कहानी- तुम्हारी कनुप्रिया… (Shor...

कहानी- तुम्हारी कनुप्रिया… (Short Story- Tumhari Kanupriya…)

अब जब वो साथ नहीं था, आंसुओं को बहने की अनुमति मिल गई थी. ग़ुस्से से दिल भरा हुआ था. आंसुओं से आंखें… मैं घर जाने वाली ट्रेन में चढ़ चुकी थी. दोनों भाई-बहन नज़र से उतर चुके थे. मेरा रोना रुक ही नहीं रहा था, कारण कई थे. वो रिश्ता, जो स़िर्फ बातों में जुड़ा था, मेरे मन से तो जुड़ ही चुका था… वही रिश्ता अभी थोड़ी देर पहले दम तोड़ चुका था. यही नहीं, जाते-जाते वो अपने एक और रिश्ते को ख़त्म कर चुका था.

दिल्ली एयरपोर्ट पर वो चेहरा देखकर मैं चौंक गई… नहीं, वो नहीं है. वो कैसे हो सकता था ये? कहां वो पैंट-शर्ट में सजा, जेल लगे बालों को ऊपर उठाकर सेट करके, हमेशा क्लीन शेव रहनेवाला मनमौजी, घमंडी लड़का और कहां ये सूती कुर्ता-जींस पहने, हल्की दाढ़ी बढ़ाए… गंभीर, शांत आदमी. मन ने हिसाब जोड़ा, पांच साल हो गए उसको देखे, शायद वही हो… दिमाग़ ने समझाया, तब भी वो नहीं हो सकता, कितने भी साल बीत जाएं, वेशभूषा बदल जाए, लेकिन चेहरे से घमंड थोड़ी जा सकता है! मन कसैला होने लगा था. सब कुछ याद आ रहा था. पांच साल पहले सीमा दीदी के साथ बीते वो दिन आज तक मुझ पर हावी थे.
सीमा दीदी यानी मेरी रूममेट. मैं ग्रेजुएशन कर रही थी और वो रिसर्च. हमारे मन कुछ ऐसे मिले थे कि रूममेट की बजाय सब हमको बहनें मानने की ग़लती कर जाते थे. देखा जाए तो ग़लती उनकी भी नहीं थी, हमारा रिश्ता था ही इतना प्यारा. मैं उनकी बात कभी नहीं टालती, वो मेरे लिए सबसे लड़ जातीं. वो कहीं बाहर जातीं, तो मेरे लिए चाट का दोना लाना न भूलतीं. और उनके सिर में दर्द होता, तो मैं ज़िद करके उनके बालों में तेल मालिश करने बैठ जाती. ऐसे ही एक दिन उनके बालों में तेल लगाते मेरे हाथ को उन्होंने अपने हाथ से रोक दिया, “अनुप्रिया, बहुत मानती हो न मुझे. एक बड़ी बात मानोगी मेरी?”
“कह कर तो देखिए दीदी.” मैंने तुरंत कहा.


वो मेरी ओर पलट कर बोलीं, “मेरी भाभी बन जाओ. कृष्णा और तुम्हारी जोड़ी…”
मैं हैरानी से उनको देखती रह गई थी. ये कैसी मांग थी? मैं उस समय ग्रेजुएशन कर रही थी. शादी-ब्याह के बारे में दूर-दूर तक सोचा तक नहीं था और फिर ये सब मुझसे क्यों पूछ रही थीं? उनके भाई को कभी देखा, जाना नहीं था. इस तरह कही गई ये बात मुझे खिन्न कर गई थी. मैं वहां से तुरंत उठकर कमरे से बाहर बालकनी में आ गई.
“तुम ग़ुस्सा हो गई क्या? अरे, मैंने बस ऐसे ही कहा था. इधर आओ, मेरे पास. तुम इतनी प्यारी हो कि बस लगता है, अपने घर ले आऊं तुमको. अच्छा, अब ये बात कभी नहीं कहूंगी.” वो मुझे मनाते हुए वापस कमरे में ले आईं.
बात जैसी बात नहीं थी, आकर चली जानी चाहिए थी, लेकिन जाने की बजाय फैल गई. अपने मन की ये इच्छा सीमा दीदी ने हास्टल की और लड़कियों पर भी ज़ाहिर की होगी और फिर शुरू हो गया मुझे चिढ़ाने का सिलसिला. हम दोनों कहीं घूमने जाते, तो कोई लड़की छेड़ देती, “ननद-भाभी कहां जा रही हैं?”
