नया कुछ न पा सकने की घोर निराशा मन में लिए वह भीतर से टूटती जा रही थी. मेरी रूटीन ज़िंदगी उसके लिए ज़हर बन गई थी. मेरा काम उसकी पीड़ा का कारण बन गया था.
वसु की चिट्ठी आई थी, साथ में ले जाने आया था उसका छोटा भाई नकुल. मैं ना नहीं कर सका. आज इतने दिनों बाद जब वसु ने ख़ुद बुला भेजा है, मैं अपनी जीत महसूस कर रहा हूं. यह जानते हुए भी कि वसु एक दिन मेरा तिरस्कार कर चली गई थी. उसके लघु संदेश पर मेरी नज़र जम के रह गई थी- "शिवेन्द्र की शादी में नकुल के साथ आ जाओ."
'तुम्हारी ही वसु'
'तुम्हारी ही वसु', मानो वसु और कुछ भी लिख सकती थी, मसलन- सिर्फ़ वसुधा या तुम्हारी वसुधा, किन्तु मेरी ही तरह शायद वो भी संजोए हुए सपनों को चूर-चूर नहीं कर पाई. प्यार कहीं दबा ही रह गया कोने में, तभी तो बड़े जतन से फिर लिखने की कोशिश की है, बिल्कुल पहले की तरह 'तुम्हारी ही वसु'.
कई महीने हो गए उसे यहां से गए, कह कर गई थी, या सच कहूं तो लड़कर गई थी. शायद चार साल से मेरे साथ एकसार ज़िंदगी जीते-जीते बेहद ऊब गई थी. नया कुछ न पा सकने की घोर निराशा मन में लिए वह भीतर से टूटती जा रही थी. मेरी रूटीन ज़िंदगी उसके लिए ज़हर बन गई थी. मेरा काम उसकी पीड़ा का कारण बन गया था और मेरी ज़िंदगी उसके लिए असह्य हो उठी थी. वह मेरा वक़्त चाहती थी, पारिवारिक जीवन बिताने के लिए उत्सुक मेरी वसु चार बरस से मेरे अवकाश के उस दिन का इंतज़ार कर रही थी, जिस दिन में फ़ुर्सत से उसके संग बैठ दो-चार बातें कर सकता. उसे कहीं घुमाने ले जा सकता, किन्तु अफ़सोस यही रहा कि न उसने प्रतीक्षा करना छोड़ा, न मुझे कभी अपने बिज़नेस से छुट्टी मिली.
वसु साधारण पति-पत्नी की तरह सुखमय पारिवारिक जीवन बिताना चाहती थी, मगर मेरा उद्देश्य बहुत ऊंचा था, जिसके लिए मैं अपना सब कुछ त्यागने को विवश था. उसमें सेंटिमेंट्स निभाने की फ़ुर्सत नहीं थी. हमारी सारी भावनात्मक गतिविधियां न जाने कब पीछे छूट गई थी और अब सिर्फ़ प्रैक्टिकल लाइफ थी. वसु जब कभी मुझसे प्यार भरी शिकायत करती तो मैं सब कुछ बस एक ही उक्ति से बैक देने की कोशिश करता, "वसु प्लीज़, सोचो अगर मैं काम पर न जाकर घर में ही चार घंटे बैठा रहा तो कितना नुक़सान होगा. बी प्रैक्टिकल एंड गिव अप योर सेंटिमेंट्स."
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वसु आहत सी होकर रह जाती थी. अब मानता हूं वसु मेरे साथ सचमुच सुखी नहीं थी. कितना मन मार कर बेचारी रहा करती थी. और जोड़ों को देख उसके मन में भी ललक उठती होगी कि काश मेरा भी पति मुझे यूं ही प्यार करें. तभी तो कितनी चाह से वह कहने आती थी, "मुकुल, बहुत अच्छी पिक्चर लगी है. शाम को आ जाओगे न जल्दी, सिर्फ़ आज भर, फिर आगे नहीं कहूंगी."
