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कहानी- वेदना (Short Story- Vedna)

"मांजी मैं भी गर्व से सिर ऊंचा करती, आंसुओं के समंदर को पी जाती, अपने सीने पर हक़ीक़त का पत्थर रखकर अपने दिल को मज़बूत कर लेती, अगर मेरा सुहाग भारत मां की आन, बान और शान की रक्षा करते-करते शहीद होकर सैनिक सम्मान के साथ तिरंगे को ओढ़ वापस घर लौटा होता और सारा शहर उसकी अगवानी करने के लिए अश्रु की धार लिए उमड़ पड़ा होता. लेकिन मांजी मैं किस बात पर गर्व करूं? क्या कहकर अपने दिल को समझाऊं? मैं तो यह भी फ़ैसला नहीं कर पा रही हूं कि मैं इस वक़्त सुहागन हूं या नहीं!"

कितना खुश था बलवंत उस दिन, मानो जंग पर नहीं, मनचाही मनोरंजक यात्रा पर जाने जा रहा हो.  होल्डाल बांधते हुए देशभक्ति के तराने उसके होंठों पर तैर रहे थे. उधर नेहा आंखों में आंसू भरे उसकी वर्दियां एवं अन्य सामान बॉक्स में रख रही थी.
बलवंत की तस्वीर के के सामने मूर्तिवत बैठी एकटक उसे निहारे जा रही थी. गालों पर ढलकी आंसुओं की लकीरें उसके हृदय की वेदना को स्पष्ट कर रही थीं. रह-रहकर बस वही दृश्य आंखों के सामने उभर रहा था…
कितना ख़ुश था बलवंत उस दिन, मानो जंग पर नहीं, मनचाही मनोरंजक यात्रा पर जा रहा हो. होल्डाल बांधते हुए देशभक्ति के तराने उसके होंठों पर तैर रहे थे. उधर नेहा आंखों में आंसू भरे उसकी वर्दियां एवं अन्य सामान बॉक्स में रख रही थी.
"जल्दी करो नेहा ! रंजीत आता ही होगा." होल्डाल बांधकर बलवंत नेहा की ओर पलटा. बलवन्त से आंखें मिलते ही नेहा की हृदय पीड़ा सब्र का बांध तोड़ सिसकी की शक्ल में होंठों पर आ ही गयी.
"अरे ये क्या? तुम तो रो रही हो नेहा! क्या इन्हीं भीगी पलकों से रुखसत करोगी मुझे?"

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बलवन्त ने नेहा के चेहरे को प्यार से ऊपर उठाते हुए कहा, "नहीं, नेहा नहीं. तुम एक आम औरत नहीं, बल्कि एक फौजी की पत्नी हो, जिसकी आंखों में आंसू नहीं स्वाभिमान झलकना चाहिए. एक सैनिक की पत्नी का दिल तो इतना मज़बूत होना चाहिए कि मातृभूमि के लिए पति के मिट जाने पर भी वह गर्व करे, रोए नहीं."
"मैं भी कहां चाहती हूं कि आपके फ़र्ज़ के रास्ते में आंसुओं की दीवार खड़ी करूं? पर मैं क्या करूं? इन दो महीनों में मुझे आपकी और आपके साथ रहने की आदत सी पड़ गयी है. अब आपके बिना और आपसे दूर रहने के ख़्याल से ही मेरा दिल बैठने लगता है और लाख कोशिशों के बावजूद भी मेरे आंसू नहीं थमते." नेहा ने बलवन्त के सीने पर अपना सिर रख दिया.
बलवन्त ने प्यार से उसके बालों को सहलाते हुए कहा, फौजी परिवार को अपनों से दूर रहने की आदत डालनी पड़ती है. सैनिक अपना परिवार छोड़कर सरहद की रक्षा करने इसलिए जाता है, ताकि देश के दूसरे परिवार अपनों के पास रह सकें.
नेहा! क्या तुमने कभी मां की आंखों में पिताजी के लिए आंसू का एक कतरा भी देखा है? नहीं… न..!"
नेहा ने 'ना' में सिर हिला दिया, "वो भी तो पिताजी के बगैर अट्ठारह सालों से बस उनकी यादों के सहारे ही जी रही हैं. हम फौजियों की ज़िंदगी का क्या भरोसा? न जाने कब दुश्मन की कोई गोली हमारा सीना चीर दे. क्या पता हम किस तरह से वापस लौटें, ज़िंदा या…" अपनी कोमल हथेलियों को उसके मुंह पर रख नेहा ने उसके अगले शब्द को रोक लिया.
बलवन्त ने उसके हाथों को हटाते हुए कहा, "हक़ीक़त रोके से नहीं रूकती नेहा. और एक हक़ीक़त यह भी है कि मैं वापस ज़रूर आऊंगा या तो फतह करके या फतह के लिए शहीद होकर तिरंगे को सीने से लगाए. और फिर, मैं अपनी याद के लिए तुम्हारी कोख में अपने प्यार की निशानी भी तो छोड़कर जा रहा हूं, जो तुमको हर पल एहसास दिलाएगा कि मैं तुम्हारे पास ही हूं."
नेहा एक बार फिर बलवन्त के सीने से लग गयी और बलवन्त ने उसे अपनी बांहों के घेरे में लेकर सीने में छुपा लिया.
अचानक नेहा की तन्द्रा टूटी, सारा दृश्य अदृश्य हो गया, नेहा हक़ीक़त में लौट चुकी थी. उसे अपने कंधे पर किसी के स्पर्श का एहसास हुआ. ये माताजी थीं, जो उसकी भीगी पलकों में उसकी आंतरिक पीड़ा को पढ़ने की कोशिश कर रही थीं.