इस सवाल पर पहले तो मैं तमतमा जाती थी और सीमा दीदी उस लड़की को इशारे से चुप रहने को कहने लगती थीं. फिर धीमे-धीमे ये चुटकुला बासी हो गया. कुछ दिन चिढ़ाकर सबने चिढ़ाना बंद कर दिया और सीमा दीदी ने भी अपने भाई का ज़िक्र तक करना बंद कर दिया. कहने को सब कुछ सामान्य ही था, लेकिन इतना सामान्य भी नहीं था. कभी मैं कुछ खास पहनती, सजती, तो सीमा दीदी निहारती रह जातीं. आकर नज़र उतार लेतीं. उनका ये अपनापन, रूममेट या सहेली जैसा नहीं लगता था. बीए थर्ड इयर में टॉप करने पर मैंने जैसे ही हॉस्टल आकर उनको ये ख़बर सुनाई, वो उछलकर बोलीं, “अरे मेरी अनु ऑलराउंडर है, तभी तो मेरा मन था ये हीरा मेरे घर आता…” बोलते ही वो चौंक गईं, “सॉरी… सॉरी…” कहते हुए आगे बढ़ीं, लेकिन मैंने उनको हंसते हुए गले लगा लिया. सच कहूं तो जब से ये बात दीदी ने करनी बंद कर दी थी, मेरा मन खाली-खाली-सा होने लगा था. कहीं न कहीं ये बातें मुझे गुदगुदा तो जाती ही थीं. कृष्णा की बातें जब दीदी हम सबको बतातीं, उसकी फोटो दिखातीं, तो शायद सबसे ज़्यादा मुझे ही ख़ुशी होती थी. फोन पर उसके भेजे चुटकुले दीदी जब सबको सुनातीं, तो सबसे ज़्यादा खिलखिलाहट मेरी ही गूंजती थी.
इसी बीच वो दिन भी आ धमका, जब हॉस्टल में मुनादी हो गई, सीमा दीदी का भाई आ रहा है, हैंडसम भाई… मैं इन सबसे अनजान बनती हुई अपने बालों में मेहंदी लगा रही थी. मैं दिखाना चाह रही थी कि मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, कोई आए या जाए. लेकिन मेरे मन की हालत, वो तो बस मेरा मन ही जानता था.
“क्यों अनुप्रिया, सीमा दीदी का भाई आ रहा है आज, तभी सब सजना-धजना चालू है तुम्हारा.” हॉस्टल की सबसे बातूनी लड़की ने आकर मेरी पीठ पर धौल जमा दी. मेहंदी का कटोरा मेरे हाथ से गिरते-गिरते बचा.
“मेहंदी तो मैं हर संडे लगाती हूं यार, कुछ भी मत बोला करो.” मैंने अपने चेहरे के रंग छुपाते हुए जवाब दिया, वो रंग जो हर पल बदल रहे थे. मैं लाख नाटक सबसे करूं कि मुझे क्या, कोई भी आए-जाए, लेकिन इस दिन का इंतज़ार तो मुझे भी था, मन बेचैन मेरा भी था. उधर सीमा दीदी अलग ऊहापोह में थीं.
“अनु, आज कृष्णा आ रहा है. उसको कुछ काम था यहां बनारस में, तो मैंने कहा हॉस्टल आ जाना. सबसे मिल भी लेना… तुम ये मत सोचना कि ये सब मैंने प्लान किया है.”
“अरे नहीं दीदी, बिल्कुल नहीं. घर के लोग मिलने नहीं आते क्या? सबके आते हैं.”
मैंने जितनी सहज होकर जवाब दिया, फिर उतनी ही सहज होकर पूछा भी, “वो तो विज़िटर्स रूम में बैठेंगे ना. वहीं कुछ खाने के लिए लेती जाइएगा.”
“हां, समोसा ले लूंगी कैंटीन से, रसगुल्ला भी. सबके लिए ले लूंगी, तुम लोग भी साथ ही खाना. चलो, अब मैं निकलती हूं, गेट पर आ गया होगा.”
