कहानी- जीने की नई राह 1 (Story Series- Jeene Ki Nai Raah 1)

राज और आरती की नोक-झोंक में आज उसे रिश्तों की गर्माहट का एहसास हो चला था. शायद यही कारण था कि मां-पापा दो अलग-अलग व्यक्तित्व होते हुए भी सदा साथ-साथ रहे. कहीं-न-कहीं उनके बीच प्यार का सेतु अवश्य रहा होगा, जिसे पापा का उग्र स्वभाव भी नहीं तोड़ पाया. अगर ऐसा नहीं होता तो क्या वे पूरी ज़िंदगी एक साथ बिता पाते…? वही उनके दिलों में छिपे प्यार को पहचान नहीं पाई थी.

प्रियंका गिल कमरे में बेचैनी से चहलक़दमी कर रही थी… दिसंबर की कड़क सर्दी में भी माथे पर पसीने की बूंदें झलक आई थीं. अपनी बेचैनी कम करने के इरादे से ग्लास में पैग बनाकर कमरे में पड़ी आरामकुर्सी पर बैठ गई.

राज-जिसके घर जाने से न तो वह स्वयं को रोक पाती थी, न ही वहां से आने के पश्‍चात् सहज हो पाती थी. आज उसने जो देखा-सुना, उसे महसूस कर वह आश्‍चर्यचकित थी… क्या किसी रिश्ते में इतना माधुर्य, एक-दूसरे के प्रति चिंता एवं समर्पण भी हो सकता है?

आज प्रियंका राज के घर बिना बताये चली गई थी. संयोग से दरवाज़ा खुला था, वह बिना घंटी बजाये ही अंदर चली गई. उसने देखा कि राज की पत्नी आरती उससे चाय पीने का आग्रह कर रही है, वहीं उसकी बड़ी बेटी शिखा उसके माथे पर बाम लगा रही है तथा छोटी बेटी शेफाली अपने नाज़ुक हाथों से उसके पैर दबा रही है.

उसे देखते ही राज उठ खड़ा हुआ तथा झेंपती हंसी के साथ बोला, “ज़रा बुखार क्या हो गया, तीनों ने घर आसमान पर उठा लिया है… चाय के नाम पर काढ़ा पीना पड़ रहा है.”

“देखिये ना, तीन दिन से बुखार है… ऑफ़िस जाने के लिए मना किया था, पर माने ही नहीं…. न ही डॉक्टर को दिखाया, ऑफ़िस से भी अभी-अभी आये हैं…. स्वास्थ्य की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं है…” आरती ने राज की ओर देखते हुए शिकायती स्वर में कहा.

“ज़ुकाम की वजह से थोड़ी-सी हरारत हो गई थी… अब इतनी-सी बात के लिये डॉक्टर के पास क्या जाना…?” राज ने सफ़ाई देते हुए कहा.

सवाल-जवाब में छिपे प्यार ने उसे झकझोर कर रख दिया था… ज़रा-से ज़ुकाम में पत्नी की पति के लिये इतनी चिंता उसे सुखद एहसास दे गई थी. उसे याद आये वे दिन जब वह मलेरिया से पीड़ित हो गई थी… यद्यपि पूरा स्टाफ उसके स्वास्थ्य के बारे में चिंतित था… डॉक्टर घंटे-घंटे पर फ़ोन कर उसका हाल लेते रहते थे, पर उसमें यह अपनत्व और चिंता कहां थी…? वह तो अपना-अपना कर्त्तव्य निभा रहे थे… उसकी जगह यदि और कोई भी होता तो उसके साथ भी उनका वही व्यवहार होता.. उनका व्यवहार उनकी कुर्सी के प्रति था, न कि उसके प्रति लगाव के कारण..

