कहानी- घुटन 3 (Story Series- Ghutan 3)

“तुम होश में हो निशा? धीरे बोलो, कहीं मम्मी न सुन लें.”

“तुम्हें मेरी मां की फ़िक्र है अमित, लेकिन मेरी नहीं. शादी के इतने सालों बाद भी तुम्हें अपनी पत्नी की फ़िक्र नहीं है. क्यों अमित, क्यों? क्योंकि निशा, आनंदी नहीं है, इसलिए.”

“यह क्या बकवास है निशा? होश में आओ.”

“मैं होश में ही हूं, अमित मैं तुम्हें साफ़-साफ़ बता देना चाहती हूं कि निशा निशा है, आनंदी नहीं. निशा का भी अपना एक अस्तित्व है, अपनी पहचान है, अपनी ज़रूरतें हैं, अपनी इच्छाएं हैं, जो तुम कभी नहीं जान पाए.”

 

व्यंग्य भरे स्वर निशा को आहत कर रहे थे. यह कोई नई बात नहीं थी. बचपन से लेकर आज तक शायद ही उसने अपनी तारीफ़ सुनी होगी. लेकिन आज उसे अपना पूरा अस्तित्व हिलता-सा महसूस हो रहा था.

उस पार्टी के बाद घर का सन्नाटा और बढ़ गया. मां, बच्चों के साथ उनके कमरे में थीं और अमित-निशा अपने कमरे में- “मैं कौन हूं अमित.” एकाएक निशा के इस प्रश्‍न ने अमित को चौंका दिया था, “यह क्या पूछ रही हो तुम? तुम निशा हो.”

“वह तो मैं जानती हूं अमित. लेकिन निशा कौन है? क्या पहचान है इस दुनिया में उसकी?” आज पहली बार निशा के स्वर में कड़वाहट का एहसास हुआ था अमित को. “क्या बात है, तुम्हारी आवाज़ में आज कड़वाहट-सी महसूस हो रही है मुझे. तुम परेशान हो?”

“हां, परेशान हूं मैं, क्योंकि मुझे ख़ुद अपनी पहचान मिटती नज़र आ रही है.” आज फट ही पड़ा दिल में बसा वह ज्वालामुखी, जो इतने सालों से सुलग रहा था.

“तुम होश में हो निशा? धीरे बोलो, कहीं मम्मी न सुन लें.”

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“तुम्हें मेरी मां की फ़िक्र है अमित, लेकिन मेरी नहीं. शादी के इतने सालों बाद भी तुम्हें अपनी पत्नी की फ़िक्र नहीं है. क्यों अमित, क्यों? क्योंकि निशा, आनंदी नहीं है, इसलिए.”

“यह क्या बकवास है निशा? होश में आओ.”

“मैं होश में ही हूं, अमित मैं तुम्हें साफ़-साफ़ बता देना चाहती हूं कि निशा निशा है, आनंदी नहीं. निशा का भी अपना एक अस्तित्व है, अपनी पहचान है, अपनी ज़रूरतें हैं, अपनी इच्छाएं हैं, जो तुम कभी नहीं जान पाए.”

एक-एक शब्द ज़हर से भरा था और कहीं-न-कहीं उनका निशाना आनंदी ही थी, जो अब तक दरवाज़े पर खड़ी उनकी सब बातें सुन चुकी?थी. एक-एक बात उन पर हथौड़े की तरह बरस रही थीं और उनकी आंखें अविश्‍वास से फैली जा रही थीं कि यह उन्हीं की बेटी है, उनका अपना ख़ून. बड़ी हिम्मत के साथ आनंदी ने अंदर पैर रखा, “ये सब क्या हो रहा है निशा. बाहर तक आवाज़ें जा रही हैं, बच्चे सो रहे हैं, उठ जाएंगे, शांत हो जाओ.”

“नहीं मम्मी, आज नहीं….. बचपन से आप मुझे शांत करती आयी हैं, लेकिन आज मुझे जानना है कि क्या पहचान है मेरी? क्या जगह है अमित के जीवन में मेरी? किस तरह साबित करूं इस दुनिया में अपनी पहचान को?”

“इतना ग़ुस्सा, इतनी कड़वाहट…. यह क्या हो गया है तुम्हें निशा. तुम पहले तो ऐसी नहीं थीं.”

– अंकुर सक्सेना

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