मैं ना नहीं कह पाता था. किन्तु लौटने के वक़्त पर ऑफिस के किसी काम में फंस जाता था या कोई अफसर घेर लेता. मैं कह भी नहीं पाता था कि आज मिसेज के साथ बाहर का प्रोग्राम है. और उधर वसु बेचारी तैयार होकर राह देखते-देखते थक जाती थी.
पहले तो बहुत दुखी रहा करती थी, फिर पिक्चर के लिए कहना ही छोड़ दिया. जान गई थी कि कहना व्यर्थ है.
एक दिन वसु की डायरी में लिखा था- मुकुल मानोमेरे न होकर तुम सिर्फ़ बिज़नेस के ही होकर रह गए हो. तुम्हारा जन्म ही शायद इसके लिए हुआ था. मैं कहां से आ गई बीच में. पत्नी के नाम पर मुझे पत्नी का कोई अधिकार नहीं. काफ़ी रोष भर जाता है मन में, फिर ख़्याल आता है, अभी तो शुरू के दिन हैं, संघर्ष के दिन हैं, पूरा समय देना ही होगा, पैर जम जाए तो सब ठीक हो जाएगा.
कैसी मीठी तसल्ली देती रहती थी वसु ख़ुद को ही. उस दिन बहुत क्षोभ हुआ मुझे अपने आप पर, क्यों नहीं कोई नौकरी ही कर लेता. वसु को एक छोटा सा घर तो दे पाता, जो उसका होता, जहां वो अपनी मर्ज़ी से रहती. उसे सजाती. पर नौकरी करके मैं अपनी आत्मा को बंधक रखना नहीं चाहता था. अजीब उलझन थी ये भी. वसु की मायूसी मुझसे देखी नहीं गई.
उस शाम मैं ठीक पिक्चर के समय घर पहुंच ही गया और वसु को सरप्राइज़ दिया, "वसु, चलो आज पिक्चर चलते हैं." मैने सोचा था वसु उछल पड़ेगी सुनकर पर नहीं, वैसा कुछ नहीं हुआ. शायद इंतज़ार करते-करते उसका मन मर गया था या वह नैराश्य से न निकल पाने की स्थिति तक पहुंच गई थी. पहले तो उसे लगा मैं चिढ़ा रहा हूं, "मज़ाक बंद कीजिए." उसने दहाड़ाकर कहा.
मैंने ज़ोर दिया तो बड़े बुझे स्वर में उसने कहा, "पर आपके काम का जो नुक़सान होगा."
मैं दुगने उत्साह से कहा, "छोड़ो, काम को मारो गोली, आज कुछ काम नहीं होगा. चलो पिक्चर ही चलेंगे."
और तब वसु की आंखों में वही पुरानी चमक उभर आई, "मां से पूछ लूं." कहकर वह मां के पास गई.
"मां! लगता है सूरज पश्चिम से निकला है आज. मुकुल कह रहे हैं पिक्चर चलने को, जाऊं?"
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उस दिन के बाद दुबारा ऐसा सौभाग्य न ही बेचारी वसु को मिला, न ही मुझे काम से कभी फ़ुर्सत मिली. एक बात मैंने हमेशा नोट की, वसु मुंह से भले ही मुझसे शिकायत करती रही हो कि मैं उसको बहुत नेग्लेक्ट करता हूं. उसकी प्रॉपर केयर नहीं कर पाता हूं, पर वसु के प्यार में कभी कमी नहीं आई. वह मेरे प्यार को जितना तरसती रही, मुझसे उतना ही ज़्यादा प्यार करती रही और यही कारण था कि जिस दिन वह मुझे तिरस्कृत कर जाने लगी थी, तब भी मैं बिल्कुल ख़ामोश रहा, क्योंकि मैं जानता था कि वसु के भीतर जो नारी है वह कभी भी मेरे बिना नहीं रह सकती. वसु मेरे बिना जी नहीं पाएगी और ख़ुद ही घबराकर कुछ दिनों बाद मेरे पास लौट आएगी.
