कहानी- एक महानगर की होली 4 ...

कहानी- एक महानगर की होली 4 (Story Series- Ek Mahanagar Ki Holi 4)

“हां… हां… ओ… हो… तुम? क्या नाम बताया था..?”

“जी शाहनवाज अली.”, नाम सुनकर सभी को झटका लगा. शाहनवाज अली… एक मुस्लिम… और ऐसी होली..? इनका तो त्योहार भी नहीं, फिर भी क्या रंग जमाया होली पर, क्या फगुआ गाया… होली का मिज़ाज ही बदल दिया…

 

“बी विंग में रहता हूं माथुर साहब, छठे माले पर.” कहकर वह अपरिचित मुस्कुराने लगा, तो वे पहचानने की कोशिश करने लगे. वे भी तो उसी विंग में रहते थे. कुछ पकड़ नहीं पा रहे थे.
“आप से चार फ्लोर ऊपर…” एक और क्लू मिला, तो बुद्धि पर ज़्यादा ज़ोर डाला, ‘कद-कठी से तो… नहीं नहीं, वह कैसे हो सकता है..?’, वे असमंजस में थे.
“नहीं पहचाना, तीन दिन पहले आपके किसी विजिटर ने ग़लती से मेरी पार्किंग में कार लगा दी थी, मैं आपसे उसे हटाने का अनुरोध करने आया था.”
“हां… हां… ओ… हो… तुम? क्या नाम बताया था..?”
“जी शाहनवाज अली.”, नाम सुनकर सभी को झटका लगा. शाहनवाज अली… एक मुस्लिम… और ऐसी होली..? इनका तो त्योहार भी नहीं, फिर भी क्या रंग जमाया होली पर, क्या फगुआ गाया… होली का मिज़ाज ही बदल दिया..
“माफ़ करना भई तुम इतने ज़बर्दस्त रंगे हो कि पहचान में ही नहीं आए.” पाटिल साहब ने कहा, जो अक्सर शाहनवाज से मार्निंग वॉक पर ‘हाय-हैलो’ किया करते थे.
“यहां आने से पहले क्या कहीं और होली खेलकर आए थे, जो ऐसे रंगे पुते थे?”
“जी, घर पर खेली थी… बाथरूम में, वो भी अकेले…” शाहनवाज हंसते हुए बोला.
“मतलब..?”
“मतलब ये कि पहले ख़ुद ही ख़ुद को रंगा, ताकि अपनी मज़हबी पहचान छिपा सकूं… मुस्लिम होते हुए भी आप लोगों के बीच का हिस्सा बन सकूं, सब के साथ घुलमिल कर होली खेल संकू.”
“अरे, इसकी क्या ज़रूरत थी? हमारी सोसायटी तो मार्डन है, सभी पढ़े-लिखे लोग हैं, कोई जात-पात, धर्म का अंतर नहीं मानता… मुझे देखो क्रिश्चन हूं, पर होली खेलने आया हूं,” ऐरन डिसूजा बोले.

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“जी डिसूज़ा साहब, सही फरमा रहे हैं आप. यही सोचकर पिछली होली पर आया था, मगर महसूस किया लोग सभी को गर्मजोशी से गुलाल लगा रहे थे, मगर मेरे क़रीब आते हुए असहज हो रहे थे… दो-चार ने गुलाल लगाया था, मगर ऐसे हिचकते हुए कि मुंह भी पूरा नहीं रंगा गया था… और मुझे तो बचपन से ही ताबड़तोड़ होली खेलना पसंद है… रंगों से भरी, पानीवाली होली, जिसमें रंगकर सबकी पहचान ही मिट जाए… ऐसी रूखी-सूखी, हिचकवाली होली मुझे नहीं जमती, बनारस का जो ठहरा… आज भी जब होली समारोह में आने के लिए सभी एक-दूसरे को बुला रहे थे, तो मेरा दरवाज़ा किसी ने नहीं खटखटाया… पहले मैं मायूस हुआ फिर सोचा अगर होली के रंग में शामिल होना है, तो इस बार मुझे ही कुछ करना पड़ेगा.”

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

 


दीप्ति मित्तल

 

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