कहानी- आज्ञा चक्र 2 (Story Series- Aagya Chakra 2)

“अब ये तेरा कौन-सा नया दर्शन है दीपा.” प्रेरणा ने मीठी झिड़की देते हुए कहा.

“ना रे प्रेरणा, तू नहीं समझेगी. पर तू बिंदी ज़रूर लगाया कर. आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकरजी कहते हैं कि महिलाओं को बिंदी ज़रूर लगानी चाहिए. इससे उन महिलाओं को रोज़गार मिलता है, जो बिंदी के व्यापार में संलग्न हैं.”

“अब ये तेरा कौन-सा नया फंडा है?”

“अरे, इससे भी ऊपर. अपना आज्ञा चक्र है ना जो माथे पर, वहां बिंदी लगाने से अपने इष्ट की तरफ़ ध्यान रहता है. हम महिलाएं इसलिए तो हमेशा ज़िंदगी की भागदौड़ में भी अपने दायित्वों के प्रति ध्यान मुद्रा में रहती हैं.”

“लो भई! ये दर्शन भी सुनो.” प्रेरणा मंत्रमुग्ध हो गई थी दीपा के तर्कों से. “अच्छा भई ज़रूर लगाऊंगी बिंदी. कभी मिस नहीं करूंगी.”

उधर प्रेरणा की शादी भी हो गई थी. वो अपने पति प्रीत के साथ ख़ुश थी. अपने कॉलेज की दोस्ती निभाने कभी-कभार दीपा के घर आ जाती. दिव्यांश और प्रीत जितने संजीदा होते, दीपा और प्रेरणा उतनी ही मुखर हो जातीं.

वर्ष दर वर्ष हंसी-ख़ुशी बीत रहे थे. पर प्रेरणा को बिंदी का शौक़ विवाह के बाद भी नहीं था. वो परवाह भी नहीं करती थी कि बिंदी लगी भी है या नहीं. एक दिन प्रेरणा दीपा के घर बिंदी लगाए बिना ही चली गई, तो वहां जाते ही दीपा ने उसे टोक दिया, “अरे! बिंदी कहां है तेरी?”

“इसका बिंदी का ये जुनून अभी भी नहीं गया, क्यों जीजाजी?” प्रेरणा दिव्यांश की ओर रुख करती हुए बोली.

“हां, पहले तो हमे माथे पर टांगे-टांगे फिरती हैं. और फिर ना जाने कौन-से आज्ञा चक्र का दर्शन हमारे सामने बघारने लगती हैं.”

दीपा अपने ड्रेसिंग टेबल में सजे हुए ढेर सारे बिंदी के कार्ड ले आई. और प्रेरणा के माथे पर उसके नीले सूट से मेल खाती नीली बिंदी रखते हुए बोली, “अरे, ज़िंदगी में इन बिंदियों की तरह ना जाने कितने रंग बिखरे हैं. लाल, पीले, हरे, बैंगनी हमें हर रंग में रहना सीखना है. क्या पता कब कौन-सा रंग इस ज़िंदगी से ख़त्म हो जाए.”

“अरे-अरे, आप तो बड़ी दार्शनिक बातें कर लेती हैं.” प्रीत आज मुखर हो उठे थे.

“ये तो बचपन से ही ऐसी बातें करती आई है. कॉलेज में कभी प्रोफेसर की बिंदी निहारती थी, तो कभी पड़ोस की आंटीजी की.” प्रेरणा आज अपनी पूरी जानकारी दे देना चाहती थी. आज दिव्यांश भी बोलने में पीछे नहीं रहे थे, “प्रेरणाजी! आपकी सहेली ने तो बिंदी के पीछे हमें ना जाने कहां-कहां घुमाया. एक बार तो थ्रीडी बिंदी के चक्कर में सारा शहर ही छान मारा. अब साइंस स्टूडेंट का ये भी तो नुक़सान है कि वो अपनी ही भाषा बोलते हैं. फिर मैंने ही दुकानदार को समझाया कि भैया! वो बिंदी जो चारों तरफ़ से लशकारे मारे और दुकान पर खड़े सारे ग्राहक हंस पड़े.”

