कहानी- बेशऊर 4 (Story Serie...

कहानी- बेशऊर 4 (Story Series- Beshur 4) 

‘‘यूं चोरी-चोरी दूसरे के जीवन में नहीं झांकते.” आनायास ही उसके मुंह से निकल गया.
‘‘जी नहीं… मैं तो आमने-सामने बात करता हूं.”
‘‘मुझ से बातें करने की ज़रूरत नहीं है.’’वह ज़रा सख़्ती से बोली.
‘‘आपके इसी अकेलेपन से उबकर आपकी छोटी चिड़िया कमली कल से गायब है.’’
वह बुरी तरह चौंक पड़ी.

हारकर हर महीने उसी व्यक्ति के पैसों का इंतज़ार करती, जिसने बिना कारण उसे जलील कर अपने जीवन से निकाल फेंका था. उस पैसों को छूते ही वह जैसे गज भर ज़मीन में धस जाती. फिर भी ज़िंदा रहने के लिए वही पैसा ख़र्च करती. उसे अपने जीवन से ही नफ़रत-सी होने लगी थी. निरूद्देश्य अकेले जीवन से उसका मन और भी गतिहीन हो गया था.
एक दिन बक्से में उसे भुवन का फोटो मिल गया, तो उसने खाली पड़े किल पर उसे टांग दिया था. जब भी चाय बनाती, एक प्याला उसके सामने भी रख देती. एक दिन भाभी की मेड शांता ने देख लिया. फिर क्या था, उसे पागल ही घोषित कर दिया गया. लोग समझते ही नहीं उसे भी किसी के साथ की ज़रूरत है, चाहे वह फोटो ही क्यों न हो.
दूसरे दिन बाहर बारिश थम गई थी. वह बाहर निकलकर अपने गमलों का निरक्षण कर ही रही थी कि उसे बगलवाले फ्लैट के बालकनी में एक 35-36 के लगभग के पुरुष आकृति उभरी. जिसका रंग भले ही सांवला था, पर चेहरा काफ़ी आकर्षक था. अपनी शोख-चंचल आंखों से मुस्कुराते हुए उसे ही देख रहा था. उसे बिना झिझक अपनी ओर देखते देखकर अंजली को घबराहट-सी होने लगी. अपने उलझे बाल और तुड़े-मुड़े कपड़े का ख़्याल आते ही वह झट से कमरे में चली गई. पर देर तक उसे अपनी पीठ पर उन आंखों की चुभन महसूस होती रही.
बहुत दिनों बाद उसने अपना चेहरा आईने में देखा. अपने उलझे बाल और रूखा-बेजान चेहरा देख न जाने क्यूं उसे शर्मिंदगी महसूस हुई. उस दिन वह देर तक अपने घने और उलझे बालों को सुलझाती रही. दूसरे दिन उसने बालो को शैंपू भी किया. वह बाहर छत पर निकली, तो उसकी चोर निगाहें बालकनी पर ही थी, पर वहां कोई नहीं था. बाद में जब वह मुंडेर पर बैठी चिड़ियों से बातें करते हुए दाना डाल रही थी. उसे लगा बगल के खिड़की से उसे कोई देख रहा है. वह वहां से हट कर अपने मोगरा के गमले के पास आ गई. तभी बालकनी से आवाज़ आई, “आपके मोगरे बहुत घने खिले हुए है. आप इनकी देखभाल बहुत अच्छे से करती हैं, पर कुछ ख़्याल अपना भी रखा कीजिए.’’
‘‘यूं चोरी-चोरी दूसरे के जीवन में नहीं झांकते.” आनायास ही उसके मुंह से निकल गया.
‘‘जी नहीं… मैं तो आमने-सामने बात करता हूं.”
‘‘मुझ से बातें करने की ज़रूरत नहीं है.’’वह ज़रा सख़्ती से बोली.
‘‘आपके इसी अकेलेपन से उबकर आपकी छोटी चिड़िया कमली कल से गायब है.’’
वह बुरी तरह चौंक पड़ी. तो क्या उसे वह चुपचाप वाॅच करते रहता है. इसे उसके चिड़ियों के नाम भी याद है. उस दिन देर रात तक वह अपने इस नए पड़ोसी के विषय में ही सोचती रही. किसी ने उसे बेहद क़रीब से महसूस किया. उसे जानने की कोशिश की, यह बात उसे बेहद सुखद लगी. आज पहली बार एक अतिरिक्त ख़ुशी का एहसास उसके दिलो-दिमाग़ ने महसूस किया था. दूसरे ही दिन अपने पति के फोटो के स्थान पर उसने एक आईना टांग दिया था.

Rita kumari

रीता कुमारी

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