सीमा दीदी तो बाय करती हुई चली गई थीं. बाकी लड़कियां शायद उनके जाने का ही इंतज़ार कर रही थीं, तुरंत कमरे में
आ धमकीं.
“चलो मिल आएं तुम्हारे उनसे…” एक लड़की ने मुझे छेड़ते हुए कहा, तो बाकी लड़कियां ‘खी… खी…’ करते हुए साथ देने चली आईं.
“क्या पहन रही हो अनु आज?” एक ने आंखें मटकाते हुए पूछा, तो मैंने बेफ़िक्री से कंधे उचका दिए, “कोई भी कॉटन का सूट पहन लेंगे यार, इतनी गर्मी है.”
कह तो दिया फिर अपने नाटक पर ख़ुद ही हंसी आई. कोई भी सूट? इतना सोचकर एक पीली-हरी बांधनी का सूट निकालकर रखा था, जिसमें मैं ख़ुद को सबसे अच्छी लगती थी. जान-बूझकर बालों में घंटों मेहंदी लगाए रखी थी, जिससे जाने के ठीक पहले धो लूं और गीले बालों का बहाना करके ना बांधूं. अपने इतने लंबे बालों की आकर्षण शक्ति के बारे में मुझे अच्छी तरह पता था, इनसे बचकर कोई भी नहीं जा सकता था. कुछ सोचकर मेरे चेहरे पर मुस्कान फैल गई. क्या मैं ख़ुद कृष्णा के आकर्षण से बच पाई? सीमा दीदी के बाहर होने पर कितनी ही बार उसकी फोटो मैंने छुप-छुपकर देखी. कितनी ही बार उसके बगल में खुद के होने की कल्पना की और कितनी ही बार उनकी फैमिली फोटो देखकर सोचा कि इसमें मेरी भी जगह होनी चाहिए. दस मिनट में तैयार होकर हम सब निकल लिए. एक लड़की ने टोक ही दिया, “अनु, तुम ऐसे ही चलोगी बाल खोलकर? गर्मी नहीं लग रही?”
“क्या करूं, सूखे ही नहीं. अभी तो धोए.” एकदम बेचारी बनकर मैंने जवाब दिया और अपने बालों पर एक नज़र डाली. घने मेघ जैसे फैले हुए बाल किसी भी मन को भिगोने की सामर्थ्य रखते थे.
“कितनी देर कर दी तुम लोगों ने आने में. कृष्णा बार-बार पूछ रहा था सबके बारे में.” सीमा दीदी हम लोगों को देखते ही चिल्लाईं. फिर परिचय करवाने लगीं, “हां तो, ये है मेरा भाई और ये हैं…”


एक-एक करके सबसे परिचय होते हुए जब मेरी बारी आई, तो मैंने ‘नमस्कार’ मुद्रा में हाथ जोड़ दिए, ‘हैलो’ बोलकर शेकहैंड करने को निकला उसका हाथ अपमानित हो गया, शायद मतभेद की शुरुआत यहीं से हो गई.
“मैं पहले भी आया हूं बनारस, लेकिन इतनी गर्मी कभी नहीं झेली.” वो टेबल पर रखे पेपर को उठाकर हवा करते हुए बोला, हमारे छत पर लगा पंखा बुरी तरह सुस्ताते हुए घूम रहा था.
“तुम एसी ऑफिस में दिनभर बैठते हो न, तो तुमको ज़्यादा लग रही है गर्मी, हम लोगों को आदत है.” सीमा दीदी ने शायद जान-बूझकर ये सब कहा, वो हंसने लगा. मैंने भी हंसी की आड़ लेकर उसकी ओर गौर से देखा, जो कुछ सामने था, फोटो से कहीं ज़्यादा था. बेहद आकर्षक सांवला चेहरा, चेहरे से भी आकर्षक मुस्कान, शानदार ड्रेसिंग सेंस और लाजवाब सेंस ऑफ ह्यूमर!
बात-बात में चुटकुले सुना देना, स्तरीय शायरी कोट कर देना, अपनी बातों से माहौल बना देना, ये सब बड़ी सहजता से वो कर रहा था. लड़कियां मुग्ध थीं और मैं गर्वित, इस सुपात्र के लिए दीदी ने मुझे चुना था!
