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कहानी- बिना चेहरे की याद 3 (Story Series- Bina Chehre Ki Yaad 3)

“दूसरों के द्वारा हमारे लिए चुने गए चेहरे हमारी चाहतों से मेल खाते हों, यह ज़रूरी तो नहीं और अगर चुनाव हमारा ख़ुद का भी हो, तब भी तो यह ज़रूरी नहीं हो जाता. शुरू-शुरू में लगता है कि हमारी ख़्वाहिशों को उसका चेहरा मिल गया है, पर कुछ ही समय बाद वह धुंधलाने लगता है तथा कोई और ही चेहरा निकल आता है, जो हमारी ख़्वाहिश से मेल नहीं खाता और हमारी यादें फिर से बिना चेहरे की हो जाती हैं.” दूर पहाड़ों पर उतरता अंधेरा अंजना के मन के अंधेरे के साथ घुलकर और भी घना हो गया, जिसकी स्याही अंजना के चेहरे पर भी फैल गई.

वह मेरी आंखों में देखते हुए आगे बोली, “दरअसल आदमी जब खोया हुआ-सा बैठा हो, तब हर बार ज़रूरी नहीं कि वह किसी को याद ही कर रहा हो. वह कुछ और भी हो सकता है.”

“कुछ और क्या?” मैंने चाय का खाली कप टेबल पर रखते हुए पूछा.

“हम जिनमें खोए रहते हैं, वे सच्चे तौर पर यादें नहीं होतीं, अक्सर या यूं कहिए कई बार वे हमारी वे ख़्वाहिशें या अंतर्मन की वे प्रबल इच्छाएं होती हैं, जो पूरी नहीं हो पातीं और ज़बर्दस्ती दबाकर रखी जाती हैं, इसलिए उनका कोई स्पष्ट चेहरा नहीं होता, क्योंकि हम जो भी चाहते हैं, जैसा भी चाहते हैं, ठीक वैसा ही हमें कभी भी मिल नहीं पाता. इसलिए उस इच्छा का कोई चेहरा बन नहीं पाता हमारे जीवन में.” अंजना संजीदगी से बोल रही थी. ऐसा लग रहा था हम न जाने कब के घनिष्ठ थे, जो बरसों बाद मिल-बैठकर बातें कर रहे थे.

“तुमने अपनी ख़्वाहिशों को कोई चेहरा देने की कोशिश नहीं की?” मैंने उसके व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानना चाहा.

“की थी सर. मैंने भी अपनी ख़्वाहिशों को एक चेहरा दिया था.” वह फीकी मुस्कान के साथ बोली.

“तब तो तुम्हारी याद का पक्का चेहरा और नाम होना चाहिए.”

“पक्का नाम तो है, पर पक्का चेहरा नहीं है.” उसकी आवाज़ में मायूसी घुल गई.

“क्यों? अगर व्यर्थ हस्तक्षेप न समझो तो क्या पूछ सकता हूं कि उससे तुम्हारा विवाह नहीं हो पाया?” मैंने थोड़ा झिझकते हुए ही पूछा. परिस्थितिजन्य आत्मीयता कहीं किसी ग़लत प्रश्न पर टूट न जाए. कब, कौन-सा प्रश्न अनाधिकृत क्षेत्र में प्रवेश करके संबंधों में अनावश्यक खिंचाव पैदा कर दे, कुछ कहा नहीं जा सकता.

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“हो गया है सर.” वह दूर पहाड़ों की चोटियों को देखते हुए बोली, जिन पर अब शाम का सुरमई अंधेरा उतरने लगा था.

“दूसरों के द्वारा हमारे लिए चुने गए चेहरे हमारी चाहतों से मेल खाते हों, यह ज़रूरी तो नहीं और अगर चुनाव हमारा ख़ुद का भी हो, तब भी तो यह ज़रूरी नहीं हो जाता. शुरू-शुरू में लगता है कि हमारी ख़्वाहिशों को उसका चेहरा मिल गया है, पर कुछ ही समय बाद वह धुंधलाने लगता है तथा कोई और ही चेहरा निकल आता है, जो हमारी ख़्वाहिश से मेल नहीं खाता और हमारी यादें फिर से बिना चेहरे की हो जाती हैं.” दूर पहाड़ों पर उतरता अंधेरा अंजना के मन के अंधेरे के साथ घुलकर और भी घना हो गया, जिसकी स्याही अंजना के चेहरे पर भी फैल गई.

मैं कहना चाहता था कि यदि चेहरा ख़्वाहिशों के अनुरूप नहीं है, तो उसे बदल क्यों नहीं लेती? लेकिन यह कहना सर्वथा अनुचित होता, वो भी एक पक्ष की कही बातों के आधार पर. कई बार बढ़ती उम्र और रिश्तों के पुराने होते जाने पर हम आपस में धीरे-धीरे सामंजस्य बिठा लेते हैं. ख़्वाहिशों में तो परिवर्तन कर सकते हैं.

मैं वातावरण के बोझिलपन को कम करने के उद्देश्य से थोड़ा हंसते हुए बोल पड़ा, “तुम बॉटनी की टीचर कैसे बन गई? तुम्हें तो साहित्यकार बनना चाहिए था.”

उत्तर में वह भी मुक्त कंठ से हंस दी. उतने में साथी प्रो़फेसर्स और स्टूडेंट्स कैंप फ़ायर की तैयारी करने आ गए.

“आज देर रात तक अकेली मत बैठी रहना, वरना आज तो और भी ज़ोर से डांट दूंगा.” मैंने हंसते हुए उसे छेड़ा.

“नहीं सर, आज तो सबसे पहले जाकर रजाई में दुबक जाऊंगी और सीधे सुबह ही बाहर निकलूंगी.” वह बच्चे की तरह अपने दोनों कान पकड़कर बोली.

देर रात तक मैं सोचता रहा, ख़्वाहिशों के बारे में, यादों के बारे में और उन्हें मन में पलनेवाले इंसानों के बारे में. दुनिया में ऐसे कितने इंसान होंगे, जिनकी यादों को एक स्पष्ट चेहरा मिलता होगा? अधिकांश की ख़्वाहिशें तो पुरानी होते हुए बिना चेहरे की याद बन जाती हैं और उन बेनाम, बेपहचान यादों में खोया इंसान उम्रभर आहें भरता रह जाता है. सुखी वही है, जो अपने साथी के वर्तमान चेहरे को स्वीकार कर ले और उसे ही अपनी यादों की पहचान बना ले. जो ऐसा नहीं कर पाता वह अंजना की तरह अनाम, अनजान ख़्वाहिशों और यादों के जंगल में ताउम्र भटकता रहता है. जीवन में ऐसे लोग न अपनी ख़्वाहिशों के साथ न्याय कर पाते हैं, न वास्तविकता के साथ. अंजना की बातें सुनकर मैंने सोचा…

डॉ. विनिता राहुरीकर

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