कहानी- अभी मंज़िल दूर है 2 (Story Series- Abhi Manzil Door Hai 2)

अतीत मुझ पर हावी होता जा रहा था. मेरी आंखों के आगे वह दृश्य साकार हो उठा जब तपती दोपहरी में किसी कामवश मैं बालकनी में निकली तो अनुश्री को तेज़ी से सामने सड़क पर जाते देखा. आश्‍चर्य के वशीभूत बरबस मैंने उसे ऊपर बुला लिया. आते ही वह फूट पड़ी. उसके आंसू रुक ही नहीं रहे थे. गहरी निराशा की घड़ी में वह आत्महत्या करने जा रही थी, इस सत्य से अनजान मैं पूछ बैठी, “अरे, रो क्यों रही हो अनु? इतनी धूप में कहां जा रही थी? सब ठीक तो है?”

“मैं आत्महत्या करने जा रही थी?”

समाज-सेवा के क्षेत्र में अलग-अलग तरह की समस्याओं से मेरा परिचय होता रहा है. अब वही सब शोभित की बातों का समर्थन करती प्रतीत हो रही थीं. पांच पुत्रियों को जन्म देनेवाली रमिया की सास उसके नाक में दम किए रहती थी, किंतु उसकी सास को समझाना मेरे लिए टेढ़ी खीर था. ग्यारह वर्षीय संजू का विवाह इतनी कम उम्र में न करने के लिए उसके पिता को तो समझा लिया, किंतु उसकी मां और दादी कहां कुछ सुनने को तैयार थीं. काश, ये सारी महिलाएं भी कुछ पढ़ी-लिखी होतीं.

बनारस की भागम-भाग में अनुश्री से मिलना हुआ. अनुश्री से मिलना उसके एकाकीपन से मिलना था. उसकी निराशाओं से साक्षात्कार था. बुरी तरह हिला कर रख दिया उसने मुझे. मेरे अंदर एक तूफान उठ खड़ा हुआ. कहां जाना चाहते हैं हम?… एक ओर नितांत अकेले अपना-अपना युद्ध लड़ते अनुश्री जैसे अनेक लोग हैं तो दूसरी ओर हर गली-मोहल्ले में खुली समाज-सेवा की अनगिनत दुकानें? बैनर, जुलूस, नारेबाज़ी और अख़बार में फ़ोटो, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात. बनारस से वापसी की यात्रा मानसिक रूप से मेरे लिए एक अंधेरी सुरंग से गुज़रने का कष्टप्रद अनुभव थी. अनुश्री का अकेलापन, उसकी पीड़ा उस अकेली की पीड़ा नहीं थी. समाज का हर व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर अपने-अपने युद्ध लड़ रहा है और दूसरे को, यहां तक कि उसके साथ रहनेवाले दूसरे व्यक्ति को भी उसकी पीड़ा का एहसास ही नहीं है. क्या हमारी संवेदना पूरी तरह मर गई है?

अपने में खोई-खोई-सी मैं अपने स्टडी के दरवाज़े तक चली आई और हवा से फड़फड़ाते काग़ज़ों की आवाज़ मुझे मेज़ के पास खींच लाई. सामने मेज़ पर नारी मुक्ति मंच की उपाध्यक्षा पद पर नियुक्ति का, पत्र रखा था. जब से बनारस से लौटी हूं यह नियुक्ति पत्र और अनुश्री का चेहरा मेरी नज़रों के सामने बार-बार गडमड होने लगे हैं. नियुक्ति पत्र के साथ जुड़ा रुतबा और सामाजिक प्रतिष्ठा अपनी ओर खींचती है तो अनुश्री का चेहरा याद दिलाता है कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है, वो भी बिना किसी बंधन में बंधे हुए. यह निर्णय की घड़ी थी और मेरे अंदर समुद्र मंथन जैसी हलचल मची थी.

“कहां खोई हुई हो?” शोभित की आवाज़ से मैं चौंक उठी.

“क्या बात है, तुम कुछ परेशान लग रही हो?” कुछ पल पति की ओर देखकर मैंने अपनी उलझन को शब्दों का जामा पहना दिया.

“अनुश्री के कहे शब्दों की अनुगूंज, मेरे कानों में अब भी गूंज रही है. जब से बनारस से वापस आई हूं घर को सजाते-संवारते, कुछ भी करते अनुश्री का भोला मुखड़ा, दुर्बल काया मेरी आंखों के आगे हर पल तैरती रहती है. उसके शब्दों में छुपी निराशा मुझे विचलित कर रही है.”

