कहानी- बदचलन 3 (Story Serie...

कहानी- बदचलन 3 (Story Series- Badchalan 3)

“पटा ली आपने भी तितली…” मैंने चौंककर उनकी ओर देखा. उन्होंने कहा, “आजकल वह आपके घर ख़ूब आती है. अच्छा है! ऐसा मौक़ा मिलने पर चूकना मूर्खता है!”
रामू मास्टर की बात मुझे बुरी लगी और मैंने उन्हें डांटकर चुप करा दिया, पर मैंने महसूस किया कि रामू मास्टर की बात का इतना गहरा असर हुआ मुझ पर कि मेरा विवेक धू-धू करके जलने लगा. मन में विकृत विचार जन्म लेने लगे.

काफ़ी अरसे बाद एक दिन वह घर आई. मेरा साप्ताहिक अवकाश था. मुझे देखकर मुस्कुरा दी और ‘हैलो’ बोली. औपचारिक अभिवादन के बाद मैं चुप हो गया. वह सामने कुर्सी पर बैठ गई और अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ने लगी. उसके बाद तो हर अवकाश पर मैं उसे अपने घर में अख़बार पढ़ते हुए देखने लगा. इसके बाद तो हमारी ख़ूब बात होने लगी. वह कई मसलों पर बात करती. बातचीत में काफ़ी समझदार लगती थी. हमारे बीच व्यक्तिगत बातें बिल्कुल नहीं होती थीं, इसलिए हम एक-दूसरे से अनजान ही रहे.
क़रीब सालभर पहले, एक दिन उसके घर के सामने जुटनेवाले लड़कों में आपस में ही मारपीट हो गई. चाकूबाज़ी में एक लड़का घायल हो गया. चर्चा थी कि लड़नेवाले दोनों लड़के उसके प्रेमी हैं और मारपीट की जड़ भी वही थी. उसी के लिए दोनों में ख़ूनी तक़रार हुई. दो दिन बाद पड़ोस के मास्टर ने बताया कि दोनों युवकों के साथ उसे रात में कई बार स्कूल के अहाते में आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ चुके हैं.
चाकूबाज़ी की घटना के बाद पुलिस आ गई और पूछताछ के लिए उसे थाने ले गई. रात को मैं घर आया, तो पता चला कि कई घंटों से वह थाने में ही है. उसकी मौसी और घरवालों के आग्रह पर मैं एक स्थानीय नेता के साथ थाने गया और देर रात उसे वापस लिवा आया. घर आते समय वह फूट-फूट कर रो रही थी, लेकिन मुझे लगा कि नाटक कर रही है. चरित्रवान होने का ढोंग करके मुझ पर इंप्रेशन बना रही है.
इस प्रकरण के बाद उसकी नौकरी भी छूट गई. वह घर पर ही रहने लगी. हां, महीने में कई बार मैं उसे काम से लौटते देखता था. शायद उसे पार्ट टाइम जॉब मिल गया था. कई बार मैंने भी उसे सुबह-सुबह घर लौटते देखा. मगर कभी नहीं पूछा कि वह क्या काम करती है.
अब वह साप्ताहिक अवकाश के दिन मेरे पास और ज़्यादा वक़्त गुज़ारने लगी. मैं संकोचवश कुछ बोल नहीं पाता था. वह कई चर्चित किताबों और उपन्यासों और उनके क़िरदारों के बारे में बात करती थी.
कभी-कभार तो नामचीन विदेशी लेखकों की बात कर मुझे भी चौंका देती. विश्‍व साहित्य में इतना अपडेटेड होने की उसकी क़ाबिलीयत का मैं क़ायल था. उसके चरित्र और रुचि में भारी विरोधाभास पर अक्सर हैरान होता.
एक दिन दूसरे पड़ोसी रामू मास्टर मेरे घर आ गए. वह भी उसके बारे में मास्टर की ही तरह विचार रखते थे. बात-बात में उन्होंने कहा, “पटा ली आपने भी तितली…” मैंने चौंककर उनकी ओर देखा. उन्होंने कहा, “आजकल वह आपके घर ख़ूब आती है. अच्छा है! ऐसा मौक़ा मिलने पर चूकना मूर्खता है!”
रामू मास्टर की बात मुझे बुरी लगी और मैंने उन्हें डांटकर चुप करा दिया, पर मैंने महसूस किया कि रामू मास्टर की बात का इतना गहरा असर हुआ मुझ पर कि मेरा विवेक धू-धू करके जलने लगा. मन में विकृत विचार जन्म लेने लगे. धीरे-धीरे मेरा अपने मन पर से नियंत्रण ढीला हो रहा था. मेरे अंदर दो व्यक्ति पैदा हो गए. एक उसकी ओर आकर्षित होता, दूसरा मना करता. उसे लेकर हमेशा ही उलझा रहता. एक दिन अचानक मन में ख़्याल कौंधा, क्या वह मुझसे पटेगी! अगले पल सिर झटक दिया कि मैं क्या वाहियात सोच रहा हूं.

हरिगोविंद विश्‍वकर्मा

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