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आज उसका यदि स्थानांतरण हो जाए तो ऐसी स्थिति में इनमें से शायद ही कोई उसका हालचाल पूछने आये. उसने नाम और शोहरत तो बहुत कमा लिया था, पर दिल एकदम खाली था… इस पूरी दुनिया में अपना कहने लायक मां-बाप के बाद शायद ही कोई बचा था. अपने अहंकार और अहम् के कारण वह स्वयं अपने परिवार से दूर होती गई थी. वैसे भी परिवार के नाम पर बस एक चाचा और एक बुआ ही तो थे.. पर जब भी वे आते, उसे लगता कि उससे कोई काम होगा…. तभी आये हैं… यह सोच उसे उनसे दूर करती चली गई… धीरे-धीरे उनका आना भी बंद हो गया. पिछले दस वर्षों से तो वह उन सबसे मिली भी नहीं है.

राज और आरती की नोक-झोंक में आज उसे रिश्तों की गर्माहट का एहसास हो चला था. शायद यही कारण था कि मां-पापा दो अलग-अलग व्यक्तित्व होते हुए भी सदा साथ-साथ रहे. कहीं-न-कहीं उनके बीच प्यार का सेतु अवश्य रहा होगा, जिसे पापा का उग्र स्वभाव भी नहीं तोड़ पाया. अगर ऐसा नहीं होता तो क्या वे पूरी ज़िंदगी एक साथ बिता पाते…? वही उनके दिलों में छिपे प्यार को पहचान नहीं पाई थी.

प्रियंका को लग रहा था कि वह पापा की उम्मीदों पर अवश्य खरी उतरी थी, पर मन का एक कोना इतना सब पाने के पश्‍चात् भी सूना रह गया था. सीढ़ी-दर-सीढ़ी सफलता के सोपानों पर चढ़ती स्वयं को आम औरतों से अलग समझने के कारण उसका रहन-सहन और बात करने का तरीक़ा भी अलग हो चला था. स्त्री सुलभ लज्जा का उसमें लेशमात्र भी अंश नहीं था. पर क्या वह मन के नारीत्व को मार पाई…?

यह सच है कि पिता उसके आदर्श रहे थे. वह उन्हीं के समान स्वतंत्र और निर्भीक जीवन व्यतीत करना चाहती थी, वह मां की तरह बंद दरवाज़े के भीतर घुटन और अपमानभरी, चौके-चूल्हे तक सीमित ज़िंदगी नहीं जीना चाहती थी. पर अब लगता है कि पापा ने न मां के साथ न्याय किया और न ही उसके साथ… मां से ज़्यादा पढ़ा होने के कारण वह सदा उन्हें नीचा दिखाते रहे. उनकी सही बात को भी अपने पुरुषोचित अहंकार के कारण ग़लत साबित करते रहे. अपनी कमी को उसके द्वारा पूरी करने की धुन में उन्होंने उसके नारीत्व को भी रौंद डाला…. बचपन से लड़कों के कपड़े पहनने के कारण उसका स्वभाव भी लड़कों जैसा ही बन चला था.

ये पिता के उपदेशों का ही असर था कि जब भी मां विवाह की बात चलाती, वह बिगड़ उठती. उसे लगता कि क्या वह किसी अनजान आदमी के साथ समझौता कर पायेगी? क्या वह अपनी पूरी ज़िदगी उसके बच्चों को बड़ा करने में बिता देगी? उसके अपने कैरियर का क्या होगा…? वह विवाह करके अपने कैरियर को तहस-नहस नहीं करना चाहती थी और न ही अपनी स्वतंत्रता में किसी का दख़ल चाहती थी. उसे लगता था बंधन हमेशा इंसान को कमज़ोर बनाते हैं… आख़िर क्या कमी है उसे, अच्छा पद है, पैसा है, फिर क्यों किसी का आधिपत्य स्वीकारे? ‘एकला चलो रे’ का मूलमंत्र अपनाते हुए उसने स्वयं को विवाहरूपी बंधन से मुक्त रखने का निश्‍चय कर लिया था.

– सुधा आदेश

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