“अच्छा, अब मैं आप सबसे पहेलियां पूछूंगा. देखता हूं, किसका आई क्यू
कितना है.”
हम सबने एक-दूसरे को देखा. मैंने समोसे की प्लेट कृष्णा की ओर बढ़ा दी, ‘थैंक्स’ बोलते हुए उसने समोसा उठाया, मेरी ओर नहीं देखा. इस समय उसका सबसे ज़्यादा ध्यान पहेलियों पर था और मेरा उस पर! दीदी से सालभर छोटा था. बी. टेक. करते ही नौकरी लग गई. कम उम्र में अच्छी-ख़ासी नौकरी, लाइफ सेटल्ड… और क्या चाहिए?
“अनु, तुम जवाब क्यों नहीं दे रही हो पहेलियों के? देखो, ये कितना घुमा रहा है हम सबको. ये बता देगी, टॉपर है भई.”
सीमा दीदी ने टोका, तो मैं चौंकी. मैं अपनी ही धुन में खोई थी. अगली पहेली उसने मुझसे पूछी, मैं जवाब नहीं दे पाई. वो ठठाकर हंसा, “बी.ए. एग्ज़ाम में पन्ने भरकर टॉप करना अलग बात है, मेरे सवालों के जवाब देना अलग बात है. वैसे भी ब्यूटी और ब्रेन एक साथ कम ही पाए जाते हैं.”
इस बात पर मैं क्या कहती? अपनी सुंदरता की तारीफ़ पर इतराना चाहिए था या फिर अपने कमअक्ल होने की बात पर छटपटाना चाहिए था? कुछ समझ नहीं आया, बस इतना समझ आया कि अब वहां से उठ जाना चाहिए था.
“दीदी, अब मैं चलती हूं. पैकिंग भी करनी है.” किसी तरह बहाना बनाकर मैंने पर्स उठाया, कृष्णा चौंककर बोला, “कहां
की पैकिंग?”
“होम टाउन जा रही हूं. एम.ए. की क्लास महीने भर बाद शुरू होगी.”
“थोड़ी देर तो बैठिए. अरे, डरिए नहीं. अब पहेली नहीं पूछूंगा.” उसने कान पकड़कर हंसते हुए कहा, इस पर बाकी लड़कियां तो हंस दीं, मुझे ये बात बेहद हल्की लगी.
“शाम की ट्रेन है मेरी, आप पहेली पूछें या न पूछें, मुझे जाना ही है.”
मैं तमतमा उठी थी. बालों को लपेटकर जूड़ा बनाया, पर्स कंधे पर टांगा और एक औपचारिक बाय बोलकर वहां से निकल आई. पीछे से एक लड़की की आवाज़ आई, “अनु सुनो… रसगुल्ला, समोसा कुछ नहीं खाया, लेती तो जाओ.”
मैंने पलटकर देखा तक नहीं. भाड़ में जाए समोसा, भाड़ में जाए रसगुल्ला और भाड़ में जाए ये पहेलियां. ये होता कौन है मेरी अक्ल जांचने वाला? ग़ुस्सा मेरी आंखों में आंसू बनकर छलक आया था. सीमा दीदी का लिहाज़ कर गई, नहीं तो ऐसे लड़कों का गुरूर तोड़ना मुझे अच्छी तरह आता था.
शाम को स्टेशन के लिए निकल ही रही थी कि सीमा दीदी धड़धड़ाते हुए कमरे में घुसीं, “मुझे लग रहा था कि तुम निकल न गयी हो. अभी-अभी गया कृष्णा. तुम उसकी बात का बुरा मान गई न? वो मज़ाक कर रहा था बस.”
सीमा दीदी लीपापोती कर रही थीं, मैंने भी बात को बढ़ाना ठीक नहीं समझा. मैं उनसे गले लगकर स्टेशन चली आई थी. मुझे लगा बात को यहीं ख़त्म करना ही ठीक था. लेकिन बात को तो यहां ख़त्म होना ही नहीं था.
“मैं आपका ही वेट कर रहा था.” रेलवे स्टेशन पहुंचते ही मेरे ठीक पीछे कृष्णा की आवाज़ आई, मैं सूटकेस और बैग संभालते हुए हड़बड़ा गई. माफ़ी मांगने यहां तक आ गया? मन में फिर से कुछ हुआ, हल्का-सा ही सही.
