कहानी- बदचलन 1 (Story Series- Badchalan 1)

 

ख़ून देने की पहल कई लोगों ने की, पर किसी का ग्रुप भी उससे ना मिला. ब्लड डोनेशन की औपचारिक पहल मैंने भी की, हालांकि डर रहा था, क्योंकि घर में किसी से पूछा नहीं था और मामला एक अनजान लड़की को ख़ून देने का था. मेरा संकट उस समय और बढ़ गया, जब मेरा ग्रुप उसके ग्रुप का ही निकला और न चाहते हुए भी मुझे ख़ून देना पड़ा.

उसे लेकर मैं बुरी तरह उलझा था. ऐसा क्यों हुआ… उसने ऐसा क्यों किया… पूरे मामले को नए सिरे से समझने की कोशिश कर रहा था. मैं अभी तक सकते में था. कह लीजिए, मेरे अंदर घमासान-सा मचा था. हालांकि पछतावा भी हो रहा था और ग़ुस्सा भी आ रहा था मुझे अपने ऊपर. उसका रिएक्शन मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित था. कहीं उसके बारे में मेरा पूरा का पूरा आकलन ग़लत तो नहीं था, उसकी प्रतिक्रिया तो कुछ ऐसी ही थी. हे भगवान! तब तो बहुत बड़ा अनर्थ हो गया. कैसे हुई मुझसे यह चूक…?
दरअसल, पिछले कई साल से वह इसी मोहल्ले में रह रही थी. दो सालों पहले मां का स्वर्गवास हो गया और तब से वह अकेली ही रह रही थी. कभी-कभार घर में एक वृद्ध महिला आ जाती थी, दो-चार दिन के लिए. वह उसकी मौसी थी. पास-पड़ोस के लोगों से वह ज़्यादा घुली-मिली नहीं थी.
नौकरी मिलने से पहले मैं घर पर ही रहता था. सो, उसे रोज़ सुबह घर से जाते और शाम को वापस लौटते देखता था. कभी-कभार रात भी हो जाती थी, पर जब से मैं ड्यूटी पर जाने लगा, उसकी दिनचर्या से अनजान हो गया. हालांकि लोग कहते थे कि वह देर रात रिक्शे से उतरती देखी जाती है और महीने में चार-पांच बार तो रातभर बाहर ही रहती है और एकदम सुबह घर लौटती है.
यह भी पता नहीं कि वह क्या काम करती है या कहां काम करती है. हालांकि लोग कहते हैं कि वह यहीं पास में किसी ऑफिस में काम करती है. कुछ लोग कहते हैं कि वह टीचर है. लेकिन सच क्या है, भगवान ही जाने… यह भी कहा जाता था कि उसकी शादी को कोई पांच साल गुज़र चुके हैं. शादी के दौरान ही लेन-देन को लेकर विवाद हो गया और पर्याप्त दहेज की व्यवस्था न होने से उसकी विदाई नहीं हुई, वह ससुराल ही न जा सकी.
मां के निधन के कुछ महीने बाद एक दिन अचानक वह बहुत बीमार हो गई. उसे पास के अस्पताल में भर्ती कराया गया था. वह काफ़ी सीरियस थी. उन दिनों मैं पढ़ाई पूरी करके मुंबई में नया-नया आया था. घरवालों के कहने पर मुझे भी उसे देखने के लिए अस्पताल जाना पड़ा. पड़ोसी होने के नाते मेरा फ़र्ज़ भी था. जब मैं अस्पताल पहुंचा, तो देखा उसकी मौसी रो रही थी, मैंने उन्हें ढांढ़स बंधाया. उसके लिवर में कुछ सूजन आ गई थी. शरीर बुख़ार से तप रहा था. उसका ऑपरेशन होनेवाला था. ख़ून की तत्काल ज़रूरत थी, लेकिन आसपास के ब्लड बैंकों में उसके ग्रुप का ख़ून ही नहीं था. ख़ून देने की पहल कई लोगों ने की, पर किसी का ग्रुप भी उससे ना मिला. ब्लड डोनेशन की औपचारिक पहल मैंने भी की, हालांकि डर रहा था, क्योंकि घर में किसी से पूछा नहीं था और मामला एक अनजान लड़की को ख़ून देने का था. मेरा संकट उस समय और बढ़ गया, जब मेरा ग्रुप उसके ग्रुप का ही निकला और न चाहते हुए भी मुझे ख़ून देना पड़ा.
उस दिन ख़ून देने के बाद मैं कई घंटे अस्पताल में ही रहा. मन ही मन मना रहा था कि ख़ून देने की ख़बर घरवालों को न हो. निश्‍चित तौर पर लोग नाराज़ होंगे. हालांकि मेरे ख़ून देने की ख़बर मुझसे पहले ही मेरे घर पहुंच गई. मेरे भैया ख़ुद अस्पताल आ गए मुझे लेने के लिए. वह किसी ज़रूरतमंद को ख़ून देने के मेरे फ़ैसले से बहुत ख़ुश थे. मुझे बड़ी तसल्ली हुई.

हरिगोविंद विश्‍वकर्मा

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