कहानी- मोहभंग 1 (Story Seri...

कहानी- मोहभंग 1 (Story Series- Mohbhang 1)

बुआ की बातें वैसे भी अबूझ होती थीं. कभी कहतीं, “पराए घर जाएगी तो…” और कभी कहतीं, “अपने घर जाकर जो मर्ज़ी करना, यहां लड़की बनकर रहो.” मुझ पर बस न चलता, तो बुआ मां को समझाने लगतीं, “लड़की को घर पर बैठना सिखाओ. घर का कुछ कामकाज सीखे. कौन-सा उसे नौकरी करनी है, जो पढ़ाए चले जा रहे हो.” 

बहरहाल, मैं बुआ की बातों को नज़रअंदाज़ करके साइकिल उठा घूमने चली जाती. क्या करूं, मुझे ‘घर घिस्सू टाइप’ लोगों से बहुत कोफ़्त होती थी.

निखिल के काम पर जाते ही मैंने दरवाज़ा बंद किया और जाकर सोफे पर बैठ गई. थोड़ा-बहुत काम अभी बाक़ी था, परंतु सामने पहाड़-सा दिन भी तो पड़ा था- ‘नीरस और उबाऊ.’ इस कमरे से उस कमरे तक, बस इतने में ही सिमट गई थी मेरी दिनचर्या. घर में हम तीन ही तो प्राणी थे. मांजी धार्मिक प्रवृति की थीं. स्नान के पश्‍चात घंटाभर अपने पूजाघर में बितातीं, उसके पश्‍चात ही अन्न ग्रहण करतीं.

छह माह हो गए थे मेरे विवाह को और हर दिन ऐसे ही बीता था, सिवाय पहले के 15 दिन, जब लोगों का आना-जाना रहा. निखिल दिनभर कोर्ट-कचहरी में व्यस्त रहते, छुट्टी के दिन भी कुछ-न-कुछ काम लेकर बैठे रहते. घूमना-फिरना, मित्रमंडली, फिल्मों इत्यादि में उनकी रुचि बिल्कुल नहीं थी, जबकि मुझे इन सबके बिना जीवन बेकार लगता था. मेरे लिए जीवन एक उत्सव यात्रा थी. अपने कर्त्तव्य निभाने से इंकार नहीं था मुझे, परंतु इस जीवन को भरपूर जीना चाहती थी मैं. निखिल की ओर से कोई रोक भी नहीं थी, परंतु मेरे संगी-साथी तो सब पीछे छूट चुके थे और इस छोटे-से शहर में मुझे अभी तक कोई ऐसी संगिनी मिली ही नहीं थी, जिसके साथ मैं मौज-मस्ती कर सकूं. बहुत पारंपरिक क़िस्म के लोग रहते थे हमारे आसपास, जहां स्त्रियां अपनी घर-गृहस्थी में ही ख़ुश थीं. मांजी ने अपनी पूरी उम्र यहीं बिताई थी, इसलिए वह भी उन्हीं विचारों की थीं. मैं उनकी पूरी देखभाल करती थी.

प्याज़-लहसुन बग़ैर उनकी पसंद का भोजन बनाती, समय पर परोसती, पर उसके बाद भी तो बड़ा-सा दिन बच जाता था.

‘आप ग़लत थे पापा जो सोचते थे कि मनोज मेरे लिए उपयुक्त वर नहीं था और निखिल के संग ख़ुश रहूंगी मैं.’ मन-ही-मन मैं अपने पापा से कहती. ‘कुछ भी तो यहां मेरे मन-माफ़िक़ नहीं है.’