“जी, कहिए.”
“थोड़ा टाइम हो तो वहां चलकर
बात करें?”
उसने सामने टी स्टॉल की ओर इशारा किया. मैंने सामान संभालते हुए हां कहा, वो उस ओर बढ़ गया. एक सामान्य-सी बात थी कि मेरा सूटकेस या बैग वो लेकर जा सकता था या फिर मेरे साथ-साथ चल सकता था.
“हां, कहिए.” मैंने वहां रखी बेंच के पास लगेज टिकाया और बैठते हुए पूछा.
वो बिना लाग-लपेट के बोला, “आप बुरा मत मानिएगा पहले तो…”
मैं कुछ बुरा सुनने के लिए तैयार होकर बैठ गई. उसने कहना शुरू किया, “मुझे कुछ भी काम नहीं था बनारस में. दीदी चाहती थीं कि हम दोनों मिल लें, तो बस.. यू नो…”
सीमा दीदी के बोले गए इस झूठ से मुझे ग़ुस्सा नहीं आया, तकलीफ़ हुई. मैंने कुछ भी नहीं जताया, बस गर्दन हिलाई कि बोलते जाओ, मैं सुन रही हूं.
“मतलब आप अभी पढ़ ही रही हैं. मुझे भी तीन-चार साल कोई इंट्रेस्ट नहीं है शादी में, तो भी दीदी ने इतनी तारीफ़ की थी एक बार मिल लो.. तो मुझे लगा…”
मैं अभी भी चुप रही. उसने गला खंखारकर बात आगे बढ़ाई, “मुझे अच्छा लगा आपसे मिलकर.. मतलब यू नो…” असली मुद्दे पर आने से पहले वो हिचकिचा रहा था.
मैंने संयत स्वर में कहा, “आप आराम से अपनी बात कह सकते हैं.”
वो आश्‍वस्त हुआ. थोड़ा रुककर बोला, “मुझे मिलकर लगा कि हम दोनों एकदम अलग हैं. मतलब… हर तरह से. इंट्रेस्ट भी अलग हैं, कल्चर भी… मतलब आप रूट्स से ज़्यादा जुड़ी हुई हैं, मैं मेट्रो सिटी में हूं. समझ रही हैं न आप? मतलब मुझे ठीक नहीं लगा… तो मुझे लगा कि मुझे
साफ़-साफ़ बता देना चाहिए. आपको किसी तरह के कन्फ्यूज़न में नहीं रखना चाहता.” आख़िरी लाइन कहते हुए उसने बड़ी स्टाइल से अपने कंधे उचका दिए. मैंने किसी तरह अपने ग़ुस्से को पिया और एक लंबी सांस खींचकर कहा, “आपसे किसने कहा कि मैं किसी भी तरह के कन्फ्यूज़न में हूं? आपको लगा भी कैसे कि मैं आपसे जुड़ना चाहती हूं और न जुड़ने की बात पर मुझे दुख होगा? मैं तो इसलिए मिलने आ गई थी कि सीमा दीदी के घर से कोई आया था. मैं तो आपसे मिलना तक नहीं चाहती थी.”
थोड़ी देर पहले किया गया अपमान मुझसे हर तरह का झूठ बुलवा रहा था. तैश में मेरे हाथ-पैर कांप रहे थे. इस लड़के की इतनी मज़ाल? इस तरह से मुझे नकार रहा था, वो भी इतनी स्पष्ट बातें बोलकर?
“एक बात और समझ लीजिए. ये सब सीमा दीदी ने शुरू किया था, उनको समझाइए जाकर.” मैं बोलती ही चली गई.
“आख़िरी बात. चाहे मैं आपको फूहड़ लगी या कमअक्ल, मुझे न तो अपने गुण आप पर सिद्ध करने हैं, न अपनी अक्ल. आप होते कौन हैं मुझे रिजेक्ट करने वाले? पहले ख़ुद तो ऐसे बनिए कि किसी को पसंद आ सकें.”
