नई शादी के साइड इफेक्ट्स (Side effects of new marriages)

शादी के शुरुआती दिनों के बाद जब प्यार की ख़ुमारी उतर जाती है और वास्तविकता से सामना होता है, तो अक्सर कपल्स को वे बातें बहुत ज़रूरी लगने लगती हैं, जिनके बारे में न तो उन्होंने कभी पहले सोचा था और न ही वे उनकी ज़िंदगी का हिस्सा थीं. अचानक कई मतभेद उनके बीच खड़े हो जाते हैं. मौज-मस्ती के एहसास को एक तरफ़ रखकर कपल्स कई बार अपनी नई शादी की चुनौतियों का सामना करने में बिज़ी हो जाते हैं. शादी के साइड इफेक्ट्स (Side effects of new marriages)उनके सामने यकायक आ जाते हैं.

Side effects of new marriages

पैरेंट ट्रैप- अपने घर को छोड़कर आई लड़की अपने पैरेंट्स व रिश्तेदारों को मिस कर रही होती है, तो इस कमी को पूरा करने के लिए वह अपनी सास की ओर देखती है, लेकिन वो पाती है कि वह तो उसकी सोच से बहुत ही अलग हैं. घर पर व्याप्त उनके एकाधिकार और अपनी तरह से सबको चलाने का शौक़ लड़की के सामने किसी शॉक से कम नहीं होता है. उनका घर चलाने का तरीक़ा एकदम अलग होता है.
टिप: शादी के बाद इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि मायकेवाला माहौल ससुराल में नहीं मिलेगा और ससुरालवालों से नए सिरे से तालमेल बैठाना होगा. ज़रूरी है कि पति को विश्‍वास में लेकर आप उनसे इस बारे में सहयोग लें, क्योंकि वह अपनी फैमिली के बारे में आपको सही तरह से समझाने में मदद कर सकते हैं.

भूमिकाएं तय करना- अधिकांशतः यही होता है कि कपल्स शादी के बाद आपस में एक-दूसरे की एक्सपेक्टेशंस पर बात करना नज़रअंदाज कर देते हैं. वे इस शादी से क्या उम्मीद रखते हैं, यह बताना वे ज़रूरी नहीं समझते और मानकर चलते हैं कि अपने आप सब होता चला जाएगा. यही सोच शादी के बाद साइड इफेक्ट्स के रूप में सामने आती है.
टिप: बेहतर यही होगा कि शादी से पहले ही अपनी भूमिकाएं तय कर लें. अपना फोकस इस बात पर रखें कि साथी किस तरह आपकी मदद करेगा और अगर शादी के बाद आपको लगे कि ऐसा नहीं हो रहा है, तो साथी पर दोष लगाने की बजाय समाधान तलाशने का प्रयास करें, ताकि दोनों मिलकर गृहस्थी को संभाल सकें. आजकल यह काम पुरुष का है या औरत का, ये चीज़ें नहीं चलतीं. जिसमें जो कंफर्टेबल फील करे, वह उस काम को कर सकता है.

मनी मैटर्स- पैसा बहुत ही सेंसिटिव विषय है और पार्टनर्स का इस मामले में एकमत होना अति आवश्यक है. शादी के बाद बिना किसी बजट प्लानिंग के पति-पत्नी दोनों ही खुले हाथों से ख़र्च करते हैं. पति पत्नी को इम्प्रेस करने के चक्कर में रहता है और पत्नी इस बात से ख़ुश रहती है कि उसके साथी को उसकी परवाह है, इसलिए वह उसकी इच्छाओं का ख़्याल रखता है. पर शादी के कुछ समय बाद स्थिति बदल जाती है. अगर पैसे को सोच-समझकर ख़र्च नहीं किया जाता है, तो बजट गड़बड़ा जाता है. कपल्स फिर
एक-दूसरे को ही इसके लिए दोषी मानने लगते हैं. फाइनेंशियल बैगेज शादी को बहुत बड़ा झटका दे सकता है.
टिप: बेहतर यही होगा कि शादी के शुरुआती दिनों से ही फाइनेंशियल प्लानिंग आरंभ कर दें, ताकि आप दोनों के बीच पैसे को लेकर तनाव न उत्पन्न हो. किस पर कितना ख़र्च करना है, यह हिसाब लगाएं. एक बार जब आप बजट बना लेते हैं, तो ज़िंदगी की गाड़ी को चलाना बहुत आसान हो जाता है. मनोवैज्ञानिक सपना पटनायक के अनुसार, एक-दूसरे की ख़र्च करने की आदत को देखकर अक्सर युगल हैरानी में पड़ जाते हैं. फाइनेंस के मामले में हो सके, तो शादी से पहले ही डिस्कस कर लें. जहां दोनों साथी कमा रहे होते हैं और आर्थिक स्वतंत्रता की आदत होती है, वहां शादी के बाद ज़्यादा परेशानी आती है, क्योंकि वे अपने मन से ख़र्च करने के आदी होते हैं. अचानक शादी के बाद इस मामले में दूसरे को जवाब देना या बताना उनके लिए आसान नहीं होता है. पर इस इफेक्ट से बचने के लिए ट्रांसपरेंसी रखें.