दिव्यांश के हर जुमले पर प्रीत अपनी चुटीली टिप्पणियां करने से नहीं चूक रहे थे. प्रीत यह कहने से भी बाज़ नहीं आए कि भई प्रेरणा को तो हमारी परवाह ही नहीं, हम गिरें, टेढ़े हों या उल्टे लटके रहें.

अगले दिन प्रेरणा ने दीपा को फोन किया, “भई, कल तो तेरे घर मज़ा ही आ गया. प्रीत भी ख़ुश थे तेरे बिंदी दर्शन पर. अब तो मुझे हर समय बिंदी का ख़्याल रखना पड़ेगा, वरना प्रीत व्यंग्य करने से नहीं चूकेंगे.”

“हां-हां, बिंदी लगाया कर तू. पता नहीं ज़िंदगी में कितने दिन बिंदी लगाना लिखा है.” दीपा फोन पर ही भावुक हो उठी.

“अब ये तेरा कौन-सा नया दर्शन है दीपा.” प्रेरणा ने मीठी झिड़की देते हुए कहा.

“ना रे प्रेरणा, तू नहीं समझेगी. पर तू बिंदी ज़रूर लगाया कर. आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकरजी कहते हैं कि महिलाओं को बिंदी ज़रूर लगानी चाहिए. इससे उन महिलाओं को रोज़गार मिलता है, जो बिंदी के व्यापार में संलग्न हैं.”

“अब ये तेरा कौन-सा नया फंडा है?”

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“अरे, इससे भी ऊपर. अपना आज्ञा चक्र है ना जो माथे पर, वहां बिंदी लगाने से अपने इष्ट की तरफ़ ध्यान रहता है. हम महिलाएं इसलिए तो हमेशा ज़िंदगी की भागदौड़ में भी अपने दायित्वों के प्रति ध्यान मुद्रा में रहती हैं.”

“लो भई! ये दर्शन भी सुनो.” प्रेरणा मंत्रमुग्ध हो गई थी दीपा के तर्कों से. “अच्छा भई ज़रूर लगाऊंगी बिंदी. कभी मिस नहीं करूंगी.”

समय चक्र कब रुका है. अनवरत चलता है वो, बिना किसी की परवाह किए. 10 वर्ष बीत गए थे दीपा के सुखी वैवाहिक जीवन की सजी-धजी गाड़ी को चलते हुए. एक दिन प्रेरणा को ख़बर मिली कि दिव्यांश की दोनों किडनी फेल हो चुकी हैं. अस्पताल के आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा है. दीपा की हंसती-खेलती ज़िंदगी पर गाज गिरी थी. प्रीत और प्रेरणा ख़बर सुनकर तुरंत अस्पताल भागे थे.

दीपा का आंसुओं से तर चेहरा, कांच की खिड़की से झांकते दिव्यांश की

टूटती-जुड़ती सांसों के बीच झूलता शरीर प्रेरणा को उद्वेलित कर रहा था. कभी ना सूना रहनेवाला दीपा का माथा आज आंसुओं के समुद्र में अपनी बिंदी बहा चुका था और बिंदी का कार्ड हर समय सामने लेकर खड़े रहनेवाले दिव्यांश ज़िंदगी से जंग लड़ रहे थे. प्रेरणा ने अपने छोटे से पर्स से गोल मैरून बिंदी निकालकर दीपा के माथे पर रख दी और भीगे स्वर में बोली, “जब से तूने बिंदी का दर्शन समझाया है न, तब से बिंदी का कार्ड हमेशा अपने पास रखती हूं. चलो, हम दिव्यांश के लिए प्रार्थना करते हैं.”

“पर प्रेरणा, डॉक्टर ने जवाब दे दिया है. वो इस स्टेज पर हैं कि कोई इलाज, कोई ट्रांसप्लांटेशन काम नहीं आएगा.” दीपा के चेहरे पर बनती भंगिमाओं और भावनाओं के सैलाब के बीच में बिंदी उठती-गिरती महसूस हो रही थी.

Sangeeta Sethi

    संगीता सेठी

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