सारा ज़हर उड़ेलकर मैं अपने सूटकेस, बैग संभालती हुई वहां से निकल आई थी. अब जब वो साथ नहीं था, आंसुओं को बहने की अनुमति मिल गई थी. ग़ुस्से से दिल भरा हुआ था. आंसुओं से आंखें… मैं घर जाने वाली ट्रेन में चढ़ चुकी थी. दोनों भाई-बहन नज़र से उतर चुके थे. मेरा रोना रुक ही नहीं रहा था, कारण कई थे. वो रिश्ता, जो स़िर्फ बातों में जुड़ा था, मेरे मन से तो जुड़ ही चुका था… वही रिश्ता अभी थोड़ी देर पहले दम तोड़ चुका था. यही नहीं, जाते-जाते वो अपने एक और रिश्ते को ख़त्म कर चुका था. सीमा दीदी और मेरे रिश्ते को.


सब कुछ मुझसे छूट चुका था. आगे की पढ़ाई बनारस से की नहीं, शहर छूटा. सीमा दीदी के कई फोन आए, न बात करने का मन हुआ, न बात की. वो भी छूट गईं. छूटने को बहुत कुछ छूटा, कुछ तो फिर भी रह गया.
पता नहीं, आकर्षण था या सपना, लेकिन कृष्णा ज़िंदगी से कभी जा नहीं पाया. अक्सर कुछ याद आ जाता, लेकिन याद आते ही फिर भूलने का मन करता. एम. ए., फिर बी.एड., उसके बाद नौकरी. साल दर साल ऐसे ही बीतते रहे.
घर के लोग शादी का दबाव बनाते रहे, मैं टालती रही. मम्मी किसी भी लड़के के लिए जब कहतीं, “एक बार उस लड़के से मिल तो लो.” मैं तुरंत कहती, “मिल लूंगी. फिर कमी निकालकर मना करके चली आऊंगी, ठीक रहेगा ऐसा?”
किसी एक लड़के का बदला मैं सारे लड़कों से लेने पर तुली हुई थी. ये भी नहीं समझा कि इन सबमें नुक़सान स़िर्फ मेरा हो रहा था. मैं दिन-ब-दिन और चिड़चिड़ी और रूखी होती जा रही थी… और इतने सालों बाद, आज मुझे वो चेहरा शायद फिर से दिख गया था, जो इन सबके लिए ज़िम्मेदार था. थोड़ी देर तक ध्यान से देखने के बाद मुझे यक़ीन हो गया था कि एयरपोर्ट के कोने में बैठा, वो सूती कुर्ते वाला आदमी कृष्णा ही था.
“मिस्टर कृष्णा…” उसके ठीक पीछे जाकर मैंने धीमे से पुकारा, वो पलटा.
एक पल रुककर वो चौंक गया,
“अनुप्रिया.. तुम?”
आह, पहले तो सुकून मिला, याद तो हूं, फिर मैं भी चौंक गई. मैं ‘आप’ से ‘तुम’ कैसे हो गई?
“आओ इधर. बैठो. कहां जा रही हो?”
अपने बगल वाली सीट से मैगज़ीन हटाते हुए एकदम अनौपचारिक निमंत्रण देने का हक़ इनको किसने दिया? कृष्णा के लहज़े में वो खुलापन था, जैसे हम बरसों से मिलते
आए हों.
“लखनऊ की फ्लाइट है! सीमा दीदी कैसी हैं?” मैंने बीच में एक सीट का फ़ासला रखते हुए, बैठते हुए पूछा. इसके अलावा कोई और सवाल मेरे पास था ही नहीं.
“दीदी ठीक हैं. कॉलेज में पढ़ा रही हैं. एक बेटा है. जीजाजी बैंक में हैं. कानपुर में हैं आजकल, वहीं जा रहा हूं. उनका फोन नंबर सेव कर लो.”
सब कुछ फटाफट बता दिया गया, जो पूछा वो भी, जो नहीं पूछा वो भी. मैंने आसपास का जायज़ा लिया. उनके साथ कोई था नहीं शायद, मेरी असहजता थोड़ी कम हुई.
“तुम बताओ, क्या कर रही हो आजकल? बच्चे, पति सब कहां, कैसे हैं?” ठीक मेरी आंखों में आंखें डालते हुए कृष्णा ने पूछा.
मैंने पर्स में फोन ढूंढ़ने के लिए आंखें झुका लीं, “सेंट्रल स्कूल में पढ़ा रही हूं. शादी अभी देख रहे हैं पापा. बताइए दीदी का नंबर.”