फैमिली ट्रेडिशंस- दोनों साथियों की चूंकि फैमिली बैकग्राउंड और परंपराएं भिन्न होती हैं, इसलिए शादी के बाद लड़की के लिए उनके साथ एडजस्ट करना सबसे बड़ी चुनौती होती है. रहन-सहन, खान-पान, त्योहार आदि हर चीज़ अलग हो सकती है. ऐसे में यदि लड़की से ज़रा-सी भी चूक हो जाती है, तो हर किसी को उससे शिकायत होती है.
टिप: अगर शादी से पहले ही लड़का अपने परिवार के तौर-तरीक़ों से लड़की को परिचित करवा दे, तो इस इफेक्ट का समाधान हो सकता है. लड़की मानसिक रूप से तैयार रहेगी कि किसके साथ कैसे बात करनी है, किसे क्या पसंद-नापसंद है आदि. शादी के बाद भी पति की ज़िम्मेदारी होती है कि वह पत्नी का हर क़दम पर साथ दे, उसे सलाह व मार्गदर्शन देकर उसकी राह आसान बनाए, ताकि वह नए माहौल में आराम से एडजस्ट हो सके.

फैमिली प्लानिंग- शादी का यह सबसे बड़ा साइड इफेक्ट होता है. अक्सर युगल न तो शादी से पहले और न ही शादी के बाद इस पर बात करते हैं. नतीजा कई बार अनचाही प्रेग्नेंसी के रूप में सामने आता है. सपना पटनायक का मानना है कि सोशल और बायोलॉजिकल कारणों की वजह से स्त्री बच्चा जल्दी चाहती है, जबकि पुरुष फाइनेंशियली और इमोशनली ख़ुद को पहले तैयार करने के बाद पिता बनना चाहता है. कई बार बच्चे के मामले में हुई देरी या जल्दी रिश्ते में दरार पैदा करने का कारण बन जाती है.
टिप: प्रेग्नेंसी का राइट टाइम क्या है, यह कोई निश्‍चित रूप से कभी भी तय नहीं कर सकता. यदि शादी से पहले इस बारे में बात नहीं हुई, तो बेहतर होगा कि शादी के तुरंत बाद कपल्स को इस मामले पर बात करके उसके अनुसार ही फैमिली प्लानिंग करनी चाहिए.

कम्यूनिकेशन गैप- मैरिज काउंसलर पूनम सचदेवा के अनुसार, आजकल लड़के-लड़कियां दोनों ही नौकरीपेशा होते हैं और इसलिए उनके लिए उनकी महत्वाकांक्षाएं व लक्ष्य बहुत ज़रूरी होते हैं. उन्हें पूरा करने के लिए अक्सर वे एक रेस में शामिल हो जाते हैं. वर्कप्लेस में आपस में प्यार हो जाने की संभावनाएं अधिक हो जाने से कपल्स समझ ही नहीं पाते कि वे एक-दूसरे के लिए बने भी हैं या नहीं. एक-दूसरे के लिए समय न निकाल पाने की वजह से शादी से पहले और बाद में भी विवाह से जुड़े मुद्दों पर बात करने का मौक़ा नहीं मिलता. कम्यूनिकेट न करने की वजह से साथी को समझना मुश्किल लग सकता है.
टिप: साथी की बातें सुनना व अपनी बातें शेयर करना दोनों ही ज़रूरी हैं. शेयरिंग प्यार को बनाए रखती है और आपसी समझ व भावनात्मक रिश्ता भी बढ़ाती है. कम्यूनिकेशन के ज़रिए ही आप दोनों एक-दूसरे की परेशानियां व ज़रूरतें समझ सकेंगे. बेहतर होगा कि शेयरिंग और केयरिंग को ही रिश्ते का आधार बनाएं.

सेक्स लाइफ पर बात न करना- हमारे समाज में आज भी सेक्स पर बात करना, ख़ासकर लड़कियों के लिए वर्जित ही माना जाता है. यही वजह है कि शादी से पहले तो क्या, शादी के बाद भी सेक्स पर आपस में पति-पत्नी कोई बात ही नहीं करते. जबकि सेक्स आपके रिश्ते में एक मज़बूत कड़ी की तरह काम करता है. शादी के बाद अगर खुलकर सेक्स संबंधों पर डिस्कस न किया जाए, तो परिणाम सुखद नहीं होते हैं. सेक्स के लिए प्लानिंग करना बुरी बात नहीं है. अगर इस पर ध्यान न दिया जाए, तो आप सेक्स को एंजॉय नहीं कर पाएंगे और यह समस्या शादी के बाद जटिल रूप ले सकती है.
टिप: अपने साथी से सेक्स से जुड़ी उसकी पसंद-नापसंद जानें, रोमांटिक वातावरण बनाएं और पहल आपको करनी पड़े, तो भी हिचकिचाएं नहीं. इस तरह साथी को आपके साथ व़क्त गुज़ारने का इंतज़ार रहेगा.

– सुमन बाजपेयी