विवाह से पहले मैं कभी रसोई में नहीं घुसी थी और यहां आने पर मांजी अपेक्षा करने लगीं कि अब रसोई मैं ही संभालूंगी. पहले दिन वह दाल चढ़ाने को बोल मंदिर चली गईं. यह तो अच्छा था कि छुट्टी का दिन था और निखिल घर पर थे. मैंने उनसे अपनी समस्या बताई, तो उन्होंने रसोई में आकर मेरी सहायता भी की और सब कुछ ब्योरेवार समझाया भी. बाद में भी कोई समस्या आने पर वह मुझे गाइड करते. मांजी की तबीयत ख़राब होने पर विवाह से पूर्व वह ही उनकी सहायता किया करते थे, इसलिए उन्हें भोजन बनाना आ गया था. अच्छे इंसान थे निखिल, परंतु जिस तरह के जीवनसाथी की मैंने कल्पना की थी, उससे बहुत भिन्न.

मम्मी-पापा की लाडली थी मैं और मुझे हर तरह की आज़ादी मिली हुई थी. पापा मुझे अपनी शहज़ादी कहते. न भाई, न बहन, उनका पूरा प्यार मेरे लिए था. थोड़ा बिगड़ गई थी मैं शायद. लड़कों की तरह घूमना, मनमर्ज़ी करना. मां तो कुछ न कहतीं, पर बुआ जब भी आतीं, मम्मी-पापा को एक लंबा-सा भाषण दे जातीं. ‘बिगाड़ रहे हो बेटी को’ वह कहतीं. “पराए घर जाएगी, तो नाक कटवाएगी तुम्हारी.” उनकी यह पराए घरवाली बात मेरी समझ न आती. यहां तो फिर भी मम्मी-पापा को बताना पड़ता था कि कहां जा रही हूं, विवाह के बाद तो किसी से पूछने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी. वह तो मेरा अपना घर होगा. बुआ की बातें वैसे भी अबूझ होती थीं. कभी कहतीं, “पराए घर जाएगी तो…” और कभी कहतीं, “अपने घर जाकर जो मर्ज़ी करना, यहां लड़की बनकर रहो.” मुझ पर बस न चलता, तो बुआ मां को समझाने लगतीं, “लड़की को घर पर बैठना सिखाओ. घर का कुछ कामकाज सीखे. कौन-सा उसे नौकरी करनी है, जो पढ़ाए चले जा रहे हो.”

बहरहाल, मैं बुआ की बातों को नज़रअंदाज़ करके साइकिल उठा घूमने चली जाती. क्या करूं, मुझे ‘घर घिस्सू टाइप’ लोगों से बहुत कोफ़्त होती थी.

यह भी पढ़ेशादी से पहले दिमाग़ में आनेवाले 10 क्रेज़ी सवाल (10 Crazy Things Which May Bother You Before Marriage)

इन्हीं मौज-मस्ती से भरे दिनों में मेरी मनोज से दोस्ती हुई थी. कॉलेज का वार्षिक उत्सव था. मुझे खेलकूद में बहुत सारे इनाम मिलने थे. पारितोषिक वितरण के पश्‍चात चाय-नाश्ते का प्रबंध भी था. कॉलेज यूनियन का अध्यक्ष था मनोज, मुझसे तीन वर्ष सीनियर. चाय के दौरान मेरे पास आकर बोला, “कल कॉफी पीने चलें, ठीक चार बजे?” और मेरे उत्तर देने से पहले ही जोड़ दिया, “मैं इंतज़ार करूंगा कैफेटेरिया में.” पहली बार एहसास हुआ दिल की धड़कन तेज़ होना किसे कहते हैं. मेरा दिमाग़ सातवें आसमान पर. लड़कियां दीवानी थीं उसकी और उसने स्वयं मुझे आमंत्रित किया था. हमारी यह छोटी-सी मुलाक़ात कॉफी से शुरू होकर गहरी मैत्री तक पहुंच गई. ख़ूब पटती थी हम दोनों की. वह भी घूमने-फिरने का बहुत शौकीन था और उसके पास निजी कार भी थी. हमारा कोई-न-कोई कार्यक्रम बना ही रहता. उसके पिता का अपना कारोबार था, पढ़ाई तो वह बस डिग्री पाने के लिए कर रहा था. और मुझे भी घर में स्पष्ट कर दिया गया था कि बीए कर लो बहुत है, नौकरी थोड़े ही करनी है.

usha vadhava

        उषा वधवा

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