नंबर बताते हुए एक जोड़ी आंखें मुझे अजीब ढंग से देखती रहीं. उठकर जा भी नहीं सकती, मैं इतनी कमज़ोर क्यों हो गई अचानक? पूछ तो लेती, कहां है आपकी पत्नी? तेज़ दिमाग़ है? मेट्रो सिटी लायक होगी न?
“अपना फोन नंबर दोगी?”
जी में आया, तमक कर बोलूं. नहीं दूंगी, हिम्मत कैसे हुई मेरा फोन नंबर मांगने की? लेकिन मुझ पर तो आज कोई और लड़की छाई हुई थी. वो लड़की जो कई महीनों तक इस आदमी से मन जोड़े बैठी थी. अपना फोन नंबर मैंने तुरंत बता दिया.
“अनु, तुमको मेरा फोन नंबर
नहीं चाहिए?”
अब बस. बहुत हुआ. कैसा आदमी है ये? इतने सालों की नाराज़गी के बाद दो लोग मिलते हैं, तो ऐसे मिलते हैं? न कोई अफ़सोस, न शर्मिंदगी. फ्लर्ट कर रहा है क्या?
“नहीं चाहिए आपका फोन नंबर, मेरे किसी काम का नहीं है. बोर्डिंग शुरू हो गई है, मैं चलती हूं.”
एक बार फिर मैं अलग होकर एक यात्रा पर निकल चुकी थी. हमारा मिलना-बिछड़ना ठीक यात्रा के पहले ही क्यों होता था. मन भारी हो गया था. सालों पहले का दिन आज अपने को दुहरा रहा था. उस दिन भी इसी तरह रोते हुए मैं ट्रेन पर चढ़ी थी, जिस तरह आज मैं आंसू भरे हुए फ्लाइट में बैठने जा रही थी.. लेकिन आज दिल में ग़ुस्सा ही नहीं था, कहां गया वो आक्रोश? इतने सालों की दूरी में वो ग़ुस्से की आग ठंडी हो गई या फिर मन में दबा कोई पुराना सपना अपनी याद दिला गया.
“फोन फ्लाइट मोड पर कर लीजिए मैम.”
एयरहोस्टेस ने पास आकर कहा तो मैंने फोन निकालकर देखा, शायद एक मैसेज ही किया हो उसने. लेकिन फोन का स्क्रीन भी मेरे भाग्य की तरह कोरा ही था. फोन बंद करके, आंखें मूंदकर मैंने कुर्सी पर पीठ टिका ली. क्यों चाहिए मुझे उसके फोन से कोई संदेश, जिसके मन तक मेरा कोई संदेश नहीं पहुंचा. इतने सालों बाद भी मैं क्यों जुड़ी हुई हूं वहीं? मन को मज़बूत करना होगा, अब जब मम्मी किसी रिश्ते की बात करेंगी, तो अपने मन के अंधेरे कोने पर पड़ने दूंगी रोशनी. कहीं से कटना है, तो कहीं तो जुड़ना ही होगा.


लखनऊ एयरपोर्ट उतरकर, लगेज बेल्ट से अपना सामान लिया. कैब बुलाने के लिए अपना फोन ऑन किया तो धड़ाधड़ एक के बाद एक कई सारे मैसेज उभरे, कुछ मम्मी के, कुछ सहेलियों के और… और एक अनजान नंबर से आए दो मैसेज, एक छोटा और दूसरा लंबा-सा मैसेज, बड़ी चिट्ठी जितना लंबा…

अनु,
मैं कृष्णा.. नंबर सेव कर लो…
पहला मैसेज पढ़ते ही दिल धक्क से रह गया. आसपास देखा, अपना सामान घसीटते हुए वेटिंग एरिया में आकर सीट पर बैठ गई. दूसरा मैसेज, इतनी लंबी चिट्ठी, कृष्णा की पहली चिट्ठी, ऐसे हड़बड़ी में तो नहीं पढ़ी जा सकती थी न! एक लंबी सांस लेकर दूसरा मैसेज पढ़ना शुरू किया,
अनु,
दुनिया गोल है, मैंने आज ही माना. जिसको इतना ढूंढ़ा, वो ख़ुद ही आकर मुझे चौंका देगी, विश्‍वास नहीं था. मैंने शादी नहीं की, कर ही नहीं पाया, कहीं और जुड़ ही नहीं पाया… बस तुमको ही ढूंढ़ता रहा. तुमको कितना ढूंढ़ा, सोशल मीडिया पर तुम हो नहीं. तुम्हारा फोन नंबर बदल गया था. हॉस्टल से पता निकलवाकर मैं और दीदी तुम्हारे शहर तक तुमको ढूंढ़ आए, वहां पता चला तुम लोग कहीं और शिफ्ट हो गए थे. तुम सोच रही होगी, इतनी मेहनत किसलिए की गई? दीदी तुमको बहुत प्यार करती थीं, अब भी करती हैं, तुमसे अलग होकर वो रह ही नहीं पा रही थीं. वजह बस इतनी ही नहीं थी, मैंने तुमको दीदी के लिए भी ढूंढ़ा, उससे ज़्यादा अपने लिए ढूंढा.