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"तुमने आज फिर आंसुओं का दामन थाम लिया? तुम्हें क्या हो जाता है नेहा? ये आंसू क्यूं? बार-बार तुम्हारी आंखें गीली हो आती है? ख़ुद को संभालो नेहा. ये आंसू तुम्हारे लिए नहीं हैं, ये तो साधारण औरतों की ही आंखों में अच्छे लगते हैं. संगीता को देखो. रंजीत के शहीद होने के बाद उसने किस तरह अपना दिल मज़बूत कर लिया है. शहीद की बीवी होने का गर्व एक तेज बनकर उसके चेहरे पर हमेशा चमकता रहता है, लेकिन तुमने तो ग़म और आंसुओं में डूबकर न जाने अपनी हालत कैसी कर डाली है?"
नेहा जैसे आज सब सच कह डालने पर अमादा हो गयी थी.
"मांजी मैं भी गर्व से सिर ऊंचा करती, आंसुओं के समंदर को पी जाती, अपने सीने पर हक़ीक़त का पत्थर रखकर अपने दिल को मज़बूत कर लेती, अगर मेरा सुहाग भारत मां की आन, बान और शान की रक्षा करते-करते शहीद होकर सैनिक सम्मान के साथ तिरंगे को ओढ़ वापस घर लौटा होता और सारा शहर उसकी अगवानी करने के लिए अश्रु की धार लिए उमड़ पड़ा होता.
लेकिन मांजी मैं किस बात पर गर्व करूं? क्या कहकर अपने दिल को समझाऊं? मैं तो यह भी फ़ैसला नहीं कर पा रही हूं कि मैं इस वक़्त सुहागन हूं या नहीं!"
मांजी के दोनों हाथों को अपने हाथों में लेते हुए नेहा ने पूछा, "आप ही बताइए मांजी! मैं ख़ुद को क्या मानूं, सुहागन या विधवा ?… विधवा तो मैं हो नहीं सकती, क्योंकि जंग पर गए फौजी की मृत्यु नहीं होती, बल्कि वे शहीद होते हैं और फिर, उनकी शहादत की कोई ख़बर भी आज तक नहीं आई है. जंग को फतह हुए अब तो एक साल बीत गया है. मेरा दिल कहता है कि ना तो जंग में वे शहीद हुए हैं और ना ही उनकी साधारण मौत हो सकती है. मांजी अब आप ही ज़रा सोचिए कि एक लापता सैनिक की बीवी कैसे अपने दिल को दिलासा दे और कैसे अपने आंसुओं को रोके?"
नेहा के सवालों ने मांजी को झंझोड़ कर रख दिया.
"मांजी! उन्होंने या तो शहीद होकर या फिर फतह करके दोनों ही सूरत में आने का वादा किया था. वो शहीद तो हुए नहीं और  फतह भी हो चुकी है, इसीलिए बस ये सोचकर दिल घबराता है कि कहीं उन्हें दुश्मनों ने क़ैद न कर लिया हो और वो उन्हें तरह-तरह की यातनाएं न दे रहे हों. इन्हीं ख़्यालों के आते ही दिल सहम सा जाता है और फिर ये आंसू..!”
आंसुओं ने फिर से नेहा का चेहरा भिगोना शुरू कर दिया, वो मांजी के गले से लग गई.

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मांजी को अब एहसास हो गया था कि शहीद की पत्नी की वेदना से भी बढ़कर है लापता सैनिक की पत्नी की वेदना. शहीद की पत्नी के सामने हक़ीक़त होती है और लापता सैनिक की पत्नी के सामने सिर्फ़ आशंकाएं…
अचानक राहुल के रोने की आवाज़ से दोनों का ध्यान भंग हुआ, वो जग गया था. नेहा ने अपने आंसू पोंछे और राहुल को गोद में उठाकर थपकी देकर उसे चुप कराने लगी.

- रवि प्रताप पाठक

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