दम बढ़ाने पर प्रत्युत्तर में चार क़दम का फ़ासला नापा जाता है? बोलो मम्मी, कब चलें?”

“तुम पागल हो गई हो काव्या. मुझे कहीं नहीं जाना.”

“ठीक है. मतलब आप नहीं चाहतीं मेरी ज़िंदगी में शादी जैसा कोई अध्याय जुड़े.”

“ये कैसी बातें कर रही हो?” मां-बेटी में काफ़ी देर तक बहस चलती रही. आख़िरकार हार मानते हुए प्रमिलाजी ने कहा, “ओह काव्या, मैं हार गई तुमसे. ठीक है, चलो जहां भी चलना है.”

ट्रेन का लंबा सफ़र प्रमिलाजी को और भी लंबा लग रहा था. कैसे करेगी वह इतने बरसों बाद नलिन का सामना?… कह देगी कि वह अपनी मर्ज़ी से नहीं आई है. उनकी बेटी खींचकर लाई है, वरना उन्हें कहां ज़रूरत है पति नामक प्राणी की? जहां इतने बरस अकेले गुज़ार लिए, बाकी के और गुज़र जाते. नहीं-नहीं, ‘गुज़ार लिए’ शब्द ठीक नहीं रहेगा. इससे बेचारगी झलकती है. वे अपने आपको कभी बेचारी सिद्ध नहीं होने देंगी… नलिन ने व्यंग्यभरी मुस्कान से ताका या कुछ ताना कसा तो? तो वे उल्टे क़दमों से लौट आएंगी और फिर कभी उस ओर रुख़ नहीं करेंगी. लेकिन इन सबसे काव्या को क्या संदेश जाएगा? यह संवेदनशील लड़की तो हमेशा के लिए शादी से मुंह मोड़ लेगी. ओह, यह मैं क्या कर बैठी? मैं यहां आने के लिए राज़ी ही क्यों हुई?

उधर काव्या के दिमाग़ में भी उथल-पुथल मची हुई थी. यदि आमने-सामने होने पर एक बार फिर दोनों के अहम् टकरा गए, तो उसकी अब तक की सारी जांच-पड़ताल, मीलों का यह कष्टदायी सफ़र, जो शारीरिक से भी ज़्यादा मानसिक रूप से कष्टदायी सिद्ध हो रहा था, सब व्यर्थ चला जाएगा. पर जो भी हो, मम्मी की ज़िंदगी का फैसला किए बिना वह अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत नहीं कर सकती.

गंतव्य तक पहुंचने के लिए मां-बेटी को ज़्यादा मश़क़्क़त नहीं करनी पड़ी. हां, मश़क़्क़त करनी पड़ी, तो बंद दरवाज़े की घंटी बजाने की हिम्मत जुटाने में. कुछ देर दिल थामकर इंतज़ार करने के बाद दरवाज़ा खुला. दरवाज़ा खोलनेवाले शख़्स को देखकर प्रमिलाजी का कलेजा मुंह को आने लगा. यह उनका नलिन है? उनकी कल्पना के यंग, स्मार्ट, हैंडसम नलिन की जगह यह कौन स़फेद बाल, कृशकाय शरीर और झुर्रियोंवाला चेहरा लिए बूढ़ा खड़ा था? मोटे लेंस की ऐनक के पीछे से झांककर पहचानने का प्रयास करता वह कृशकाय थरथराता शरीर जैसे ही ढहने लगा, काव्या ने आगे बढ़कर उसे थाम लिया, “पापा!”

नज़रभर काव्या को देखने और फिर प्रमिला को देख नलिन हर्षातिरेक से बोले, “काव्या? मेरी बच्ची?… यह हमारी बेटी ही है न प्रमिला? ओह… मैं… मैं… सपना तो नहीं देख रहा? मुझे विश्‍वास दिलाओ… कोई मुझे नींद से जगाओ.” नलिन मानो ख़ुशी से बौरा उठे थे. प्रमिलाजी और काव्या ने सहारा देकर उन्हें सोफे पर बैठाया. सबकी डबडबाई आंखें बरसने लगीं. पंद्रह बरसों के वियोग की पीड़ा बहते निःशब्द आंसुओं में कब घुलकर बह गई, किसी को पता ही नहीं लगा. प्रमिलाजी के दिमाग़ में कब से चल रहे संवाद, प्रतिसंवाद, व्यंग्य-प्रतिव्यंग्य, कटुक्तियां जाने कहां तिरोहित हो गई थीं. इस अशक्त, निरीह, व़क़्त के थपेड़ों से घायल इंसान पर वह अब और क्या प्रहार करे? दया, सहानुभूति और अंततः निर्मल प्रेम का सागर उनके हृदय में हिलोरें लेने लगा था. नलिन भी शायद ऐसी ही मनःस्थिति से गुज़र रहे थे. नज़रें चुराती आंखों ने मानो वाक्क्षमता भी चुरा ली थी.

“मैं रसोई देखती हूं और कुछ चाय-पानी का प्रबंध करती हूं.” कहते हुए काव्या खिसक ली. उसका सोचना सही था. एकांत ने दिलों की दूरियां और मीलों के फ़ासले पल में मिटा दिए. जान-बूझकर काफ़ी देर लगाकर जब वह चाय की ट्रे लेकर कमरे में दाख़िल हुई तो नलिन उसे अपलक ताकते रह गए.

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“कितनी बड़ी, समझदार और सुंदर हो गई है हमारी छोटी-सी गुड़िया!” पापा के उद्गार सुन काव्या सकुचा उठी.

“बस, यह अंतिम ज़िम्मेदारी रह गई है मेरी. इसे अच्छा घर-वर देखकर विदा कर दूं…”

“अब यह हमारी ज़िम्मेदारी है.” नलिन ने ‘हमारी’ शब्द पर ज़ोर देते हुए काव्या को अपने पास बैठा लिया और स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरने लगे.

काव्या सोच रही थी, रिश्तों में सद्भाव और मिठास हो, तो ज़िंदगी का हर अध्याय ही सुनहरा है. गृहस्थी बसाने से पूर्व ही वह शनैः शनैः सफल गृहस्थ जीवन के समस्त गुर आत्मसात् करती जा रही थी.

Sangeeta Mathur

     संगीता माथुर

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