कहानी- चांद के पार 2 (Story...

कहानी- चांद के पार 2 (Story Series- Chand Ke Paar 2)

ऊंची-नीची चट्टानों पर उगे जंगलों के बीच बने आलीशान महलों को निहारते समय शिव हमेशा जया की कलाइयों को थामे रहते. जया का थोड़ा-सा भी लड़खड़ाना शिव को बेचैन कर देता. जिस तत्परता से शिव जया को अपनी बांहों में समेटते, उतनी सहजता से जया भी उनकी बांहों में सिमट आतीं, फिर सकपका कर अलग हो जातीं. वहां पर किसी को किसी से मतलब ही कहां कि ऐसी छोटी-छोटी बातों को तूल दे. ऐसे ही मधुयामिनी बने उन दोनों के दिन गुज़रते रहे. बारिश और धूप की आंख-मिचौली शिव और जया के बीच की दूरियां समाप्त करती रही.

रास्तेभर शिव अपनी राम कहानी कहते रहे और जया मूक श्रोता बनी रहीं. शिव पटना के बिजली विभाग के रिटायर्ड चीफ इंजीनियर हैं. पिछले साल ही कैंसर से उनकी पत्नी की मृत्यु हुई है. बातों-बातों में ही जया कब अपने घर पहुंच गईं, उन्हें पता ही नहीं लगा. ये बात और थी कि ऊंचे-नीचे कटाव पर जब भी वे लड़खड़ातीं, शिव उनकी बांहों को थाम लेते. एक दशक बाद किसी पुरुष का स्पर्श उनके तन-मन को भले ही कंपित कर रहा था, पर अपनेपन का ख़ूबसूरत सुखद एहसास भी उनमें भरता जा रहा था.

औपचारिकता निभाते हुए जया ने शिव को अंदर आकर एक कप चाय पीकर जाने को कहा. तो प्रत्युत्तर में उन्होंने अपनी बच्चों-सी मुस्कान से उन्हें मोहते हुए कहा, “नहीं जयाजी, अब आपको और बोर नहीं करूंगा. किसी और दिन आकर चाय के साथ पकौड़े भी खाऊंगा…” कहते हुए शिव जाने के लिए मुड़ गए. जब तक वो दिखते रहे सम्मोहित हुई जया उसी दिशा में ताकती रहीं.

अब जब भी शिव शाम को सैर के लिए निकलते, जया को साथ लेना नहीं भूलते. जया भी तैयार होकर उनकी बाट जोहतीं. बोलते-बतियाते, एक-दूजे के सुख-दुख बांटते वे बहुत दूर निकल जाते. रास्तेभर शिव जया का ख़्याल रखते और जया भी उनके अपनेपन की ठंडी फुहार में भीगती रहतीं. कभी गगनचुंबी पेड़ों के नीचे बैठकर वे अपनी थकान मिटाते, तो कभी झील के किनारे बैठ पानी में तैरनेवाले जीवों से बच्चों की तरह खेलते.

ना जाने कितनी बार शिव ने जया का विगत जानने के लिए उन्हें कुरेदा होगा, पर उनकी पलकों पर उतर आए ख़ामोशियों के साए को समेटकर इतना ही जान सके कि 30 साल पहले उनके पति की मृत्यु कार दुर्घटना में हुई थी. अपने बेटे यश को उन्होंने अपने बलबूते पर इतना क़ाबिल बनाया है. जहां पर शिव अपनी पत्नी पद्मा को याद कर विह्वल हो जाते थे, वहीं पर जया अपने पति की स्मृति से उदासीन थीं. उनकी असहजता को देखते हुए उन्होंने जया के अतीत की चर्चा फिर कभी नहीं की.

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कुछ ही दिनों में जया और शिव के बीच की औपचारिकताएं ना के बराबर रह गईं. घर के सदस्यों के अपने गंतव्य की ओर जाते ही या तो शिव जया के पास आ जाते या जया उनके घर चली जातीं. दिनभर का लंबा साथ उन दोनों को ताज़गी से भर देता. फिर देश भी ऐसा कि जहां किसी को किसी और को देखने की फुर्सत नहीं होती है. बहुत हुआ, तो हाय-हेलो कहकर आगे बढ़ गए. ऊंची-नीची चट्टानों पर उगे जंगलों के बीच बने आलीशान महलों को निहारते समय शिव हमेशा जया की कलाइयों को थामे रहते.

जया का थोड़ा-सा भी लड़खड़ाना शिव को बेचैन कर देता. जिस तत्परता से शिव जया को अपनी बांहों में समेटते, उतनी सहजता से जया भी उनकी बांहों में सिमट आतीं, फिर सकपका कर अलग हो जातीं. वहां पर किसी को किसी से मतलब ही कहां कि ऐसी छोटी-छोटी बातों को तूल दे. ऐसे ही मधुयामिनी बने उन दोनों के दिन गुज़रते रहे. बारिश और धूप की आंख-मिचौली शिव और जया के बीच की दूरियां समाप्त करती रही. एक-दूसरे में वे ऐसे खोए कि विगत की सारी खट्टी-मीठी यादें विस्मृत हो गई थीं.

जया के सघन घने बाल शिव के कंधे पर कब लहराने लगे, कब शिव जया को अपनी भुजाओं में समेटते चले गए… सोचने के लिए उन दोनों को होश ही कहां था. एक-दूसरे में समाहित होने की व्यग्रता को उनका मर्यादित विकल मन अथक प्रयास को झेलता रहा. स्वयं के परिवर्तित रूप पर दोनों आश्‍चर्यचकित थे. पांच दिनों के साथ के बाद सप्ताहांत में जब दोनों के परिवार घर में रहते थे, तो इस उम्र में भी वे एक-दूजे के सानिध्य के लिए तड़प उठते थे. उन दो दिनों में जया घर में जो भी व्यंजन बनाती, शिव के लिए रखना नहीं भूलतीं.

हमेशा अकेलेपन का रोना रोनेवाली उदासी की प्रतिमूर्ति बनी जया के चेहरे पर छाई ख़ुशियों की लालिमा उनके बेटे यश और बहू अणिमा से छुपी नहीं रही. जया को ख़ुश देखकर यश की प्रसन्नता का कोई ओर-छोर नहीं था.

यश ने जब से होश संभाला, उसने जया को हमेशा ही उदास और सहमा हुआ पाया. अपने पापा की गरजती आवाज़ से डरकर हमेशा वह जया की गोद में छुप जाया करता था. दूसरों के समक्ष अकारण ही मम्मी को तिरस्कृत करना, उनके कामों में नुक्स निकालना, उनके मायकेवालों को अनुचित बातें कहना, सभी अपनों के साथ अप्रिय आचरण करना आदि पापा की बेशुमार असहनीय आदतें थीं.

ऑफिस हो या घर, शायद ही कोई उन्हें पसंद करता था. उसे याद नहीं कि उन्होंने अपने इकलौते बेटे को गोद में उठाकर कभी प्यार किया हो. बाद में उसने जाना कि मम्मी का अपार सौंदर्य की स्वामिनी के साथ अति प्रतिभाशालिनी होना ही अतिसाधारण रंग-रूप और अति साधारण शैक्षणिक योग्यता रखनेवाले पापा को कभी ना सुहाया.

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उनमें झूठी ग़लतियां निकाल उन्हें अकारण तिरस्कृत करके जब तक जीवित रहे, अपने अहम् को संतुष्ट करते रहे.

      रेणु श्रीवास्तव

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