शायद वसु मुझसे जितना ज्यादा प्यार करती थी, मैं उसकी उतनी ही उपेक्षा करने को मजबूर था. मैं तो उसे बातों से भी कभी सहला नहीं पाता था. उल्टे हमेशा उसे भी प्रैक्टिकल लाइफ के उपदेश देता रहा, तभी एक दिन भयंकर तूफ़ान आया और मुझसे बेतहाशा प्यार करने वाली मेरी वसु, मेरी दुनिया से निकल कर चली गई. रह गई मेरे हाथों में उसकी चिट्ठी, जिसे आज भी मैं रोज़ सोने से पहले एक बार ज़रूर पढ़ लेता हूं और धीरे से तकिए के नीचे रख कर सो जाता हूं,. आंखें मूंदता हूं, तो उसके अक्षर फिर से उभरने लगते हैं-
मुकुल,
बहुत दिनों के उपरान्त तुम्हें हिन्दी में लिखने बैठी हूं. हालांकि तुम्हारी स्ट्रिक्ट प्रॉहिबिशन बिल्कुल याद है, "जब भी लिखो इंग्लिश में ही लिखो और उसके नीचे लाल स्याही से दो अंडर लाइन्स, ताकि बात का इम्पोर्टस ज़ाहिर हो सके." पर सच कहती हूं अब ऊब गई हूं. तुम्हारी सारी नियमावलियों को ढोते ढोते. एक ऊब सी हो गई है तुम से भी. और अब तो ये ऊब इतनी ज़्यादा बढ़ गई है कि सह नहीं पा रही हूं. तुम्हारे लिए शायद पैसा ही सब कुछ है. मेरी कोई अहमियत नहीं तुम्हारी ज़िन्दगी में. कुछ प्यार था हम दोनों के बीच, मुझे लगता है वो अब चुक गया है. उसकी अवधि समाप्त हो गई है. अब उसे ज़्यादा खींच कर ढोना मूर्खता ही है. बेहतर यही है कि अब ये सम्बन्ध दम तोड़ ही दे. तुम्हारी उपेक्षा से इतना नैराश्य भर उठा है मुझमें कि बस एक ही निर्णय सहज हो उठा है, जिसे तुम्हारे आगे रखने में बड़ी कठिनाई हो रही है.
हम दोनों के बीच पहला प्रपोजल पांच बरस पहले हुआ था और तुमने मुझसे शादी प्रपोज की थी. और आज इतने दिनों बाद दूसरा प्रपोजल मैं रख रही हूं. आशा है तुमने मुझे और कुछ तो नहीं दिया, पर इतना शायद दे सको मुझे मुक्ति. निर्णय शीघ्र लो, क्योंकि मैं टेंशन से शीघ्र ही मुक्त होना चाहूंगी.
तुम्हारी वसुधा
'तुम्हारी वसुधा' तक आते-आते जैसे सारे शब्द मेरे गले में ही अटक जाते थे. मैंने कुछ भी निर्णय नहीं दिया, क्योंकि मैं जानता था कि यदि वसु को अपना समय नहीं दे पाया, तो किसी दूसरे के लिए भी मेरे पास समय नहीं है. अगर वसु मुझसे मुक्ति ही चाहती है तो भी वह ज़रूर मेरे पास लौटेगी, यह मेरा विश्वास है.
दूर जाकर भी वसु आज और ज़्यादा क़रीब है. उसके प्रति मेरा खोया हुआ प्यार हमेशा के लिए उभर आया था. वसु मेरी थी, आज भी है. उसके चले जाने का सारा रोष धीरे-धीरे धुल गया. पुरानी यादें उभर आईं, आवेश में लिए गए निर्णय सिनेमा के पोस्टर की तरह एक के ऊपर एक चढ़ने लगे. मर्यादा और अभिमान फिर से उभरने लगे, पर संभल गया मैं. मर्यादा के चक्कर में प्रेम को नहीं गंवाना है. मेरी नज़र वसु की चिट्ठी पर अटक गई थी, जहां न जाने कितनी प्रत्याशा से कितने अधिकार से लिखा हुआ था.
'तुम्हारी ही वसु'
- डॉ. मंजु सिन्हा

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