कहानी- कुछ तो लोग कहेंगे 3 ...

कहानी- कुछ तो लोग कहेंगे 3 (Story Series- Kuch Toh Log Kahenge 3)

“जीवनसाथी छीनकर नियति जिसके संग वैसे ही इतना बड़ा अन्याय कर चुकी है, उसके प्रति समाज इतना निर्दयी कैसे हो सकता है? किसी को तो सब कुछ बदलना ही होगा स्वाति. किसी को तो आवाज़ उठानी ही होगी. तो फिर क्यों न तुम्हारी मां ही यह शुरूआत करे?” आंटी की आवाज़ में आक्रोश उतर आता, जो शनैः शनैः दुख में तब्दील होने लगता.

 

… लेकिन स्वाति के धैर्य का बांध जब तब टूटकर छलक उठता है. नहीं देख सकती वह अपनी प्यारी मां को जबरन इतना संयमित और मर्यादित जीवन जीते हुए. पापा चले गए, तो क्या इसके लिए मां दोषी हैं? समाज में, परिवार में इतने विधुर भी तो हैं. उन पर तो कोई वर्जनाएं नहीं हैं.
नीरजा आंटी को देखकर, तो मां के प्रति स्वाति की सहानुभूति और भी बढ़ जाती थी. उसे नीरजा आंटी से कोई ईर्ष्या नहीं थी. उसका आक्रोश तो समाज के दोहरे मापदंडों को लेकर था. अपना यह आक्रोश वह कई बार आंटी के सम्मुख व्यक्त भी कर चुकी थी. आंटी तो हैरानी से सुनती रह जाती थीं.
“कैसे और क्यों सह रही है तुम्हारी मां यह सब? रंगीन कपड़े नहीं पहनना, नॉनवेज नहीं खाना, श्रृंगार नहीं करना, मांगलिक अवसरों में सम्मिलित नहीं होना… मन का दुख दर्शाने के भला ये कौन-से तरीक़े हैं? किसे फ़र्क़ पड़ रहा है उनके स्वयं पर इस तरह के अत्याचारों से? तथाकथित लोगों को? मुझे तो नहीं लगता लोगों को फ़र्क़ पड़ता होगा, बल्कि जिन्हें फ़र्क़ पड़ रहा है, जो उनके लिए परेशान, दुखी हो रहे हैं यानी तुम घरवाले. तो उन्हें तुम लोगों के बारे में पहले सोचना चाहिए.”
“वे सोचती हैं पर लोग…” स्वाति शायद मां पर आक्षेप सह न सकी. इसलिए बचाव में उतर आई.
“जीवनसाथी छीनकर नियति जिसके संग वैसे ही इतना बड़ा अन्याय कर चुकी है, उसके प्रति समाज इतना निर्दयी कैसे हो सकता है? किसी को तो सब कुछ बदलना ही होगा स्वाति. किसी को तो आवाज़ उठानी ही होगी. तो फिर क्यों न तुम्हारी मां ही यह शुरूआत करे?” आंटी की आवाज़ में आक्रोश उतर आता, जो शनैः शनैः दुख में तब्दील होने लगता.
“एक ही नाव की सवार होने के कारण मैं तुम्हारी मां का दुख अच्छे से समझ सकती हूं. तुम उन्हें कुछ दिनों के लिए यहां क्यूं नहीं ले आतीं?”
“सारे प्रयास करके थक चुकी हूं आंटी. वे तो घर के बाहर कदम निकालने को तैयार ही नहीं हैं.” स्वाति के स्वर में हताशा उभर आती. आंटी उसका हाथ सहलाकर दिलासा देने लगती, तो स्वाति उनके प्रति कृतज्ञ हो उठती.

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“आपसे सब कुछ शेयर कर मन हल्का हो जाता है. मां से तो यह सब कह भी नहीं पाती.”
“उम्मीद न छोड़ो बिटिया. शायद वक़्त के साथ हालात संभल जाएं. सब ख़ुद-ब-ख़ुद ठीक हो जाए.” स्वाति को दिलासा देती आंटी ख़ुद अपने आश्वासनों को लेकर आशंकित बनी रहतीं.

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

Anil Mathur

अनिल माथुर

 

 

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