“… दीदी, मेरी प्रेरणा तो महराजगंज चली गई… अब सब ख़त्म! यही कहा था ना उसने?” शोभित ने अनुश्री के शब्द दोहरा दिए थे.

“हां.”

“तो तुम इतनी विचलित क्यों हो रही हो? ये तो बहुत बड़ा कॉम्प्लीमेंट है तुम्हारे लिए.” शोभित के चेहरे पर सहज मुस्कान थी.

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“कॉम्प्लीमेंट! आप इसे कॉम्प्लीमेंट कह रहे हैं? मैं तो यह सोचने पर विवश हूं कि आख़िर मैंने ऐसा क्या कर दिया उसके लिए कि वह इतना विह्वल हुई जा रही?थी. इतनी बड़ी बात कहनेवाली लड़की को आख़िर मैंने दिया ही क्या है?”

“तुमने उसके अंदर हिम्मत और विश्‍वास जगाया है.”

“वो तो उसके अंदर पहले से ही था, मैंने तो स़िर्फ प्यार के दो मीठे बोल दिए थे. निराशा के पल में प्यार का स्नेहिल स्पर्श और ‘मैं तुम्हारे साथ हूं’ का एहसास, एक विश्‍वास, बस इतना ही न!”

“… और तुम इसे छोटी-सी साधारण बात समझती हो? हक़ीक़त यह है कि आज हमारे समाज में इसी भावनात्मक सहारे का नितांत अभाव हो गया है, जो तुमने उसे दिया. इसी कारण तुम्हारे चले आने से उसके जीवन में एक गहरी शून्यता घिर

आई है जो उसे विचलित कर रही है.” शोभित ने सरल शब्दों में स्थिति का विश्‍लेषण कर दिया.

“मैं चलता हूं. तुम भी किसी काम में मन लगाने की कोशिश करना, शाम को बात करेंगे.” मेरे विचारों से सहमति जताते हुए शोभित बाहर चल दिए.

मैं पति को गाड़ी तक छोड़ कर लौटी तो अनुश्री के जीवन में डूबने-उतराने लगी. अनुश्री एक साधन-संपन्न परिवार की तीन संतानों में सबसे बड़ी संतान है. प्रखर बुद्धि वाली इस लड़की की शिक्षा बी.ए. करते ही बंद करा दी गई और आरंभ हो गया एकसूत्री कार्यक्रम- ‘योग्य वर की तलाश’. समय बीतने के साथ-साथ योग्य शब्द लुप्त हो गया  और ‘वर की तलाश’ में परिवर्तित हो गया. सुंदर, सुशील इस कन्या हेतु वर की तलाश द्रौपदी के चीर-सी खिंचती गई. साथ ही बढ़ती गई अनुश्री की उम्र, उसकी कुंठा और परिजनों की चिंता. परिवार की लाडली बेटी से वह बेचारी बन गई. चेहरे पर पड़ती उम्र की थाप को वह कैसे रोक सकती थी? अब तो बालों में कुछ चांदी के तार भी झांकने लगे हैं. जो भी आता, कुछ उम्र को रोकने के सुझाव उसकी ओर उछाल देता. दर्द की तेज़ चुभन उसके हृदय को भेद जाती. डर जाती वह इनसे, अतः आगंतुकों से कतराना उसकी नियति बनती गई, परंतु उसके अकेलेपन का एहसास किसी को नहीं है. आज भी वर की खोज जारी है, परंतु कन्या को उसके पैरों पर खड़ा करने का किसी परिजन को स्वप्न में भी ख़याल नहीं आता. संस्कारी परिवार की नाक जो कट जाएगी.

अतीत मुझ पर हावी होता जा रहा था. मेरी आंखों के आगे वह दृश्य साकार हो उठा जब तपती दोपहरी में किसी कामवश मैं बालकनी में निकली तो अनुश्री को तेज़ी से सामने सड़क पर जाते देखा. आश्‍चर्य के वशीभूत बरबस मैंने उसे ऊपर बुला लिया. आते ही वह फूट पड़ी. उसके आंसू रुक ही नहीं रहे थे. गहरी निराशा की घड़ी में वह आत्महत्या करने जा रही थी, इस सत्य से अनजान मैं पूछ बैठी, “अरे, रो क्यों रही हो अनु? इतनी धूप में कहां जा रही थी? सब ठीक तो है?”

“मैं आत्महत्या करने जा रही थी?”

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       नीलम राकेश

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