जानती हो, पहली बार मिलने से पहले ही मैं तुमको दीदी के ज़रिए पसंद कर चुका था, तुम्हारी तस्वीर, तुम्हारी उपलब्धियां सब कुछ मुझे तुम्हारी तरफ़ मोड़ रहे थे, लेकिन पता नहीं क्यों मैं जुड़ना ही नहीं चाह रहा था. इसको क्या कहूं, ईगो या फिर ओवर कॉन्फिडेंस, लगता था जैसे दुनिया मेरे कदमों में है. मेरे लुक्स, मेरे सेंस आफ ह्यूमर, मेरी इंटेलिजेंस, मेरे आगे कोई कुछ है ही नहीं. तुमसे मिलकर मुझे कुछ ख़ास नहीं लगा, कुछ भी एक्स्ट्राआर्डिनरी नहीं. तब मैंने सोचा, हमारा कोई मेल नहीं. तभी तो मैं जाकर उस दिन स्टेशन पर तुमसे सब कुछ कह आया, बड़े आराम से, बेफ़िक्र होकर!
पता नहीं, ठीक उसी दिन के बाद से मेरी बेफ़िक्री को किसकी नज़र लग गई. सोते, जागते, कुछ भी काम करते मेरी आंखों के सामने तुम्हारा चेहरा घूमने लगा. कैंटीन में बैठी अनु का हंसता चेहरा भी दिखता और स्टेशन पर बेंच पर बैठी अनु का उदास होता चेहरा भी.
शायद ये मेरा भ्रम हो, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि तुम्हारी हंसी में भी मैं था, उदासी में भी मैं ही था! अगर मैं ग़लत हूं, तो मेरा नंबर डिलीट कर देना और अगर मैं सही हूं, तो अपने जीवन में मुझे शामिल करो या नहीं, मुझे एक बार मिलकर माफ़ी मांगने का मौक़ा ज़रूर देना.
तुम्हारे इंतज़ार में,
स़िर्फ तुम्हारा
कृष्णा

मैंने महसूस किया, आंखों से दो आंसू टपककर मेरे गाल भिगो चुके थे. चेहरा भी भीग गया था, मन भी. पूरा मैसेज एक बार फिर पढ़ा. नियति कौन-सा खेल मेरे साथ खेल रही थी? मैंने थोड़ी देर पहले तय किया था कि मम्मी को रिश्ते के लिए हां कह दूंगी और इतनी-सी देर में इतना कुछ बदल गया! कितना सुखद एहसास था ये, कोई इतने सालों से मेरा इंतज़ार कर रहा है. मुझे ढूंढ़ रहा है. आंसू पोंछते हुए होंठों पर मुस्कान फैल गई, जवाब क्या लिखूं? कृष्णा, मैंने मन ही मन नाम लिया. कनु भी तो कहते हैं कृष्णा को और राधा को, कनुप्रिया! जवाब लिखूंगी, बस इतना-सा-
“लखनऊ से कानपुर दो घंटे का ही रास्ता है, आज ही मिल लेते हैं- कनुप्रिया”
अब मेरी बारी थी उसका आईक्यू चेक करने की. अपनी शरारत पर ख़ुद ही हंसी आ गई. देखती हूं अनुप्रिया से कनुप्रिया नामकरण की पहेली उसको समझ में आती है या नहीं!

Lucky Rajiv
लकी राजीव

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