कहानी- बेवफा 2 (Story Serie...

कहानी- बेवफा 2 (Story Series- Bewafa 2)

 

जिस पर भरोसा किया, जब वही मुकर गया. नहीं-नहीं, मुकरा ही नहीं, बल्कि एक गंभीर आरोप भी मढ़ दिया. इतना गंभीर आरोप कि उसे कई साल जेल की चक्की पीसनी पड़ेगी. अपनी इस हालत के लिए क्या सचमुच कुंडल दोषी ही है?

यहां शबाना ही तो दोषी नहीं है. कुंडल ने भी तो हथियार डाल दिया. शबाना के बयान का विरोध नहीं किया. पहले कोई वकील नहीं किया, अब ख़ुद चुप हो गया है.
हालांकि वह कायर नहीं है. वह लड़ाकू क़िस्म का लड़का है. इसके बावजूद संवेदनशील मामले में लड़ने का उसमें माद्दा ही नहीं. ख़ासकर वह शबाना के ख़िलाफ़ एक शब्द नहीं बोल सकता. उसके ख़िलाफ़ लंबा-चौड़ा बयान देना या कोई मोर्चा खोलना, तो बहुत दूर की बात है. वह अदालत से यह नहीं कह सकता था कि शबाना झूठ बोल रही है.
वैसे तीन दिन पहले जेल में लंबी-चौड़ी हांक रहा था. कह रहा था कि वह बेदाग़ छूट जाएगा, क्योंकि उसकी शबाना उसके साथ है. शबाना से उसका जन्म-जन्म का साथ है. शबाना को लेकर वह बहकी-बहकी बातें कर रहा था. शबाना ऐसी है, शबाना वैसी है. शबाना के साथ वह एक नई दुनिया बसाएगा. ख़ूब पैसा कमाएगा. यह करेगा, वह करेगा. और पता नहीं क्या-क्या… मुलाक़ात के पूरे आधे घंटे, वह यही बातें करता रहा. दूसरी बात करने का मौक़ा ही नहीं दिया. जबकि मैं मुक़दमे के संबंध में उससे कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातें करने के लिए जेल में उससे मिलने गया था. उसे शबाना पर इतना भरोसा था कि उसने मुझे कोई वकील ही नहीं करने दिया.
और अब एकदम चुप… सारी योजनाएं धरी की धरी रह गईं. एक आदमी के भरोसे पर कल्पनाओं के पुल बना लिया था. जो अचानक ही अप्रत्याशित रूप से ध्वस्त हो गया. भरभरा कर गिर पड़ा. सारे अरमान, सारे सपने, आशियाना, जीने की अभिलाषा और भविष्य की सारी योजनाएं अचानक से भरभरा कर गिर पड़ीं. किसी रेत में बनाएं किसी महल की तरह. कुछ पलों में ज़िंदगी की पूरी की पूरी धारा ही बदल गई या कहें ज़िंदगी ही बेमानी हो गई. आदमी क्या सोचता है और क्या हो जाता है. शायद इसी का नाम दुनिया है. जो वैसी नहीं है, जैसी ऊपर दिखती है. न मालूम कितने रहस्य छुपाकर रखती है, यह दुनिया अपने गर्भ में.
जिस पर भरोसा किया, जब वही मुकर गया. नहीं-नहीं, मुकरा ही नहीं, बल्कि एक गंभीर आरोप भी मढ़ दिया. इतना गंभीर आरोप कि उसे कई साल जेल की चक्की पीसनी पड़ेगी. अपनी इस हालत के लिए क्या सचमुच कुंडल दोषी ही है?
मैं समझने का प्रयास कर रहा था कि आख़िर गड़बड़ी कहां हुई? इतना तो तय था कि कुंडल की इसमें ज़रा भी ग़लती नहीं थी, क्योंकि इसका गवाह मैं भी था.
मुझे याद हैं, जब गर्मियों में कुंडल गांव आया था, तो उसने ही बताया था कि उसके जीवन में एक सुंदर-सी लड़की आ गई है. वह उसे बहुत प्यार करती है. टूटकर चाहती है उसे. उसके बिना ज़िंदा नहीं रह सकती वह आदि-आदि. वह मुझसे पांच-छह साल बड़ा था, लेकिन अपनी हर बात मुझसे शेयर करता था.
मैं तो चौंक-सा पड़ा था, उसकी बातें सुनकर, क्योंकि प्यार-व्यार की बातें उसने मुझसे पहली बार की थी. वह कभी प्यार की बात भी करेगा, मैंने कल्पना ही नहीं की थी. उसकी विचारधारा कम्युनिस्टों से मिलती-जुलती थी. वह कामरेडों की तरह संघर्ष की बातें किया करता था. जब मिलता था, वही मार्क्स, साम्यवाद, मजदूर, दलित, शोषित वगैरह वगैरह… जी हां, उस समय तक उसने मुझसे केवल समाज सुधारने की ही बात की थी. मेरे लाख समझाने कि उसके सुधारे इस दुनिया का सुधरना फ़िलहाल संभव नहीं है. इसके बावजूद उसके ऊपर चढ़ा समाज सुधार का भूत उतरता ही नहीं था. इसलिए जब उसने किसी लड़की से प्यार हो जाने की बात कही, तो मैं बेसाख्ता चौंक-सा पड़ा था. अचानक गंभीर हो गया था मैं उसे लेकर.

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वह पढ़ने में भले ही कितना होशियार क्यों न रहा हो, लेकिन लड़कियों के मामले में था वह बड़ा डरपोक. एकदम फिसड्डी. गांव की लड़कियों तक से वह बेझिझक नहीं बोल पाता था. हकलाने लगता था.
बहरहाल, उसके बाद उसने जो कुछ बताया, वह हैरतअंगेज़ था. उसे सहजता से कतई नहीं लिया जा सकता था. दरअसल, उसे एक लड़की से सचमुच का प्यार हो गया था. वह भी एक मुस्लिम लड़की से. और वह लड़की भी जनाब पर मर रही थी. उन पर जान न्यौछावर कर रही थी. वह लड़की शबाना ही थी. दोनों प्यार के मामले में काफ़ी आगे बढ़ गए थे.
कुंडल ने मुझसे मिलने और मुझे बताने से पहले ही शबाना को लेकर काफ़ी लंबी-चौड़ी प्लनिंग कर ली थी. उस दिन उसी ने बताया था कि वह शबाना के साथ अगले हफ़्ते किसी गुप्त जगह चला जाएगा. मौक़ा मिलते ही दोनों किसी अदालत में जाकर कोर्ट मैरिज कर लेंगे. और नए सिरे से जीवन की शुरुआत करेंगे. अंतरधार्मिक विवाह करके समाज के सामने नई मिसाल पेश करेंगे.

Harigovind Vishwakarma
हरिगोविंद विश्वकर्मा

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